भारत में मानसून (seasons) से आप क्या समझते हैं?

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भारत में मानसून (seasons) से आप क्या समझते हैं?
भारत में मानसून (seasons) से आप क्या समझते हैं?

भारत के मध्य से कर्क रेखा के गुजरने के कारण इसके दक्षिणी भाग की जलवायु मुख्यतः उष्णकटिबंधीय मानी जाती है। इसके विपरीत, वृहद हिमालय श्रृंखला उत्तरी दिशा से आने वाली ठंडी ध्रुवीय हवाओं को प्रभावशाली रूप से अवरुद्ध करती है, जिससे भारत का उत्तरी क्षेत्र, समान अक्षांशीय स्थिति वाले अन्य देशों की तुलना में शीत ऋतु में लगभग 3°C से 8°C अधिक तापमान अनुभव करता है। इस प्रकार, यह स्पष्ट है कि भारत की जलवायु संरचना मुख्यतः उष्णकटिबंधीय प्रकृति की है। देश के विस्तृत स्थलरूप के कारण, ग्रीष्म ऋतु में आंतरिक भागों का तापमान अत्यधिक बढ़ जाता है। विशेषतः उत्तर-पश्चिमी मैदानी क्षेत्र में तीव्र गर्मी के परिणामस्वरूप एक अत्यंत तीव्र निम्नवायुदाब क्षेत्र (Intense Thermal Low) विकसित हो जाता है। इसके विपरीत, शीत ऋतु के दौरान तापमान में अत्यधिक गिरावट के कारण यहाँ एक कमज़ोर प्रतिचक्रवातीय प्रणाली, अर्थात् उच्च वायुदाब क्षेत्र का निर्माण होता है। ग्रीष्म ऋतु में उत्पन्न तापीय निम्नदाब, हिन्द महासागर से हवाओं को अपनी ओर आकर्षित करता है, जबकि शीत ऋतु में प्रतिचक्रवात की स्थिति के कारण ये हवाएँ महासागर की दिशा में वापस प्रवाहित होती हैं। इस प्रकार, भारत में मौसमी दबाव व्यवस्था में होने वाले परिवर्तनों के साथ-साथ पवनों की दिशा में भी उलटफेर होता है। ऐसी हवाएँ, जो एक ऋतु में किसी विशेष दिशा से बहती हैं तथा दूसरी ऋतु में ठीक विपरीत दिशा में प्रवाहित होती हैं, उन्हें ‘मानसून’ कहा जाता है।


मानसून की उत्पत्ति एवं क्रियाविधि (Origin and Mechanism of Monsoon)

भारत में मानसून (seasons) से आप क्या समझते हैं?

‘मानसून’ शब्द की उत्पत्ति अरबी भाषा के ‘Mausim’ शब्द से हुई है, जिसका अर्थ होता है ‘ऋतु (Season)‘। यह शब्द उन हवाओं को इंगित करता है जिनकी दिशा में परिवर्तन मौसमी बदलावों के साथ होता है। स्थल और जलखंडों के बीच वायुदाब में असमानता तथा इसके साथ होने वाले परिवर्तनों के कारण मानसूनी हवाओं की दिशा प्रभावित होती है। इस प्रकार, मानसून उन्हीं मौसमी पवनों को संदर्भित करता है जो शीत ऋतु में महाद्वीप से महासागर की ओर तथा ग्रीष्म ऋतु में महासागर से महाद्वीप की दिशा में प्रवाहित होती हैं। इन्हें स्थली और सागरीय समीर का विस्तृत रूप भी कहा जाता है।

ऐसी हवाओं की दिशा कई भौगोलिक तथा वायुमंडलीय कारकों से प्रभावित होती है – जैसे कि पृथ्वी की घूर्णन गति, पर्वतीय अवरोध, घर्षण बल, तथा ऊपरी वायुमंडल में प्रवाहित वायु धाराएँकोरिऑलिस बल की उपस्थिति के कारण, दक्षिण-पूर्व दिशा से आने वाली हवाएँ विषुवत रेखा पार करते ही दक्षिण-पश्चिमी दिशा में मुड़ जाती हैं और भारत में मानसूनी हवाओं के रूप में प्रवेश करती हैं। ग्रीष्म ऋतु की शुरुआत में, जब जेट स्ट्रीम हिमालय के उत्तर की ओर खिसकती है और उत्तर-पश्चिम भारत में निम्न वायुदाब स्थापित होता है, तो यही स्थिति मानसून को सशक्त रूप देती है। साथ ही, पर्वतों की अवस्थिति एवं ऊँचाई भारत में वर्षा के वितरण को गहराई से प्रभावित करती है। अराकान योमा पर्वत श्रृंखला, जो उत्तर-पश्चिम दिशा में स्थित है, दक्षिण-पश्चिमी मानसून की धारा को मोड़ देती है। इसी प्रकार, हिमालय, जो पूर्व से पश्चिम तक विस्तृत है, मानसूनी हवाओं को उत्तर की ओर आगे बढ़ने से रोकता है, जिसके कारण वर्षा मुख्यतः भारत तक ही सीमित रह जाती है।

