राजस्थान में वन्य जीव एवं जैव-विविधता संरक्षण

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1. प्रस्तावना

राजस्थान, अपनी भौगोलिक विविधता के साथ-साथ समृद्ध वन्य जीवन के लिए भी जाना जाता है। राज्य में वन्य जीवों के संरक्षण का इतिहास और उससे जुड़े वैधानिक प्रावधान अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।

  • राजस्थान वन्य-पक्षी संरक्षण अधिनियम, 1951: स्वतंत्रता के पश्चात, वन्य जीवों की सुरक्षा की दिशा में पहला ठोस कदम उठाते हुए, राज्य सरकार द्वारा 23 अप्रैल 1951 को यह अधिनियम लागू किया गया।
  • वन्य जीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972: भारत सरकार द्वारा राष्ट्रीय स्तर पर वन्य जीवों की सुरक्षा सुनिश्चित करने हेतु 9 सितम्बर 1972 को यह ऐतिहासिक अधिनियम लागू किया गया। राजस्थान राज्य में इस केंद्रीय अधिनियम को 1 सितम्बर 1973 से प्रभावी किया गया।
  • रेड डाटा बुक (Red Data Book): यह एक अंतर्राष्ट्रीय दस्तावेज है जिसमें संकटग्रस्त (Endangered) एवं विलुप्त (Extinct) हो रहे जंतुओं तथा वनस्पतियों का विस्तृत विवरण अंकित किया जाता है, ताकि उनके संरक्षण की योजना बनाई जा सके।

कैलाश सांखला: भारत के ‘टाइगर मैन’

बाघ संरक्षण के क्षेत्र में राजस्थान के कैलाश सांखला का योगदान अविस्मरणीय है। उन्हें ‘टाइगर मैन ऑफ इंडिया’ (Tiger Man of India) की उपाधि से विभूषित किया गया है। वे भारत में ‘बाघ संरक्षण परियोजना’ (Project Tiger) के मुख्य सूत्रधार और निर्माता थे। वन्य जीवन के प्रति अपने समर्पण को व्यक्त करते हुए उन्होंने ‘Tiger’ और ‘Return of the Tiger’ नामक प्रसिद्ध पुस्तकें भी लिखीं। राज्य सरकार उनके नाम पर ‘कैलाश सांखला वन्य जीव पुरस्कार’ भी प्रदान करती है।

rajasthan forest map
राजस्थान में वन्य जीव एवं जैव-विविधता संरक्षण

2. राष्ट्रीय उद्यान (National Parks)

यद्यपि प्रशासनिक और आधिकारिक तौर पर राजस्थान में मुख्य रूप से 3 राष्ट्रीय उद्यान माने जाते हैं, परन्तु अकादमिक दृष्टिकोण (जैसे डॉ. हरि मोहन सक्सेना की ‘राजस्थान का भूगोल’) से 5 राष्ट्रीय उद्यान (रणथम्भौर, केवलादेव, सरिस्का, मरु उद्यान, मुकुन्दरा) माने जाते हैं।

(i) रणथम्भौर राष्ट्रीय उद्यान (Ranthambore National Park)

  • अवस्थिति: सवाई माधोपुर जिला।
  • क्षेत्रफल: लगभग 392 वर्ग किलोमीटर।
  • ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: इसका प्राचीन नाम ‘रण स्तम्भपुर’ है। ऐतिहासिक रूप से यह सवाई माधोपुर के शासकों का निजी आखेट (शिकार) क्षेत्र था।
  • संवैधानिक स्थिति:
    • 1955 में इसे ‘अभयारण्य’ घोषित किया गया।
    • 1973 में ‘वन्य जीव संरक्षण अधिनियम, 1972’ के तहत इसे ‘टाइगर प्रोजेक्ट’ में शामिल किया गया (राजस्थान का प्रथम टाइगर प्रोजेक्ट)।
    • 1 नवम्बर 1980 को इसे ‘राष्ट्रीय उद्यान’ का दर्जा दिया गया।
  • विशेषता: यह अरावली और विंध्याचल पर्वतमालाओं के संगम पर स्थित है। इसे ‘Land of Tiger’ (बाघों की भूमि) भी कहा जाता है। यह भारत की सबसे छोटी बाघ परियोजना मानी जाती है।
  • जैव-विविधता: इसे ‘भारतीय बाघों का घर’ कहा जाता है। यहाँ बाघों के अतिरिक्त घड़ियाल, चीतल, नीलगाय, सांभर, रीछ, और जरख जैसे वन्य जीव बहुतायत में पाए जाते हैं।
  • प्रमुख दर्शनीय स्थल: रणथम्भौर दुर्ग, जोगी महल, गिलाई सागर, त्रिनेत्र गणेश मंदिर, बकौला, राजबाग के खंडहर, पदम तालाब, लकरदा, अनंतपुर और काचिदा घाटी। यहाँ क्षेत्रीय प्राकृतिक विज्ञान संग्रहालय भी स्थापित किया गया है।
  • विकास परियोजना: यहाँ विश्व बैंक के सहयोग से ‘इंडिया इको-डेवलपमेंट प्रोजेक्ट’ (India Eco. Dev. Project) वर्ष 1998 से 2004 तक (6 वर्षों के लिए) संचालित किया गया था।

