राजस्थान की संस्कृति अपनी प्राचीन परंपराओं, “सोलह संस्कारों”, विवाह-मृत्यु के रीति-रिवाजों और मध्यकालीन प्रशासनिक शब्दावली के लिए विश्व विख्यात है। यहाँ प्रस्तुत अध्ययन सामग्री में जन्म से लेकर मृत्यु तक के संस्कारों और ऐतिहासिक कुप्रथाओं व उनके निवारण हेतु बनाए गए कानूनों का विस्तृत विवरण दिया गया है।
भाग 1: हिन्दू जीवन दर्शन के सोलह संस्कार (Shodash Sanskar)
भारतीय संस्कृति में मानव जीवन को मर्यादित, अनुशासित और पवित्र बनाने के लिए ‘संस्कारों’ का विधान है। मनुस्मृति और गृह्यसूत्रों के अनुसार इनकी संख्या 16 मानी गई है, जिनका पालन राजस्थान के जनजीवन में आज भी प्रमुखता से किया जाता है।
1. गर्भाधान संस्कार (Garbhadhan)

यह प्रथम संस्कार है। यह वह अनुष्ठान है जिसके द्वारा एक विवाहित युगल संतान उत्पत्ति के उद्देश्य से, धार्मिक विधि-विधान और पवित्र मन से गर्भ धारण की प्रक्रिया को संपन्न करता है। इसका उद्देश्य उत्तम और स्वस्थ संतान की प्राप्ति है।
2. पुंसवन संस्कार (Punsavan)
- उद्देश्य: पुत्र प्राप्ति एवं गर्भस्थ शिशु के स्वस्थ विकास हेतु।
- विवरण: यह संस्कार गर्भधारण के तीसरे या चौथे माह में किया जाता है। ऐतिहासिक रूप से, पितृसत्तात्मक समाज में वंश वृद्धि के लिए पुत्र की कामना हेतु यह संस्कार महत्वपूर्ण माना जाता था।

3. सीमन्तोन्नयन संस्कार (Simantonnayana)

उद्देश्य: गर्भवती माता को प्रसन्न रखना और गर्भस्थ शिशु की रक्षा।
विवरण: यह संस्कार गर्भ के छठे या आठवें महीने में किया जाता है। इसका शाब्दिक अर्थ है ‘सौभाग्यवती स्त्री की मांग भरना’। इसका मनोवैज्ञानिक पक्ष यह है कि गर्भवती स्त्री को तनावमुक्त रखा जाए ताकि शिशु की मानसिक शक्तियों (अविकारी शक्तियों) का पूर्ण विकास हो सके और वह अमंगलकारी शक्तियों से सुरक्षित रहे।
4. जातकर्म संस्कार (Jatakarma)
शिशु के जन्म के तुरंत बाद, नाल काटने से पूर्व यह संस्कार किया जाता है। इसमें पिता द्वारा शिशु की जीभ पर सोने की सलाई या अनामिका अंगुली से मधु और घी चटाया जाता है, जिसे ‘मेधाजनन’ भी कहते हैं। इसका उद्देश्य शिशु की आयु और बुद्धि में वृद्धि करना है।

5. नामकरण संस्कार (Namkaran)

जन्म के 10वें, 12वें दिन या शुभ मुहूर्त में शिशु का विधिवत नाम रखने की प्रक्रिया। इसमें ज्योतिषीय गणना के आधार पर बच्चे के व्यक्तित्व के अनुरूप नाम रखा जाता है।
6. निष्क्रमण संस्कार (Nishkraman)
- अर्थ: बाहर निकलना।
- विवरण: जन्म के चौथे माह में शिशु को पहली बार घर से बाहर निकालकर सूर्य और चंद्रमा के दर्शन कराए जाते हैं। यह बच्चे का पंचतत्वों (विशेषकर सूर्य के प्रकाश और खुली हवा) से प्रथम परिचय होता है।
7. अन्नप्राशन संस्कार (Annaprashan)
शिशु को जन्म के 6 माह तक केवल माँ का दूध दिया जाता है। छठे माह में उसे पहली बार अन्न (जैसे- खीर या दही-भात) चटाया जाता है, जिससे उसकी शारीरिक वृद्धि और पाचन तंत्र का विकास हो सके।
8. चूड़ाकर्म / जडूला / मुंडन संस्कार (Chudakarma)