शीत ऋतु के दौरान हिमालय पर्वत श्रृंखला, उत्तर दिशा से आने वाली ठंडी ध्रुवीय हवाओं के मार्ग में प्रभावी अवरोधक का कार्य करती है। इसी कारण ये उत्तर की सन्नमार्गी हवाएँ, भारत में प्रवेश नहीं कर पातीं, जिससे इस अवधि में तुलनात्मक रूप से उच्च तापमान बना रहता है।

केवल तापीय कारकों पर आधारित मौसमी वायु प्रणाली की उत्पत्ति से जुड़ी यह परिकल्पना मानसून की उत्पत्ति के ‘परंपरागत सिद्धांत’ (Classical Theory) के नाम से जानी जाती है। इस सिद्धांत के अनुसार, मानसून का मूल कारण, महाद्वीपीय भूभागों और महासागरीय जलराशियों के बीच तापीय विषमता को माना गया है।

हिन्द महासागर, जो अफ्रीका के पूर्व में स्थित है, उसमें प्रवाहित होने वाली दक्षिण-पश्चिम मानसूनी वायु धारा का आरंभ दक्षिण-पूर्वी व्यापारिक हवाओं से होता है। ये हवाएँ जब विषुवत रेखा को पार करती हैं तो कोरिऑलिस प्रभाव के तहत अपनी दिशा पश्चिम की ओर मोड़ लेती हैं। परिणास्वरूप यह वायुधारा दो मुख्य शाखाओं में विभाजित हो जाती है। पहली, अरब सागर की शाखा, आगे चलकर तीन उपशाखाओं में विभक्त होती है। इनमें प्रथम उपशाखा, समकोणिक दिशा में प्रवाहित होकर पश्चिमी घाट की ढलानों और तटीय क्षेत्र में वर्षा करती है। दूसरी उपशाखा, नर्मदा तथा ताप्ती घाटियों से गुजरते हुए छोटा नागपुर के पठारी भूभाग में बंगाल की खाड़ी शाखा से मिल जाती है। मानसूनी वायु की दूसरी, बंगाल की खाड़ी शाखा, भी दो उपशाखाओं में विभाजित होकर एक ओर उत्तर-पूर्वी भारत के हिमालयी क्षेत्रों से तथा दूसरी ओर उत्तरी मैदानों से होते हुए पंजाब की ओर अग्रसर होती है।

जब ऊपरी वायुमंडल का गहन परीक्षण किया गया, तब यह स्पष्ट हुआ कि केवल तापीय आधार पर ग्रीष्म ऋतु में निम्न वायुदाब और शीत ऋतु में उच्च वायुदाब के प्रभाव से मानसून की उत्पत्ति की व्याख्या अपर्याप्त है। इसके अतिरिक्त, उष्णकटिबंधीय अभिसरण क्षेत्र (Inter-Tropical Convergence Zone – ITCZ) का उत्तर की ओर विस्थापन भी एक महत्वपूर्ण कारक माना गया।

ऋतु परिवर्तन के साथ-साथ, आई.टी.सी.जेड. भी भूमध्यरेखा से कुछ अक्षांशीय दूरी तक पवन पेटियों के डोलन प्रभाव के साथ स्थलांतरित होता रहता है। मई के पहले अथवा दूसरे सप्ताह में जब दक्षिण-पूर्वी व्यापारिक हवाएँ भूमध्य रेखा पार करती हैं, तो ITCZ भी अपनी समान अक्षांशीय स्थिति से हटकर भारत की ओर खिसक जाता है। भूमध्य रेखा पार करते ही इन व्यापारिक हवाओं की दिशा दक्षिण-पश्चिमी हो जाती है और इन्हें भूमध्य रेखीय पछुआ पवन कहा जाता है। इन हवाओं के उत्तर की ओर प्रसार से ITCZ तेजी से भारत की ओर अग्रसर होता है। मई के अंतिम सप्ताह तक यह केरल तक पहुँच जाता है और प्रचुर वर्षा का कारण बनता है। जून के अंत तक ITCZ, गंगा के मैदानों को भी पार कर जाता है।

शीत ऋतु के प्रारंभ के साथ ही, ITCZ पुनः भूमध्य रेखा की ओर खिसक जाता है, और दिसंबर के अंत तक इसका प्रभाव दक्षिण भारत में भी समाप्त हो जाता है। इस ऋतु में, उत्तरी भारत के ऊपर से होकर पश्चिमी पवन तरंगें तथा वायुदाबीय अवदाव (Western Disturbances) गुजरते हैं, जो मैदानी क्षेत्रों में कुछ वर्षा, एवं पर्वतीय भागों में हल्का हिमपात उत्पन्न करते हैं।

भारत में ऋतु परिवर्तन (Seasonal Change in India)

ग्रीष्म ऋतु (Summer)

