प्रस्तावना
राजस्थान केवल भौगोलिक रूप से मरुस्थल और अरावली की पहाड़ियों का प्रदेश नहीं है, बल्कि यह एक जीवित संग्रहालय है जहाँ की संस्कृति, परंपराएँ और इतिहास यहाँ के कण-कण में गूंजते हैं। इस सांस्कृतिक धरोहर की सबसे सशक्त अभिव्यक्ति यहाँ के ‘लोकगीत’ हैं। रवीन्द्रनाथ टैगोर ने एक बार कहा था, “लोकगीत संस्कृति के वो पहरेदार हैं जो जनमानस की सुख-दुःख की अनुभूतियों को पीढ़ियों तक सुरक्षित रखते हैं।” राजस्थान के संदर्भ में यह कथन अक्षरशः सत्य प्रतीत होता है।
यहाँ के लोकगीत केवल मनोरंजन का साधन नहीं हैं, बल्कि ये राजस्थानी मानव जीवन के संपूर्ण इतिहास, सामाजिक मूल्यों, नैतिकताओं और संघर्षों का जीवंत दस्तावेज हैं। जन्म से लेकर मृत्यु तक, युद्ध के मैदान से लेकर खेतों की मेड़ों तक, और महलों के झरोखों से लेकर झोपड़ियों के आंगन तक—राजस्थान का कोई भी पहलू संगीत से अछूता नहीं है।
1. राजस्थानी लोकगीतों का वर्गीकरण एवं स्वरूप
विषय-वस्तु, गायन शैली और अवसरों के आधार पर राजस्थानी लोकगीतों को एक व्यवस्थित शैक्षणिक ढांचे में विभाजित किया जा सकता है। प्रमुख श्रेणियाँ निम्नलिखित हैं:
1.1 जन-सामान्य के लोकगीत (सामाजिक एवं संस्कार गीत)
यह श्रेणी लोकगीतों का सबसे विस्तृत भाग है, जो आम जनजीवन से जुड़ा है। इसमें सोलह संस्कारों, विशेषकर विवाह, जन्म और मृत्यु से संबंधित गीत आते हैं। इन गीतों की भाषा अत्यंत सहज, भावुक और मर्मस्पर्शी होती है।
- प्रमुख विषय: तीज-त्योहार (गणगौर, होली, तीज), पारिवारिक संबंध, और दैनिक क्रियाकलाप।
- उदाहरण: ईंडोणी, कांगसियो, पणिहारी, लूर, ओल्यूं, सुपना, और चिरमी।
1.2 व्यावसायिक जातियों के गीत
राजस्थान में संगीत को ही आजीविका मानने वाली कई जातियाँ सदियों से सक्रिय रही हैं। इनमें लंगा, मांगणियार, ढाढ़ी, मिरासी, कलावंत, और भाट प्रमुख हैं।
- विशेषता: इनके गीतों में शास्त्रीयता का पुट होता है। ये गीत राजा-महाराजाओं के मनोरंजन और यशोगान के लिए गाए जाते थे।
- संरचना: इनमें खयाल और ठुमरी की भांति ‘स्थायी’ और ‘अंतरा’ स्पष्ट दिखाई देता है। ये गीत मांड, देस, सोरठ, और मारू जैसे रागों पर आधारित होते हैं।
1.3 क्षेत्रीय लोकगीत
भौगोलिक विषमताओं ने गीतों के स्वरूप को भी प्रभावित किया है:
- मरुस्थलीय क्षेत्र (जैसलमेर, बाड़मेर, बीकानेर, जोधपुर): यहाँ के गीत ‘ऊंचे सुरों’ और ‘लंबी तानों’ वाले होते हैं। इसका कारण खुले रेगिस्तान में आवाज को दूर तक पहुँचाने की आवश्यकता है। कुरजां, पीपली, रतन राणो, मूमल यहाँ के प्रमुख गीत हैं।