- स्थानीय नाम: जडूला उतारना।
- समय: जन्म के पहले, तीसरे या पांचवें वर्ष में।
- विवरण: शिशु के जन्म के बाल अशुद्ध माने जाते हैं, अतः उन्हें कुलदेवी या देवता के स्थान पर पहली बार मुंडवाया जाता है। इसे दीर्घायु और सौंदर्य वृद्धि का प्रतीक माना जाता है।
9. कर्णवेध संस्कार (Karnavedha)
शिशु के कान छेदन का संस्कार। यह रोग से बचाव (विशेषकर आंत्र वृद्धि या हर्निया जैसे रोगों की रोकथाम के लिए सुश्रुत संहिता में उल्लेखित) और आभूषण धारण करने के लिए किया जाता है।
10. विद्यारम्भ संस्कार (Vidyarambha)
जब बालक/बालिका शिक्षा ग्रहण करने योग्य हो जाता है (लगभग 5 वर्ष की आयु), तब उसे अक्षराम्भ (अक्षर ज्ञान) कराया जाता है। इसमें गणेश और सरस्वती की पूजा की जाती है।
11. उपनयन संस्कार / यज्ञोपवीत (Upanayana)
- महत्व: यह बालक के शैक्षणिक जीवन का औपचारिक प्रारंभ है।
- प्रक्रिया: बालक को ‘जनेऊ’ (यज्ञोपवीत) धारण कराया जाता है और उसे गुरु के पास (गुरुकुल) ले जाया जाता है। इसके बाद बालक ‘द्विज’ (दूसरा जन्म लेने वाला) कहलाता है।
12. वेदारम्भ संस्कार (Vedarambha)
उपनयन के बाद गुरुकुल में वेदों और विशिष्ट शास्त्रों का अध्ययन प्रारंभ करना। प्राचीन काल में यहीं से ब्रह्मचर्य आश्रम की विधिवत शुरुआत होती थी।
13. केशान्त / गोदान संस्कार (Keshant/Godan)
वेदाध्ययन पूर्ण होने पर या 16 वर्ष की आयु में दाढ़ी-मूंछ बनाने का प्रथम संस्कार। इस अवसर पर गुरु को गाय दान में दी जाती थी, इसलिए इसे ‘गोदान’ भी कहते हैं।
14. समावर्तन संस्कार (Samavartana)
शिक्षा समाप्ति के बाद गुरुकुल से अपने घर लौटने का संस्कार। इसे आधुनिक दीक्षांत समारोह (Convocation) के समकक्ष माना जा सकता है। इसके बाद व्यक्ति ब्रह्मचर्य आश्रम से निकलकर गृहस्थ जीवन की ओर कदम बढ़ाता है।
15. विवाह संस्कार (Vivah)
यह मानव जीवन का सबसे महत्वपूर्ण संस्कार है। इसके द्वारा व्यक्ति ‘गृहस्थ आश्रम’ में प्रवेश करता है और धर्म, अर्थ, काम की पूर्ति करते हुए पितृ ऋण से मुक्त होने का प्रयास करता है।
16. अन्त्येष्टि संस्कार (Antyeshti)
जीवन का अंतिम संस्कार। मृत्यु के उपरांत शरीर का दाह-संस्कार करना, जिससे आत्मा को सद्गति प्राप्त हो सके।
भाग 2: विवाह से संबंधित विशिष्ट राजस्थानी रीति-रिवाज
राजस्थान में विवाह एक सामाजिक उत्सव है, जिसमें अनेक रस्में निभाई जाती हैं। इनका क्रमबद्ध विवरण निम्न है:
1. सगाई (Engagement)
विवाह तय होने की रस्म। वधू पक्ष द्वारा वर को तिलक लगाकर और नारियल व मिठाई देकर संबंध पक्का किया जाता है।
2. टीका
सगाई के बाद विवाह की निश्चित तिथि के आसपास वधू पक्ष की ओर से वर के लिए उपहार, वस्त्र और नकदी भेजी जाती है, जिसे टीका कहते हैं।
3. लग्न-पत्रिका (पीली चिट्ठी)
विवाह का शुभ मुहूर्त निकलवाने के बाद, विवाह की तिथि और समय का विवरण एक पत्रिका में लिखकर वधू पक्ष द्वारा वर पक्ष को भेजा जाता है। इसे गणेश पूजन का निमंत्रण भी माना जाता है।
4. गणेश पूजन / विनायक स्थापना / बाण बैठाना
