राजस्थान की जलवायु का वर्गीकरण

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राजस्थान (Rajasthan) की जलवायु

राजस्थान की जलवायु का स्वरूप शुष्क से लेकर उप-आर्द्र मानसूनी प्रकार का है। अरावली पर्वतमाला के पश्चिमी भाग में वर्षा की कमी, ऊँचे दैनिक और वार्षिक तापमान का अंतर, कम नमी तथा तेज गति की हवाओं वाली जलवायु पाई जाती है। इसके विपरीत, अरावली के पूर्वी हिस्से में अर्द्ध-शुष्क तथा उप-आर्द्र प्रकार की जलवायु विद्यमान है।

जलवायु को नियंत्रित करने वाले महत्वपूर्ण कारक – प्रदेश की अक्षांशीय अवस्थिति, सागर तट से फासला, समुद्र स्तर से ऊँचाई, तथा अरावली पर्वत श्रृंखलाओं की अवस्थिति एवं दिशा इत्यादि सम्मिलित हैं।

राजस्थान की जलवायु की प्रमुख विशेषताएँ –

  • शुष्क तथा नम जलवायु दशाओं की प्रधानता।
  • वर्षा की अपर्याप्तता एवं अनिश्चितता।
  • वर्षा का असंतुलित क्षेत्रीय वितरण।
  • वर्षा का अधिकांश भाग जून से सितंबर के मध्य होना।
  • वर्षा की परिवर्तनशीलता और कमी के परिणामस्वरूप सूखे तथा अकाल की स्थितियों की अधिकता।

राजस्थान की अवस्थिति कर्क रेखा के उत्तरी ओर है। इसलिए, यह राज्य मुख्यतः उपोष्ण कटिबंध के अंतर्गत आता है। सिर्फ डूंगरपुर एवं बांसवाड़ा जिलों का कुछ भू-भाग ही उष्ण कटिबंध में पड़ता है।

अरावली पर्वत श्रृंखलाओं ने जलवायु के दृष्टिकोण से राजस्थान को दो पृथक भागों में विभाजित कर दिया है। ये पर्वत श्रेणियाँ मानसूनी पवनों के प्रवाह की दिशा के समानांतर होने के कारण उनके मार्ग में अवरोध उत्पन्न नहीं कर पातीं, जिसके चलते मानसूनी हवाएँ बिना वर्षा किए सीधे आगे निकल जाती हैं। इस प्रकार, अरावली का पश्चिमी क्षेत्र वृष्टि छाया प्रदेश होने के कारण बहुत कम वर्षा प्राप्त करता है।

जिस समय सूर्य कर्क रेखा पर लंबवत होता है, उस दौरान इसकी रश्मियाँ बांसवाड़ा पर सीधी पड़ती हैं, जबकि गंगानगर जिले पर ये तिरछी होती हैं। राजस्थान का औसत वार्षिक तापमान 37 से 38 डिग्री सेल्सियस के मध्य रहता है।

जयपुर स्थित मौसम विज्ञान वेधशाला की स्थापना वर्ष 1875 में रियासतकालीन केंद्रीय लोक निर्माण विभाग के प्रांगण में की गई थी। इसे दिनांक 25 अक्टूबर 1947 को सांगानेर स्थित जयपुर हवाई अड्डे पर स्थानांतरित किया गया। मौसम विज्ञान केंद्र, जयपुर का गठन अक्टूबर 1972 में एक किराये के परिसर में हुआ। वर्ष 2001 में इसे अपने निजी विभागीय भवन में ले जाया गया। यह केंद्र राजस्थान की आम जनता तथा कृषि, सिंचाई, ऊर्जा, बाढ़ नियंत्रण, राहत एवं पुनर्वास, सड़क परिवहन और रेल जैसे केंद्र व राज्य सरकार के विभिन्न महत्वपूर्ण विभागों को मौसम संबंधित सेवाएँ उपलब्ध कराता है। वर्ष 2025 तक, यह केंद्र और भी उन्नत प्रौद्योगिकियों का उपयोग करके सटीक पूर्वानुमान और जलवायु विश्लेषण प्रदान करने में एक निर्णायक भूमिका निभा रहा है।

राजस्थान को जलवायु के परिप्रेक्ष्य से पाँच भागों में वर्गीकृत किया गया है:

  • शुष्क जलवायु प्रदेश (0-20 सेमी.)
  • अर्द्धशुष्क जलवायु प्रदेश (20-40 सेमी.)
  • उपआर्द्र जलवायु प्रदेश (40-60 सेमी.)
  • आर्द्र जलवायु प्रदेश (60-80 सेमी.)
  • अति आर्द्र जलवायु प्रदेश (80-100 सेमी.)
राजस्थान की जलवायु मुख्य रूप से शुष्क और उपोष्णकटिबंधीय (subtropical) है, जिसमें तापमान की अत्यधिक विविधता पाई जाती है; यहाँ गर्मियों में अत्यधिक गर्मी और सर्दियों में हल्की ठंड होती है, वर्षा कम और अनियमित होती है, और अरावली पर्वतमाला के कारण पश्चिमी भाग (थार मरुस्थल) सबसे शुष्क और पूर्वी भाग थोड़ा अधिक आर्द्र (humid) होता है, जहाँ कर्क रेखा का प्रभाव भी है।
राजस्थान की जलवायु का वर्गीकरण

1. शुष्क प्रदेश

क्षेत्र – इसके अंतर्गत जैसलमेर, बाड़मेर का उत्तरी हिस्सा, फलौदी, गंगानगर का दक्षिणी भाग, अनूपगढ़, तथा बीकानेर और जोधपुर के पश्चिमी भू-भाग आते हैं।