- मैदानी और पर्वतीय क्षेत्र (जयपुर, कोटा, अलवर, भरतपुर): यहाँ भक्ति और श्रृंगार रस की प्रधानता है। गीतों में स्वरों का उतार-चढ़ाव अधिक कलात्मक होता है।
2. राग एवं गायन शैलियाँ: शास्त्रीय परिप्रेक्ष्य
2.1 मांड गायकी (Mand Singing)
राजस्थान की सबसे परिष्कृत और प्रसिद्ध गायन शैली ‘मांड’ है। यह शास्त्रीय संगीत और लोक संगीत के बीच का सेतु है। इसे मूलतः जैसलमेर क्षेत्र की देन माना जाता है, लेकिन समय के साथ इसके कई क्षेत्रीय घराने विकसित हुए:
- उदयपुर की मांड: इसमें गंभीरता और ठहराव है।
- जोधपुर की मांड: यह वीर रस और श्रृंगार का मिश्रण है।
- जयपुर-बीकानेर की मांड: इसमें तानों की बारीकी और शास्त्रीयता का प्रभाव अधिक है।
- जैसलमेर की मांड: यह मूल और सबसे शुद्ध रूप मानी जाती है।
नोट: सुप्रसिद्ध लोकगीत ‘केसरिया बालम’ मांड शैली का ही सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है।
2.2 मारू और अन्य राग
- राग मारू: यह रेगिस्तान की आत्मा है। युद्ध के समय ‘सिंधु’ और ‘मारू’ रागों का प्रयोग वीरों में उत्साह भरने के लिए किया जाता था।
- अन्य राग: जोगिया, आसावरी, बिलावल, पीलू, और खमाज रागों का प्रयोग भी लोकगीतों को सजाने में बहुतायत से किया जाता है।
3. प्रमुख लोकगीत
(यहाँ प्रमुख गीतों को उनके सामाजिक और सांस्कृतिक महत्व के साथ विस्तृत रूप में समझाया गया है)
अ. विरह एवं प्रेम प्रधान गीत (Shrinagar & Separation)
1. केसरिया बालम (Kesariya Balam)
- श्रेणी: राज्य गीत (State Song) / रजवाड़ी गीत।
- भाव: यह एक विरहणी नायिका की पुकार है जो अपने परदेसी पति (ढोला) को वापस वतन आने का निमंत्रण देती है।
- सांस्कृतिक महत्व: यह गीत राजस्थान की ‘अतिथि देवो भव’ की संस्कृति का प्रतीक बन चुका है। “पधारौ म्हारे देस” केवल एक पंक्ति नहीं, बल्कि राजस्थान का सांस्कृतिक उद्घोष है। इसे मांड शैली में गाया जाता है।
2. कुरजां (Kurja)
- विवरण: कुरजां (Demoiselle Crane) एक प्रवासी पक्षी है जो सर्दियों में राजस्थान आता है।
- कथानक: विरहणी नायिका इस पक्षी को दूत (Messenger) मानकर अपने परदेसी पति को संदेश भेजती है।
- गीत के बोल: “कुरजां ए म्हारौ भंवर मिलादयो ए…” (हे कुरजां! मुझे मेरे प्रियतम से मिला दे)।
3. कागा (Kaga)
- शगुन शास्त्र: राजस्थानी लोक मान्यताओं में कौए का बोलना मेहमान (प्रियतम) के आने का संकेत माना जाता है।
- भाव: नायिका कौए को उड़ने के लिए कहती है और उसे लालच देती है (दूध-भात खिलाना, चोंच मढ़वाना) ताकि उसका पति घर आ जाए।
- बोल: “उड़-उड़ रे म्हारा काळा रे कागला, जद म्हारा पिवजी घर आवै।”
4. ओल्यूँ (Olyu)
- अर्थ: राजस्थानी भाषा में ओल्यूँ का अर्थ है ‘याद’ या ‘स्मृति’।