शीतकालीन प्रतिचक्रवात, जो ठंड के मौसम में स्थापित होते हैं, वे ग्रीष्म ऋतु के आरंभिक महीनों में भी सक्रिय रहते हैं, क्योंकि इस स्थिति में आकाश सामान्यतः निर्मल होता है और सूर्य की किरणें प्रखरता से प्रवाहित होती हैं। फलस्वरूप, मध्य मार्च से मध्य जून तक का समय उष्ण एवं शुष्क होता है, जबकि मध्य जून से मध्य सितंबर तक यह अवधि गर्म एवं आर्द्र रहती है। इसी प्रकार, भारत में ग्रीष्म ऋतु को दो मुख्य उपवर्गों में विभाजित किया जाता है— (1) गर्म एवं शुष्क ऋतु, जिसे पूर्व-मानसूनी वर्षा ऋतु भी कहा जाता है
(2) गर्म और आर्द्र ऋतु, जिसे मानसूनी वर्षा ऋतु के नाम से जाना जाता है।

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गर्म और शुष्क ऋतु (Hot and Dry Season)

अप्रैल से जून तक का समय, विशेष रूप से उत्तरी भारत में, तथा देश के शेष भागों में मार्च से मई तक की अवधि, शुष्क ग्रीष्म ऋतु के रूप में जानी जाती है, क्योंकि इस दौरान पूरे देश में गंभीर शुष्कता और अत्यधिक ऊष्मा की स्थिति विद्यमान रहती है।

मार्च के आगमन के साथ ही जब सौर विकिरण उत्तरी गोलार्द्ध की ओर अग्रसर होता है, तो प्रायद्वीपीय भारत में तापमान में उल्लेखनीय वृद्धि होने लगती है। अप्रैल के महीने में, सतपुड़ा पर्वतमाला के दक्षिणी भूभाग में जून का औसत अधिकतम तापमान 40°C तक पहुँचता है, जो कि उत्तर-पश्चिम भारत की तुलना में लगभग 3°C अधिक होता है। ज्ञात है कि जैसे-जैसे सूर्य की लंबवत् किरणें कर्क रेखा की ओर बढ़ती हैं, उत्तर भारत के तापमान में निरंतर वृद्धि होती जाती है। मई के मध्य तक सम्पूर्ण भारत में औसत मासिक तापमान अत्यंत उच्च स्तर पर पहुँच जाता है और अधिकांश आंतरिक क्षेत्रों में यह 32°C से ऊपर दर्ज किया जाता है। जबकि, सागरीय समीपता के कारण, तटीय क्षेत्रों में यह औसत उच्चतम तापमान 38°C से नीचे ही बना रहता है, किंतु मध्य भारत एवं उत्तर-पश्चिमी मैदानों में कुछ स्थानों पर तापमान 48°C तक पहुँच जाता है।

भारत में मानसून (seasons) से आप क्या समझते हैं?
भारत में मानसून (seasons) से आप क्या समझते हैं?

तटीय क्षेत्रों और पर्वतीय शीतल प्रदेशों को छोड़कर भारत के अधिकांश भागों में मई का तापमान तुलनात्मक रूप से समान पाया जाता है। दक्षिण-पूर्व भारत में जून का महीना अपेक्षाकृत कम ऊष्म होता है, क्योंकि इस अवधि में यहाँ वर्षा की शुरुआत हो जाती है। फिर भी, उत्तर-पश्चिम भारत इस समय देश का सर्वाधिक उष्ण क्षेत्र बना रहता है, जहाँ जून का औसत तापमान 35°C से अधिक होता है और कुछ स्थानों पर अधिकतम तापमान 46°C से भी ऊपर दर्ज किया जाता है।

गर्म तथा आर्द्र ऋतु (Hot and Wet Season)

मध्य जून से मध्य अक्टूबर तक की अवधि को आर्द्र-ग्रीष्म ऋतु कहा जाता है, जिसे मानसून वर्षा ऋतु के नाम से भी जाना जाता है। इस समय, ग्रीष्म ऋतु की शुरुआत में बने उच्च वायुदाब क्षेत्र के साथ-साथ भारत के विभिन्न भागों में तापमान में निरंतर वृद्धि होती रहती है। मई के अंतिम सप्ताहों में तापमान अत्यंत ऊँचा हो जाता है, विशेषकर उत्तर-पश्चिम भारत में यह प्रायः 46°C से भी अधिक तक पहुँच जाता है। इसके साथ-साथ, वायुदाब में निरंतर गिरावट होती है और जुलाई तक यह न्यूनतम स्तर पर पहुँच जाता है, जिससे भारत और पाकिस्तान के सीमावर्ती क्षेत्रों में एक पुष्पीय तापीय निम्न वायुदाब क्षेत्र बन जाता है।

इसी समय, मेडागास्कर (मालागासी) के दक्षिण-पूर्व में स्थित एक उच्च वायुदाबीय प्रतिचक्रवात (1030 मिलीबार) से, हिंद महासागर की आर्द्र वायु उत्तर-पश्चिम दिशा में प्रवाहित होती है और निम्न वायुदाबीय क्षेत्र की ओर अभिसरित होती है। विषुवत् रेखा को पार करने के उपरांत ये पवनें कोरिओलिस बल के प्रभाव से पश्चिम की ओर मुड़ जाती हैं और इन्हें भूमध्यरेखीय पछुआ पवनें (Equatorial Westerlies) कहा जाता है।