औसत वर्षा – 0 से 20 सेमी.।

2. अर्द्धशुष्क जलवायु प्रदेश

क्षेत्र – इसमें चूरू, गंगानगर, हनुमानगढ़, बाड़मेर का दक्षिणी भाग, बालोतरा, जोधपुर व बीकानेर का पूर्वी अंचल तथा पाली, जालौर, सीकर, नागौर, डीडवाना कुचामन व झुंझुनू का पश्चिमी क्षेत्र शामिल है।

औसत वर्षा – 20 से 40 सेमी.।

3. उपआर्द्र जलवायु प्रदेश

क्षेत्र – यह अलवर, जयपुर, अजमेर, पाली, जालौर, नागौर, डीडवाना कुचामन व झुंझुनू के पूर्वी हिस्सों तथा डीग, दौसा, टोंक, केकड़ी, भीलवाड़ा व सिरोही के उत्तर-पश्चिमी क्षेत्रों में विस्तृत है।

औसत वर्षा – 40 से 60 सेमी.।

4. आर्द्र जलवायु प्रदेश

क्षेत्र – इसके दायरे में डीग का दक्षिण-पूर्वी अंचल, भरतपुर, धौलपुर, कोटा, बूंदी, सवाईमाधोपुर, उदयपुर, सलूम्बर का उत्तर-पूर्वी भाग, टोंक का दक्षिण-पूर्वी हिस्सा तथा चित्तौड़गढ़ आते हैं।

औसत वर्षा – 60 से 80 सेमी.।

5. अति आर्द्र जलवायु प्रदेश

क्षेत्र – इसमें कोटा का दक्षिण-पूर्वी भाग, बारां, झालावाड़, बांसवाड़ा, प्रतापगढ़, डूंगरपुर, सलूम्बर का दक्षिण-पूर्वी क्षेत्र तथा माउंट आबू का इलाका शामिल है।

औसत वर्षा – 60 से 80 सेमी.।

तथ्य

  • राजस्थान में सर्वाधिक गर्म महीने मई और जून होते हैं, जबकि सबसे ठंडे महीने दिसंबर तथा जनवरी हैं।
  • राजस्थान का सर्वाधिक गर्म एवं सबसे ठंडा जिला चूरू है।
  • प्रदेश के पश्चिमी क्षेत्र में सबसे अधिक दैनिक तापांतर दर्ज किया जाता है।
  • राजस्थान का सर्वाधिक दैनिक तापांतर वाला जिला जैसलमेर है।
  • राजस्थान में वर्षा का औसत 57 सेमी. है, जिसका वितरण 10 से 100 सेमी. के मध्य होता है। वर्षा का यही असमान वितरण, अपर्याप्त और अनिश्चित मात्रा राजस्थान में प्रतिवर्ष सूखे व अकाल का मौलिक कारण बनता है।
  • राजस्थान में वर्षा की मात्रा दक्षिण-पूर्व से उत्तर-पश्चिम की दिशा में घटती जाती है। अरब सागरीय मानसूनी पवनों से राज्य के दक्षिणी व दक्षिण-पूर्वी जिलों में पर्याप्त वर्षा हो जाती है।
  • राज्य में होने वाली कुल वार्षिक वर्षा का 34 प्रतिशत जुलाई माह में तथा 33 प्रतिशत अगस्त माह में होता है।
  • जिला स्तर पर सर्वाधिक वर्षा झालावाड़ (100 सेमी.) में होती है।
  • जिला स्तर पर न्यूनतम वर्षा जैसलमेर (10 सेमी.) में दर्ज की जाती है।
  • राजस्थान में वर्षा वाले दिनों की औसत संख्या 29 है।
  • वर्षा के दिनों की अधिकतम संख्या झालावाड़ (40 दिन) और बांसवाड़ा (38 दिन) में है।
  • वर्षा के दिनों की न्यूनतम संख्या जैसलमेर (5 दिन) में पाई जाती है।
  • राजस्थान का सर्वाधिक वर्षा प्राप्त करने वाला स्थान माउंट आबू (120-140 सेमी.) है, और यहीं पर वर्षा के सर्वाधिक दिन (48 दिन) भी मिलते हैं।
  • वर्षा के दिनों की संख्या उत्तर-पश्चिम से दक्षिण-पूर्व की ओर बढ़ती है।
  • राजस्थान में सबसे कम आर्द्रता अप्रैल माह में रहती है।
  • राजस्थान में सबसे अधिक आर्द्रता अगस्त माह में अनुभव की जाती है।
  • राजस्थान में सबसे सम तापमान अक्टूबर माह में रहता है।
  • सबसे कम वर्षा वाला स्थान सम (जैसलमेर) है, जहाँ 5 सेमी. वर्षा होती है।
  • 50 सेमी. की समवर्षा रेखा राजस्थान को दो भागों में विभाजित करती है। इस 50 सेमी. वर्षा रेखा के उत्तर-पश्चिम में वर्षा कम होती है, जबकि दक्षिण-पूर्व में वर्षा अधिक होती है।
  • यह 50 सेमी. मानक रेखा मुख्यतः अरावली पर्वत माला को माना जाता है।
  • राजस्थान में सर्वाधिक आर्द्रता वाला जिला झालावाड़ तथा न्यूनतम आर्द्रता वाला जिला जैसलमेर है। प्रदेश में सर्वाधिक आर्द्रता वाला स्थान माउंट आबू तथा सबसे कम आर्द्रता वाला स्थान फलौदी (जोधपुर) है।
  • राजस्थान में सर्वाधिक ओलावृष्टि वाला महीना मार्च-अप्रैल है तथा सबसे अधिक ओलावृष्टि उत्तर-पूर्वी क्षेत्र में होती है। सर्वाधिक ओलावृष्टि वाला जिला जयपुर है।
  • राजस्थान में हवाएँ सामान्यतः पश्चिम व दक्षिण-पश्चिम दिशा से चलती हैं।
  • हवाओं की सर्वाधिक गति जून माह में होती है।
  • हवाओं की मंद गति नवम्बर माह में रहती है।
  • ग्रीष्म ऋतु में पश्चिमी क्षेत्र का वायुदाब पूर्वी क्षेत्र की तुलना में कम होता है।
  • ग्रीष्म ऋतु में पश्चिम दिशा से गर्म हवाएँ चलती हैं, जिन्हें ‘लू’ कहा जाता है। इस लू के प्रभाव से यहाँ निम्न वायुदाब का क्षेत्र निर्मित हो जाता है। इस निम्न वायुदाब की पूर्ति के लिए दूसरे क्षेत्रों (उच्च वायुदाब वाले) से तीव्र गति से हवा उठकर आती है, जो अपने साथ धूल और मिट्टी ले आती है, जिसे ‘आँधी’ कहते हैं।
  • आँधियों की सर्वाधिक संख्या श्रीगंगानगर (27 दिन) में दर्ज की जाती है।
  • आँधियों की न्यूनतम संख्या झालावाड़ (3 दिन) में है।
  • राजस्थान के उत्तरी भागों में धूल भरी आँधियाँ जून माह में और दक्षिणी भागों में मई माह में आती हैं।
  • राजस्थान में पश्चिम की अपेक्षा पूर्व में तूफ़ान (आँधी + वर्षा) अधिक आते हैं।
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आर्द्रता

