1. ऐतिहासिक पृष्ठभूमि एवं वन प्रबंधन का विकास
ऐतिहासिक रूप से, भारत में अंग्रेजी शासन से पूर्व वनों का प्रबंधन और उपयोग पूर्णतः स्थानीय समुदायों और उनकी पारंपरिक रीति-रिवाजों के अधीन था। वनों को एक सामुदायिक संसाधन माना जाता था। औपनिवेशिक काल और स्वतंत्रता के बाद इसमें निम्नलिखित महत्वपूर्ण परिवर्तन आए:
- लार्ड डलहौजी की घोषणा (1855): भारत में वैज्ञानिक वन प्रबंधन की नींव 1855 में लार्ड डलहौजी ने रखी। उन्होंने एक वन नीति घोषित की जिसके तहत यह निर्धारित किया गया कि राज्य के वन क्षेत्रों में मौजूद इमारती लकड़ी के वृक्षों पर सरकार का एकाधिकार होगा और निजी व्यक्तियों का उन पर कोई अधिकार नहीं होगा।
- प्रथम राष्ट्रीय वन नीति (1894): ब्रिटिश औपनिवेशिक काल में भारत की पहली औपचारिक राष्ट्रीय वन नीति वर्ष 1894 में प्रकाशित की गई, जिसने वनों के दोहन और राजस्व पर अधिक ध्यान केंद्रित किया।
- स्वतंत्र भारत की वन नीति (1952): स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात, भारत सरकार ने 1952 में नई राष्ट्रीय वन नीति लागू की। इस नीति का मुख्य लक्ष्य पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखना था।
- संशोधित वन नीति (1988): 1952 की नीति को 1988 में संशोधित किया गया। इस नीति के अनुसार, पारिस्थितिक स्थिरता के लिए देश के 33 प्रतिशत भू-भाग पर वनों का होना अनिवार्य निर्धारित किया गया है।
संवैधानिक स्थिति
भारतीय संविधान के मूल ढांचे में वन ‘राज्य सूची’ का विषय था। लेकिन वनों के महत्व और संरक्षण की आवश्यकता को देखते हुए 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 के द्वारा ‘वन’ और ‘वन्यजीव संरक्षण’ विषयों को राज्य सूची से हटाकर समवर्ती सूची (Concurrent List) में शामिल किया गया, जिससे केंद्र और राज्य दोनों इस पर कानून बना सकें।

2. राजस्थान में वानिकी का विकास
राजस्थान, अपनी भौगोलिक विषमताओं के बावजूद, वन संरक्षण के इतिहास में अग्रणी रहा है:
- रियासती प्रयास: राजस्थान में वन संरक्षण की दिशा में सर्वप्रथम प्रयास जोधपुर रियासत ने 1910 में किया। इसके पश्चात अलवर रियासत ने 1935 में अपनी वन संरक्षण नीति बनाई।
- वन विभाग की स्थापना: स्वतंत्रता के बाद, राजस्थान के एकीकरण के चरण में 1949-50 में ‘राजस्थान वन विभाग’ की स्थापना की गई, जिसका मुख्यालय जयपुर में स्थित है।
- वैधानिक अधिनियम: राज्य में वनों के प्रबंधन और नियमन हेतु ‘राजस्थान वन अधिनियम, 1953’ पारित किया गया।
राजस्थान वन अधिनियम 1953 के अनुसार वनों का वर्गीकरण
इस अधिनियम के तहत कानूनी स्थिति के आधार पर वनों को तीन प्रमुख श्रेणियों में विभाजित किया गया है:
