राजस्थान की कला एवं संस्कृति: प्रमुख संत एवं सम्प्रदाय

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प्रस्तावना

राजस्थान की पावन धरा शूरवीरों की ही नहीं, अपितु संतों और भक्तों की भी भूमि रही है। मध्यकाल में जब भारतीय समाज धार्मिक आडंबरों और बाह्य आक्रमणों से जूझ रहा था, तब राजस्थान में भक्ति आंदोलन का उदय हुआ। यहाँ की भक्ति धारा को मुख्य रूप से तीन भागों में विभाजित किया जा सकता है: सगुण भक्ति, निर्गुण भक्ति, और मिश्रित भक्ति

1. जसनाथी सम्प्रदाय (Jasnathi Sampraday)

यह राजस्थान का एक प्रमुख निर्गुण भक्ति सम्प्रदाय है, जो पर्यावरण संरक्षण और तांत्रिक सिद्धियों के लिए जाना जाता है।

  • प्रवर्तक/संस्थापक: सिद्ध जसनाथ जी (जाट)
  • जन्म: 1482 ई. (विक्रम संवत 1539), कार्तिक शुक्ल एकादशी।
  • जन्म स्थान: कतरियासर (जिला – बीकानेर)।
  • प्रधान पीठ: कतरियासर (बीकानेर)।
  • गुरु: गोरखनाथ जी।
  • ज्ञान प्राप्ति: जसनाथ जी को ‘गोरखमालिया’ (बीकानेर) नामक स्थान पर कठोर तपस्या के उपरांत ज्ञान की प्राप्ति हुई।

प्रमुख विशेषताएँ एवं नियम

  • आचार संहिता: इस सम्प्रदाय के अनुयायी कुल 36 नियमों का निष्ठापूर्वक पालन करते हैं।
  • पवित्र ग्रंथ:
    1. सिमूदड़ा
    2. कोडाग्रंथ (इन ग्रंथों में जसनाथ जी के उपदेश संकलित हैं)।
  • प्रचार-प्रसार: इस सम्प्रदाय का प्रचार “परमहंस मण्डली” द्वारा किया जाता है।
  • अग्नि नृत्य (Fire Dance): यह इस सम्प्रदाय की सबसे विशिष्ट पहचान है। रात्रि जागरण (जम्मा) के दौरान सिद्ध पुरुष धधकते हुए अंगारों (धूणा) पर नंगे पांव नृत्य करते हैं और ‘फतेह-फतेह’ का उद्घोष करते हैं। नृत्य के दौरान सिर पर मतीरा फोड़ने और हल जोतने जैसी क्रियाओं का कलात्मक प्रदर्शन किया जाता है।

ऐतिहासिक संदर्भ

  • सिकंदर लोदी का योगदान: दिल्ली सल्तनत के शासक सिकंदर लोदी जसनाथ जी के चमत्कार और व्यक्तित्व से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने कतरियासर में प्रधान पीठ स्थापित करने के लिए 500 बीघा भूमि दान में दी थी।
  • राव लूणकरण (बीकानेर शासक) ने भी जसनाथ जी को बीकानेर राज्य का राजचिह्न प्रदान किया था।

सम्प्रदाय की उप-पीठें

इस सम्प्रदाय की पाँच प्रमुख उप-पीठें (आश्रम) हैं:

  1. बमलू (बीकानेर)
  2. लिखमादेसर (बीकानेर)
  3. पूनरासर (बीकानेर)
  4. मालासर (बीकानेर)
  5. पान्चला (नागौर)

2. दादू सम्प्रदाय (Dadu Sampraday)

दादू दयाल जी को ‘राजस्थान का कबीर’ कहा जाता है। उन्होंने निर्गुण निराकार ब्रह्म की उपासना पर बल दिया।