वायुमंडल में विद्यमान जलवाष्प की मात्रा को आर्द्रता के रूप में परिभाषित किया जाता है। सापेक्षिक आर्द्रता मार्च-अप्रैल में न्यूनतम तथा जुलाई-अगस्त में अधिकतम होती है।

लू

मरुस्थलीय क्षेत्र में प्रवाहित होने वाली शुष्क एवं अत्यधिक गर्म हवाएँ ‘लू’ कहलाती हैं।

समुद्र तल से ऊँचाई में वृद्धि के साथ तापमान में गिरावट आती है। इसके घटने की यह सामान्य दर प्रति 165 मीटर की ऊँचाई पर 1 डिग्री सेल्सियस है।

राजस्थान के उत्तर-पश्चिमी भाग से दक्षिण-पूर्वी भाग की ओर तापमान में कमी देखी जा सकती है।

डॉ. व्लादिमीर कोपेन, थार्नथ्वेट, ट्रिवार्था के जलवायु वर्गीकरण के अनुसार जलवायु प्रदेश

कोपेन, थार्नथ्वेट, और ट्रिवार्था जैसे विद्वानों ने विश्व को विभिन्न जलवायु प्रदेशों में विभाजित किया और उनकी विशेषताओं को संकेताक्षरों के माध्यम से प्रस्तुत किया। यद्यपि उनके वर्गीकरण राजस्थान जैसे राज्यों के लिए पूर्ण रूप से सार्थक नहीं हैं, फिर भी उनका विभाजन एक मौलिक सामान्य आधार प्रदान करता है। अतः, जलवायुगत समानताओं के आधार पर राजस्थान को विभिन्न जलवायु प्रदेशों में विभक्त किया जाता है।

कोपेन के अनुसार जलवायु प्रदेश

कोपेन के अनुसार, राजस्थान की जलवायु मुख्य रूप से शुष्क (BWh - गर्म मरुस्थल) और अर्ध-शुष्क (BSh - स्टेपी) है, जिसमें कुछ दक्षिणी-पूर्वी भागों में उप-आर्द्र (Cwg) और उष्णकटिबंधीय आर्द्र (Aw) क्षेत्र भी हैं, जो क्रमशः रेगिस्तानी पश्चिमी हिस्सों (जैसलमेर, बीकानेर) से लेकर पूर्वी और दक्षिणी हिस्सों (बांसवाड़ा, टोंक) तक फैले हैं, जहाँ वर्षा और वनस्पति में अंतर होता है।

जर्मनी के वैज्ञानिक, डॉ. व्लादिमीर कोपेन ने वर्ष 1918 में पहली बार वैश्विक जलवायु का वर्गीकरण प्रस्तुत किया। कोपेन का मानना था कि स्थानीय वनस्पति ही जलवायु की सर्वोत्तम अभिव्यक्ति होती है। यद्यपि, कोपेन ने अपने जलवायु वर्गीकरण में वर्षा तथा तापमान को भी महत्वपूर्ण स्थान दिया, क्योंकि वनस्पति अप्रत्यक्ष रूप से वर्षा और तापमान पर ही आश्रित होती है। इसी आधार पर कोपेन ने राजस्थान की जलवायु को चार सांकेतिक श्रेणियों में वर्णित किया है।

कोपेन ने अपने वर्गीकरण में जलवायु को पाँच प्रमुख समूहों—उष्णकटिबंधीय, शुष्क जलवायु, उष्ण शीतोष्ण, महाद्वीपीय, और ध्रुवीय या शीत जलवायु समूह—में विभाजित किया है।