- आरक्षित वन (Reserved Forests):
- इन वनों पर सरकार का पूर्ण स्वामित्व और कड़ा नियंत्रण होता है।
- इनमें पशु चराने और लकड़ी काटने जैसे किसी भी प्रकार के दोहन पर पूर्ण प्रतिबंध होता है।
- उद्देश्य: मरुस्थलीकरण को रोकना और पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखना।
- रक्षित/सुरक्षित वन (Protected Forests):
- इन वनों की देखरेख भी सरकार द्वारा की जाती है।
- स्थानीय निवासियों को कुछ विशिष्ट नियमों और शर्तों के आधार पर सीमित दोहन (जैसे सूखी लकड़ी बीनना या पशु चराना) की छूट दी जाती है।
- अवर्गीकृत वन (Unclassed Forests):
- ये वे वन क्षेत्र हैं जो आरक्षित या रक्षित श्रेणी में नहीं आते।
- इन वनों में सरकार द्वारा निर्धारित शुल्क जमा करवाकर वन संपदा का दोहन किया जा सकता है और पशु चारण पर कम प्रतिबंध होते हैं।
3. राजस्थान की वन नीतियां (Forest Policies of Rajasthan)
(A) राजस्थान राज्य वन नीति, 2010
राजस्थान सरकार ने 8 फरवरी 2010 को अपनी पहली राज्य वन नीति घोषित की।
- लक्ष्य: यथोचित समयावधि में राज्य के कुल भौगोलिक क्षेत्र के 20 प्रतिशत भाग को वनाच्छादित करना।
- महत्व: राजस्थान ऐसा करने वाला देश का पहला राज्य बना जिसने अपनी पृथक वन नीति घोषित की।
(B) राजस्थान वन नीति (RFP), 2023
नवीनतम आवश्यकताओं और जलवायु परिवर्तन को ध्यान में रखते हुए 5 जून 2023 (विश्व पर्यावरण दिवस) को नई राजस्थान वन नीति 2023 जारी की गई।
- उद्देश्य: जैव विविधता का संरक्षण, संरक्षित क्षेत्रों का सतत प्रबंधन और वनों के बाहर (Trees Outside Forest) वनस्पति आवरण को बढ़ावा देना।
- दीर्घकालिक लक्ष्य: आगामी 20 वर्षों में राज्य के वनस्पति आवरण को भौगोलिक क्षेत्र के 20 प्रतिशत तक पहुँचाना।
4. वन अनुसंधान एवं सर्वेक्षण संस्थाएं
- भारतीय वन सर्वेक्षण (FSI): वनों के सर्वेक्षण और आकलन के लिए 1981 में देहरादून में इसकी स्थापना की गई। यह संस्थान ‘भारतीय वन संरक्षण अधिनियम 1980’ के अधिदेशों के तहत कार्य करता है।
- क्षेत्रीय कार्यालय: शिमला, कोलकाता, नागपुर एवं बेंगलुरु।
- प्रकाशन: यह संस्थान 1987 से द्विवार्षिक रूप से ‘वन स्थिति रिपोर्ट’ जारी करता है।
- केंद्रीय शुष्क क्षेत्र अनुसंधान संस्थान (CAZRI): जोधपुर (मरुस्थलीकरण रोकने हेतु अनुसंधान)।
- शुष्क वन अनुसंधान संस्थान (AFRI): जोधपुर।
5. इंडिया स्टेट ऑफ फॉरेस्ट रिपोर्ट (ISFR) 2021: राजस्थान का विश्लेषण
पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय द्वारा 13 जनवरी 2022 को 17वीं ‘इंडिया स्टेट ऑफ फॉरेस्ट रिपोर्ट 2021’ जारी की गई। इस रिपोर्ट के आधार पर राजस्थान की स्थिति का विस्तृत विश्लेषण निम्न प्रकार है:
(A) अभिलिखित वन क्षेत्र (Recorded Forest Area – RFA)
प्रशासनिक प्रतिवेदन 2020-21 और ISFR 2021 के अनुसार, राजस्थान का अभिलिखित वन क्षेत्र 32,862.50 वर्ग किलोमीटर है, जो राज्य के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का 9.60% है।
कानूनी वर्गीकरण के अनुसार क्षेत्र का वितरण:
| क्र.सं. | वन श्रेणी | क्षेत्रफल (वर्ग किमी में) | प्रतिशत (%) | सर्वाधिक विस्तार वाला जिला |
|---|---|---|---|---|
| 1. | आरक्षित वन | 12,176.24 | 37.05% | उदयपुर |
| 2. | रक्षित/सुरक्षित वन | 18,543.22 | 56.43% | बारां |
| 3. | अवर्गीकृत वन | 2,143.04 | 6.52% | बीकानेर |
| कुल | योग | 32,862.50 | 100% | – |
(नोट: प्रशासनिक प्रतिवेदन 2022-23 के नवीनतम आंकड़ों में कुल वन क्षेत्र 32,869.69 वर्ग किमी दर्शाया गया है, जिसमें आरक्षित 37.05%, रक्षित 56.55% और अवर्गीकृत 6.40% है।)
(B) वनावरण (Forest Cover) और वृक्षावरण (Tree Cover) की स्थिति
सैटेलाइट डेटा और कैनोपी घनत्व के आधार पर वास्तविक हरियाली का मापन:
- वनावरण (Forest Cover): 1 हेक्टेयर से अधिक क्षेत्रफल वाली भूमि जहाँ वृक्ष घनत्व 10% से अधिक हो।
- कुल वनावरण: 16,654.96 वर्ग किमी (कुल क्षेत्रफल का 4.87%)।
- वृद्धि: 2019 की तुलना में 25 वर्ग किमी (0.01%) की वृद्धि।
- वृक्षावरण (Tree Cover): वनावरण के बाहर 1 हेक्टेयर से कम क्षेत्र वाले वृक्षों के समूह।
- कुल वृक्षावरण: 8,733 वर्ग किमी (कुल क्षेत्रफल का 2.55%)।
- वृद्धि: 2019 की तुलना में 621 वर्ग किमी की उल्लेखनीय वृद्धि।
कुल हरित आवरण (Total Green Cover):
- वनावरण + वृक्षावरण = 16,654.96 + 8,733 = 25,387.96 वर्ग किमी।
- यह राज्य के कुल क्षेत्रफल का 7.41% (नवीनतम आंकड़ों में 7.42%) है।
- प्रति व्यक्ति औसत: 0.037 हेक्टेयर।
(C) कैनोपी (वितान) घनत्व के आधार पर वर्गीकरण
ISFR 2021 के अनुसार राजस्थान में वनों की सघनता:
| श्रेणी | परिभाषा (घनत्व) | क्षेत्रफल (वर्ग किमी) | भौगोलिक क्षेत्र का % |
|---|---|---|---|
| अत्यधिक सघन वन (VDF) | 70% से अधिक | 78.15 | 0.02% |
| मध्यम सघन वन (MDF) | 40% से 70% | 4,368.65 | 1.28% |
| खुले वन (OF) | 10% से 40% | 12,208.16 | 3.57% |
| कुल वनावरण | – | 16,654.96 | 4.87% |
| झाड़ी (Scrub) | 10% से कम | 4,808.51 | 1.41% |
| गैर-वन क्षेत्र (Non-Forest) | – | – | 93.72% |
- विशेष तथ्य: झाड़ी (Scrub) क्षेत्र में सर्वाधिक विस्तार पाली जिले में है।
6. जिलावार वन स्थिति: तुलनात्मक विश्लेषण
