अध्याय आठ
CrPC Section 107 in Hindi: अन्य मामलों में शांति बनाए रखने के लिए प्रतिभूति
New Law Update (2024)
धारा 112 भा.ना.सु.सं.
TRIAL COURT
कार्यपालक मजिस्ट्रेट
Punishment
प्रक्रियात्मक / प्रशासनिक
Cognizable?
Bailable?
Compoundable?
Bare Act Text
(1) जब किसी कार्यपालक मजिस्ट्रेट को यह इत्तिला मिलती है कि कोई व्यक्ति परिशांति भंग करने वाला है या लोक प्रशांति विक्षुब्ध करने वाला है या कोई ऐसा दोषपूर्ण कार्य करने वाला है जिससे परिशांति भंग हो सकती है या लोक प्रशांति विक्षुब्ध हो सकती है और उसकी यह राय है कि कार्यवाही करने के लिए पर्याप्त आधार है, तब वह, जैसा इसमें इसके पश्चात् उपबंधित है, ऐसे व्यक्ति से यह अपेक्षा कर सकता है कि वह कारण दर्शित करे कि उसे इतनी अवधि के लिए, जो एक वर्ष से अधिक न होगी, जितनी मजिस्ट्रेट ठीक समझे, परिशांति बनाए रखने के लिए प्रतिभुओं सहित या रहित बंधपत्र निष्पादित करने का आदेश क्यों न दिया जाए।
(2) इस धारा के अधीन कार्यवाही किसी ऐसे कार्यपालक मजिस्ट्रेट के समक्ष की जा सकती है जिसकी स्थानीय अधिकारिता के भीतर परिशांति भंग या विक्षोभ की आशंका है अथवा जिसकी अधिकारिता के भीतर ऐसा व्यक्ति है जो परिशांति भंग करने या लोक प्रशांति विक्षुब्ध करने वाला है या पूर्वोक्त रूप से उसकी अधिकारिता के परे कोई दोषपूर्ण कार्य करने वाला है।
Important Sub-Sections Explained
धारा 107(1)
यह मूलभूत भाग एक कार्यपालक मजिस्ट्रेट को एक व्यक्ति से प्रतिभुओं सहित या रहित, एक वर्ष तक की अवधि के लिए शांति बनाए रखने हेतु बंधपत्र प्रस्तुत करने की अपेक्षा करने वाली कारण बताओ सूचना जारी करने का अधिकार देता है, यदि ऐसी जानकारी है जिससे पता चलता है कि वे परिशांति भंग करने या लोक प्रशांति विक्षुब्ध करने की संभावना रखते हैं। यह आधार और प्रारंभिक कार्रवाई को रेखांकित करने वाला मुख्य प्रावधान है।
धारा 107(2)
यह महत्वपूर्ण उपधारा धारा 107 के तहत कार्यवाही शुरू करने के लिए कार्यपालक मजिस्ट्रेट की क्षेत्रीय अधिकारिता को परिभाषित करती है। यह निर्दिष्ट करती है कि मजिस्ट्रेट तब कार्रवाई कर सकता है जब अपेक्षित भंग या विक्षोभ उनकी स्थानीय अधिकारिता के भीतर हो, या यदि ऐसा कार्य करने वाला व्यक्ति उनकी अधिकारिता के भीतर रहता हो, भले ही दोषपूर्ण कार्य कहीं और हो सकता हो।
Landmark Judgements
मधु लिमये बनाम वेद मूर्ति और अन्य (1970) AIR 1971 SC 2481:
इस ऐतिहासिक निर्णय ने धारा 107 के दायरे को स्पष्ट किया, इस बात पर जोर दिया कि एक कार्यपालक मजिस्ट्रेट को कार्यवाही शुरू करने से पहले परिशांति भंग होने या लोक प्रशांति में विक्षोभ होने की वास्तविक संभावना के संबंध में पर्याप्त जानकारी होनी चाहिए। इसमें कहा गया कि यह धारा वैध राजनीतिक गतिविधि या भाषण की स्वतंत्रता को रोकने के लिए नहीं है, बल्कि विश्वसनीय जानकारी के आधार पर सार्वजनिक व्यवस्था के लिए आसन्न खतरों को रोकने के लिए है।
राम प्रसाद बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (1970) AIR 1970 All 303:
इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया कि परिशांति भंग होने की संभावना के संबंध में कार्यपालक मजिस्ट्रेट की संतुष्टि वस्तुनिष्ठ सामग्री पर आधारित होनी चाहिए, न कि केवल पुलिस रिपोर्ट या व्यक्तिपरक राय पर। इसने व्यक्ति को कारण बताओ और अपना पक्ष प्रस्तुत करने का अवसर देने के महत्व पर जोर दिया, प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन करते हुए।
किशोर सिंह बनाम राजस्थान राज्य (1979 Cr.L.J. 1109 राज):
इस मामले में इस बात पर प्रकाश डाला गया कि धारा 107 के तहत कार्यवाही निवारक है, न कि दंडात्मक। मजिस्ट्रेट की शक्ति पिछले कृत्यों को दंडित करने की नहीं है, बल्कि भविष्य में परिशांति भंग को रोकने की है। आदेश में बंधपत्र की आवश्यकता के कारण और उसकी अवधि स्पष्ट रूप से निर्दिष्ट होनी चाहिए, यह सुनिश्चित करते हुए कि यह अपेक्षित खतरे के अनुपात में हो।