मई के अंत या जून के आरंभ में, जेट प्रवाह (Jet Stream) गंगा के मैदान के ऊपर से हटकर तिब्बत के उत्तरी छोर पर स्थिर हो जाता है। इसके फलस्वरूप, उत्तर-पश्चिम भारत में अचानक एक अत्यधिक निम्न वायुदाब क्षेत्र विकसित होता है, जो कि अत्यंत सक्रिय रूप में उष्णकटिबंधीय-अभिसरण क्षेत्र (ITCZ) को अपनी ओर खींचता है, जिससे ग्रीष्मकालीन मानसून का प्रस्फोट (Monsoon Burst) होता है। यह प्रस्फोट केरल में मई के अंत में तथा गंगा के मैदान में जून के तीसरे या चौथे सप्ताह में होता है। तथापि, हिमालय पर्वत श्रृंखला, इस ITCZ को उत्तर की ओर अधिक विस्थापित होने से रोक देती है

ग्रीष्मकालीन मानसून की दो प्रमुख शाखाएँ होती हैं—एक, बंगाल की खाड़ी शाखा, तथा दूसरी, अरब सागर शाखाबंगाल की खाड़ी की शाखा, पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश को पार कर, हिमालय के दक्षिणी छोर एवं उससे सटे मैदानों में जून से सितंबर तक एक पूर्वी प्रवाह के रूप में सक्रिय रहती है।

ग्रीष्मकालीन मानसून की शुरुआत की तिथि का निर्धारण उष्णकटिबंधीय-अभिसरण क्षेत्र के उत्तरगमन द्वारा होता है। सामान्यतः वर्षा का आरंभ अंडमान-निकोबार द्वीपसमूह में मई के तीसरे सप्ताह में, केरल में जून के प्रथम सप्ताह, कोंकण तथा पश्चिम बंगाल में जून के प्रथम सप्ताह, पूर्वी उत्तर प्रदेश में जून के द्वितीय सप्ताह तथा पंजाब में जुलाई के प्रथम सप्ताह तक हो जाता है। जुलाई के द्वितीय सप्ताह तक संपूर्ण भारत, मानसून के प्रभाव में आ जाता है।

भारत में मानसून (seasons) से आप क्या समझते हैं?
भारत में मानसून (seasons) से आप क्या समझते हैं?

जहाँ-जहाँ उष्णकटिबंधीय-अभिसरण क्षेत्र गुजरता है, वहीं वर्षा होती है। जैसे-जैसे यह उत्तर की ओर बढ़ता है, इसका प्रभाव क्रमशः क्षीण हो जाता है और यह दक्षिण में समाप्त हो जाता है। इसके बाद एक नया ITCZ भूमध्यरेखा के निकट बनता है, जो दक्षिणी गोलार्द्ध की पवनों की शक्ति पर आधारित होकर उत्तर की ओर गति करता है। जब यह गति तीव्र होती है, तब वर्षा भी अत्यधिक होती है

पूर्वीय अवदाब (Easterly Depressions) एवं धरातल की प्रकृति भी वर्षा की मात्रा और वितरण को गंभीर रूप से प्रभावित करते हैं। कभी-कभी, पूर्वीय द्रोणी (मानसूनी अवदाब) का पूर्वी किनारा ओडिशा तट से आगे बंगाल की खाड़ी तक पहुँचता है। जब यह क्षेत्र दक्षिण-पश्चिमी पवनों तथा शक्तिशाली पूर्वी प्रवाह के साथ अभिसरण करता है, तो पूर्वीय अवदाब और अधिक विकसित हो जाते हैं। यदि कोई विक्षोभ (Disturbance) इस द्रोणी के निकट से गुजरता है, तो अवदाब और भी अधिक सक्रिय हो जाते हैं। ये सामान्यतः ITCZ के साथ-साथ पश्चिम की ओर बढ़ते हैं, क्योंकि द्रोणी की औसत स्थिति समयानुसार उत्तर-दक्षिण में कुछ डिग्री तक विस्थापित होती रहती है, जिससे मानसूनी अवदाबों का मार्ग भी परिवर्तनीय हो जाता है।

उत्तरी भारत तथा भारतीय पठार के उत्तर-पूर्वी भाग में होने वाली वर्षा का मुख्य कारण यही मानसूनी अवदाब होते हैं। जब इनकी संख्या कम होती है, तो वर्षा सामान्य से नीचे रहती है।

भारत में वर्षा के वितरण पर सबसे अधिक प्रभाव उच्च पर्वतीय श्रेणियों की अवस्थिति डालती है। पश्चिमी घाट, भूमध्यरेखीय पछुआ पवनों को रोककर पश्चिमी तटीय मैदानों में भारी वर्षा कराते हैं, जो कई बार 250 सेमी से अधिक होती है, जबकि पूर्वी पार्श्व (Lee Side) जैसे मेखुला में वर्षा मात्र 38 से 65 सेमी तक सीमित रहती है, जो अनियमित भी होती है।