राजस्थान में वनों का वितरण असमान है। भौगोलिक दृष्टि से आरक्षित वन क्षेत्र में राजस्थान का भारत में 15वां स्थान है।
(A) सर्वाधिक वन क्षेत्र वाले जिले
| वरीयता | जिला | क्षेत्रफल (वर्ग किमी) |
|---|---|---|
| 1 | उदयपुर | 2753.39 |
| 2 | अलवर | 1195.91 |
| 3 | प्रतापगढ़ | 1033.77 |
| 4 | बारां | 1010.05 |
| 5 | चित्तौड़गढ़ | 990.05 |
(B) सर्वाधिक वन प्रतिशत वाले जिले
| वरीयता | जिला | भौगोलिक क्षेत्र का % |
|---|---|---|
| 1 | उदयपुर | 23.49% |
| 2 | प्रतापगढ़ | 23.24% |
| 3 | सिरोही | 17.49% |
| 4 | करौली | 15.28% |
| 5 | बारां | 14.45% |
(C) न्यूनतम वन क्षेत्र वाले जिले
| वरीयता | जिला | क्षेत्रफल (वर्ग किमी) |
|---|---|---|
| 1 | चूरू | 77.69 (न्यूनतम) |
| 2 | हनुमानगढ़ | 92.97 |
| 3 | जोधपुर | 109.25 |
| 4 | गंगानगर | 115.09 |
| 5 | दौसा | 116.60 |
(D) न्यूनतम वन प्रतिशत वाले जिले
| वरीयता | जिला | भौगोलिक क्षेत्र का % |
|---|---|---|
| 1 | जोधपुर | 0.48% (न्यूनतम) |
| 2 | चूरू | 0.56% |
| 3 | जैसलमेर | 0.84% |
| 4 | बीकानेर | 0.92% |
| 5 | हनुमानगढ़/नागौर | 0.96% |
(E) वनावरण में परिवर्तन (2019 की तुलना में)
- सर्वाधिक वृद्धि: अजमेर (26.45 वर्ग किमी), पाली (26.01 वर्ग किमी), बीकानेर (24.10 वर्ग किमी)।
- सर्वाधिक कमी (गिरावट): जालोर (-32.46 वर्ग किमी), करौली (-26.16 वर्ग किमी), सिरोही (-13.49 वर्ग किमी)।
- कुल मिलाकर राज्य के 19 जिलों में वृद्धि तथा 14 जिलों में कमी दर्ज की गई है।
7. राजस्थान में वनों का वर्गीकरण (प्रकार)
जलवायु और भौगोलिक स्थिति के आधार पर राजस्थान के वनों को मुख्य रूप से 5 भागों में बांटा जा सकता है:
- शुष्क सागवान वन (Dry Teak Forests):
- क्षेत्र: दक्षिणी राजस्थान (बांसवाड़ा, चित्तौड़गढ़, प्रतापगढ़, उदयपुर, कोटा, बारां)। बांसवाड़ा में सर्वाधिक।
- विस्तार: कुल वनों का लगभग 7%।
- प्रमुख वृक्ष: बरगद, आम, तेंदु, गुलर, महुआ, साल, खैर।
- शुष्क पतझड़/मिश्रित वन (Dry Deciduous Forests):
- क्षेत्र: उदयपुर, राजसमंद, चित्तौड़गढ़, भीलवाड़ा, सवाई माधोपुर, बूंदी।
- विस्तार: कुल वनों का लगभग 27%।
- प्रमुख वृक्ष: धोकड़ा, आम, खैर, ढाक (पलाश), बांस, जामुन, नीम।
- उष्ण कटिबंधीय कांटेदार वन (Tropical Thorn Forests):
- क्षेत्र: पश्चिमी मरुस्थलीय जिले (जोधपुर, बीकानेर, जालौर, सीकर, झुंझुनूं)।
- विस्तार: सर्वाधिक विस्तृत (कुल वनों का लगभग 65%)।
- प्रमुख वृक्ष: बबूल, खेजड़ी, केर, बेर, रोहिड़ा।
- उष्ण कटिबंधीय सदाबहार वन (Tropical Evergreen Forests):
