वर्ण-विचार एवं आक्षरिक खंड

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1. प्रस्तावना

मानव सभ्यता के विकास में ‘भाषा’ का स्थान सर्वोपरि है। हम अपने विचारों का आदान-प्रदान जिस माध्यम से करते हैं, उसे भाषा कहते हैं। भाषा का निर्माण वाक्यों से, वाक्यों का शब्दों से और शब्दों का निर्माण ‘वर्णों’ (Sounds/Letters) से होता है। अतः किसी भी भाषा के वैज्ञानिक अध्ययन के लिए उसकी सबसे छोटी इकाई, यानी ‘वर्ण’ का ज्ञान होना अनिवार्य है।

व्याकरण के जिस विभाग में वर्णों के स्वरूप, भेद, आकार, उच्चारण स्थान और उनके मेल से शब्द बनाने के नियमों का अध्ययन किया जाता है, उसे ‘वर्ण-विचार’ (Phonology) कहते हैं।

वर्ण की परिभाषा

भाषा की वह लघुतम (सबसे छोटी) मौखिकी ध्वनि, जिसके और अधिक खंड (टुकड़े) नहीं किए जा सकते, ‘वर्ण’ कहलाती है। जब इन ध्वनियों को लिखित रूप दिया जाता है, तो वे ‘लिपि-चिह्न’ या ‘अक्षर’ कहलाते हैं।

वैज्ञानिक विश्लेषण: उदाहरण के लिए, एक शब्द लें: ‘पीला’। सामान्य दृष्टि से इसके दो खंड प्रतीत होते हैं: पी + ला। किंतु, व्याकरणिक दृष्टि से इनके और भी सूक्ष्म खंड संभव हैं:

  • ‘पी’ का विच्छेद = प् + ई
  • ‘ला’ का विच्छेद = ल् + आ

अतः ‘पीला’ शब्द प्, ई, ल्, आ – इन चार मूल ध्वनियों के योग से बना है। अब यदि हम ‘प्’ या ‘ई’ के और टुकड़े करना चाहें, तो यह संभव नहीं है। यही अविभाज्य मूल ध्वनियाँ ‘वर्ण’ हैं।

2. हिंदी वर्णमाला

हिंदी भाषा की लिपि ‘देवनागरी’ है, जो नितांत वैज्ञानिक लिपि है। इसमें जैसा बोला जाता है, वैसा ही लिखा जाता है। हिंदी वर्णमाला में उच्चारण और प्रयोग के आधार पर वर्णों को व्यवस्थित किया गया है।

मानक हिंदी व्याकरण (NCERT एवं केंद्रीय हिंदी निदेशालय) के अनुसार, हिंदी में वर्णों की कुल संख्या 52 मानी जाती है, जबकि उच्चारण के आधार पर मूलतः 44 वर्णों की गणना की जाती है।

अध्ययन की सुविधा हेतु वर्णों को मुख्यतः दो भागों में वर्गीकृत किया गया है:

  1. स्वर (Vowels)
  2. व्यंजन (Consonants)

3. स्वर (Vowels)

जिन वर्णों का उच्चारण स्वतंत्र रूप से होता है, अर्थात् जिनके उच्चारण में किसी अन्य वर्ण की सहायता नहीं लेनी पड़ती और हवा बिना किसी बाधा के मुख-विवर से बाहर निकलती है, वे ‘स्वर’ कहलाते हैं।

स्वरों की संख्या: परंपरागत रूप से स्वरों की संख्या 13 मानी जाती थी, किंतु आधुनिक मानक हिंदी में उच्चारण की दृष्टि से 11 स्वर स्वीकृत हैं: अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ऋ, ए, ऐ, ओ, औ।

विशेष नोट: ‘अं’ (अनुस्वार) और ‘अः’ (विसर्ग) को न तो पूर्णतः स्वर माना जाता है और न ही व्यंजन। इन्हें ‘अयोगवाह’ कहा जाता है, क्योंकि इनका प्रयोग स्वरों के सहारे ही संभव होता है।

