राजस्थान की वीर-प्रसूता धरा पर लोकदेवताओं का स्थान केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है, अपितु यह सामाजिक सुधार, वचनबद्धता और पर्यावरण संरक्षण का एक जीवंत इतिहास है। इस परंपरा में ‘पाबूजी राठौड़’ का नाम अत्यंत आदर और श्रद्धा के साथ लिया जाता है। मारवाड़ के राठौड़ वंश में जन्में पाबूजी को ‘गौरक्षक’, ‘वचन-पालक’ और ‘अछूतोद्धारक’ के रूप में पूजा जाता है। अकादमिक दृष्टिकोण से, पाबूजी का व्यक्तित्व सांप्रदायिक सद्भाव का एक उत्कृष्ट उदाहरण है, जहाँ हिंदू उन्हें भगवान राम के अनुज ‘लक्ष्मण का अवतार’ मानते हैं, वहीं मेहर जाति के मुसलमान उन्हें ‘पीर’ मानकर पूजते हैं।

1. जीवन परिचय एवं ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
इतिहासकार मुहणौत नैणसी, महाकवि मोडजी आशिया और समकालीन लोकसाहित्य के अनुसार, पाबूजी का संबंध मारवाड़ के राठौड़ राजवंश से है।
- जन्म एवं समय: पाबूजी का जन्म वि.सं. 1313 (तदनुसार 1239 ईस्वी) में हुआ था।
- जन्म स्थान (नवीनतम प्रशासनिक अपडेट): उनका जन्म कोलू (कोलूमण्ड) गाँव में हुआ। राजस्थान में नए जिलों के गठन (अगस्त 2023) के पश्चात, अब यह स्थान फलौदी जिले की फलौदी तहसील के अंतर्गत आता है (पूर्व में यह जोधपुर जिले में था)।
- वंशावली: पाबूजी मारवाड़ के राव आस्थान जी के पौत्र और धांधलजी राठौड़ के पुत्र थे। उनकी माता का नाम कमला दे था। जनश्रुतियों और ‘पाबू प्रकाश’ ग्रंथ के अनुसार, इनका जन्म एक अप्सरा (परी) के गर्भ से बाड़मेर के निकट खारी खाबड़ के जूना नामक स्थान पर हुआ माना जाता है।
- परिवार: इनका विवाह अमरकोट (वर्तमान पाकिस्तान) के सोढ़ा राणा सूरजमल की पुत्री सुपियार दे (फूलम दे) के साथ तय हुआ था।
2. सामाजिक समरसता और सुधारवादी दृष्टिकोण
पाबूजी मात्र एक योद्धा नहीं, अपितु एक महान समाज सुधारक भी थे। मध्यकालीन सामंती व्यवस्था में जब जाति-पाति का भेदभाव चरम पर था, तब पाबूजी ने सामाजिक समानता का बिगुल बजाया।
- शरणागत वत्सलता: ऐतिहासिक ग्रंथ ‘नैणसी री ख्यात’ पुष्टि करती है कि पाबूजी ने तत्कालीन समाज में ‘म्लेच्छ’ और अछूत मानी जाने वाली ‘थोरी’ जाति (नायक/भील समुदाय) के सात भाइयों (चांदा, डेमा, हरमल आदि) को न केवल शरण दी, बल्कि उन्हें अपने प्रधान सरदारों में शामिल कर सम्मानजनक स्थान दिलाया।
- आराध्य देव: आज भी थोरी और भील जाति के लोग पाबूजी को अपना मुख्य आराध्य मानते हैं और ‘सारंगी’ वाद्य यंत्र के साथ उनकी यशोगाथा गाते हैं। इसके अतिरिक्त, रायका (रेबारी) जाति, जो परंपरागत रूप से ऊँट पालक है, उन्हें अपना कुलदेवता मानती है।
3. वीरता और बलिदान: गायों की रक्षार्थ महाप्रयाण
पाबूजी के जीवन की सबसे महत्वपूर्ण घटना उनका ‘गौरक्षा’ के लिए किया गया बलिदान है, जो क्षत्रिय धर्म और वचन-पालन का सर्वोच्च उदाहरण है।
- विवाद की पृष्ठभूमि: पाबूजी के बहनोई, जायल (नागौर) के शासक जींदराव खींची, और पाबूजी के मध्य पुराना वैर था। जींदराव की नजर चारणी महिला ‘देवल’ की अति सुंदर घोड़ी ‘केसर कालमी’ पर थी, लेकिन देवल ने वह घोड़ी पाबूजी को इस शर्त पर दी थी कि जब भी उनकी गायों पर संकट आएगा, पाबूजी उनकी रक्षा करेंगे।