- हलदायत: विवाह से 3, 5, 7, या 9 दिन पूर्व दोनों पक्षों के घरों में गणेश जी की स्थापना की जाती है।
- बाण बैठाना: इस दिन से वर और वधू को तेल, हल्दी और उबटन (पीठी) लगाने की रस्म शुरू होती है ताकि उनका रूप निखर सके। इस दौरान उन्हें घर से बाहर निकलने की मनाही होती है।
5. पीठी (Pithi)
घर की चार सुहागिन स्त्रियाँ (जिन्हें ‘आचारियां’ कहा जाता है) वर और वधू को हल्दी-चंदन का लेप लगाती हैं। इसमें एक विशेष रस्म होती है जिसमें एक ‘चचांचली’ स्त्री (जिसके माता-पिता और सास-ससुर जीवित हों) पीठी चढ़ाती है। इसके बाद महिलाएँ पारंपरिक विवाह गीत (लगधण) गाती हैं।
6. कांकण-डोरडा / कांकण बंधन
बाण (विनायक स्थापना) के दिन वर और वधू के दाहिने हाथ और दाहिने पांव में मौली (धागा), लोहे का छल्ला, और राई-नमक की पोटली बांधी जाती है। यह रस्म उन्हें बुरी नजर से बचाने के लिए की जाती है। विवाह संपन्न होने के बाद ही इसे खोला जाता है।
7. बिंदोरी / बन्दोली (Bindori)
विवाह से पूर्व के दिनों में रिश्तेदारों द्वारा वर और वधू को (अपने-अपने गांवों में) दावत दी जाती है और गाजे-बाजे के साथ जुलूस निकाला जाता है। इसे निकासी का पूर्व रूप माना जा सकता है।
8. मुकलावा / गौना (Muklava/Gauna)
बाल विवाह या छोटी आयु में विवाह होने की स्थिति में, वधू को वयस्क होने तक पीहर में रखा जाता था। वयस्क होने पर उसे ससुराल भेजने की रस्म ‘मुकलावा’ या ‘आणा’ कहलाती है। आधुनिक समय में विवाह के तुरंत बाद विदाई होती है, लेकिन यह शब्द ऐतिहासिक महत्व रखता है।
9. बरी-पड़ला (Bari-Padla)
वर पक्ष की ओर से वधू के लिए जो विवाह के वस्त्र (बरी), आभूषण, श्रृंगार सामग्री और मिठाइयाँ भेजी जाती हैं, उन्हें संयुक्त रूप से ‘बरी-पड़ला’ कहा जाता है।
10. बरात निकासी / जान चढ़ना
वर का दूल्हे के वेश में घोड़ी पर बैठकर ससुराल के लिए प्रस्थान करना।
11. सामेला / मधुपर्क (Samela)
जब बरात वधू के गाँव या नगर की सीमा पर पहुँचती है, तो वधू पक्ष (पिता और रिश्तेदार) द्वारा बरात का औपचारिक स्वागत किया जाता है। इसे ‘सामेला’ या ‘ठुकाव’ भी कहते हैं।
12. तोरण मारना (Toran)
दूल्हा वधू के घर के मुख्य द्वार पर लटके हुए तोरण (लकड़ी का मांगलिक चिह्न) को अपनी तलवार या छड़ी से स्पर्श करता है। यह एक प्रतीकात्मक विजय रस्म है, जो प्राचीन काल में शक्ति प्रदर्शन का प्रतीक थी।
13. सास द्वारा दही देना / आरती
तोरण मारने के बाद सास द्वारा दूल्हे की आरती उतारी जाती है और शगुन के तौर पर दही खिलाया जाता है। (कई क्षेत्रों में नाक खींचने की रस्म भी होती है)।
14. हथलेवा / पाणिग्रहण (Panigrahan)
विवाह मंडप (चंवरी) में अग्नि के समक्ष वर और वधू का हाथ एक-दूसरे के हाथ में देना। यह जीवन भर साथ निभाने का वचन है। इस समय मामा द्वारा लाया गया ‘भात’ (मायरा) भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
15. मांडा झाकणा
यह विवाह के दौरान देवताओं और पितरों को आमंत्रित करने की एक रस्म है।
16. जेवनवार (Jevanvar) – विवाह भोज