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शिलांग पठार एवं हिमालय पर्वत भी इन आर्द्र पवनों को रोककर भारी वर्षा कराते हैं। शिलांग पठार के दक्षिणी किनारे पर अत्यधिक वर्षा (जैसे चेरापूंजी: 1141.9 सेमी) होती है, जबकि गुवाहाटी, जो इसी पठार की वृष्टि छाया में है, वहाँ की वर्षा 163.7 सेमी तक ही सीमित रहती है।

वर्षा (Rainfall)

इस ऋतु के दौरान भारत के अधिकांश भाग शुष्क बने रहते हैं, परंतु जब अत्यधिक स्थलीय ऊष्मा (Strong Surface Heating) के फलस्वरूप विकसित निम्न वायुदाब क्षेत्र में पर्याप्त आर्द्रता उपस्थित होती है, तो वहाँ कभी-कभी तीव्र हवाओं के साथ तड़ित झंझाओं (Thunder-storms) का आगमन हो जाता है। इन झंझाओं को असम तथा बंगाल में काल बैसाखी, जबकि उड़ीसा में Nor’westers कहा जाता है। यद्यपि ये तूफान अल्पकालिक होते हैं, फिर भी ये वर्षा लाते हैं तथा कभी-कभी खरीफ फसलों एवं संपत्ति को गंभीर क्षति पहुँचा सकते हैं। इन झंझाओं से पश्चिमी तटीय मैदानों में लगभग 25 सेमी., तथा तमिलनाडु और कर्नाटक के कुछ भागों में 10 सेमी. तक की वर्षा हो जाती है, जबकि अन्य क्षेत्रों में यह मात्रा 5 से 10 सेमी. के मध्य रहती है। यद्यपि इस ऋतु में वर्षा की कुल मात्रा अल्प होती है, परंतु यह पूर्वी भारत में चाय, चावल एवं पटसन की फसलों तथा दक्षिण भारत में चाय, कहवा एवं फलों के बागानों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। वर्षा के अभाव में चाय एवं पटसन की उपज में भारी गिरावट आती है, जिससे किसानों को गंभीर आर्थिक हानि उठानी पड़ती है। दक्षिण भारत में इसे “आम्र-वर्षा (Mango Showers)” कहा जाता है।

इस समय उत्तर-पश्चिम भारत अत्यंत शुष्क बना रहता है, क्योंकि इस क्षेत्र से बहुत ही कम पश्चिमी अवदाब गुजरते हैं। इस क्षेत्र में तड़ित झंझाओं की उपस्थिति अत्यंत सीमित होती है, विशेषकर गर्मी की ऋतु में। परंतु राजस्थान के उत्तरी भाग में धूल-भरी आँधियाँ (Dust-Storms) प्रचुर मात्रा में आती हैं। कभी-कभी ये धूल से लदी तीव्र हवाएँ कई दिनों तक चलती हैं, विशेष रूप से तब जब पश्चिमी अवदाब पंजाब से होकर गुजरता है और पश्चिमी राजस्थान में तीव्र वायुदाब प्रवणता (Steep Pressure Gradient) उत्पन्न करता है। परिणामस्वरूप, उग्र एवं झोंकेदार गर्म हवाएँ चलती हैं, जो पंजाब, हरियाणा और उत्तर प्रदेश तक पहुँच जाती हैं। इस प्रकार की गर्म एवं धूलभरी हवाओं को “लू (Loo)” कहा जाता है।

हालाँकि, तापीय निम्नदाब मई में ही पाकिस्तान एवं उससे लगे भारतीय क्षेत्रों में स्थापित हो जाता है, परंतु यह इतना सशक्त नहीं होता कि मानसून का आरंभ कर सके। इसकी दुर्बलता का मुख्य कारण ग्रीष्मकाल के ऊपरी वायुमंडल में उपस्थित प्रतिचक्रवात होता है। यह ऊपरी वायु प्रतिचक्रवात जेट प्रवाह के अप्रवाहिसित हो जाने तथा पाकिस्तान के निकट एक चक्र या विसर्प के निर्माण से उत्पन्न होता है, जो उत्तर की ओर मुड़ता है। इस वक्र के परिणामस्वरूप ऊपरी वायु प्रतिचक्रवात स्थापित हो जाता है, जो गंगा के मैदान पर मई के अंत तक बना रहता है।


उत्तर-पश्चिमी भारत में वर्षा (Rainfall in the North-West India)

इस मौसम में कभी-कभी गर्म एवं शुष्क वायु पाकिस्तान से भारत में प्रवेश करती है। यह वायु महाद्वीपीय प्रकृति की होती है और यह दिल्ली तक पहुँच जाती है। लगभग 760 मीटर ऊँचाई पर गर्म तथा शुष्क वायु की परत विद्यमान होने के कारण, आर्द्र मानसूनी वायु का ऊर्ध्वगमन रुक जाता है, जिससे वर्षा की संभावना नगण्य हो जाती है। यदि आर्द्र वायु इस गर्म वायु परत को भेदने में सफल भी हो जाए, तो भी वह आर्द्रता अवशोषित कर लेती है, जिससे वर्षा का होना अत्यंत दुर्लभ हो जाता है।