- क्षेत्र: केवल माउंट आबू (सिरोही) के पर्वतीय क्षेत्र में।
- विस्तार: मात्र 0.4% (सबसे कम)।
- विशेषता: ये वन वर्ष भर हरे-भरे रहते हैं और यहाँ जैव विविधता अधिक है।
- प्रमुख वृक्ष: आम, धाक, जामुन, सिरिस, अम्बरतरी, बेल।
- सालर वन (Salar Forests):
- क्षेत्र: अलवर, चित्तौड़गढ़, सिरोही, उदयपुर।
- उपयोग: इनकी लकड़ी फर्नीचर और पैकिंग उद्योग के लिए उपयुक्त होती है।
8. वन विकास योजनाएं एवं परियोजनाएं
राजस्थान में वनों के विकास हेतु राज्य सरकार, केंद्र सरकार और विदेशी संस्थाओं के सहयोग से कई परियोजनाएं संचालित हैं:
(A) विदेशी सहायता प्राप्त परियोजनाएं (JICA & others)
- राजस्थान वानिकी एवं जैव विविधता परियोजना (RFBP) – फेज 2:
- वित्तीय सहयोग: जापान इंटरनेशनल को-ऑपरेशन एजेंसी (JICA)।
- कार्यक्षेत्र: 10 मरुस्थलीय जिले (सीकर, झुंझुनूं, चूरू, जालौर, बाड़मेर, जोधपुर, पाली, नागौर, जैसलमेर, बीकानेर) + 5 गैर-मरुस्थलीय जिले (बांसवाड़ा, डूंगरपुर, भीलवाड़ा, सिरोही, जयपुर) + 7 वन्यजीव संरक्षित क्षेत्र।
- उद्देश्य: साझा वन प्रबंधन (JFM) के माध्यम से वनावरण बढ़ाना, जैव विविधता संरक्षण और आजीविका संवर्धन।
- RABCP (Rajasthan Afforestation and Biodiversity Conservation Project):
- JICA द्वारा वित्त पोषित नई प्रस्तावित परियोजना।
- 19 जिलों के लिए तैयार, कुल लागत लगभग 1803.42 करोड़ रुपये।
- RFBDP (Rajasthan Forestry and Biodiversity Development Project):
- वित्तीय सहयोग: AFD (फ्रांस की एजेंसी)।
- कार्यक्षेत्र: पूर्वी राजस्थान के 13 जिले (अलवर, भरतपुर, दौसा, आदि)।
- लागत: लगभग 1693.91 करोड़ रुपये।
- अरावली वृक्षारोपण योजना: जापान सरकार (OECF) के सहयोग से 1992-2000 तक 10 जिलों में चलाई गई।
- इंदिरा गांधी क्षेत्र वृक्षारोपण परियोजना: 1991 में जापान के सहयोग से IGNP नहर के किनारे वृक्षारोपण हेतु शुरू की गई (2002 में पूर्ण)।
(B) केंद्र एवं नाबार्ड पोषित योजनाएं
- नाबार्ड (NABARD) परियोजना: ग्रामीण आधारभूत ढांचा विकास निधि (RIDF) के तहत राज्य के 17 जिलों में 2012-13 से जलग्रहण विकास और वृक्षारोपण कार्य।
- मरुस्थल वृक्षारोपण परियोजना (DDP): 1978 में 10 जिलों में शुरू। केंद्र:राज्य हिस्सेदारी 75:25।
- CAMPA (कैम्पा): ‘प्रतिकरात्मक वनरोपण निधि प्रबंधन और योजना प्राधिकरण’।
- वन भूमि का गैर-वन कार्यों में उपयोग करने पर वसूली गई राशि (NPV, CA आदि) का प्रबंधन।
- नियम 2018: 90% राशि राज्य को और 10% केंद्र को मिलती है। राज्य इस राशि का 80% वन/वन्यजीव प्रबंधन और 20% अवसंरचना विकास पर खर्च करता है।
(C) अन्य प्रमुख कार्यक्रम