स्वरों का वर्गीकरण (Classification of Vowels)

स्वरों को उच्चारण में लगने वाले समय (मात्रा) और प्रयत्न के आधार पर तीन श्रेणियों में बाँटा गया है:

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(क) ह्रस्व स्वर (Short Vowels)

जिन स्वरों के उच्चारण में अत्यंत कम समय (एक मात्रा का समय) लगता है, उन्हें ह्रस्व स्वर कहते हैं। ये अन्य स्वरों के निर्माण की नींव हैं, अतः इन्हें ‘मूल स्वर’ भी कहा जाता है।

  • संख्या: 4
  • वर्ण: अ, इ, उ, ऋ।
  • विशेष: ‘ऋ’ का प्रयोग हिंदी में तत्सम (संस्कृत निष्ठ) शब्दों में ही होता है (जैसे- ऋषि, ऋतु, ऋण)। उच्चारण में अब यह ‘रि’ की भांति उच्चरित होने लगा है।

(ख) दीर्घ स्वर (Long Vowels)

जिन स्वरों के उच्चारण में ह्रस्व स्वरों की तुलना में दुगुना समय (दो मात्राओं का समय) लगता है, वे दीर्घ स्वर कहलाते हैं। ये दो स्वरों के मेल से बनते हैं।

  • संख्या: 7
  • वर्ण: आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ।
    • सजातीय दीर्घ: आ (अ+अ), ई (इ+इ), ऊ (उ+उ)
    • विजातीय (संयुक्त) दीर्घ: ए (अ+इ), ऐ (अ+ए), ओ (अ+उ), औ (अ+ओ)

(ग) प्लुत स्वर (Prolated Vowels)

जिन स्वरों के उच्चारण में ह्रस्व से तिगुना समय लगता है, उन्हें प्लुत कहते हैं। इनका कोई अलग चिह्न नहीं होता, प्रायः (३) का अंक लगाकर इसे दर्शाया जाता है। इसका प्रयोग किसी को पुकारने या जोर से गाने/रोने में होता है।

  • उदाहरण: ओ३म्, राम३।

(घ) आगत स्वर (Borrowed Vowel)

अंग्रेजी भाषा के प्रभाव से हिंदी में ‘ऑ’ (अर्ध-चंद्र) ध्वनि को स्वीकार किया गया है। इसका उच्चारण ‘आ’ और ‘ओ’ के बीच का होता है।

  • उदाहरण: डॉक्टर, कॉलेज, बॉल, ऑफिस।

4. व्यंजन (Consonants)

जो वर्ण स्वरों की सहायता के बिना उच्चरित नहीं किए जा सकते, वे ‘व्यंजन’ कहलाते हैं। इनके उच्चारण में फेफड़ों से निकलने वाली वायु मुख के किसी भाग (कंठ, तालु, दाँत आदि) से टकराकर या बाधित होकर बाहर आती है।

  • मूल रूप से व्यंजन स्वर-रहित होते हैं, जिसे दर्शाने के लिए उनके नीचे एक तिरछी रेखा लगाई जाती है, जिसे ‘हलंत’ ( ् ) कहते हैं (जैसे- क्, ख्, ग्)।
  • उच्चारण के समय इनमें ‘अ’ स्वर मिला होता है (जैसे- क् + अ = क)।
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हिंदी में व्यंजनों की कुल संख्या (संयुक्त व्यंजनों को छोड़कर) 33 है, तथा 2 उत्क्षिप्त व्यंजनों को मिलाकर 35 होती है। इनके मुख्य भेद निम्नलिखित हैं:

(क) स्पर्श व्यंजन (Stop Consonants)

इनके उच्चारण में जीभ मुख के विभिन्न स्थानों का पूर्ण स्पर्श करती है। इन्हें पाँच वर्गों में बाँटा गया है (क से म तक)। इनकी कुल संख्या 25 है।