दिल्ली के पश्चिमी क्षेत्र में मानसूनी पवन की आर्द्रता में कमी आने के कारण वर्षा की संभावनाएँ और भी अधिक घट जाती हैं। अरब सागर से गुजरात और राजस्थान की ओर आने वाली आर्द्र पवनों के मार्ग में कोई पर्वतीय अवरोध न होने के कारण इस क्षेत्र में वर्षा अत्यल्प होती है।

शीत ऋतु (Winter)

सितंबर के बाद से पूरे भारत में तापमान में क्रमिक गिरावट प्रारंभ हो जाती है, किंतु उत्तर-पश्चिमी भारत में शीत ऋतु का प्रभाव अपेक्षाकृत शीघ्र दिखाई देने लगता है। तापमान में गिरावट के साथ-साथ तापीय निम्न दाब का प्रभाव भी घटने लगता है और कुछ ही सप्ताहों में यह पूर्णतः लुप्तप्राय हो जाता है। इस समय दक्षिण-पश्चिमी मानसून, सितंबर के द्वितीय सप्ताह में कमजोर पड़ने लगता है और अपने पूर्व निर्धारित स्थान तक नहीं पहुँच पाता। ऐसे में यह मानसून उत्तर-पश्चिमी भारत से सितंबर के तृतीय सप्ताह में तेज़ी से लौटने लगता है, जिसे “मानसून का निवर्तन (Retreat of the Monsoon)” कहा जाता है। इस चरण में बंगाल की खाड़ी की वायु कोलकाता की दिशा में तथा अरब सागर की वायु दक्षिण की ओर लौट जाती है।

मध्य अक्तूबर में ऊष्णकटिबंधीय पश्चिमी जेट प्रवाह, पुनः गंगा के मैदान के ऊपर स्थापित हो जाता है, जो कि इसकी सामान्य ऋतुपरक स्थिति है। इसी समय तक उत्तर-पश्चिम भारत और पाकिस्तान के ऊपर एक क्षीण शीतकालीन उच्च दाब क्षेत्र भी विकसित हो जाता है। इस उच्च दाब के प्रभाव से गंगा के मैदान में स्थित निम्न वायुदाबीय द्रोणी समाप्त हो जाती है, और उसकी जगह शीत ऋतु की मानसूनी पवनें प्रवाहित होने लगती हैं।

भारत में मानसून (seasons) से आप क्या समझते हैं?
भारत में मानसून (seasons) से आप क्या समझते हैं?

इस प्रक्रिया के परिणामस्वरूप, उष्णकटिबंधीय-अभिसरण क्षेत्र (ITCZ) गंगा के मैदान से तमिलनाडु की ओर विस्थापित हो जाता है, जहाँ इससे जुड़ी पूर्वी अवदाबीय गतिविधियों के कारण अक्तूबर, नवंबर और दिसंबर के महीनों में वर्षा होती है।


शीत ऋतु, एक अल्पकालिक ऋतु है, जो नवंबर से फरवरी के बीच मुख्यतः उत्तर-पश्चिमी तथा मध्य भारत में देखी जाती है। जबकि दक्षिण भारत में यह ऋतु केवल भारतीय पठार के मध्य भाग, कर्नाटक का पठार, एवं कुछ पर्वतीय क्षेत्रों में बहुत संक्षिप्त अवधि तक ही रहती है। जैसे-जैसे तापमान गिरता है, उत्तर-पश्चिम भारत में स्थित निम्न दाबीय प्रभाव समाप्त होता जाता है, और अक्तूबर से वहाँ एक क्षीण प्रतिचक्रवात (Weak Anticyclone) स्थापित हो जाता है। इस प्रतिचक्रवात के प्रभाव से पवनों की दिशा उत्तर-पश्चिम भारत से देश के अन्य भागों की ओर दक्षिणावर्त (Clockwise) हो जाती है। प्रतिचक्रवात के कारण मौसम सामान्यतः शुष्क रहता है, परंतु पश्चिमी तरंगों एवं अवदाबों के प्रभाव से उत्तर भारत के मैदानों में हल्की वर्षा तथा हिमालय पर हिमपात देखा जाता है। ये समशीतोष्ण अवदाब (Temperate Depressions), जो भूमध्य सागर तथा फारस की खाड़ी (Mediterranean Sea and Persian Gulf) में उत्पन्न होते हैं, उत्तर भारत को पश्चिम से पूर्व की दिशा में पार करते हैं। ये सामान्यतः वातग्री चक्रवातों के अवरुद्ध रूप (Occluded Cyclones) होते हैं और कुछ सेमी. वर्षा ही करते हैं। ये अवदाब दिसंबर से मार्च के बीच अधिक सक्रिय होते हैं, और इनका औसत सप्ताह में एक बार उत्तर भारत से गुजरने का होता है। वर्षा का प्रारंभ दिसंबर के मध्य से होता है और अप्रैल तक यह क्रमशः चलता रहता है। ये अवदाब केवल उत्तर-पश्चिम और उत्तर भारत को ही नहीं, बल्कि उत्तर-पूर्वी भारत के मौसम को भी प्रभावित करते हैं।