Cwg उप आर्द्र जलवायु प्रदेश – पूर्वी और मध्य राजस्थान का अरावली से पूर्व का भाग।

Aw उष्ण कटिबंधीय आर्द्र जलवायु प्रदेश – डूंगरपुर, सलूम्बर, प्रतापगढ़, बांसवाड़ा व दक्षिणी चित्तौड़ तथा झालावाड़।

Bshw अर्द्ध शुष्क कटिबंधीय शुष्क जलवायु प्रदेश – अरावली के पश्चिम का क्षेत्र।

Bwhw उष्ण कटिबंधीय शुष्क जलवायु प्रदेश – जैसलमेर, फलौदी, बीकानेर, अनूपगढ़, श्रीगंगानगर, हनुमानगढ़ तथा चूरू जिले का कुछ क्षेत्र।

थार्नथ्वेट के अनुसार जलवायु प्रदेश

थार्नथ्वेट ने अपने जलवायु वर्गीकरण हेतु वाष्पोत्सर्जन, वनस्पति, वाष्पीकरण की मात्रा, वर्षा और तापमान को आधार बनाया। राजस्थान में थार्नथ्वेट का जलवायु वर्गीकरण अधिक स्वीकार्य माना जाता है।

EA’d या उष्ण शुष्क कटिबन्धीय मरुस्थलीय जलवायु

CA’w या उपआर्द्र जलवायु प्रदेश

DA’w या उष्ण आर्द्र जलवायु प्रदेश

DB’w या अर्द्ध शुष्क जलवायु प्रदेश

थॉर्नथवेट के अनुसार राजस्थान को मुख्य रूप से चार जलवायु क्षेत्रों में बांटा गया है, जिनमें उष्णकटिबंधीय मरुस्थलीय (DA'd) (जैसलमेर, बाड़मेर), अर्द्ध-शुष्क (CA'd) (जोधपुर, पाली, नागौर), उपोष्णकटिबंधीय (CWA') (कोटा, बूंदी, झालावाड़) और उपोष्णकटिबंधीय आर्द्र (CWA-W) (उदयपुर, बांसवाड़ा, डूंगरपुर के कुछ हिस्से) शामिल हैं, जो वर्षा, तापमान और वाष्पीकरण पर आधारित हैं, जिसमें पश्चिमी राजस्थान सूखा और पूर्वी भाग अधिक आर्द्र होता है.

ट्रिवार्था के अनुसार जलवायु प्रदेश

ट्रिवार्था (Trewartha) के अनुसार राजस्थान की जलवायु को मुख्य रूप से उपोष्णकटिबंधीय (Subtropical) और उष्णकटिबंधीय (Tropical) क्षेत्रों में बांटा जा सकता है, जिसमें 'Aw' (उष्णकटिबंधीय सवाना) और 'BShw' (अर्ध-शुष्क स्टेपी) प्रमुख हैं, जो शुष्क व अर्द्ध-शुष्क मरुस्थलीय, स्टेपी (अर्द्ध-शुष्क), और उपोष्णकटिबंधीय आर्द्र क्षेत्रों को दर्शाते हैं, जहाँ तापमान और वर्षा के आधार पर ये वर्गीकरण होते हैं, जैसे दक्षिण-पूर्व में उपोष्णकटिबंधीय और पश्चिम में शुष्क/अर्द्ध-शुष्क क्षेत्र.

प्रोफेसर ट्रिवार्था ने कोपेन के वर्गीकरण में संशोधन करके एक अधिक सुबोध, सरल, सुग्राह्य एवं संगत वर्गीकरण प्रस्तुत किया, जो निम्नलिखित है:

Caw अर्द्ध उष्ण आर्द्र जलवायु प्रदेश

Aw उष्ण कटिबन्धीय आर्द्र जलवायु प्रदेश

Bsh उष्ण एवं अर्द्ध उष्ण कटिबंधीय स्टेपी तुल्य जलवायु प्रदेश

Bwh मरुस्थलीय या शुष्क जलवायु प्रदेश

कृषि जलवायु प्रदेश

राजस्थान को कृषि के दृष्टिकोण से निम्नलिखित दस जलवायु प्रदेशों में विभाजित किया गया है:

  1. शुष्क पश्चिमी मैदानी
  2. सिंचित उत्तरी पश्चिमी मैदानी
  3. शुष्क आंशिक सिंचित पश्चिमी मैदानी
  4. अंन्त प्रवाही
  5. लूनी बेसिन
  6. पूर्वी मैदानी (भरतपुर, धौलपुर, करौली जिले)
  7. अर्द्र शुष्क जलवायु प्रदेश
  8. उप आर्द्र जलवायु प्रदेश
  9. आर्द्र जलवायु प्रदेश
  10. अति आर्द्र जलवायु प्रदेश

ऋतुएँ

राजस्थान में जलवायु का अध्ययन करने पर तीन प्रकार की ऋतुएँ पाई जाती हैं:

  • ग्रीष्म ऋतु: (मार्च से मध्य जून तक)
  • वर्षा ऋतु: (मध्य जून से सितम्बर तक)
  • शीत ऋतु: (नवम्बर से फरवरी तक)

ग्रीष्म ऋतु

राजस्थान में मार्च से मध्य जून की अवधि ग्रीष्म ऋतु की होती है। इसमें मई व जून के महीनों में गर्मी अपने चरम पर होती है। अत्यधिक गर्मी के कारण वायु में नमी का लोप हो जाता है, परिणामस्वरूप वायु हल्की होकर ऊपर उठ जाती है। इससे राजस्थान में निम्न वायुदाब का क्षेत्र बनता है, जिसके कारण उच्च वायुदाब से वायु निम्न वायुदाब की ओर तीव्र गति से प्रवाहित होती है, जिससे गर्मियों में आँधियों का प्रवाह बना रहता है।