- सामाजिक वानिकी योजना: 1985-86 में शुरू।
- जनता वन योजना: 1996।
- हरित राजस्थान: 2009।
- स्मृति वन: जयपुर के झालाना में 2006 में ‘कर्पूर चंद कुलिस स्मृति वन’ (पूर्व में स्मृति वन) विकसित किया गया।
9. वन संपदा एवं आर्थिक महत्व
वनों से प्राप्त उत्पादों को इमारती लकड़ी और गौण वन उपज (Minor Forest Produce) में बांटा जाता है:
- बांस (Bamboo): इसे ‘हरा सोना’ या ‘आदिवासियों का हरा सोना’ कहा जाता है। (क्षेत्र: बांसवाड़ा, उदयपुर, चित्तौड़गढ़, सिरोही)।
- तेंदूपत्ता (Tendu Leaf): इसे स्थानीय भाषा में ‘टिमरू’ कहते हैं। इसका उपयोग बीड़ी उद्योग में होता है। (क्षेत्र: हाड़ौती और मेवाड़ क्षेत्र)।
- खस (Khas): यह एक सुगंधित घास है, जिससे इत्र और शरबत बनाया जाता है। (क्षेत्र: भरतपुर, सवाई माधोपुर, टोंक)।
- महुआ (Mahua): आदिवासी इससे ‘मोकड़ी’ (देसी शराब) बनाते हैं। (क्षेत्र: डूंगरपुर, उदयपुर, चित्तौड़गढ़)।
- कत्था (Catechu): ‘कथौड़ी’ जनजाति द्वारा खैर के वृक्ष से ‘हांडी प्रणाली’ के माध्यम से तैयार किया जाता है। (क्षेत्र: उदयपुर, चित्तौड़गढ़)।
- आंवल/झाबुई: इसकी छाल चमड़ा साफ करने (टैनिंग) में काम आती है। (क्षेत्र: जोधपुर, पाली)।
- गोंद: बाड़मेर का ‘चौहटन’ क्षेत्र गोंद उत्पादन के लिए प्रसिद्ध है।
10. पारिस्थितिकी, सांस्कृतिक महत्व एवं विविध तथ्य
पवित्र उपवन (Orans)
- परिभाषा: ये समुदाय-संरक्षित हरित क्षेत्र हैं, जो किसी स्थानीय देवता या मंदिर को समर्पित होते हैं। यहाँ पेड़ काटना वर्जित होता है।
- प्रमुख वृक्ष: खेजड़ी और रोहिड़ा।
- संरक्षण: पहले इन्हें राजस्व रिकॉर्ड में बंजर भूमि माना जाता था, लेकिन अब राजस्थान सरकार ने इन्हें ‘मानित वन’ (Deemed Forest) के रूप में अधिसूचित कर संरक्षण प्रदान किया है।
राज्य प्रतीक एवं वनस्पति
- खेजड़ी (Prosopis cineraria):
- उपनाम: ‘रेगिस्तान का कल्पवृक्ष’, ‘शमी’ (वेदों में), ‘जांटी’ (स्थानीय), ‘बन्नी’ (कन्नड़)।
- महत्व: 1983 में ‘राज्य वृक्ष’ घोषित। इसकी पत्तियों को ‘लूम’ और फली को ‘सांगरी’ कहते हैं। विजयदशमी पर इसकी पूजा होती है।
- रोहिड़ा (Tecomella undulata):
- उपनाम: ‘मरुस्थल का सागवान’, ‘मरुशोभा’।
- महत्व: 1983 में इसके फूलों को ‘राज्य पुष्प’ घोषित किया गया।
- पलाश/ढाक (Butea monosperma): इसके लाल फूलों के कारण इसे ‘जंगल की ज्वाला’ (Flame of the Forest) कहा जाता है।
ऐतिहासिक बलिदान: खेजड़ली आंदोलन
- इतिहास: 1730 ई. में जोधपुर रियासत के खेजड़ली गाँव में पेड़ों को बचाने के लिए अमृता देवी बिश्नोई के नेतृत्व में 363 लोगों ने बलिदान दिया।