- विवाह मंडप से प्रस्थान: 1276 ई. में जब पाबूजी अमरकोट में फेरे ले रहे थे, तभी जींदराव खींची ने देवल चारणी की गायों का अपहरण कर लिया। वचनबद्ध पाबूजी ने साढ़े तीन फेरे लिए ही थे कि देवल की पुकार सुनकर वे विवाह मंडप छोड़कर, केसर कालमी घोड़ी पर सवार होकर युद्ध के लिए निकल पड़े।
- वीरगति: जोधपुर (अब फलौदी जिला) के देचू गाँव के पास भीषण युद्ध हुआ। 1276 ई. में अपने बहनोई जींदराव खींची से लड़ते हुए पाबूजी वीरगति को प्राप्त हुए। उनकी पत्नी फूलमदे उनके साथ सती हुईं। इस बलिदान ने उन्हें लोकदेवता के पद पर प्रतिष्ठित कर दिया।
4. ऊँटों के देवता: सांस्कृतिक मान्यता
राजस्थान की मरुस्थलीय संस्कृति में पाबूजी का विशेष महत्व है।
- ऊंट रक्षक: मारवाड़ क्षेत्र में सर्वप्रथम ऊँट (सांड) लाने का श्रेय पाबूजी को ही दिया जाता है।
- रोग निवारण: मान्यता है कि ऊँटों के बीमार होने पर पाबूजी के नाम की ‘तांती’ (धागा) बांधने और उनकी मन्नत मांगने से पशु स्वस्थ हो जाते हैं। यही कारण है कि ऊँट पालक रेबारी समाज उन्हें अपना इष्टदेव मानता है।
5. साहित्यिक और कलात्मक विरासत
पाबूजी की कीर्ति राजस्थानी साहित्य और कला में अमिट है। उनकी शौर्य गाथाओं को विभिन्न विधाओं में संजोया गया है:
- पाबूजी की फड़ (Phad Painting):
- यह कपड़े पर चित्रित एक लोकगाथा है। राजस्थान के लोकदेवताओं में पाबूजी की फड़ सबसे लोकप्रिय है (यद्यपि सबसे लंबी फड़ देवनारायण जी की है, लेकिन जन-मान्यता में पाबूजी की फड़ का स्थान विशिष्ट है)।
- वाचन: ऊँट के स्वस्थ होने पर या मन्नत पूरी होने पर ‘भोपा-भोपी’ (विशेषकर नायक या थोरी जाति के) द्वारा ‘रावणहत्था’ वाद्य यंत्र के साथ इसका वाचन किया जाता है।
- पाबूजी के पावड़े (वीरगाथा गीत):
- पाबूजी के वीररस प्रधान गीतों को ‘पावड़े’ कहा जाता है। इनका गायन ‘माठ’ (मिट्टी का बड़ा मटका) वाद्य यंत्र के साथ किया जाता है।
- प्रमुख ग्रंथ:
- पाबू प्रकाश: आशिया मोडजी द्वारा रचित यह ग्रंथ पाबूजी की प्रामाणिक जीवनी माना जाता है।
- पाबूजी रा छंद: मेहाजी बीठू द्वारा रचित।
- पाबूजी रा दोहा: लघराज द्वारा रचित।
6. परीक्षा उपयोगी महत्वपूर्ण तथ्य (संक्षिप्त सारांश)
प्रतियोगी परीक्षाओं और शोध की दृष्टि से अद्यतन तथ्य निम्नलिखित हैं:
| विवरण | तथ्य |
|---|---|
| उपनाम | ऊँटों के देवता, गौ-रक्षक, प्लेग रक्षक देवता, हाड़-फाड़ के देवता, लक्ष्मण का अवतार। |
| जन्म | 1239 ई. (चैत्र अमावस्या)। |
| पिता/माता | धांधलजी राठौड़ / कमला दे। |
| पत्नी | सुपियार दे (फूलम दे) – अमरकोट की राजकुमारी। |
| सवारी | केसर कालमी (काले रंग की घोड़ी)। |
| प्रतीक चिह्न | भाला लिए हुए अश्वारोही और बाईं ओर झुकी हुई पाग (पगड़ी)। |
| मुख्य मंदिर | कोलू मण्ड (जिला- फलौदी)। |
| मेला | प्रतिवर्ष चैत्र अमावस्या को कोलू मण्ड में विशाल मेला भरता है। |
| आराध्य | मेहर जाति के मुसलमान, थोरी (नायक) समाज और रेबारी (रायका) जाति। |
| विशेष वाद्य | फड़ वाचन में ‘रावणहत्था’ और पावड़ों में ‘माठ’। |
निष्कर्ष: पाबूजी राठौड़ का चरित्र हमें सिखाता है कि महानता का आधार जन्म नहीं, अपितु कर्म है। गायों और अबलाओं की रक्षार्थ राज-पाट और वैवाहिक सुख का त्याग कर देना भारतीय संस्कृति के ‘त्याग’ और ‘बलिदान’ का सर्वोच्च आदर्श है। वर्तमान समय में भी सामाजिक समरसता और पशु-प्रेम के प्रतीक के रूप में पाबूजी की प्रासंगिकता अक्षुण्ण बनी हुई है।