- कंवारी जान का जीमण: पाणिग्रहण (फेरों) से पूर्व बारातियों को दिया जाने वाला भोजन।
- परणी जान का जीमण: फेरों के बाद दूसरे दिन का भोजन।
- बड़ी जान का जीमण: शाम का मुख्य प्रीतिभोज।
- मुकलानी: चौथा भोज (गौना के समय)।
17. गृहप्रवेश / नांगल / बारणा रोकना
नवविवाहित वधू जब पहली बार ससुराल आती है, तो वर की बहनें या बुआ (सवासणियां) द्वार रोककर खड़ी हो जाती हैं और नेग (दक्षिणा) लेकर ही उन्हें प्रवेश करने देती हैं।
18. ओलन्दी / ओलन्दा
वधू के साथ पीहर से प्रथम बार ससुराल आने वाला उसका छोटा भाई या कोई निकट संबंधी ‘ओलन्दी’ कहलाता है। यह वधू को नए माहौल में सहज महसूस कराने के लिए एक प्राचीन परंपरा है।
भाग 3: मृत्यु और शोक से संबंधित संस्कार (Death Rituals)
1. बैकुण्ठी (Baikunthi)
मृतक को श्मशान ले जाने के लिए बांस या लकड़ी से बनाई गई अर्थी या सीढ़ीनुमा संरचना।
2. बखेर (Bakher)
शव यात्रा के दौरान अर्थी के पीछे परिजनों द्वारा जो पैसे, कौड़ियाँ, खील, पताशे, फूल या अनाज फेंका जाता है, उसे बखेर कहते हैं। यह दान का एक रूप माना जाता है।
3. आधेठा / आधेटा (Adheta)
घर से श्मशान के रास्ते के बीच में एक स्थान पर अर्थी को कुछ क्षण के लिए रोका जाता है और उसकी दिशा परिवर्तित की जाती है (पैर श्मशान की ओर और सिर घर की ओर)। इसे ‘आधेठा’ कहते हैं।
4. लांपा / मुखाग्नि
मृतक के सबसे बड़े पुत्र या उत्तराधिकारी द्वारा चिता को अग्नि देना।
5. कपाल क्रिया
जब शव जल रहा होता है, तब बीच में बांस के डंडे से मृतक की खोपड़ी (कपाल) को तोड़ा जाता है ताकि घी डाला जा सके और माना जाता है कि इससे प्राण वायु पूर्ण रूप से मुक्त हो जाती है।
6. सांतरवाड़ा (Santarwada)
अन्त्येष्टि के बाद, स्नान करके लोग मृतक के घर सांत्वना देने जाते हैं। यह प्रक्रिया 12 दिनों तक चलती रहती है।
7. फूल चुनना
दाह संस्कार के तीसरे दिन श्मशान से मृतक की अस्थियाँ (फूल) चुनकर उन्हें गंगा या किसी पवित्र सरोवर में विसर्जित करने की रस्म।
8. मोसर / ओसर / नुक्ता (Mosar)
- मोसर: मृत्यु के बारहवें दिन (द्वादशी) किया जाने वाला मृत्यु भोज।
- जोसर: जीवित रहते हुए ही व्यक्ति द्वारा अपना मृत्यु भोज कर देना।
- (नोट: राजस्थान मृत्यु भोज निवारण अधिनियम, 1960 के तहत मृत्यु भोज करना कानूनी अपराध है, फिर भी सामाजिक दबाव में यह प्रथा प्रचलित है)।
9. पगड़ी रस्म
मृत्यु के 12वें दिन उत्तराधिकारी (बड़े बेटे) को समाज के सामने पगड़ी बांधी जाती है, जो यह घोषित करती है कि अब घर की जिम्मेदारी उस पर है।
भाग 4: ऐतिहासिक प्रशासनिक एवं राजस्व शब्दावली (Administrative Terminology)
मध्यकालीन राजस्थान (राजपूताना) की प्रशासनिक व्यवस्था सामंती स्वरूप की थी। प्रमुख शब्दावलियाँ निम्न हैं:
1. हरावल (Harawal)
सेना का वह अग्रिम दस्ता जो युद्ध भूमि में सबसे आगे रहता था। मेवाड़ में ‘चुण्डावत’ सरदारों को हरावल में रहने का विशेष अधिकार प्राप्त था, जो उनके अदम्य साहस का प्रतीक था।
2. चन्दावल (Chandawal)