वर्षा ऋतु

राजस्थान में मध्य जून से सितम्बर तक की अवधि वर्षा ऋतु की होती है।

राजस्थान में तीन प्रकार के मानसूनों से वर्षा प्राप्त होती है:

1. बंगाल की खाड़ी का मानसून

यह मानसून राजस्थान में पूर्व दिशा से प्रवेश करता है। पूर्वी दिशा से आने के कारण इन मानसूनी हवाओं को ‘पुरवइयां’ के नाम से जाना जाता है। यह मानसून राजस्थान में सर्वाधिक वर्षा का प्रमुख स्रोत है। इस मानसून से राजस्थान के उत्तरी, उत्तर-पूर्वी, तथा दक्षिण-पूर्वी क्षेत्रों में वर्षा होती है।

2. अरब सागर का मानसून

यह मानसून राजस्थान में दक्षिण-पश्चिमी दिशा से प्रवेश करता है। यह मानसून राज्य में अधिक वर्षा नहीं कर पाता क्योंकि यह अरावली पर्वतमाला के समानांतर आगे बढ़ जाता है। राजस्थान में अरावली पर्वतमाला का विस्तार दक्षिण-पश्चिम से उत्तर-पूर्व की ओर है। यदि राज्य में अरावली का विस्तार उत्तर-पश्चिम से दक्षिण-पूर्व की ओर होता, तो राजस्थान के अधिकांश क्षेत्र में भारी वर्षा होती।

राजस्थान में सर्वप्रथम अरब सागर का मानसून ही प्रवेश करता है।

3. भूमध्यसागरीय मानसून

यह मानसून राजस्थान में पश्चिम दिशा से प्रवेश करता है। पश्चिमी दिशा से प्रवेश के कारण इस मानसून को ‘पश्चिमी विक्षोभों का मानसून’ के उपनाम से भी जाना जाता है। इस मानसून से राजस्थान के उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र में वर्षा होती है। यह मानसून मुख्यतः सर्दियों में वर्षा करता है। सर्दियों में होने वाली इस वर्षा को स्थानीय भाषा में ‘मावठ’ कहते हैं। यह वर्षा गेहूँ की फसल के लिए अत्यधिक लाभकारी होती है। इन वर्षा की बूँदों को ‘गोल्डन ड्रॉप्स’ या ‘सोने की बूँदें’ के उपनाम से जाना जाता है।

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शीत ऋतु

राजस्थान में नवम्बर से फरवरी तक शीत ऋतु का समय होता है। इन चार महीनों में जनवरी माह सर्वाधिक ठंडा होता है। शीत ऋतु में भूमध्यसागर से उठने वाले चक्रवातों के कारण राजस्थान के उत्तरी-पश्चिमी भाग में वर्षा होती है, जिसे “मावट” या “मावठ” कहा जाता है। यह वर्षा माघ के महीने में होती है। शीतकालीन वर्षा ‘मावट’ को ‘गोल्डन ड्रॉप्स’ (अमृत बूँदें) भी कहते हैं। यह रबी की फसल के लिए अत्यंत लाभदायक है।

राज्य में हवाएँ प्रायः पश्चिम और उत्तर-पश्चिम दिशा से चलती हैं।

वर्षा

राजस्थान में सर्वाधिक वर्षा दक्षिण-पश्चिमी मानसूनी हवाओं से होती है। इसके बाद दूसरा स्थान बंगाल की खाड़ी के मानसून का, तीसरा स्थान अरब सागर के मानसून का, और अंतिम स्थान भूमध्यसागरीय मानसून का है।

आंधियों के नाम

  • उत्तर की ओर से आने वाली – उत्तरा, उत्तराद, धरोड, धराऊ
  • दक्षिण की ओर से आने वाली – लकाऊ
  • पूर्व की ओर से आने वाली – पूरवइयां, पूरवाई, पूरवा, आगुणी
  • पश्चिम की ओर से आने वाली – पिछवाई, पच्छऊ, पिछवा, आथूणी।

अन्य

  • उत्तर-पूर्व के मध्य से – संजेरी
  • पूर्व-दक्षिण के मध्य से – चीर/चील
  • दक्षिण-पश्चिम के मध्य से – समंदरी/समुन्द्री
  • उत्तर-पश्चिम के मध्य से – सूर्या

सूखा

सूखा एक असामान्य और लंबा शुष्क मौसम काल होता है जो किसी क्षेत्र विशेष में एक स्पष्ट जलीय असंतुलन उत्पन्न करता है। सूखे के लिए मानसून की अनिश्चितता के अतिरिक्त, अवैज्ञानिक कृषि प्रबंधन भी एक उत्तरदायी कारक हो सकता है। ‘सूखे’ की तीन मुख्य स्थितियाँ होती हैं:

(i) मौसमी सूखा: किसी विस्तृत क्षेत्र में अपेक्षा से 75% कम वर्षा होने पर उत्पन्न हुई स्थिति। वर्षा की कमी (RD) के आधार पर इसे आगे तीन श्रेणियों में वर्गीकृत किया जा सकता है:

  • RD > 50% – भयंकर सूखा
  • 25% ≤ RD ≤ 50% – मध्यम सूखा
  • RD < 25% – सूखा

(ii) जलीय सूखा: जब ‘मौसम विज्ञानी सूखे’ की अवधि अत्यधिक लंबी हो जाती है, तो नदियों, तालाबों, और झीलों जैसे जल स्रोतों के सूखने से यह स्थिति उत्पन्न होती है।