  • संस्थापक: संत दादू दयाल जी।
  • जन्म: 1544 ई. (चैत्र शुक्ल अष्टमी), अहमदाबाद (गुजरात)।
  • गुरु: वृद्धानंद जी (बुड्ढन बाबा), जो कबीरदास जी के शिष्य परम्परा में थे।
  • तपस्या स्थली: इन्होंने सांभर (जयपुर) और भैराणा की पहाड़ियों (बिचून, जयपुर) में कठोर तपस्या की।
  • प्रधान पीठ: नरेना/नारायण (वर्तमान में दूदू जिला, पूर्व में जयपुर)।

साहित्यिक योगदान एवं दर्शन

  • उपनाम: कबीरपंथी सम्प्रदाय (विचारधारा की समानता के कारण)।
  • प्रमुख ग्रंथ: ‘दादू वाणी’ और ‘दादू जी रा दोहा’।
  • भाषा: सधुकड़ी (यह हिंदी और ढूंढाड़ी बोली का मिश्रण है)।
  • सत्संग स्थल: इनके उपदेश स्थल ‘अलख-दरीबा’ कहलाते हैं।

दादू पंथ की संरचना (52 स्तम्भ)

दादू दयाल जी के कुल 152 शिष्य थे, जिनमें से 100 विरक्त थे और 52 प्रमुख शिष्य थे, जिन्हें दादू पंथ के ’52 स्तम्भ’ कहा जाता है। इनमें उनके दो पुत्र गरीब दास जी और मिस्किन दास जी भी सम्मिलित थे।

सम्प्रदाय की 5 प्रमुख शाखाएँ (पंचतीर्थ)

  1. खालसा: आचार्य परंपरा के साधु जो प्रधान पीठ (नरेना) पर निवास करते हैं। (प्रवर्तक: गरीबदास जी)
  2. विरक्त: गृहस्थ त्याग कर घूम-घूम कर धर्म प्रचार करने वाले साधु।
  3. उत्तराधे (स्थानधारी): वे साधु जिन्होंने उत्तर भारत (हरियाणा/हिसार) की ओर जाकर प्रचार किया। (प्रवर्तक: बनवारी दास जी)
  4. खाकी: शरीर पर भस्म रमाने वाले और जटा रखने वाले साधु।
  5. नागा: यह योद्धा साधुओं का वर्ग था जो शस्त्र रखते थे और निर्वस्त्र रहते थे। नागा शाखा की स्थापना दादू जी के शिष्य सुन्दर दास जी ने की थी। मराठा आक्रमणों के समय जयपुर रियासत की रक्षा में नागा साधुओं ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।

अंतिम संस्कार की विशिष्ट पद्धति

दादू पंथ में शव को न तो जलाया जाता है और न ही दफनाया जाता है। मानव शरीर को “परोपकाराय सतां विभूतयः” के सिद्धांत पर जंगल में पशु-पक्षियों के आहार हेतु खुला छोड़ दिया जाता है। दादू दयाल जी का पार्थिव शरीर भी भैराणा की पहाड़ियों में रखा गया था, जिसे ‘दादू खोल’ कहा जाता है।

प्रमुख शिष्य: रज्जब जी

  • मूल स्थान: सांगानेर (जयपुर)।
  • विशेषता: ये दादू जी के उपदेश सुनकर विवाह के मंडप से ही सन्यास ले लिए थे और आजीवन दूल्हे के वेश में रहे।
  • रचनाएँ: रज्जब वाणी, सर्वंगी।
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3. विश्नोई सम्प्रदाय (Bishnoi Sampraday)

यह विश्व का संभवतः एकमात्र ऐसा धार्मिक सम्प्रदाय है, जिसका मूल आधार ‘पर्यावरण संरक्षण’ है।

  • संस्थापक: जाम्भोजी (गुरु जम्भेश्वर)।
  • जन्म: 1451 ई. (भाद्रपद कृष्ण अष्टमी/जन्माष्टमी), पीपासर (नागौर)।
  • वंश: पंवार वंशीय राजपूत।
  • उपनाम: पर्यावरण वैज्ञानिक (Geologist), पर्यावरण संत, गूंगा-गहला संत।
  • मूल मंत्र: “हृदय से विष्णु का नाम जपो और हाथ से कार्य करो।”