(ii) केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान (Keoladeo National Park)

  • अवस्थिति: भरतपुर।
  • क्षेत्रफल: लगभग 28.73 वर्ग किमी।
  • उपनाम: घना पक्षी विहार, पक्षियों का स्वर्ग (Paradise of Birds)।
  • महत्व: यह एशिया की सबसे बड़ी पक्षी प्रजनन स्थली है। यह राष्ट्रीय उद्यान गंभीर और बाणगंगा नदियों के संगम पर स्थित है तथा ‘सुनहरा त्रिकोण’ (दिल्ली-आगरा-जयपुर) पर्यटक परिपथ पर अवस्थित है।
  • संवैधानिक स्थिति:
    • 1956 में इसे अभयारण्य घोषित किया गया।
    • 1981 में इसे राष्ट्रीय उद्यान का दर्जा मिला (राज्य का दूसरा राष्ट्रीय उद्यान)।
    • 1985 में यूनेस्को (UNESCO) ने इसे ‘विश्व प्राकृतिक धरोहर’ सूची में शामिल किया।
    • यह रामसर कन्वेंशन के तहत एक ‘रामसर साइट’ (आर्द्रभूमि) भी है। (नोट: राजस्थान में दूसरी रामसर साइट सांभर झील है)।
  • जैव-विविधता:
    • प्रवासी पक्षी: यहाँ शीतकाल में यूरोप के साइबेरिया प्रांत से साइबेरियन क्रेन (सारस) आते हैं और ग्रीष्मकाल में प्रजनन के पश्चात लौट जाते हैं।
    • अन्य जीवों में सुर्खाव, लाल गर्दन वाले तोते, और जलमानुष (उदबिलाव) प्रमुख हैं।
    • यहाँ के ‘पाइथन पॉइंट’ पर अजगरों को देखा जा सकता है।
    • प्रसिद्ध पक्षी वैज्ञानिक डॉ. सलीम अली की यह कर्मस्थली रही है।
    • इस उद्यान को जल की आपूर्ति ‘अजान बांध’ (तथा गोवर्धन ड्रेन) से होती है।

विशेष अध्ययन: बोमा तकनीक (Boma Technique) राजस्थान के केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान में वन्य जीव स्थानांतरण हेतु अफ्रीका की प्रसिद्ध ‘बोमा तकनीक’ का प्रयोग किया गया।

  • उद्देश्य: चीतल या चित्तीदार हिरणों को पकड़कर मुकुंदरा हिल्स टाइगर रिज़र्व में स्थानांतरित करना, ताकि वहां बाघों के लिए शिकार (Prey Base) उपलब्ध हो सके।
  • प्रक्रिया: इसमें फनल (Funnel) जैसी बाड़ के माध्यम से जानवरों को खदेड़कर एक बाड़े (Enclosure) में लाया जाता है। यह संरचना जानवरों के लिए अपारदर्शी बनाई जाती है (घास की चटाई और हरे जाल से) ताकि जानवर भयभीत न हों। अंततः उन्हें एक बड़े वाहन में लोड किया जाता है।
  • महत्व: चीतल IUCN की रेड लिस्ट में ‘कम चिंतनीय’ (Least Concern) श्रेणी में है। इस स्थानांतरण को राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) द्वारा अनुमोदित किया गया था।

(iii) मुकुन्दरा हिल्स राष्ट्रीय उद्यान (Mukundra Hills National Park)