- अवसर: मुख्य रूप से बेटी की विदाई के समय। जब वधू अपने पीहर (मायके) को छोड़कर ससुराल जाती है, तो उसकी सखियाँ और परिवारजन ओल्यूँ गाते हैं। यह करुण रस से भरा गीत है।
- बोल: “कँवर बाई री ओल्यूँ आवे ओ राज…”
5. सुपना (Supna)
- अर्थ: स्वप्न (Dream)।
- विवरण: यह विरह व्यथा का मनोवैज्ञानिक चित्रण है। नायिका सपने में अपने पति को देखती है, लेकिन नींद खुलने पर उसे न पाकर वह व्यथित हो जाती है और उसे ‘बैरी’ (दुश्मन) नींद कहती है।
- बोल: “सुपणा में म्हारा भँवर न मिलायो जी…”
6. मूमल (Moomal)
- क्षेत्र: जैसलमेर (लोद्रवा)।
- प्रकृति: यह एक ऐतिहासिक प्रेम गाथा और श्रृंगारिक गीत है।
- विषय: इसमें लोद्रवा की राजकुमारी मूमल की सुंदरता (नख-शिख वर्णन) और अमरकोट के राणा महेंद्र के साथ उसकी प्रेम कहानी का वर्णन होता है। यह गीत जैसलमेर की पहचान है।
- बोल: “म्हार्इ बरसाले री मूमल, हालौनी ऐ आलीजे रे देश।”
7. पीपली (Pipli)
- ऋतु: वर्षा ऋतु।
- क्षेत्र: मारवाड़ और शेखावाटी।
- संदर्भ: तीज के त्योहार से कुछ दिन पूर्व, स्त्रियाँ पीपली के पेड़ को संबोधित कर अपने परदेसी पति को याद करती हैं। यह गीत पति को परदेस न जाने या वापस बुलाने का आग्रह है।
8. झोरावा (Jhorawa)
- क्षेत्र: जैसलमेर।
- विशेषता: यह पश्चिमी राजस्थान का एक अत्यंत भावुक विरह गीत है, जिसे पति के वियोग में गाया जाता है। इसमें किसी वाद्य यंत्र की आवश्यकता नहीं होती, केवल स्वर की प्रधानता होती है।
9. ढोला-मारू (Dhola-Maru)
- क्षेत्र: सिरोही और मारवाड़।
- जाति: ढाढी।
- कथा: यह राजस्थान की सबसे प्रसिद्ध प्रेम कहानी ‘ढोला और मारू’ पर आधारित है। इसमें बाल-विवाह, वियोग और पुनर्मिलन की कहानी गीतों के माध्यम से सुनाई जाती है।
ब. पारिवारिक एवं सामाजिक उत्सव गीत (Social & Festival Songs)
10. घूमर (Ghoomar)
- महत्व: यह राजस्थान का राज्य नृत्य है और इसे ‘नृत्यों का सिरमौर’ कहा जाता है।
- गीत का सार: गणगौर या विवाह के अवसर पर स्त्रियाँ गोल घेरे में नृत्य करते हुए यह गीत गाती हैं। इसमें लहंगे (घघरे) की लचक और राजस्थानी नारी की नजाकत का वर्णन है।
- बोल: “म्हारी घूमर छै नखराली ए माँ, घूमर रमवा म्हें जास्यां।”
11. गोरबंद (Gorband)
- सांस्कृतिक संदर्भ: मरुस्थल में ऊंट जीवन का आधार है। गोरबंद ऊंट के गले का कलात्मक आभूषण होता है।
- भाव: स्त्रियाँ ऊंट के लिए गोरबंद गूंथते समय यह गीत गाती हैं। यह गीत श्रम (Labour) और कला (Art) के सुंदर समन्वय का उदाहरण है, विशेषकर शेखावाटी क्षेत्र में।
- बोल: “म्हारो गोरबंद नखरालौ…”
12. चिरमी (Chirmi)
- प्रतीक: चिरमी एक मरुस्थलीय पौधा है।