प्रमुख ग्रंथ एवं नियम

  • ग्रंथ: जम्भ सागर, जम्भवाणी (वेद वाणी), विश्नोई धर्म प्रकाश।
  • नियम: जाम्भोजी ने अनुयायियों के लिए 29 नियम (20+9) निर्धारित किए, इसीलिए यह पंथ ‘विश्नोई’ (बीस+नौ) कहलाया।
  • दर्शन: विष्णु भक्ति पर बल, हरे वृक्षों (विशेषकर खेजड़ी) की रक्षा और वन्य जीव (हिरण) संरक्षण।

प्रमुख धार्मिक स्थल (धाम)

  1. मुकाम (तालवा): (नोखा तहसील, बीकानेर) – यहाँ जाम्भोजी का समाधि स्थल है। यहाँ फाल्गुन और आश्विन अमावस्या को मेला भरता है।
  2. समराथल धोरा: (बीकानेर) – 1485 ई. में इसी रेतीले टीले (धोक धोरा) पर जाम्भोजी ने विश्नोई सम्प्रदाय का प्रवर्तन किया था।
  3. लालासर: (बीकानेर) – यहाँ जाम्भोजी को निर्वाण (मोक्ष) की प्राप्ति हुई।
  4. रामड़ावास: (पीपाड़, जोधपुर ग्रामीण) – यहाँ जाम्भोजी ने शिष्यों को उपदेश दिए थे।
  5. जाम्भोलाव: (जोधपुर) – यह पुष्कर के समान पवित्र तालाब माना जाता है। इसका निर्माण जैसलमेर के शासक जैत्रसिंह ने करवाया था।
  6. जांगलू (बीकानेर) एवं रोटू (नागौर) – अन्य प्रमुख केंद्र।
  7. सांथरी: जाम्भोजी के उपदेश स्थल ‘सांथरी’ कहलाते हैं।

4. लाल दासी सम्प्रदाय (Lal Dasi Sampraday)

यह सम्प्रदाय हिंदू- मुस्लिम एकता और सांप्रदायिक सद्भाव का प्रतीक है।

  • संस्थापक: संत लालदास जी।
  • जन्म: धोली दूब गाँव (जिला – अलवर)।
  • जाति: मेव (लकड़हारा)।
  • गुरु: गद्दन चिश्ती (मुस्लिम संत)।
  • साधना/ज्ञान प्राप्ति: तिजारा (वर्तमान खैरथल-तिजारा जिला)।
  • प्रधान पीठ: नगला जहाज (जिला – भरतपुर)।
  • समाधि: शेरपुर (अलवर)।

विशेषताएँ

  • यह मेवात क्षेत्र (अलवर-भरतपुर) का सर्वाधिक लोकप्रिय सम्प्रदाय है।
  • इस सम्प्रदाय में दीक्षा लेने की प्रक्रिया अत्यंत कठिन है। शिष्य का अहंकार मिटाने के लिए उसे काला मुंह करके, गधे पर उल्टा बैठाकर गाँव में घुमाया जाता है।
  • ये स्वयं कमाकर खाने (पुरुषार्थ) पर बल देते हैं और भिक्षावृत्ति का विरोध करते हैं।

5. चरणदासी सम्प्रदाय (Charandasi Sampraday)

  • संस्थापक: संत चरणदास जी।
  • जन्म: डेहरा गाँव (जिला – अलवर)।
  • मूल नाम: रणजीत सिंह।
  • प्रधान पीठ: दिल्ली (यह राजस्थान का एकमात्र प्रमुख सम्प्रदाय है जिसकी प्रधान पीठ राज्य से बाहर है)।
  • नियम: इस सम्प्रदाय में 42 नियमों का पालन किया जाता है।
  • भविष्यवाणी: चरणदास जी ने 1739 ई. में नादिर शाह के भारत आक्रमण की सटीक भविष्यवाणी की थी।
  • योग साधना: इस मत में सगुण (कृष्ण भक्ति) और निर्गुण (योग) का समन्वय है।

