
राजस्थान की वीर-प्रसूता धरा पर लोकदेवताओं का स्थान अत्यंत विशिष्ट है। यहाँ के जनमानस में ‘पंच पीरों’ के अतिरिक्त जिस लोकदेवता की सर्वाधिक मान्यता और व्यापक प्रभाव है, वे हैं— वीर तेजाजी। तेजाजी केवल एक ऐतिहासिक पुरुष नहीं, बल्कि वचनबद्धता, गौ-रक्षा, और वीरता के पर्याय हैं। उनका जीवन चरित्र कृषक समाज और आम जनमानस के लिए त्याग और बलिदान की एक आदर्श गाथा है।
1. जीवन परिचय
वीर तेजाजी का अवतरण उस कालखंड में हुआ जब भारत में अस्थिरता थी और स्थानीय स्तर पर गौ-धन की रक्षा एक परम कर्तव्य माना जाता था। प्रमाणिक स्रोतों और लोक साहित्य के आधार पर उनका जीवन विवरण निम्नलिखित है:
- जन्म एवं वंश: तेजाजी का जन्म विक्रम संवत 1130 (ईस्वी सन् 1073) में माघ शुक्ल चतुर्दशी को हुआ था। वे नागवंशीय जाट समुदाय से ताल्लुक रखते थे और उनका गोत्र ‘धौल्या’ था।
- जन्म स्थान: इनका जन्म तत्कालीन मारवाड़ राज्य के नागौर परगने के खरनाल (खड़नाल) गाँव में हुआ।
- माता-पिता: इनके पिता का नाम ताहड़जी (जिन्हें बख्शाराम जी के नाम से भी जाना जाता है) था, जो खरनाल के प्रतिष्ठित जागीरदार थे। इनकी माता का नाम रामकुंवरी था। लोकगाथाओं के अनुसार, तेजाजी का जन्म भगवान शिव की कठोर तपस्या और आशीर्वाद के फलस्वरूप हुआ था।
- विवाह: इनका विवाह बचपन में ही पनेर (वर्तमान में रूपनगढ़ के पास) के रायमल जी (कुछ स्रोतों में रामचंद्र जी) की पुत्री पेमल दे के साथ हुआ था।
लोक-साहित्य में तेजाजी की स्तुति: “लौपे नाहिं लगार, वासक तेजा रा वचन। कदी न भाजे कार, नौखण्ड भादे नीकली॥ भवंग असल गया भाग, नाहिं कबै आवे नजर। नाहिं सतावै नाग, नौखण्ड मांदे वनकली॥”
यह दोहा तेजाजी की वचनबद्धता और नाग देवता (वासुकी) के साथ उनके संबंध को रेखांकित करता है।
2. शौर्य गाथा और लाछा गूजरी का प्रसंग (The Saga of Valor)
तेजाजी के जीवन का सबसे महत्वपूर्ण अध्याय उनकी सत्यवादिता और गौ-रक्षा के लिए किया गया बलिदान है।
एक बार जब वे अपनी पत्नी पेमल दे को विदा कराने अपने ससुराल पनेर गए हुए थे, उसी समय उस क्षेत्र में ‘मेर’ (Meena tribe) लुटेरों का आतंक था। उसी रात मेर लुटेरों ने पनेर की लाछा गूजरी की गायों का अपहरण कर लिया। लाछा गूजरी, जो तेजाजी की पत्नी की सहेली थी, ने तेजाजी से गुहार लगाई।
शरण में आए व्यक्ति की सहायता करना और गौ-धन की रक्षा करना क्षत्रिय धर्म मानते हुए, तेजाजी ने अकेले ही लुटेरों का पीछा किया।
नाग देवता और वचनबद्धता (The Divine Promise)
रास्ते में सेंदरिया (ब्यावर के पास) नामक स्थान पर उन्होंने एक सर्प को अग्नि में जलते हुए देखा। दयावश उन्होंने सर्प को आग से बाहर निकाल दिया। लेकिन सर्प (जो नागराज वासुकी का रूप माने जाते हैं) क्रोधित हो गया क्योंकि तेजाजी ने उसे मोक्ष (मृत्यु) प्राप्त करने से रोक दिया था। सर्प ने उन्हें डसने की इच्छा जताई।
यहाँ तेजाजी के चरित्र की महानता दिखाई देती है। उन्होंने मृत्यु के भय से भागने के बजाय सर्प को वचन दिया: “हे नागराज! मैं अभी गौ-रक्षा के लिए जा रहा हूँ। यदि मैं जीवित बचा, तो गायों को छुड़ाकर स्वयं आपके पास आऊँगा, तब आप मुझे डस लेना।”
3. बलिदान और निर्वाण (Sacrifice and Nirvana)
तेजाजी ने मंडावरिया की पहाड़ियों में मेर लुटेरों के साथ भीषण युद्ध किया और लाछा गूजरी की समस्त गायों को मुक्त कराया। इस युद्ध में वे बुरी तरह घायल हो गए; उनका पूरा शरीर क्षत-विक्षत हो गया था।
विजयी होने के बावजूद, वे घर नहीं लौटे। अपने वचन को निभाने के लिए वे वापस उसी स्थान पर आए जहाँ नाग प्रतीक्षा कर रहा था। तेजाजी की लहुलुहान अवस्था देखकर नाग ने कहा, “तुम्हारे शरीर पर तो डसने के लिए कोई जगह ही नहीं बची है।”
तब वीर तेजाजी ने अपनी जिह्वा (जीभ) आगे कर दी, जो एकमात्र सुरक्षित स्थान था। नागराज ने उनकी सत्यवादिता से प्रसन्न होकर उन्हें आशीर्वाद दिया और उनकी जीभ पर दंश दिया।