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शीत ऋतु में भारत के अधिकांश भागों में वर्षा अत्यंत न्यून होती है, जबकि हिमालय एवं तमिलनाडु में देश के अन्य क्षेत्रों की तुलना में अधिक वर्षा होती है। इस अवधि में हिमालय में 15 से 60 सेमी. तक वर्षा होती है, जबकि राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, उत्तर कर्नाटक तथा आंतरिक आंध्र प्रदेश में 5 सेमी. से भी कम होती है। तमिलनाडु और उससे जुड़े कर्नाटक राज्य के भागों में यह वर्षा 5 से 10 सेमी. तक होती है।

भारत में वार्षिक वर्षा का वितरण प्रतिरूप (Distribution Pattern of Annual Rainfall in India)

भारत में वार्षिक वर्षा का स्थानिक एवं कालिक वितरण अत्यंत असमान है। इसमें पश्चिमी घाट, हिमालय क्षेत्र, मेघालय तथा उत्तर-पूर्व के पर्वतीय भूभाग विशेष रूप से प्रभावशाली भूमिका निभाते हैं। देश की भौगोलिक रेखाचित्र पर 100 सेमी. वर्षा रेखा एक महत्त्वपूर्ण प्राकृतिक विभाजक का कार्य करती है, जो एक ओर चावल की वर्षा आधारित (Rainfed) खेती तथा दूसरी ओर गेहूँ की कृषि प्रणाली के बीच सीमा रेखा निर्धारित करती है।

भारत को वार्षिक वर्षा की मात्रा के आधार पर पाँच प्रमुख क्षेत्रीय श्रेणियों में वर्गीकृत किया जा सकता है। यद्यपि, यह ध्यान रखना आवश्यक है कि ये क्षेत्र सतत नहीं होकर कई स्थानों पर विच्छिन्न (Discontinuous) हैं।

1. अति न्यून वर्षा क्षेत्र (Less than 30 cm)

देश में अत्यल्प वर्षा प्राप्त करने वाले दो प्रमुख क्षेत्र हैं:

  • (i) जम्मू एवं कश्मीर में जास्कर पर्वत श्रृंखला के उत्तर में स्थित मरुस्थलीय प्रदेश
  • (ii) पश्चिमी कच्छ तथा राजस्थान का मरुस्थलीय भूभाग, जहाँ वार्षिक वर्षा 10 सेमी. से भी कम होती है।

2. न्यून वर्षा क्षेत्र (30–60 cm)

ये क्षेत्र अर्ध-शुष्क (Semi-arid) प्रकृति के होते हैं और तीन प्रमुख उपक्षेत्रों में बँटे हैं:

  • (i) देवसई पर्वत क्षेत्र सहित जम्मू एवं कश्मीर की संकुचित पर्वतीय पट्टी
  • (ii) पंजाब-हरियाणा के मैदान, मध्यवर्ती राजस्थान एवं पश्चिमी गुजरात को आवृत्त करती हुई वृत्ताकार पट्टी
  • (iii) पश्चिमी घाट के पूर्वी ढाल पर स्थित संकरी पट्टी, जो महाराष्ट्र, कर्नाटक, तथा दक्षिण-पूर्वी आंध्र प्रदेश से होकर गुजरती है।

3. मध्यम वर्षा क्षेत्र (60–100 cm)

इस श्रेणी की वर्षा एक लंबी पट्टी में फैली हुई है, जो उत्तर में पंजाब से लेकर दक्षिण में कन्याकुमारी तक जाती है। यह कुछ न्यून वर्षा वाले क्षेत्रों से खंडित होती है। इस क्षेत्र में सम्मिलित हैं:

  • कर्नाटिक पठार,
  • उत्तर प्रदेश का दक्षिणी भाग,
  • पूर्वी राजस्थान,
  • मध्य प्रदेश,
  • पूर्वी गुजरात,
  • महाराष्ट्र का पठारी भाग,
  • कर्नाटक का पठार,
  • दक्षिणी आंध्र प्रदेश, तथा
  • आंतरिक तमिलनाडु

4. उच्च वर्षा क्षेत्र (100–200 cm)

देश में उच्च वर्षा प्राप्त करने वाले चार प्रमुख क्षेत्र हैं, जो एक-दूसरे से प्राकृतिक रूप से पृथक हैं:

  • (i) पश्चिमी घाट की ढाल तथा इसके दक्षिण में गुजरात का तटीय क्षेत्र
  • (ii) असम के पर्वतीय क्षेत्र, दक्षिणी हिमालय, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल के उत्तरी मैदान, उड़ीसा, मध्यवर्ती मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, पूर्वी महाराष्ट्र तथा उत्तरी आंध्र प्रदेश — ये मिलकर देश का सबसे बड़ा उच्च वर्षा क्षेत्र बनाते हैं।
  • (iii) तमिलनाडु के दक्षिण-पूर्वी तटीय भाग में फैली एक संकरी पट्टी
  • (iv) असम की मध्य एवं निम्न घाटियाँ, मिकिर की पहाड़ियाँ, मणिपुर एवं त्रिपुरा

5. अति उच्च वर्षा क्षेत्र (More than 200 cm)

इस श्रेणी में दो विशेष क्षेत्र सम्मिलित हैं:

  • (i) सिलचर से लेकर तिरुवनंतपुरम तक विस्तारित लंबी और संकरी पट्टी, जिसमें पश्चिमी घाट की पश्चिमी ढाल तथा तटीय मैदान आते हैं।
  • (ii) दार्जिलिंग, बंगाल दुआर, मेघालय, असम की ऊपरी घाटी, तथा अरुणाचल प्रदेश — ये क्षेत्र देश में सर्वाधिक वर्षा प्राप्त करते हैं।
भारत में मानसून (seasons) से आप क्या समझते हैं?
भारत में मानसून (seasons) से आप क्या समझते हैं?

भारत में मानसून कब आता है?

भारत में दक्षिण-पश्चिमी मानसून सामान्यतः जून के प्रथम सप्ताह में केरल तट पर पहुंचता है और धीरे-धीरे उत्तर तथा उत्तर-पश्चिम की ओर अग्रसर होता है। यह मानसून जून से सितंबर तक सक्रिय रहता है तथा देश के अधिकांश भागों में मुख्य वर्षा ऋतु का निर्धारण करता है।

भारतीय मानसून प्रणाली क्या है?

भारतीय मानसून प्रणाली एक मौसमी पवन प्रणाली है, जिसमें पवनें वर्ष के विभिन्न समयों पर दिशा परिवर्तित करती हैं। यह प्रणाली मुख्यतः दो प्रकार की हवाओं से निर्मित होती है—
दक्षिण-पश्चिमी मानसून (गर्मी में)
उत्तर-पूर्वी मानसून (शीत ऋतु में)।
यह प्रणाली स्थलीय-समुद्री तापीय विषमता, ऊपरी वायुमंडलीय प्रवाह, तथा उष्णकटिबंधीय-अभिसरण क्षेत्र की स्थिति पर आधारित होती है।

मानसून का इतिहास क्या है? भारत में मानसून की उत्पत्ति कब होती है?

भारत में मानसून की उत्पत्ति का ऐतिहासिक आधार हिमालय तथा थार मरुस्थल की उपस्थिति से जुड़ा हुआ है। ग्रीष्म ऋतु में अत्यधिक स्थलीय ऊष्मा के कारण उत्तर-पश्चिमी भारत में तापीय निम्नदाब उत्पन्न होता है, जिससे समुद्र से आर्द्र हवाएँ खिंच कर आती हैं।
दक्षिण-पश्चिमी मानसून की उत्पत्ति मई के उत्तरार्ध में अरब सागर एवं बंगाल की खाड़ी क्षेत्र में होती है, किंतु यह केरल तट पर जून के प्रथम सप्ताह में पहुंचता है

भारत मौसम विभाग का मुख्यालय कहाँ है?

भारत मौसम विभाग (IMD) का मुख्यालय नई दिल्ली में स्थित है। यह विभाग देश में मौसम पूर्वानुमान, जलवायु निगरानी, तथा वर्षा की माप एवं विश्लेषण हेतु उत्तरदायी है।

भारतीय मानसून की तीन विशेषताएं क्या हैं?

भारतीय मानसून की प्रमुख तीन विशेषताएं निम्नलिखित हैं:
ऋतुचक्रात्मक परिवर्तन (Seasonal Reversal) — मानसूनी हवाओं की दिशा गर्मी और सर्दी में विपरीत होती है।
असमान स्थानिक वितरण — भारत में वर्षा का वितरण अत्यंत विषम होता है, जैसे मेघालय एवं पश्चिमी घाट में अत्यधिक वर्षा जबकि राजस्थान एवं कच्छ में अत्यल्प।
प्रतिचक्रवातों एवं अवदाबों से प्रभावितता — मानसून की सक्रियता और कमजोर पड़ना कई बार पश्चिमी विक्षोभों, प्रतिचक्रवातों एवं ऊपरी वायुदाब प्रवणताओं पर निर्भर करता है।

भारत में मानसून किन पवनों के कारण बनता है?

भारत में मानसून का निर्माण मुख्यतः दक्षिण-पश्चिमी पवनों से होता है, जो अरब सागर तथा बंगाल की खाड़ी से आर्द्रता लेकर आते हैं। ये पवनें स्थलीय ऊष्मा द्वारा निर्मित निम्नदाब की ओर खिंचती हैं। शीत ऋतु में उत्तर-पूर्वी पवनें, जो महाद्वीपीय प्रकृति की होती हैं, तमिलनाडु तट पर वर्षा लाती हैं।

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