प्रमुख शिष्याएँ

चरणदास जी की दो विदुषी शिष्याएँ हुईं:

  1. दयाबाई: रचनाएँ – ‘विनय मालिका’, ‘दयाबोध’।
  2. सहजोबाई: रचना – ‘सहज प्रकाश’। (सहजोबाई को ‘मत्स्य संघ की मीरा’ भी कहा जा सकता है)।

6. प्राणनाथी सम्प्रदाय (Prannathi Sampraday)

  • संस्थापक: प्राणनाथ जी।
  • जन्म: जामनगर (गुजरात)।
  • प्रधान पीठ: पन्ना (मध्य प्रदेश)।
  • राजस्थान में पीठ: आदर्श नगर (जयपुर)।
  • पवित्र ग्रंथ: ‘कुलजम स्वरूप’ (या कुलजम संग्रह)। यह ग्रंथ गुजराती मिश्रित हिंदी भाषा में है।
  • इस सम्प्रदाय में मंदिर में मूर्ति के स्थान पर ‘कुलजम स्वरूप’ ग्रंथ की पूजा की जाती है, जिसे कृष्ण का स्वरूप माना जाता है।

7. वैष्णव धर्म/सम्प्रदाय (Vaishnav Sects)

राजस्थान में वैष्णव धर्म की चार प्रमुख शाखाएँ (चतु: सम्प्रदाय) प्रचलित हैं:

(i) वल्लभ सम्प्रदाय / पुष्टि मार्ग

  • संस्थापक: आचार्य वल्लभ।
  • दर्शन: शुद्धाद्वैतवाद (शुद्ध+अद्वैत)।
  • मूल मंत्र: “श्री कृष्णः शरणं मम”।
  • उपासना: भगवान श्रीकृष्ण के बाल रूप की पूजा। दिन में 8 बार (अष्टयाम) पूजा की जाती है।
  • प्रधान पीठ:श्रीनाथ जी का मंदिर, नाथद्वारा (जिला – राजसमंद)।
    • इतिहास: 1669 ई. में औरंगजेब के मंदिर तोड़ो अभियान के समय, दामोदर दास और गोविंद दास जी श्रीनाथ जी की मूर्ति वृंदावन से लेकर मेवाड़ आए। मेवाड़ महाराणा राजसिंह ने 1672 ई. में सिहाड़ (वर्तमान नाथद्वारा) में बनास नदी के किनारे मूर्ति स्थापित करवाई।
  • अष्टछाप कवि मंडली: इसकी स्थापना वल्लभाचार्य के पुत्र विट्ठलनाथ जी ने की थी।
  • कला: ‘पिछवाई कला’ (मंदिर में मूर्ति के पीछे कपड़े पर कृष्ण लीलाओं का चित्रण) और ‘हवेली संगीत’ इसी सम्प्रदाय की देन है। किशनगढ़ शासक सावंत सिंह (नागरीदास) इसी मत के अनुयायी थे।

वल्लभ सम्प्रदाय की 7 प्रमुख पीठें (हवेलियाँ):

  1. श्रीनाथ जी – नाथद्वारा (राजसमंद) – (प्रधान)
  2. विट्ठलनाथ जी – नाथद्वारा (राजसमंद)
  3. द्वारकाधीश जी – कांकरोली (राजसमंद)
  4. गोकुलचन्द्र जी – कामां (डीग/भरतपुर)
  5. मदनमोहन जी – कामां (डीग/भरतपुर)
  6. मथुरेश जी – कोटा (प्रथम पीठ मानी जाती है)
  7. बालकृष्ण जी – सूरत (गुजरात) नोट: एक पीठ (गोकुलनाथ जी) गोकुल (उ.प्र.) में भी है।