- भाव: नवविवाहित वधू ससुराल में अपने पिता और भाई की प्रतीक्षा करती है। वह चिरमी के पौधे को संबोधित कर अपने पीहर की यादों को साझा करती है। यह गीत वात्सल्य और स्नेह का प्रतीक है।
- बोल: “चिरमी रा डाळा चार, वारी जाऊँ चिरमी ने।”
13. बधावा (Badhava)
- अवसर: किसी भी शुभ कार्य के संपन्न होने पर (जैसे विवाह, गृह प्रवेश, पुत्र जन्म)।
- अर्थ: बधाई देना। यह मंगल गीत है जो खुशियों को प्रकट करता है।
14. जच्चा / होलर (Jachcha/Holar)
- अवसर: पुत्र जन्मोत्सव।
- विषय: इसमें वंश वृद्धि की खुशी, जच्चा (माता) के स्वास्थ्य और नवजात शिशु के लिए मंगल कामना की जाती है।
15. जलो और जलाल (Jalo and Jalal)
- समारोह: विवाह।
- प्रसंग: जब बारात वधू के घर पहुँचती है (डेरा डालती है), तो वधू पक्ष की स्त्रियाँ बारात का डेरा देखने जाती हैं। उस समय यह गीत गाया जाता है। इसमें बारातियों के रूप-रंग और ठाठ-बाट का वर्णन (कभी-कभी मीठे व्यंग्य के साथ) होता है।
- बोल: “म्हैं तो थारा डेरा निरखण आई ओ, म्हारी जोड़ी रा जला…”
16. बना-बनी (Bana-Bani)
- शब्दार्थ: बना (दूल्हा) और बनी (दुल्हन)।
- प्रसंग: विवाह के अवसर पर गाए जाने वाले गीतों को बना-बनी कहा जाता है। इनमें भावी दांपत्य जीवन की अभिलाषाएं व्यक्त होती हैं।
17. कामण (Kaman)
- उद्देश्य: सुरक्षात्मक गीत।
- प्रसंग: विवाह के समय दूल्हे को बुरी नजर और जादू-टोने से बचाने के लिए वधू पक्ष की स्त्रियाँ ‘कामण’ गाती हैं। यह राजस्थानी समाज के अंधविश्वास और सुरक्षात्मक प्रेम को दर्शाता है।
18. पावणा (Pawana)
- अर्थ: दामाद (Guest/Son-in-law)।
- अवसर: जब दामाद ससुराल आता है, तो उसे भोजन कराते समय स्त्रियाँ यह गीत गाती हैं। इसमें मान-मनुहार और मीठी छेड़छाड़ होती है।
19. सीठणे (Sithne)
- प्रकृति: गाली गीत (Playful Abuse)।
- मनोविज्ञान: विवाह के तनावपूर्ण वातावरण को हल्का करने के लिए समधिनों द्वारा समधियों को मीठी गालियाँ दी जाती हैं। यह सामाजिक रिश्तों में घनिष्ठता का सूचक है।
स. दैनिक जीवन और श्रृंगारिक गीत (Daily Life & Shringar)
20. पणिहारी (Panihari)
- संदर्भ: मरुस्थल में पानी का अत्यधिक महत्व है। स्त्रियाँ मीलों दूर से पानी लाने जाती हैं।
- नैतिकता: पणिहारी गीत में केवल पानी लाने का कष्ट नहीं, बल्कि राजस्थानी नारी के ‘पातिव्रत्य धर्म’ (Fidelity) का चित्रण है। गीत में एक पथिक पणिहारी को ललचाता है, पर वह अपने धर्म पर अडिग रहती है।
21. ईंडोणी (Indoni)
- वस्तु: पानी का मटका सिर पर रखने के लिए कपड़े या नारियल की जटा से बनी गोल गद्दी।
- गीत: यह पणिहारी संस्कृति का ही हिस्सा है, जिसमें ईंडोणी के खो जाने या उसके सौंदर्य का वर्णन होता है।