वर्गवर्णउच्चारण स्थान
क-वर्गक, ख, ग, घ, ङकंठ (Throat)
च-वर्गच, छ, ज, झ, ञतालु (Palate)
ट-वर्गट, ठ, ड, ढ, णमूर्द्धा (Roof of mouth)
त-वर्गत, थ, द, ध, नदाँत (Teeth)
प-वर्गप, फ, ब, भ, मओष्ठ (Lips)
  • नासिक्य व्यंजन: प्रत्येक वर्ग का पाँचवाँ अक्षर (ङ, ञ, ण, न, म) ‘पंचमाक्षर’ कहलाता है। इनका उच्चारण मुख और नाक दोनों से होता है।

(ख) अंतस्थ व्यंजन (Semi-Vowels)

इनका उच्चारण स्वरों और व्यंजनों के मध्य का होता है। वायु मुख में कहीं भी पूर्णतः स्पर्श नहीं करती।

  • संख्या: 4
  • वर्ण: य, र, ल, व।

(ग) ऊष्म व्यंजन (Sibilants/Heat Consonants)

इनके उच्चारण में वायु मुख के अवयवों से रगड़ खाकर गर्म होकर बाहर निकलती है। इसमें एक प्रकार की ‘सीटी’ या संघर्ष होता है।

  • संख्या: 4
  • वर्ण: श (तालव्य), ष (मूर्धन्य), स (दन्त्य), ह (काकल्य)।

(घ) उत्क्षिप्त व्यंजन (Flapped Consonants)

जिनके उच्चारण में जीभ पहले ऊपर उठकर मूर्द्धा को स्पर्श करे और फिर झटके से नीचे आए।

  • संख्या: 2
  • वर्ण: ड़, ढ़।
  • नियम: इनका प्रयोग कभी भी शब्द के आरंभ में नहीं होता (जैसे- ‘सड़क’, ‘पढ़ना’, लेकिन ‘डमरू’ में ‘ड’ स्पर्श व्यंजन है)।

(ङ) संयुक्त व्यंजन (Conjunct Consonants)

दो भिन्न व्यंजनों के मेल से बने वर्णों को संयुक्त व्यंजन कहते हैं। हिंदी वर्णमाला में मुख्य रूप से चार संयुक्त व्यंजन स्थान पाते हैं:

  1. क्ष = क् + ष + अ (कक्षा, रक्षक)
  2. त्र = त् + र् + अ (पत्र, मित्र)
  3. ज्ञ = ज् + ञ् + अ (ज्ञान, विज्ञान) – नोट: इसका वर्तमान उच्चारण ‘ग्य’ जैसा होता है, पर मूल संरचना ज्+ञ है।
  4. श्र = श् + र् + अ (श्रम, विश्राम)

5. वर्णों का वर्गीकरण

प्रतियोगी परीक्षाओं और उच्च अध्ययन के लिए वर्णों का यह सूक्ष्म वर्गीकरण अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।

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1. प्राणत्व (श्वास वायु) के आधार पर

  • अल्पप्राण (Unaspirated): जिनके उच्चारण में मुख से कम वायु निकले और हकार की ध्वनि न हो।
    • प्रत्येक वर्ग का पहला, तीसरा, पाँचवाँ वर्ण + अंतस्थ (य, र, ल, व) + सभी स्वर।
  • महाप्राण (Aspirated): जिनके उच्चारण में मुख से अधिक वायु निकले और ‘ह’ जैसी ध्वनि सुनाई दे।
    • प्रत्येक वर्ग का दूसरा, चौथा वर्ण + ऊष्म (श, ष, स, ह)।