  • विस्तार: कोटा, चित्तौड़गढ़, बूंदी और झालावाड़।
  • इतिहास: पूर्व में इसका नाम ‘दर्रा अभयारण्य’ था। 2003 में दर्रा और चम्बल घड़ियाल (जवाहर सागर) अभयारण्य को मिलाकर ‘राजीव गांधी नेशनल पार्क’ बनाने की घोषणा हुई। 2006 में इसका नाम पुनः ‘दर्रा राष्ट्रीय अभयारण्य’ किया गया। अंततः हाड़ौती के प्रकृति प्रेमी शासक मुकंद सिंह के नाम पर इसे ‘मुकुंदरा हिल्स’ नाम दिया गया।
  • संवैधानिक स्थिति:
    • स्थापना: 1955
    • राष्ट्रीय उद्यान का दर्जा: 9 जनवरी 2012
    • टाइगर रिजर्व घोषित: 9 अप्रैल 2013
  • सांस्कृतिक महत्व: यहाँ आदिमानव के शैलाश्रय (Rock Shelters) और शैल चित्र प्राप्त हुए हैं। मुकुंदवाड़ा की पहाड़ियाँ यहीं स्थित हैं। अभयारण्य में गागरोन दुर्ग, अबली मीणी का महल, रावठा महल और गुप्तकालीन मंदिर (भीम चौरी) के खंडहर स्थित हैं।
  • जैव-विविधता: यह घड़ियाल, सारस और गागरोनी तोते (हीरामन तोता) के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ वन्य जीवों के अवलोकन हेतु स्तंभ बने हैं जिन्हें ‘औदिया’ कहा जाता है। राज्य में सर्वाधिक जीव घनत्व इसी अभयारण्य में माना जाता है। यहाँ सर्वाधिक जैव विविधताधोंकड़ा वन भी पाए जाते हैं।
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3. प्रमुख वन्य जीव अभयारण्य (Wildlife Sanctuaries)

राजस्थान के विभिन्न जिलों में फैले अभयारण्य अपनी विशिष्ट प्रजातियों के लिए जाने जाते हैं:

  1. सरिस्का वन्य जीव अभयारण्य (अलवर):
    • स्थापना: 1955 (अभयारण्य दर्जा), 1978-79 (टाइगर रिजर्व)। क्षेत्रफल: 860 वर्ग किमी।
    • यह राज्य का दूसरा टाइगर रिजर्व है।
    • विशेषता: यह ‘हरे कबूतरों’ के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ मोर का सर्वाधिक घनत्व पाया जाता है।
    • दर्शनीय स्थल: क्रासका व कांकनबाड़ी पठार, भर्तृहरि मंदिर, नीलकंठ महादेव, पांडुपोल, तालवृक्ष, नेडा की छतरियां, नारायणी माता मंदिर, सरिस्का पैलेस और RTDC का टाइगर डेन होटल।
    • नोट: सरिस्का ‘अ’ (Sariska-A) राज्य का सबसे छोटा अभयारण्य है।
  2. राष्ट्रीय मरू उद्यान (जैसलमेर-बाड़मेर):
    • स्थापना: 8 मई 1981 (क्षेत्रफल: 3162 वर्ग किमी)।
    • यह क्षेत्रफल की दृष्टि से राजस्थान का सबसे बड़ा अभयारण्य है।
    • जीवाश्म: यहाँ ‘आकल वुड फॉसिल्स पार्क’ (Akal Wood Fossil Park) स्थित है जहाँ करोड़ों वर्ष पुराने काष्ठ अवशेष मिले हैं। हाल ही में जैसलमेर के जेठवाई गांव में शाकाहारी डायनासोर के जीवाश्म (थारोसोरस इंडिकस) खोजे गए हैं।
    • जीव: यह राज्य पक्षी गोडावण (Great Indian Bustard), चिंकारा, काले हिरण, मरु बिल्ली, पीवणा सांप, कोबरा, रसल वाइपर आदि का मुख्य आवास है।
  3. सीतामाता अभयारण्य (प्रतापगढ़, चित्तौड़गढ़, उदयपुर):
    • स्थापना: 1971/1979 (क्षेत्रफल: 423 वर्ग किमी)।
    • विशेषता: यह ‘उड़न गिलहरी’ (Flying Squirrel) के लिए विश्व प्रसिद्ध है। इसे ‘चीतल की मातृभूमि’ भी कहा जाता है। यहाँ राज्य पशु चिंकारा (चौसिंगा) की सर्वाधिक संख्या पाई जाती है।
    • वनस्पति: यहाँ सागवान (Teak), बांस और महुआ के वनों की अधिकता है। यह हिमालय के बाद सर्वाधिक दुर्लभ औषधीय वनस्पतियों वाला क्षेत्र है।
    • यहाँ लव-कुश नामक जलस्रोतों से सदैव ठंडी व गर्म जलधाराएं प्रवाहित होती हैं। जाखम बांध इसी क्षेत्र में है।
  4. कुम्भलगढ़ अभयारण्य (उदयपुर, पाली, राजसमंद):
    • स्थापना: 1971
    • विशेषता: यह भेड़ियों (Wolves) की प्रजनन स्थली के रूप में विख्यात है। यहाँ जंगली धूसर मुर्गे और चौसिंगा (घटेल) भी मिलते हैं।
    • यहाँ चंदन के वृक्ष पाए जाते हैं। प्रसिद्ध रणकपुर जैन मंदिर इसी अभयारण्य क्षेत्र में स्थित है।
  5. चंबल घड़ियाल अभयारण्य (कोटा, बूंदी, स. माधोपुर, धौलपुर, करौली):
    • यह राणा प्रताप सागर से यमुना नदी तक विस्तृत है।
    • यह एकमात्र अंतर्राज्यीय अभयारण्य है (राजस्थान, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश)।
    • इसे ‘घड़ियालों का संसार’ कहा जाता है और यह जलीय पक्षियों की प्रजनन स्थली भी है। यहाँ ‘गांगेय सूस’ (Ganges River Dolphin) भी पाई जाती है।
    • मगरमच्छ प्रजातियाँ: घड़ियाल (Critically Endangered), मगर (Vulnerable), और खारे पानी का मगरमच्छ (Least Concern)।
  6. तालछापर अभयारण्य (चूरू):
    • यह काले हिरणों (Black Bucks) के संरक्षण के लिए प्रसिद्ध है।
    • इसे प्रवासी पक्षी ‘कुरजां’ की शरण स्थली माना जाता है। यहाँ ‘मोथिया’ नामक मृदु घास और ‘लाना’ झाड़ियाँ पाई जाती हैं।
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अन्य महत्वपूर्ण अभयारण्य