- बोल: “म्हारी सवा लाख री लूम गम गई ईंडोणी…”
22. कांगसियो (Kangasiyo)
- अर्थ: कंघा (Comb)।
- रस: विशुद्ध श्रृंगार।
- भाव: नायिका अपने बालों को संवारने वाले कंघे के प्रति अपना मोह व्यक्त करती है, जिसे उसका प्रियतम (पणिहारी के संदर्भ में या अलग से) ले गया है।
- बोल: “म्हारै छैल भँवर रो कांगसियो पणिहारियों ले गई रे।”
23. मोरिया (Moriya)
- प्रतीक: मोर (Peacock)।
- कथानक: यह एक ऐसी युवती की व्यथा है जिसकी सगाई हो चुकी है, लेकिन विवाह में देरी हो रही है। रात में मोर के बोलने पर उसे अपनी विवशता और प्रियतम की याद आती है।
24. हिचकी (Hitchki)
- लोक विश्वास: हिचकी आने का अर्थ है कि कोई प्रियजन याद कर रहा है।
- क्षेत्र: मेवात (अलवर-भरतपुर) क्षेत्र में यह विशेष लोकप्रिय है।
- बोल: “म्हारा पियाजी बुलाई म्हानै आई हिचकी।”
25. बीछूड़ो (Bichudo)
- क्षेत्र: हाड़ौती (कोटा-बूंदी)।
- कथानक: यह गीत एक पत्नी के त्याग को दर्शाता है। उसे बिच्छू ने काट लिया है और वह मृत्युशैया पर है। वह अपने पति से आग्रह करती है कि उसकी मृत्यु के बाद वह दूसरा विवाह कर ले ताकि गृहस्थी न उजड़े।
- बोल: “मैं तो मरी होती राज, खा गयो बैरी बीछूड़ो।”
26. जीरा (Jeera)
- कृषि संदर्भ: जीरे की फसल बहुत नाजुक होती है और इसे उगाने में बहुत मेहनत लगती है।
- भाव: एक ग्रामीण महिला अपने पति से विनती करती है कि वह जीरे की फसल न बोए क्योंकि यह “जीव का बैरी” (जानलेवा) है, इसमें पूरा परिवार खप जाता है।
- बोल: “ओ जीरो जीव रो बैरी रे, मत बाओ म्हारा परण्या जीरो।”
द. भक्ति एवं धार्मिक लोकगीत (Religious & Devotional)
27. हरजस (Harjas)
- प्रकृति: सगुण भक्ति गीत।
- विषय: जब परिवार में किसी वृद्ध व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है या धार्मिक अनुष्ठान होते हैं, तब भगवान राम और कृष्ण (हरि) के यशोगान में हरजस गाए जाते हैं। यह शोक को भक्ति में बदलने का माध्यम है।
28. रातीजगा (Raatijaga)
- परंपरा: किसी भी शुभ कार्य से पहले रात भर जागकर देवी-देवताओं का आह्वान करना।
- गीत: इसमें कुलदेवी, पितृ देवता, भोमिया जी, और सती माता के गीत गाए जाते हैं। यह “प्रथम निमंत्रण” ईश्वर को देने की प्रथा है।
29. लांगुरिया (Languriya)
- क्षेत्र: करौली (पूर्वी राजस्थान)।
- भक्ति: यह कैला देवी (शक्ति) के भक्तों द्वारा गाया जाता है। ‘लांगुरिया’ शब्द हनुमान जी (बजरंगबली) का प्रतीक माना जाता है जो देवी के आगे चलते हैं।
- शैली: यह गीत भक्ति के साथ-साथ कभी-कभी हंसी-ठिठोली और श्रृंगारिक पुट (कामुक अर्थों के बिना निर्दोष छेड़छाड़) लिए हुए भी होता है।