2. घोषत्व (नाद/गूँज) के आधार पर

  • अघोष (Voiceless): उच्चारण में स्वर-तंत्रियों में कंपन नहीं होता।
    • प्रत्येक वर्ग का पहला, दूसरा वर्ण + श, ष, स।
  • सघोष/घोष (Voiced): उच्चारण में स्वर-तंत्रियों में कंपन होता है।
    • प्रत्येक वर्ग का तीसरा, चौथा, पाँचवाँ वर्ण + य, र, ल, व, ह + सभी स्वर।

6. उच्चारण स्थानों का समेकित चार्ट (Consolidated Chart of Articulation)

किस वर्ण का उद्गम शरीर के किस अंग से होता है, इसे निम्नलिखित तालिका से सरलता से समझा जा सकता है:

उच्चारण स्थानसंज्ञा (नाम)स्वरस्पर्श/वर्गीयअंतस्थऊष्म/अन्य
कंठकंठ्यअ, आ, अःक ख ग घ ङ
तालुतालव्यइ, ईच छ ज झ ञ
मूर्द्धामूर्धन्यट ठ ड ढ ण
दाँतदन्त्यत थ द ध न
ओष्ठओष्ठ्यउ, ऊप फ ब भ म
कंठ + तालुकंठतालव्यए, ऐ
कंठ + ओष्ठकंठोष्ठ्यओ, औ
दाँत + ओष्ठदन्तोष्ठ्य
नासिकानासिक्यअंङ, ञ, ण, न, म

7. आक्षरिक खंड (Syllabic Division) एवं वर्ण-विच्छेद

भाषा विज्ञान में ‘अक्षर’ (Syllable) और ‘वर्ण’ (Letter) में सूक्ष्म अंतर है। वर्ण वह मूल ध्वनि है जिसके टुकड़े नहीं होते, जबकि अक्षर वह ध्वनि समूह है जिसका उच्चारण एक ही झटके (श्वास के एक आघात) में होता है।

वर्ण-विच्छेद (Dissection of Sounds)

किसी शब्द की वर्तनी (Spelling) को समझने के लिए उसके वर्णों को अलग-अलग करना वर्ण-विच्छेद कहलाता है। यह वर्तनी शुद्धि के लिए अनिवार्य है।

नियम और उदाहरण:

  1. व्यंजन को स्वर से अलग करते ही व्यंजन के नीचे हलंत (्) लगता है।
  2. संयुक्त अक्षरों को उनके मूल घटकों में तोड़ा जाता है।

महत्त्वपूर्ण उदाहरण:

  • कमल: क् + अ + म् + अ + ल् + अ
  • विद्या: व् + इ + द् + य् + आ (यहाँ ‘द’ और ‘य’ मिलकर ‘द्य’ बने हैं)
  • विज्ञान: व् + इ + ज् + ञ् + आ + न् + अ (‘ज्ञ’ को ज्+ञ में तोड़ा गया)
  • श्रृंगार: श् + ऋ + ं + ग् + आ + र् + अ (यहाँ ‘श्र’ में ‘र’ नहीं, बल्कि ‘ऋ’ की मात्रा है)
  • राष्ट्रीय: र् + आ + ष् + ट् + र् + ई + य् + अ (यहाँ ‘ट्र’ में ट्+र् का योग है)
  • धर्म: ध् + अ + र् + म् + अ (‘रेफ’ वाला र, म से पहले बोला जाएगा)
  • गृह: ग् + ऋ + ह् + अ (ग में ऋ की मात्रा) vs ग्रह: ग् + र् + अ + ह् + अ (ग में र पदेन)

8. निष्कर्ष

वर्ण-विचार हिंदी व्याकरण की आधारशिला है। शुद्ध उच्चारण और शुद्ध लेखन के लिए वर्णों के भेद, उच्चारण स्थान और उनके संयोजन (संधि/संयोग) का ज्ञान होना अत्यावश्यक है। वैज्ञानिकता की कसौटी पर खरी उतरने वाली देवनागरी वर्णमाला न केवल भारत की बल्कि विश्व की सबसे व्यवस्थित वर्णमालाओं में से एक है।

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