(ii) निम्बार्क सम्प्रदाय / हंस / सनकादि सम्प्रदाय

  • संस्थापक: आचार्य निम्बार्क।
  • दर्शन: द्वैताद्वैतवाद (भेदाभेद)।
  • उपासना: राधा-कृष्ण के युगल रूप की पूजा (राधा को कृष्ण की पत्नी मानकर पूजा)।
  • प्रधान पीठ:सलेमाबाद (किशनगढ़, जिला – अजमेर)।
    • इस पीठ की स्थापना 17वीं सदी में आचार्य परशुराम देवाचार्य ने की थी। इसलिए इसे ‘परशुरामपुरी’ भी कहते हैं।
    • यह रूपनगढ़ नदी के किनारे स्थित है।
  • ग्रंथ: परशुराम सागर।
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(iii) रामानुज / रामावत / रामानंदी सम्प्रदाय

  • आदि प्रवर्तक: आचार्य रामानुज (दक्षिण भारत)।
  • उत्तर भारत में प्रवर्तक: स्वामी रामानंद जी (रामानुज के शिष्य)।
  • दर्शन: विशिष्टाद्वैतवाद।
  • उपासना: राम और सीता के युगल रूप की पूजा।
  • राजस्थान में प्रमुख पीठ:गलता जी (जयपुर)
    • संस्थापक: संत कृष्णदास पयहारी (इन्होंने केवल दूध/पय का आहार ग्रहण किया)।
    • गलता जी को ‘उत्तर तोताद्रि’ और ‘मंकी वैली’ (Monkey Valley) भी कहा जाता है।
  • रसिक सम्प्रदाय: कृष्णदास पयहारी के शिष्य अग्रदास जी ने रेवासा (सीकर) में अलग पीठ स्थापित की और राम की भक्ति ‘रसिक नायक’ (कृष्ण की तरह रासलीला करते हुए) के रूप में शुरू की।
  • सवाई जयसिंह के काल में ‘रामरासा’ ग्रंथ (लेखक: भट्ट कलानिधि) लिखा गया।

(iv) गौड़ सम्प्रदाय / ब्रह्म सम्प्रदाय

  • संस्थापक: मध्वाचार्य। (गौड़ीय मत चैतन्य महाप्रभु से भी जुड़ा है)।
  • दर्शन: द्वैतवाद।
  • राजस्थान में विकास: आमेर (जयपुर) के राजा मानसिंह-प्रथम के काल में सर्वाधिक प्रभाव। मानसिंह ने वृंदावन में गोविंद देव जी का मंदिर बनवाया।
  • प्रधान पीठ:गोविंद देव जी मंदिर (सिटी पैलेस, जयपुर)।
    • वर्तमान मंदिर का निर्माण सवाई जयसिंह ने करवाया। जयपुर शासक स्वयं को गोविंद देव जी का दीवान मानते थे।
  • करौली का मदन मोहन जी मंदिर भी इसी सम्प्रदाय का प्रमुख केंद्र है।

8. शैव मत (Shaivism)

भगवान शिव की उपासना करने वाले सम्प्रदाय। इसकी चार मुख्य शाखाएँ हैं:

  1. कापालिक:
    • ये भैरव को शिव का अवतार मानकर पूजा करते हैं।
    • ये श्मशानवासी होते हैं, नर-कपाल (खोपड़ी) में भोजन करते हैं और तांत्रिक क्रियाएं (सुरा-सुन्दरी का सेवन) करते हैं। अघोरी बाबा इसी श्रेणी में आते हैं।
  2. पाशुपत (लकुलीश):
    • प्रवर्तक: दंडधारी लकुलीश।
    • यह शैव मत का सबसे प्राचीन सम्प्रदाय है।
    • प्रमुख मंदिर: एकलिंग जी (कैलाशपुरी, उदयपुर)। मेवाड़ के राणा एकलिंग जी को अपना कुलदेवता मानते थे।
  3. लिंगायत (वीरशैव): दक्षिण भारत में अधिक प्रचलित। शिव की लिंग रूप में पूजा।
  4. काश्मीरक: कश्मीर क्षेत्र में प्रचलित।