- बोल: “केला मैया के भवन में गुटकन खेलै लांगुरिया…”
30. तेजा (Teja)
- लोक देवता: वीर तेजाजी।
- अवसर: खेती शुरू करते समय (हल जोतते समय)।
- महत्व: किसान तेजाजी के गीत गाकर अच्छी फसल और सांपों से रक्षा की कामना करते हैं। यह कृषि संस्कृति का अभिन्न अंग है।
31. पंछीड़ा (Panchida)
- क्षेत्र: ढूंढाड़ (जयपुर) और हाड़ौती।
- अवसर: मेलों और त्योहारों के समय।
- वाद्य: अलगोजा, ढोलक और मंजीरा।
- संदेश: यह स्वतंत्रता और उमंग का गीत है।
4. अन्य विशिष्ट लोकगीत एवं शैलियाँ
4.1 लावणी (Lavani)
‘लावणी’ शब्द का अर्थ है ‘बुलाना’ या ‘आमंत्रित करना’। यद्यपि लावणी महाराष्ट्र की प्रमुख शैली है, लेकिन राजस्थान में भी इसका विशिष्ट रूप मिलता है।
- प्रकार:
- श्रृंगारिक लावणी: नायक द्वारा नायिका को बुलाने के लिए।
- भक्ति लावणी: निर्गुण संतों द्वारा गाई जाने वाली, जैसे- मोरध्वज, भरथरी और सेऊ-संमन की कथाएँ।
4.2 हींडो (Hindo)
- ऋतु: श्रावण मास (सावन)।
- उत्सव: तीज और झूला झूलने की परंपरा।
- भाव: सखियाँ बागों में झूला झूलते हुए सावन के आगमन और भाई-बहन या पति-पत्नी के प्रेम के गीत गाती हैं।
- बोल: “सावणियै रौ हींडौ रे बाँधन जाय।”
4.3 पपैयो (Papaiyo)
- पक्षी: पपीहा।
- आदर्श: यह गीत दांपत्य प्रेम के उच्च आदर्श को प्रस्तुत करता है। इसमें प्रेमिका अपने प्रियतम को उपवन में मिलने के लिए बुलाती है, लेकिन गीत का अंत सुखद और नैतिक मर्यादाओं के भीतर होता है।
4.4 वीर रस के गीत
चारण और भाट कवियों द्वारा रचित ये गीत डिंगल भाषा में होते थे।
- विषय: राजाओं का शौर्य, युद्ध का वर्णन और बलिदान।
- उदाहरण: ‘मायड़ थारो वो पूत कठै’, महाराणा प्रताप और पृथ्वीराज चौहान की प्रशस्तियाँ।
5. निष्कर्ष
राजस्थान के लोकगीत केवल संगीत की स्वरलहरियां नहीं हैं, अपितु यह मरुधरा की धड़कन हैं। जहाँ शास्त्रीय संगीत के नियम कठोर होते हैं, वहीं राजस्थानी लोकगीतों में लोच, सहजता और हृदय की भाषा है।
इन गीतों में एक ओर जहाँ ‘केसरिया बालम’ जैसा शाही स्वागत है, तो दूसरी ओर ‘जीरा’ जैसी किसान जीवन की कठिनाइयाँ। एक ओर ‘चिरमी’ जैसा वात्सल्य है, तो दूसरी ओर ‘ढोला-मारू’ जैसा अमर प्रेम। इन गीतों की सुदीर्घ परंपरा का श्रेय यहाँ की पेशेवर जातियों (लंगा-मांगणियार) और आम ग्रामीण महिलाओं को जाता है, जिन्होंने इसे केवल कंठों में ही नहीं, बल्कि आत्मा में जीवित रखा है।
आधुनिकता की दौड़ में, ये गीत हमें हमारी जड़ों से जोड़ते हैं और यह सिद्ध करते हैं कि अभावों (पानी, संसाधन) के बीच भी जीवन को उत्सव की तरह कैसे जिया जा सकता है।