- निर्वाण स्थल: सर्प दंश के कारण सुरसुरा (किशनगढ़ के पास) नामक स्थान पर भाद्रपद शुक्ल दशमी (तेजा दशमी), संवत 1160 (लगभग 1103 ई.) को उन्होंने नश्वर देह का त्याग किया।
- सती प्रथा: उनकी पत्नी पेमल दे ने उनके साथ सुरसुरा में ही सती होकर अपने पतिव्रत धर्म का पालन किया।
4. धार्मिक महत्व एवं लोक मान्यताएँ (Religious Significance)
वर्तमान में तेजाजी को केवल एक योद्धा के रूप में नहीं, बल्कि एक सिद्ध देव के रूप में पूजा जाता है।
- काला और बाला के देवता (Deity of Kala and Bala):
- काला: इसका अर्थ है नाग (सर्प)। मान्यता है कि सर्प-दंशित व्यक्ति यदि तेजाजी के नाम की ‘तांत’ (डोरी) दायें पैर में बांध ले, तो विष का प्रभाव खत्म हो जाता है।
- बाला: यह एक प्रकार का रोग है (नारू रोग/Guinea worm)। तेजाजी को इस रोग से मुक्ति दिलाने वाला देवता भी माना जाता है।
- कृषि कार्यों के उपकारक देवता: राजस्थान के किसान फसल की बुवाई शुरू करने से पहले तेजाजी का स्मरण करते हैं। हल जोतते समय किसान जो गीत गाते हैं, उन्हें ‘तेजा टेर’ कहा जाता है। यह गीत अच्छी फसल और वर्षा की कामना के साथ गाए जाते हैं।
- पूजा प्रतीक: तेजाजी की प्रतिमाओं में उन्हें प्रायः एक तलवारधारी अश्वारोही योद्धा के रूप में दर्शाया जाता है, जिसकी जीभ पर एक सर्प डस रहा है। उनकी घोड़ी का नाम लीलण (शृंगारी) था, जो लोकगीतों में अत्यंत प्रिय पात्र है।
5. प्रमुख तीर्थ स्थल एवं मेले (Major Pilgrimage Sites & Updates)
राजस्थान के नवीन जिलों के गठन (2023) के बाद कुछ स्थानों की प्रशासनिक स्थिति में परिवर्तन आया है, जिसका विवरण अद्यतन रूप में नीचे दिया गया है:
| क्रम | स्थल का नाम | विवरण | जिला (वर्तमान स्थिति) |
|---|---|---|---|
| 1. | खरनाल | जन्म स्थली और भव्य मंदिर का निर्माण कार्य प्रगति पर है। | नागौर |
| 2. | परबतसर | राज्य का सबसे बड़ा पशु मेला (तेजाजी पशु मेला) यहीं लगता है। | डीडवाना-कुचामन (पूर्व में नागौर) |
| 3. | सुरसुरा | निर्वाण स्थली (जहाँ मृत्यु हुई)। | अजमेर (किशनगढ़ के पास) |
| 4. | सेंदरिया | जहाँ नाग ने डसा था। | ब्यावर (पूर्व में अजमेर) |
| 5. | भावंता | यहाँ सर्प दंश का इलाज गोमूत्र और मंत्रों से किया जाता है। | अजमेर |
| 6. | बांसी-दुगारी | तेजाजी की कर्मस्थली मानी जाती है। | बूंदी |
तेजा दशमी मेला: प्रतिवर्ष भाद्रपद शुक्ल दशमी को ‘तेजा दशमी’ मनाई जाती है। इस अवसर पर परबतसर में विशाल मेले का आयोजन होता है। यह मेला श्रावण पूर्णिमा से भाद्रपद अमावस्या तक चलता है, जो न केवल धार्मिक बल्कि आर्थिक दृष्टि से (नागोरी बैलों के व्यापार के लिए) भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।
6. सांस्कृतिक धरोहर एवं विशेष तथ्य (Key Facts & Cultural Heritage)
- डाक टिकट (Postal Stamp): तेजाजी की लोक-मान्यता को राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान देते हुए, भारतीय डाक विभाग ने 2011 में वीर तेजाजी पर 5 रुपये का डाक टिकट जारी किया।
- फड़ चित्रण (Phad Painting): तेजाजी की ‘फड़’ (कपड़े पर चित्रित गाथा) का वाचन नायक जाति के भोपों द्वारा किया जाता है, हालांकि यह पाबूजी की फड़ जितनी लंबी नहीं होती।
- जागृति (Jagran): ग्रामीण अंचलों में तेजाजी की जोत जलाई जाती है और रात्रि जागरण किया जाता है।
- मंदिर (थान): तेजाजी के पूजा स्थल को सामान्यतः ‘थान’ कहा जाता है, जो प्रायः खेजड़ी वृक्ष के नीचे होते हैं। पुजारी को ‘घोड़ला’ कहा जाता है।
निष्कर्ष वीर तेजाजी का जीवन यह शिक्षा देता है कि प्राणों से भी बढ़कर ‘वचन’ और ‘परोपकार’ का मूल्य होता है। जाति-पांति के बंधनों से ऊपर उठकर, उन्होंने सर्वसमाज और मूक पशुओं की रक्षा के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया। यही कारण है कि सदियों बाद भी राजस्थान के कण-कण में उनकी गाथा ‘तेजा टेर’ के रूप में गूंजती है।