क्र.अभयारण्य का नामजिला/स्थान (नवीन जिलों सहित)मुख्य विशेषता/तथ्य
7.भैंसरोडगढ़चित्तौड़गढ़घड़ियालों के लिए प्रसिद्ध।
8.बस्सीचित्तौड़गढ़ओराई व बामनी नदियों का उद्गम स्थल।
9.माउंट आबूसिरोहीजंगली मुर्गों के लिए प्रसिद्ध, गुरुशिखर इसी में स्थित है।
10.सवाई मानसिंहसवाई माधोपुररणथम्भौर का पूरक क्षेत्र।
11.कैला देवीकरौलीयहाँ ‘देववन’ (ओरण) स्थित हैं। बनास नदी प्रवाहित होती है।
12.फुलवारी की नालउदयपुरसोम नदी का उद्गम, टीक वृक्षों का एनाटॉमी पार्क, महाराणा प्रताप की कर्मस्थली।
13.टॉडगढ़ रावलीब्यावर, पाली, राजसमंदकर्नल जेम्स टॉड द्वारा निर्मित किला। विजयसिंह पथिक को यहाँ कैद रखा गया था।
14.रामगढ़ विषधारीबूंदीइसे ‘रणथम्भौर के बाघों का जच्चा घर’ कहते हैं। यहाँ ‘धोंकड़ा वन’ मिलते हैं। यह राज्य का चौथा टाइगर रिजर्व बना।
15.जमवा रामगढ़जयपुर (ग्रामीण)शिकारगाह रहा है। यहाँ ‘खस’ घास पाई जाती है।
16.बंध बारैठाभरतपुर‘परिंदों का घर’, बया पक्षी सर्वाधिक पाए जाते हैं। केवलादेव का हिस्सा। बारैठा झील।
17.जवाहर सागरकोटा, बूंदी, चित्तौड़घड़ियालों का प्रजनन केंद्र, मगरमच्छ, गैपरनाथ मंदिर, गडरिया महादेव, कोटा बांध।
18.शेरगढ़बारांपरवन नदी के किनारे। ‘सांपों की संरक्षण स्थली’, शेरगढ़ दुर्ग स्थित है। यहाँ चिरौंजी के वृक्ष मिलते हैं। सर्प उद्यान भी है।
19.जयसमंदउदयपुर‘जलचरों की बस्ती’। बघेरों के लिए प्रसिद्ध। रूठी रानी का महल स्थित है।
20.नाहरगढ़जयपुरराज्य का पहला जैविक उद्यान (Biological Park) यहाँ शुरू हुआ था।
21.रामसागरधौलपुरजलीय पक्षियों के लिए।
22.केसरबागधौलपुर
23.वन विहारधौलपुरसांभर और सारस के लिए जाना जाता है।
24.सज्जनगढ़उदयपुरराज्य का दूसरा सबसे छोटा अभयारण्य। यहाँ ‘बायोलॉजिकल पार्क’ है।
25.दर्रा वन्य जीवकोटा, झालावाड़सर्वाधिक जैव विविधता।

4. राजस्थान में टाइगर रिजर्व (Tiger Reserves)

राजस्थान में बाघ संरक्षण की दिशा में अभूतपूर्व कार्य हुआ है। वर्तमान में राज्य में 5 टाइगर रिजर्व अस्तित्व में हैं:

  1. रणथंभौर टाइगर रिजर्व (सवाई माधोपुर) – 1973-74
  2. सरिस्का टाइगर रिजर्व (अलवर) – 1978-79
  3. मुकुंदरा हिल्स टाइगर रिजर्व (कोटा, झालावाड़) – 2013
  4. रामगढ़ विषधारी टाइगर रिजर्व (बूंदी) – 2021 (भारत का 52वां टाइगर रिजर्व)।
  5. धौलपुर-करौली टाइगर रिजर्व (धौलपुर-करौली) – 2023 (राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण द्वारा अनुमोदित, भारत का 54वां टाइगर रिजर्व)।

5. जंतुआलय (Zoos) एवं जैविक उद्यान (Biological Parks)

जंतुआलय (Zoological Gardens) – 4

  1. जयपुर जंतुआलय (1876): सवाई रामसिंह द्वारा स्थापित, यह राज्य का सबसे पुराना और बड़ा जंतुआलय है। यह मगरमच्छ और बाघ प्रजनन के लिए प्रसिद्ध है।
  2. उदयपुर जंतुआलय (1878): गुलाब बाग में स्थित (बाघ, बघेरा, भालू)।
  3. बीकानेर जंतुआलय (1922): सार्वजनिक उद्यान, वर्तमान में बंद।
  4. जोधपुर जंतुआलय (1936): उम्मेद बाग में स्थित। यह गोडावण के कृत्रिम प्रजनन के लिए एवं अपनी पक्षी शाला के लिए प्रसिद्ध है।
  5. कोटा जंतुआलय (1954): (अब अभेड़ा बायोलॉजिकल पार्क में स्थानांतरित)।

जैविक उद्यान (Biological Parks)

  • सज्जनगढ़ (उदयपुर): राज्य का पहला जैविक उद्यान, 12 अप्रैल 2015 को शुरू।
  • माचिया (जोधपुर): 20 जनवरी 2016 को लोकार्पण।
  • नाहरगढ़ (जयपुर): 4 जून 2016 को पर्यटकों के लिए खोला गया।
  • अभेड़ा (कोटा): 18 दिसम्बर 2021 को लोकार्पण, 1 जनवरी 2022 से आमजन के लिए शुरू।
  • प्रस्तावित: मरुधरा जैविक उद्यान (बीकानेर) और पुष्कर (अजमेर)।
  • बर्ड पार्क (Bird Park): राज्य का पहला बर्ड पार्क गुलाब बाग, उदयपुर में 12 मई 2022 को खोला गया।

6. मृगवन (Deer Parks) – 7

राजस्थान में हिरणों और चिंकारा के संरक्षण हेतु 7 मृगवन स्थापित हैं:

  1. अशोक विहार मृगवन (जयपुर): 12 हेक्टेयर क्षेत्र।
  2. माचिया सफारी पार्क (जोधपुर): कायलाना झील के पास, 1985 में स्थापित, 600 हेक्टेयर। यह देश का पहला ‘मरु वानस्पतिक उद्यान’ भी है। इसमें भेड़िया, लंगूर, सेही, मरु बिल्ली, नीलगाय, काला हिरण, चिंकारा आदि मिलते हैं।
  3. चित्तौड़गढ़ मृगवन (चित्तौड़गढ़): 1969 में स्थापित (राज्य का प्रथम मृगवन)। दुर्ग के दक्षिणी किनारे पर स्थित।
  4. पुष्कर मृगवन (अजमेर): पंचकुंड के पास, 1985 में हिरण छोड़े गए।
  5. संजय उद्यान मृगवन (शाहपुरा, जयपुर): 10 हेक्टेयर।
  6. सज्जनगढ़ मृगवन (उदयपुर): सज्जनगढ़ दुर्ग के नीचे।
  7. अमृता देवी मृगवन (खेजड़ली, जोधपुर): 1998 में स्थापित। यह राज्य का सबसे बड़ा मृगवन है, जो विश्नोई समाज के बलिदान की स्मृति में बना है।
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7. कंजर्वेशन रिजर्व (Sanrakshan Agar)

राज्य में जैव विविधता के संरक्षण हेतु ‘कंजर्वेशन रिजर्व’ की संख्या में निरंतर वृद्धि हो रही है। यहाँ सभी प्रमुख कंजर्वेशन रिजर्व की विस्तृत सूची दी गई है (नवीनतम जिलों के अनुसार):