यह सेना का पिछला भाग होता था।
3. ताजीम (Tazim)
राजा द्वारा अपने सामंतों को दिया जाने वाला विशेष सम्मान। जब कोई विशिष्ट सामंत दरबार में प्रवेश करता था, तो राजा उसके सम्मान में खड़ा होता था। इसे ‘ताजीम’ देना कहते थे।
4. मिसल (Misal)
राजदरबार में सामंतों और अधिकारियों के बैठने की एक निश्चित पंक्तिबद्ध व्यवस्था। किस सामंत को राजा के कितना निकट बैठने का अधिकार है, यह उसकी हैसियत (Rank) दर्शाता था।
5. तलवार बंधाई / नजराना
जब कोई नया ठाकुर या सामंत अपनी जागीर का उत्तराधिकारी बनता था, तो उसे गद्दीनशीनी के समय राजा को एक शुल्क देना पड़ता था। इसे ‘उत्तराधिकार शुल्क’, ‘कैद खालसा’ या ‘तलवार बंधाई’ कहा जाता था। (बिजौलिया किसान आंदोलन का यह एक प्रमुख कारण था)।
6. भूमि विभाजन:
- खालसा भूमि (Khalsa): वह भूमि जो सीधे राजा/केंद्र के नियंत्रण में होती थी और जिसका राजस्व सीधे राजकोष में जमा होता था।
- जागीर भूमि (Jagir): वह भूमि जो सामंतों या जागीरदारों के नियंत्रण में होती थी। वे इसका राजस्व वसूलते थे और बदले में राजा को सैन्य सेवा देते थे।
7. राजस्व निर्धारण पद्धतियाँ (Revenue Systems):
- लाटा (Lata): फसल की कटाई के बाद खलिहान में अनाज का ढेर लगाकर, तोलकर राजस्व का निर्धारण करना।
- कूंत / कूता (Kunta): खड़ी फसल का अनुमान लगाकर (बिना काटे) राजस्व निर्धारित करना। यह किसानों के लिए अक्सर नुकसानदायक होता था।
8. प्रमुख लाग-बाग (Taxes):
- कामठा लाग: दुर्ग या गढ़ के निर्माण/मरम्मत के समय जनता से वसूला जाने वाला कर।
- खिचड़ी लाग: युद्ध या सैन्य अभियान के समय सेना के भोजन और खर्च के लिए स्थानीय जनता से वसूला जाने वाला कर।
- कीणा: गांवों में सब्जी, घी या अन्य दैनिक सामान खरीदने/बेचने पर लिया जाने वाला कर।
- बिगोड़ी (Bigori): यह नकद रूप में लिया जाने वाला भूमि कर (Land Tax) था।
- सिगोटी: पशुओं के क्रय-विक्रय पर लगने वाला कर।
- जाजम: भूमि के विक्रय पर लगने वाला कर।
- जकात/डाग: एक प्रकार का सीमा शुल्क (Customs Duty/Transit Duty)।
9. अन्य शब्दावली:
- प्रिवीपर्स (Privy Purse): स्वतंत्रता के बाद भारतीय संघ में विलय के बदले पूर्व शासकों को दिया जाने वाला शाही गुजारा भत्ता (जिसे 1971 में 26वें संविधान संशोधन द्वारा समाप्त कर दिया गया)।
- करब: सामंतों को प्राप्त एक विशेष सम्मान, जिसमें राजा जागीरदार के कंधों पर हाथ रखकर उसे अपनी छाती तक लाता था (आलिंगन जैसा)। इसका अर्थ था- “आपका स्थान मेरे हृदय में है।”
भाग 5: राजस्थान में प्रचलित सामाजिक प्रथाएं एवं सुधार (Customs & Reforms)
ऐतिहासिक रूप से राजस्थान में कई कुप्रथाएं प्रचलित थीं, जिन्हें समय-समय पर समाज सुधारकों और सरकारी कानूनों द्वारा प्रतिबंधित किया गया।
1. कन्या वध प्रथा (Female Infanticide)
राजपूत समाज में दहेज के बोझ और झूठी शान के कारण कन्या के जन्म लेते ही उसे अफीम देकर या गला दबाकर मारने की क्रूर प्रथा थी।