(iii) कृषिगत सूखा: इस स्थिति में फसल के लिए आवश्यक वर्षा से काफी कम वर्षा होने पर मिट्टी की नमी फसल के विकास के लिए अपर्याप्त हो जाती है।

दैनिक गति/घूर्णन गति

पृथ्वी अपने अक्ष पर 23.5 डिग्री झुकी हुई है। यह अपने अक्ष पर पश्चिम से पूर्व की ओर 1610 किमी./घंटे की चाल से 23 घंटे, 56 मिनट और 4 सेकंड में एक चक्कर पूरा करती है। इस गति को घूर्णन गति या दैनिक गति कहते हैं, और इसी के कारण दिन और रात होते हैं।

वार्षिक गति/परिक्रमण गति

पृथ्वी को सूर्य की परिक्रमा पूर्ण करने में 365 दिन, 5 घंटे, 48 मिनट और 46 सेकंड का समय लगता है। इसे पृथ्वी की वार्षिक गति या परिक्रमण गति कहा जाता है। इसमें लगने वाले समय को सौर वर्ष कहते हैं। पृथ्वी पर ऋतु परिवर्तन, इसके अक्ष पर झुके होने के कारण तथा सूर्य के सापेक्ष इसकी स्थिति में परिवर्तन, अर्थात् वार्षिक गति के कारण होता है। वार्षिक गति के परिणामस्वरूप ही पृथ्वी पर दिन और रात छोटे-बड़े होते हैं।

पृथ्वी के परिक्रमण काल में 21 मार्च एवं 23 सितम्बर को सूर्य की किरणें भूमध्य रेखा पर सीधी पड़ती हैं, फलस्वरूप संपूर्ण पृथ्वी पर रात-दिन की अवधि बराबर होती है।

विषुव

जब सूर्य की किरणें भूमध्य रेखा पर लंबवत पड़ती हैं, तो इस स्थिति को विषुव कहा जाता है। वर्ष में दो विषुव होते हैं:

  • 21 मार्च को बसंत विषुव तथा 23 सितम्बर को शरद विषुव होते हैं।

आयन

23.5° उत्तरी अक्षांश से 23.5° दक्षिणी अक्षांश के मध्य का वह भू-भाग जहाँ वर्ष में कभी न कभी सूर्य की किरणें सीधी चमकती हैं, आयन कहलाता है। यह दो प्रकार का होता है:

  • उत्तरी आयन (उत्तरायण) – 0° अक्षांश से 23.5° उत्तरी अक्षांश के मध्य।
  • दक्षिणी आयन (दक्षिणायन) – 0° अक्षांश से 23.5° दक्षिणी अक्षांश के मध्य।

आयनान्त

जहाँ आयन का अंत होता है, उसे आयनान्त कहते हैं। यह दो होते हैं:

  • उत्तरी आयन का अन्त (उत्तरायणान्त) – 23.5° उत्तरी अक्षांश/कर्क रेखा पर 21 जून को उत्तरी आयन का अंत होता है।
  • दक्षिणी आयन का अन्त (दक्षिणायनान्त) – 23.5° दक्षिणी अक्षांश/मकर रेखा पर 22 दिसम्बर को दक्षिणायनान्त होता है।

पृथ्वी के परिक्रमण काल में 21 जून को कर्क रेखा पर सूर्य की किरणें लंबवत् रहती हैं। फलस्वरूप, उत्तरी गोलार्द्ध में दिन बड़े व रातें छोटी एवं ग्रीष्म ऋतु होती है, जबकि दक्षिणी गोलार्द्ध में सूर्य की किरणें तिरछी पड़ने के कारण दिन छोटे, रातें बड़ी व शरद ऋतु होती है।

तथ्य

  • उत्तरी गोलार्द्ध का सबसे बड़ा दिन – 21 जून
  • दक्षिणी गोलार्द्ध की सबसे बड़ी रात – 21 जून
  • उत्तरी गोलार्द्ध की सबसे छोटी रात – 21 जून
  • दक्षिणी गोलार्द्ध का सबसे छोटा दिन – 21 जून

पृथ्वी के परिक्रमण काल में 22 दिसम्बर को मकर रेखा पर सूर्य की किरणें लंबवत् रहती हैं। फलस्वरूप, दक्षिणी गोलार्द्ध में दिन बड़े, रातें छोटी एवं ग्रीष्म ऋतु होती है, जबकि उत्तरी गोलार्द्ध में सूर्य की किरणें तिरछी पड़ने के कारण दिन छोटे, रातें बड़ी व शरद ऋतु होती है।

तथ्य

  • दक्षिणी गोलार्द्ध का सबसे बड़ा दिन – 22 दिसम्बर
  • उत्तरी गोलार्द्ध की सबसे बड़ी रात – 22 दिसम्बर
  • दक्षिणी गोलार्द्ध की सबसे छोटी रात – 22 दिसम्बर
  • उत्तरी गोलार्द्ध का सबसे छोटा दिन – 22 दिसम्बर

कटिबन्ध

किन्हीं भी दो अक्षांशों के मध्य का भू-भाग कटिबंध कहलाता है।

गोर

किन्हीं भी दो देशांतरों के मध्य का भू-भाग गोर कहलाता है।

भारत दो कटिबन्धों में अवस्थित है:

  • उष्ण कटिबंध और शीतोष्ण कटिबंध।

राजस्थान उष्ण कटिबंध के निकट, वास्तव में उपोष्ण कटिबंध में स्थित है।

मानसून

मानसून शब्द की उत्पत्ति अरबी भाषा के ‘मौसिम’ शब्द से हुई है, जिसका शाब्दिक अर्थ एक विशेष ऋतु में हवाओं की दिशाओं का उलट जाना होता है।

ग्रीष्मकालीन/दक्षिणी-पश्चिमी मानसून

गर्मियों में जब उत्तरी गोलार्द्ध में सूर्य की किरणें सीधी पड़ती हैं, तो यहाँ निम्न वायुदाब का क्षेत्र बनता है। जबकि दक्षिणी गोलार्द्ध में सूर्य की किरणें तिरछी पड़ने के कारण शीत ऋतु होती है और वायुदाब उच्च रहता है। इस कारण हवाएँ दक्षिणी गोलार्द्ध से उत्तरी गोलार्द्ध की ओर चलती हैं।

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भारत की प्रायद्वीपीय स्थिति के कारण दक्षिण-पश्चिम से आने वाली ये मानसूनी पवनें दो शाखाओं में विभाजित हो जाती हैं:

  1. अरब सागरीय शाखा
  2. बंगाल की खाड़ी शाखा

भारत में सर्वप्रथम मानसून की अरब सागरीय शाखा ही सक्रिय होती है। औसतन 1 जून को मालाबार तट (केरल) पर ग्रीष्मकालीन मानसून की अरब सागरीय शाखा सक्रिय होती है।

नोट

भारत में ग्रीष्मकालीन मानसून सबसे पहले अंडमान निकोबार द्वीपसमूह (ग्रेट निकोबार, इंदिरा पॉइंट) पर सक्रिय होता है।

राजस्थान में भी सर्वप्रथम ग्रीष्मकालीन मानसून की अरब सागरीय शाखा ही सक्रिय होती है।

भारत एवं राजस्थान में सर्वाधिक वर्षा ग्रीष्मकालीन मानसून की बंगाल की खाड़ी शाखा से प्राप्त होती है।

शीतकालीन मानसून से केवल कोरोमंडल तट (तमिलनाडु) में ही वर्षा होती है। शीतकालीन मानसून से सर्वाधिक वर्षा प्राप्त करने वाला देश चीन है।

तथ्य

  • विश्व का सबसे गर्म स्थान – अल-अजीजिया (लीबिया), सहारा मरुस्थल।
  • भारत का सबसे गर्म राज्य – राजस्थान।
  • भारत का सबसे गर्म स्थान – फलौदी (जोधपुर)।
  • राजस्थान का सबसे गर्म जिला – चूरू।
  • राजस्थान का सबसे गर्म स्थान – फलौदी (जोधपुर)।
  • विश्व का सबसे ठंडा स्थान – बर्खोयांस्क (रूस)।
  • भारत का सबसे ठंडा राज्य – जम्मू-कश्मीर।
  • भारत का सबसे ठंडा स्थान – द्रास (-46°C)।
  • राजस्थान का सबसे ठंडा जिला – चूरू।
  • राजस्थान का सबसे ठंडा स्थान – माउंट आबू (सिरोही)।
  • विश्व का सबसे आर्द्र स्थान – मौसिनराम (मेघालय), भारत।
  • भारत का सबसे आर्द्र राज्य – केरल।
  • भारत का सबसे आर्द्र स्थान – मौसिनराम (मेघालय)।
  • राजस्थान का सबसे आर्द्र जिला – झालावाड़।
  • राजस्थान का सबसे आर्द्र स्थान – माउंट आबू।
  • विश्व का सर्वाधिक वर्षा वाला स्थान – मौसिनराम (मेघालय)।
  • भारत का सर्वाधिक वर्षा वाला स्थान – मौसिनराम (मेघालय)।
  • भारत का सर्वाधिक वर्षा वाला राज्य – केरल।
  • राजस्थान का सर्वाधिक वर्षा वाला स्थान – माउंट आबू।
  • राजस्थान का सर्वाधिक वर्षा वाला जिला – झालावाड़।
  • विश्व का सबसे शुष्क स्थान – अटाकामा मरुस्थल (चिली)।
  • भारत का सबसे शुष्क राज्य – राजस्थान।
  • भारत का सबसे शुष्क स्थान – लेह (लद्दाख)।
  • राजस्थान का सबसे शुष्क जिला – जैसलमेर।
  • राजस्थान का सबसे शुष्क स्थान – सम (जैसलमेर) और फलौदी (जोधपुर)।
  • विश्व में सबसे कम वर्षा वाला स्थान – अटाकामा मरुस्थल।
  • भारत में सबसे कम वर्षा वाला राज्य – पंजाब।
  • भारत में सबसे कम वर्षा वाला स्थान – लेह।
  • राजस्थान में सबसे कम वर्षा वाला जिला – जैसलमेर।
  • राजस्थान में सबसे कम वर्षा वाला स्थान – सम (जैसलमेर)।
  • भारत का सर्वाधिक तापांतर वाला राज्य – राजस्थान।
  • राजस्थान का सर्वाधिक वार्षिक तापांतर वाला जिला – चूरू।
  • राजस्थान का सर्वाधिक दैनिक तापांतर वाला जिला – जैसलमेर।
  • राजस्थान का वनस्पति रहित क्षेत्र – सम (जैसलमेर)।
  • साइबेरिया की ठंडी हवा एवं हिमालय के हिमपात के कारण राजस्थान में जो शीत लहर चलती है, वह जाड़ा कहलाती है।
  • गर्मियों में थार के मरुस्थल में चलने वाली गर्म पवनें लू कहलाती हैं।
  • राजस्थान में सर्वाधिक धूल भरी आँधियाँ श्रीगंगानगर में चलती हैं।
  • राजस्थान में पाला – दक्षिणी तथा दक्षिण-पूर्वी भागों में अधिक ठंड के कारण पाला पड़ता है।
  • दक्षिण राजस्थान में तेज हवाओं के साथ होने वाली मूसलाधार वर्षा चक्रवाती वर्षा कहलाती है।
  • राजस्थान में मानसून का प्रवेश द्वार झालावाड़ और बांसवाड़ा हैं।
  • राजस्थान में सर्वाधिक वर्षा की विषमता वाले जिले बाड़मेर और जैसलमेर हैं।
  • राजस्थान में वर्षा की सबसे कम विषमता वाला जिला बांसवाड़ा है।
  • 21 जून को राजस्थान के बांसवाड़ा जिले में सूर्य की किरणें सीधी पड़ती हैं।
  • 22 दिसम्बर को राजस्थान के श्री गंगानगर जिले में सूर्य की किरणें सर्वाधिक तिरछी पड़ती हैं।
  • राजस्थान की जलवायु उपोष्ण कटिबंधीय है।