क्र.कंजर्वेशन रिजर्व का नामजिला (नवीनतम)क्षेत्रफल (वर्ग किमी)घोषणा वर्ष
1.बीसलपुरकेकड़ी48.3113 अक्टूबर 2008
2.जोड़ बीड़ गढ़वालाबीकानेर56.4625 अक्टूबर 2008
3.सुंधा माताजालौर-सिरोही117.4825 अक्टूबर 2008
4.गुढ़ा विश्नोइयानजोधपुर2.315 दिसम्बर 2011
5.शाकंभरीसीकर-नीमकाथाना1319 फरवरी 2012
6.गोगेलावनागौर3.589 फरवरी 2012
7.बीड़झुंझुनू10.479 फरवरी 2012
8.रोटूनागौर0.7229 मई 2012
9.उम्मेदगंज पक्षी विहारकोटा2.725 नवम्बर 2012
10.जवाई बांध लेपर्डपाली19.7827 फरवरी 2013
11.बांसियाल-खेतड़ीनीमकाथाना70.181 मार्च 2017
12.बांसियाल-खेतड़ी बागोरनीमकाथाना39.6610 अप्रैल 2018
13.जवाई बांध लेपर्ड IIपाली61.9815 जून 2018
14.मनसा माताझुंझुनू-नीमकाथाना102.3118 नवम्बर 2019
15.शाहबादबारां189.3928 अक्टूबर 2021
16.रणखारजालौर (सांचौर)72.8825 अप्रैल 2022
17.शाहाबाद तलहटीबारां178.841 सितम्बर 2022
18.बीड घास फुलियाखुर्दशाहपुरा0.8527 सितम्बर 2022
19.वाघदर्रा/बागदर्रा क्रोकोडाइलउदयपुर3.6830 नवंबर 2022
20.वाडाखेड़ा सरंक्षित रिजर्वसिरोही43.3127 दिसम्बर 2022
21.आमागढ़ लेपर्डजयपुर35.0727 फ़रवरी 2023
22.रामगढ़ कुंजी सुनवासबारां38.083 मार्च 2023
23.खड़मोरकेकड़ी9.3110 अप्रैल 2023
24.सोरसेन-1बारां16.1022 अप्रैल 2023
25.सोरसेन-2बारां4.2722 अप्रैल 2023
26.सोरसेन-3बारां0.7522 अप्रैल 2023
27.हमीरगढ़भीलवाड़ा5.6622 अप्रैल 2023
28.खिचनफलौदी2.9222 अप्रैल 2023
29.बांझ आमलीबारां146.2119 मई 2023
30.बालेश्वरनीमकाथाना221.698 सितम्बर 2023
31.गंगा भैरव घाटीअजमेर39.516 अक्टूबर 2023
32.बीड़ फतेहपुरसीकर30.036 अक्टूबर 2023
33.बीड़ मुहाना-Aजयपुर2.066 अक्टूबर 2023
34.बीड़ मुहाना-Bजयपुर0.106 अक्टूबर 2023
35.अमरख महादेव लेपर्डउदयपुर71.467 अक्टूबर 2023
36.महासीर कंज़र्वेशन रिज़र्व बड़ी झीलउदयपुर2.067 अक्टूबर 2023
37.आसोप संरक्षण रिजर्वभीलवाड़ा1.1827 अगस्त 2024

तथ्य: शाहबाद संरक्षण रिजर्व (189.39 वर्ग किमी) को सामान्यतः राज्य का सबसे बड़ा कंजर्वेशन रिजर्व माना जाता है (हालांकि कुछ सूचियों में बालेश्वर का क्षेत्रफल अधिक अंकित है)। वहीं बीड़ मुहाना-B (0.10 वर्ग किमी) का क्षेत्रफल सबसे कम है।

8. आखेट निषेध क्षेत्र (Hunting Prohibited Areas) – 33

वन्य जीवों की सुरक्षा के लिए राज्य में 33 ऐसे क्षेत्र हैं जहाँ शिकार पूर्णतः प्रतिबंधित है।

क्र.आखेट निषेध क्षेत्रजिलाविवरण
1.बागदड़ाउदयपुर
2.बज्जुबीकानेर
3.रानीपुराटोंक
4.देशनोकबीकानेर
5.दीयात्राबीकानेर
6.जोड़ावीरबीकानेर
7.मुकामबीकानेर
8.डेचुंजोधपुर
9.डोलीजोधपुरकाले हिरणों के लिए
10.गुढ़ा-बिश्नोईजोधपुर
11.जम्भेश्वरजोधपुर
12.लोहावटजोधपुर
13.साथीनजोधपुर
14.फिटकाशनीजोधपुर
15.बरदोदअलवर
16.जौड़ीयाअलवर
17.धोरीमन्नाबाड़मेर
18.जरोंदानागौर
19.रोतूनागौर
20.गंगवानाअजमेर
21.सौंखलियाकेकड़ीगोडावण के लिए प्रसिद्ध
22.तिलोराअजमेर
23.सोरसनबारांगोडावण के लिए प्रसिद्ध
24.संवत्सर-कोटसरचूरूक्षेत्रफल में सबसे बड़ा आखेट निषेध क्षेत्र
25.सांचैरजालौर/सांचौर
26.रामदेवराजैसलमेर
27.कंवाल जीसवाई माधोपुर
28.मेनालचित्तौड़गढ़
29.महलांजयपुर
30.कनक सागरबूंदीजलमुर्गो के लिए प्रसिद्ध, छोटा क्षेत्र
31.जवाई बांधपाली
32.संथाल सागरजयपुरसबसे छोटा आखेट निषेध क्षेत्र (सैथलसागर)
33.उज्जलाजैसलमेर