- प्रतिबंध: इस प्रथा को गैर-कानूनी घोषित करने वाला राजस्थान का पहला राज्य ‘कोटा’ था। हाड़ौती के पॉलिटिकल एजेंट विलकिंसन के प्रयासों से 1833 ई. में कोटा में और 1834 ई. में बूंदी में इस पर रोक लगाई गई।
2. त्याग प्रथा
राजपूतों में विवाह के समय चारण, भाट और ढोली जाति के लोग वर पक्ष से मुंहमांगी दान-दक्षिणा (त्याग) मांगते थे, जिससे वधू पक्ष पर आर्थिक भार पड़ता था।
- प्रतिबंध: 1841 ई. में जोधपुर रियासत में नियम बनाकर इसे सीमित किया गया।
3. मानव व्यापार / मानव क्रय-विक्रय
कोटा राज्य में मनुष्यों की खरीद-फरोख्त पर बकायदा टैक्स वसूला जाता था, जिसे ‘चौगान’ कहते थे।
- प्रतिबंध: सर्वप्रथम 1847 ई. में जयपुर रियासत ने मानव व्यापार पर रोक लगाई।
4. सती प्रथा
पति की मृत्यु पर पत्नी द्वारा चिता में जलने की प्रथा।
- प्रतिबंध: राजा राममोहन राय के प्रयासों से लॉर्ड विलियम बेंटिक ने 1829 ई. में सती प्रथा निषेध अधिनियम पारित किया। राजस्थान में सबसे पहले बूंदी रियासत (1822 ई.) ने इसे गैर-कानूनी घोषित किया था। बाद में जयपुर (1844) आदि ने इसे अपनाया।
- वर्तमान कानून: सती (निवारण) अधिनियम, 1987 (रूप कंवर प्रकरण के बाद लागू)।
5. डाकन प्रथा
स्त्रियों पर जादू-टोना करने का आरोप लगाकर उन्हें प्रताड़ित करने या मारने की प्रथा।
- प्रतिबंध: महाराणा स्वरूप सिंह के समय 1853 ई. में उदयपुर (मेवाड़) में खैरवाड़ा छावनी में इसे सर्वप्रथम गैर-कानूनी घोषित किया गया (जे.सी. ब्रूक के प्रयासों से)।
6. विधवा पुनर्विवाह (Widow Remarriage)
- सुधार: समाज सुधारक ईश्वर चंद्र विद्यासागर के अथक प्रयासों से लॉर्ड डलहौजी के समय रूपरेखा बनी और लॉर्ड कैनिंग के समय 1856 ई. में ‘विधवा पुनर्विवाह अधिनियम’ पारित हुआ।
7. दहेज प्रथा (Dowry System)
विवाह में वधू पक्ष द्वारा वर पक्ष को धन-संपत्ति देने की प्रथा।
- कानून: भारत सरकार द्वारा दहेज निषेध अधिनियम, 1961 पारित किया गया, जो 1 जुलाई 1961 से लागू हुआ।
8. दास प्रथा (Slavery)
युद्ध बंदियों या गरीब लोगों को खरीदकर दास (गोला/गोली/दरोगा/चाकर) बनाकर रखने की प्रथा। विवाह में ‘डावरिया’ के रूप में दासियां दी जाती थीं।
- प्रतिबंध: 1832 ई. में विलियम बेंटिक ने इसे संपूर्ण भारत में प्रतिबंधित किया। राजस्थान में सबसे पहले कोटा और बूंदी (1832 ई.) ने रोक लगाई।
9. बंधुआ मजदूर / सागड़ी / हाली प्रथा
सेठ, साहूकार या सामंत द्वारा दिए गए ऋण के बदले, ऋणी व्यक्ति या उसके परिवार को बिना वेतन के जीवन भर नौकर बनाकर रखना। इसे ‘सागड़ी’ कहा जाता था।
- कानून: सागड़ी निवारण अधिनियम, 1961 (राजस्थान सरकार) और बंधुआ श्रम पद्धति (उत्सादन) अधिनियम, 1976 (केंद्र सरकार) द्वारा इसे पूर्णतः समाप्त कर दिया गया है। संविधान के अनुच्छेद 23 में भी इसका निषेध है।
10. बेगार प्रथा
जागीरदारों या रसूखदार लोगों द्वारा मजदूरों से काम करवाकर उन्हें कोई मजदूरी न देना।
- कानून: 1961 और 1976 के अधिनियमों के तहत इसे दंडनीय अपराध माना गया है। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 23 ‘बेगार’