मावठ

सर्दियों में पश्चिमी विक्षोभों या भूमध्यसागरीय विक्षोभों के कारण भारत के उत्तरी मैदानी क्षेत्र में जो वर्षा होती है, उसे ‘मावठ’ कहते हैं।

  • मावठ का प्रमुख कारण – जेट स्ट्रीम।
  • जेट स्ट्रीम – संपूर्ण पृथ्वी पर पश्चिम से पूर्व की ओर क्षोभमंडल में प्रवाहित होने वाली तीव्र पवनें।

मावठ रबी की फसल के लिए अत्यंत उपयोगी होती है, जिस कारण इसे ‘गोल्डन ड्रॉप्स’ या ‘स्वर्णिम बूँदें’ भी कहा जाता है।

महत्वपूर्ण तथ्य

  • नॉरवेस्टर – छोटा नागपुर के पठार पर ग्रीष्म काल में चलने वाली पवनें नॉरवेस्टर कहलाती हैं। यह बिहार एवं झारखंड राज्य को प्रभावित करती हैं।
  • जब नॉरवेस्टर पवनें पूर्व की ओर आगे बढ़कर पश्चिम बंगाल राज्य में पहुँचती हैं, तो इन्हें काल बैसाखी कहा जाता है। तथा जब यही पवनें और पूर्व की ओर बढ़कर असम राज्य में पहुँचती हैं, तो यहाँ 50 सेमी. तक वर्षा करती हैं। यह वर्षा चाय की खेती के लिए अत्यंत उपयोगी होती है, इसलिए इसे चाय वर्षा या टी-शॉवर कहा जाता है।
  • मैंगो शॉवर – तमिलनाडु, केरल एवं आंध्र प्रदेश राज्यों में मानसून-पूर्व जो वर्षा होती है, जिससे वहाँ की आम की फसलें पकती हैं, वह वर्षा मैंगो शॉवर कहलाती है।
  • चेरी ब्लॉसम – कर्नाटक राज्य में मानसून-पूर्व होने वाली वर्षा, जो वहाँ की कहवा (कॉफी) की फसल के लिए अत्यधिक उपयोगी होती है, चेरी ब्लॉसम या फूलों की बौछार कहलाती है।
  • मानसून की विभंगता – मानसून द्वारा किसी एक स्थान पर वर्षा हो जाने तथा उसी स्थान पर होने वाली अगली वर्षा के मध्य का समय अनिश्चित होता है, जिसे मानसून की विभंगता कहा जाता है।
  • मानसून का प्रस्फोट (फटना) – दक्षिण भारत में ग्रीष्मकालीन मानसून के दौरान केरल के मालाबार तट पर तेज हवाओं एवं बिजली की चमक के साथ बादलों की तीव्र गर्जना के साथ जो मानसून की प्रथम मूसलाधार वर्षा होती है, उसे मानसून का प्रस्फोट या फटना कहा जाता है।
  • वृष्टि प्रदेश एवं वृष्टि छाया प्रदेश
  • अल-नीनो – यह एक गर्म जलधारा है जो दक्षिण अमेरिका महाद्वीप के पश्चिम में प्रशांत महासागर में ग्रीष्मकालीन मानसून के दौरान सक्रिय होती है। इससे भारतीय मानसून कमजोर पड़ जाता है और भारत एवं पड़ोसी देशों में अल्पवृष्टि एवं सूखे की स्थिति उत्पन्न हो जाती है।
  • ला-नीना – यह एक ठंडी जलधारा है जो ऑस्ट्रेलिया महाद्वीप के उत्तर-पूर्व में अल-नीनो के विपरीत उत्पन्न होती है। इससे भारतीय मानसून की शक्ति बढ़ जाती है और भारत तथा पड़ोसी देशों में अतिवृष्टि की स्थिति पैदा हो जाती है।

उपसौर और अपसौर

  • उपसौर – सूर्य और पृथ्वी के बीच न्यूनतम दूरी (1470 लाख किमी.) की घटना जो 3 जनवरी को होती है, उसे उपसौर कहते हैं।
  • अपसौर – सूर्य और पृथ्वी के बीच की अधिकतम दूरी (1510 लाख किमी.) की घटना जो 4 जुलाई को होती है, उसे अपसौर कहते हैं।
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