सर्वाधिक आखेट निषेध क्षेत्र: जोधपुर जिला।

9. वन्य जीव संरक्षण हेतु प्रमुख परियोजनाएं एवं प्रयास

(i) प्रोजेक्ट बस्टर्ड (Project Bustard)

राज्य पक्षी गोडावण (Critically Endangered) को विलुप्ति से बचाने के लिए राज्य सरकार, भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) और केंद्र सरकार के बीच त्रिपक्षीय समझौता हुआ है।

  • जैसलमेर के ‘सम’ (Sam) क्षेत्र में गोडावण का कृत्रिम प्रजनन केंद्र (Conservation Breeding Centre) स्थापित किया गया है।
  • गोडावण के 21 चूजों का पालन पोषण हो रहा है।
  • खरमोर पक्षी (Lesser Florican) के संरक्षण हेतु भी प्रयास जारी हैं, 8 चूजों का पालन हो रहा है।
  • उदयपुर पक्षी उद्यान में हरित मुनिया का संरक्षण प्रजनन आरम्भ हुआ है।

(ii) प्रोजेक्ट लेपर्ड (Project Leopard)

पैंथर (बघेरा) की बढ़ती आबादी और मानव-पशु संघर्ष को कम करने के लिए राजस्थान सरकार ने ‘प्रोजेक्ट लेपर्ड’ शुरू किया।

  • झालाना (जयपुर) में देश की पहली लेपर्ड सफारी शुरू की गई।
  • इसके तहत आमागढ़, कुम्भलगढ़, रावली टाडगढ़, जयसमंद, शेरगढ़, माउंट आबू, खेतड़ी बांसियाल और जवाई बांध, बस्सी व सीतामाता अभयारण्य क्षेत्रों को शामिल कर उनके आवास (Habitat) सुधार, जल प्रबंधन और चारदीवारी निर्माण कार्य किए जा रहे हैं।

(iii) अन्य महत्वपूर्ण परियोजनाएं

  • इन्टीग्रेटेड डेवलपमेंट ऑफ वाईल्ड लाईफ हैबिटाट्स: भारत सरकार (60%) एवं राज्य (40%) की हिस्सेदारी।
  • राजस्थान वानिकी और जैव विविधता विकास परियोजना (RFBDP): फ्रांस सरकार की एजेंसी AFD के सहयोग से। इसके तहत केवलादेव में ‘वेटलैंड एक्स-सीटू कंज़र्वेशन इस्टैब्लिशमेंट’ (WESCE) की स्थापना प्रस्तावित है (गैंडों, जल भैंसों और डॉल्फिन के लिए)।
  • राजस्थान एक्स-सीटू कन्जर्वेशन ऑथोरिटी (RESCA): चिड़ियाघरों/जैविक उद्यानों के प्रबंधन और ‘Captive Animal Sponsorship Scheme’ (गोद लेने की योजना) के लिए गठित।

10. परीक्षा उपयोगी महत्वपूर्ण तथ्य (Key Examination Facts)