- स्मृति: यहाँ विश्व का एकमात्र वृक्ष मेला ‘भाद्रपद शुक्ल दशमी’ को लगता है।
- पुरस्कार: इस बलिदान की स्मृति में 1994-95 से ‘अमृता देवी स्मृति पुरस्कार’ (वन एवं वन्यजीव संरक्षण हेतु) प्रदान किया जा रहा है।
- नोट: इससे पूर्व 1604 में रामसड़ी गाँव में कर्मा और गौरा ने भी बलिदान दिया था।
प्रशिक्षण संस्थान
- राजस्थान वानिकी एवं वन्यजीव प्रशिक्षण संस्थान: जयपुर
- मरु वन प्रशिक्षण केंद्र: जोधपुर
- वन प्रशिक्षण केंद्र: अलवर
- वन्यजीव प्रबंधन एवं रेगिस्तान परितंत्र प्रशिक्षण केंद्र: तालछापर (चूरू)
अन्य महत्वपूर्ण तथ्य
- सेवण घास: जैसलमेर की लाठी सीरीज (भूगर्भीय जल पट्टी) में पाई जाने वाली पौष्टिक घास (वैज्ञानिक नाम: Lasiurus sindicus)।
- धोकड़ा वन: राजस्थान में सर्वाधिक क्षेत्रफल पर पाए जाने वाले वन।
- चंदन वन: राजसमंद के खमनौर (हल्दीघाटी) और देलवाड़ा क्षेत्र को कहा जाता है।
- बीड़: शेखावाटी क्षेत्र में चारागाह या घास के मैदानों को ‘बीड़’ कहा जाता है।
- माचिया सफारी पार्क (जोधपुर): यहाँ देश का पहला मरु वानस्पतिक उद्यान स्थापित किया जा रहा है।
- कैक्टस गार्डन: कुलधरा (जैसलमेर) में विकसित।
- राष्ट्रीय वन आयोग: गठन 7 फरवरी 2003।
- प्रशासनिक वृत्त: वन प्रबंधन हेतु राजस्थान को 13 वृत्तों में बांटा गया है।
राजस्थान में कितने अवर्गीकृत वन हैं?
‘इंडिया स्टेट ऑफ फॉरेस्ट रिपोर्ट 2021’ (ISFR 2021) के अनुसार, राजस्थान में 2,143.04 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में अवर्गीकृत वन (Unclassed Forests) हैं। यह राज्य के कुल भौगोलिक क्षेत्र का लगभग 6.52% है।
विशेष तथ्य: राजस्थान में सर्वाधिक अवर्गीकृत वन बीकानेर जिले में पाए जाते हैं। इन वनों में सरकार द्वारा निर्धारित शुल्क जमा करवाकर वन संपदा का दोहन किया जा सकता है और मवेशियों के चरने पर कम प्रतिबंध होते हैं।
राजस्थान में सर्वाधिक कौन से वन पाए जाते हैं?
जलवायु और क्षेत्र के विस्तार के आधार पर, राजस्थान में ‘उष्ण कटिबंधीय कांटेदार वन’ (Tropical Thorn Forests) सर्वाधिक पाए जाते हैं। ये कुल वनों का लगभग 65 प्रतिशत हिस्सा कवर करते हैं।
यदि वृक्ष प्रजाति की बात की जाए, तो सामग्री के अनुसार राजस्थान में सर्वाधिक ‘धोकड़ा’ (Dhok) के वन पाए जाते हैं।
राजस्थान का सबसे बड़ा वन क्षेत्र कौन सा है?
जिलेवार क्षेत्रफल के आधार पर, उदयपुर राजस्थान का सबसे बड़ा वन क्षेत्र वाला जिला है।
क्षेत्रफल: ISFR 2021 के अनुसार उदयपुर में 2,753.39 वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्र है।
प्रतिशत: भौगोलिक क्षेत्र के प्रतिशत के आधार पर भी उदयपुर (23.49%) प्रथम स्थान पर है।