  • भालू संरक्षण: राजस्थान के जालौर और सिरोही जिलों में (सुंधा माता संरक्षित क्षेत्र) भालू अभ्यारण्य बनाया जाएगा। यह प्रदेश का पहला और देश का चौथा भालू अभ्यारण्य होगा (क्षेत्रफल 326 + 117.49 वर्ग किमी)।
  • कुरजां पक्षी (Demoiselle Crane): खींचन गांव (फलौदी/जोधपुर) इनके लिए विश्व प्रसिद्ध है। ‘कुरजां’ एक विरह गीत भी है।
  • गजनेर अभयारण्य (बीकानेर): यह ‘बटबड़’ पक्षी या ‘रेत का तीतर’ (Imperial Sandgrouse) के लिए प्रसिद्ध है।
  • डोलीधावा (जोधपुर): काले मृगों के लिए संरक्षित एक गांव है।
  • सर्प उद्यान: उत्तर भारत का प्रथम सर्प उद्यान कोटा में है।
  • गोडावण (Great Indian Bustard): वैज्ञानिक नाम- Ardeotis nigriceps। स्थानीय नाम- सोहन चिड़िया, हुकना, गुधनमेर। प्राप्ति स्थल: राष्ट्रीय मरु उद्यान, सोरसन (बारां) और सौंखलिया (केकड़ी)।
  • राष्ट्रीय स्तर पर: 94 राष्ट्रीय उद्यान, 501 अभयारण्य, 14 बायोस्फीयर रिजर्व (डेटा परिवर्तनीय)।
  • वन्य पक्षी सुरक्षा: भारत में सर्वप्रथम 1887 में वन्य पक्षी सुरक्षा अधिनियम बनाया गया।
  • बाघ परियोजना: देश में अप्रैल 1973 में शुरू। देश में अब तक 54+ बाघ अभयारण्य हैं। राजस्थान में 5 हैं।
  • हरे कबूतर: सरिस्का, अजमेर, तिलोरा गांव (पुष्कर), थांवला गांव (नागौर) में मिलते हैं।
  • गेडवेल (Gadwall): जीय बतख जो रूस/चीन से शीतकाल में अजमेर आती है।
  • प्रस्तावित अभयारण्य: ताली अभयारण्य (करौली) और बीसलपुर अभयारण्य (टोंक)।
  • बड़ोपल पक्षी अभयारण्य: हनुमानगढ़ जिले के बड़ोपल गांव में (सेम समस्या ग्रस्त क्षेत्र में) स्थापित किया जाएगा।
  • सर्वाधिक: सर्वाधिक अभयारण्य उदयपुर में, सर्वाधिक आखेट निषेध क्षेत्र जोधपुर में हैं।
  • प्रथम/द्वितीय:
    • प्रथम राष्ट्रीय उद्यान: रणथंभौर (1 नवम्बर 1980)।
    • दूसरा राष्ट्रीय उद्यान: केवलादेव घना (1981)।
    • विश्व धरोहर: केवलादेव (1985)।
    • पहला टाइगर प्रोजेक्ट: रणथंभौर (1974)।
    • दूसरा टाइगर प्रोजेक्ट: सरिस्का (1978)।
  • आकल वुड फॉसिल पार्क: जैसलमेर में।
  • क्षेत्रफल: केवलादेव (28.73 वर्ग किमी)। सरिस्का (860), रणथंभौर (392), सीतामाता (423), राष्ट्रीय मरू (3162)।
  • सीतामाता वनस्पति: सागवान, बांस, महुआ।
  • सबसे छोटी बाघ परियोजना: रणथंभौर (प्रोजेक्ट टाइगर में शामिल भारत की सबसे छोटी)।
  • जलीय पक्षी प्रजनन: चंबल अभयारण्य।
  • वन्य जीव संरक्षण शुरुआत: 7 नवम्बर 1955 को (वन विहार, सरिस्का, दर्रा घोषित)।
  • विस्तार: राज्य के 2.67 प्रतिशत क्षेत्र पर राष्ट्रीय उद्यान एवं अभयारण्य विस्तृत हैं।
  • जनक: भारत में बाघ परियोजना के जनक कैलाश सांखला
  • स्थान: वन्य जीवों की संख्या की दृष्टि से राजस्थान का देश में दूसरा स्थान है।
  • विशिष्ट:
    • राज्य पशु चिंकारा सर्वाधिक: सीतामाता।
    • सागवान वन: सीतामाता।
    • उड़न गिलहरी: सीतामाता।
    • जंगली मुर्गे: माउंट आबू।
    • कृष्ण मृग: तालछापर।
    • मोर घनत्व: सरिस्का।
    • दुर्लभ औषधीय वन: सीतामाता।
    • चंदन वृक्ष: कुम्भलगढ़।
    • सांपों का संरक्षण: शेरगढ़।
    • सर्वाधिक जैव विविधता: दर्रा।
    • धोंकड़ा वन: दर्रा व रामगढ़ विषधारी।
    • भेड़िया/जंगली धूसर मुर्गे: कुम्भलगढ़।
    • गागरोनी तोते: दर्रा।
    • चीतल की मातृभूमि: सीतामाता।
    • खस घास: जमवा रामगढ़।
    • मोथिया घास: तालछापर।
  • क्षेत्रफल अनुसार बड़े (मरु उद्यान के बाद): सरिस्का > कैलादेवी > कुम्भलगढ़।
  • क्षेत्रफल अनुसार छोटे: तालछापर, सज्जनगढ़।
  • जिलों में कोई अभयारण्य नहीं: गंगानगर, हनुमानगढ़, सीकर, झुंझुनू, डूंगरपुर, बांसवाड़ा, भीलवाड़ा।
  • रणथंभौर/सरिस्का के अलावा बाघ: रामगढ़ विषधारी (बूंदी) व धौलपुर-करौली।
  • प्रथम जंतुआलय: जयपुर (1876)। पक्षी शाला हेतु प्रसिद्ध: जोधपुर।
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