9. नाथ सम्प्रदाय (Nath Sampraday)

यह शैव मत का ही एक योग-प्रधान रूप है।

  • संस्थापक: नाथ मुनि।
  • प्रमुख साधु: मत्स्येन्द्रनाथ, गोरखनाथ, जालंधरनाथ, भरथरी, गोपीचंद।
  • राजस्थान में प्रभाव: जोधपुर के महाराजा मानसिंह (सन्यासी राजा) इस सम्प्रदाय के परम भक्त थे।
  • प्रमुख मंदिर: महामंदिर (जोधपुर)। इसका निर्माण मानसिंह ने करवाया। यह 84 खंभों पर निर्मित है।
  • शाखाएँ:
    1. वैराग पंथी: प्रमुख केंद्र – राताडूंगा (पुष्कर, अजमेर)। (भर्तृहरि गुफा)।
    2. माननाथी (मानपंथी): प्रमुख केंद्र – महामंदिर (जोधपुर)। (आयस देवनाथ जी के प्रभाव से स्थापित)।

10. रामस्नेही सम्प्रदाय (Ramsnehi Sampraday)

यह निर्गुण भक्ति की एक शाखा है, जिसमें ‘राम’ नाम का अर्थ दशरथ पुत्र राम न होकर ‘निर्गुण ब्रह्म’ है।

  • विशेषता: मूर्ति पूजा का विरोध। गुरु पूजा पर बल। इनके पूजा स्थल ‘रामद्वारा’ कहलाते हैं।
  • वेशभूषा: साधु गुलाबी रंग के वस्त्र पहनते हैं तथा दाढ़ी-मूँछ नहीं रखते (सिर और चेहरे के बाल मुंडवाते हैं)।
  • महोत्सव: शाहपुरा में होली के अगले दिन ‘फूलडोल महोत्सव’ (Phool Dol Fair) मनाया जाता है।

प्रमुख 4 पीठें (शाखाएँ):

शाखास्थानजिला (नवीन)संस्थापकप्रमुख ग्रंथ/तथ्य
1. शाहपुराशाहपुराशाहपुरासंत रामचरण जीग्रंथ: ‘अणभैवाणी’ (Anbhaivani)। इनका मूल नाम ‘रामकिशन’ था। जन्म: सोडा ग्राम (टोंक)।
2. रेणरेणनागौरसंत दरियाव जीइन्होंने राम शब्द में ‘रा’ से राम और ‘म’ से मुहम्मद का समन्वय बताया।
3. सिंहथलसिंहथलबीकानेरसंत हरिराम दास जीग्रंथ: ‘निशानी’ (इसमें प्राणायाम/योग का उल्लेख है)।
4. खेड़ापाखेड़ापाजोधपुर ग्रामीणसंत रामदास जीये हरिराम दास जी के शिष्य थे।

विशेष: संत किशनदास जी महाराज का रामद्वारा

संत किसनदास जी, संत दरियाव जी (रेण शाखा) के प्रमुख शिष्यों में से एक थे।

  • जन्म: वि.सं. 1746 माघ शुक्ला 5।
  • नवनिर्मित भव्य मंदिर: नागौर (टांकला गांव के पास) में संत किशनदास महाराज का भव्य रामद्वारा बनाया गया है।
  • वास्तुकला: इसमें बंसी पहाड़पुर का वही गुलाबी पत्थर (Sandstone) इस्तेमाल हुआ है जो अक्षरधाम और राम मंदिर अयोध्या में हुआ है।
  • विशेषता: 200 कारीगरों ने 8 वर्ष में इसे बनाया। यह बिना सीमेंट के, पत्थर को पत्थर में फंसाकर (Interlocking) तथा तांबे व सीसे (Lead) का उपयोग करके बनाया गया है। इसमें लोहे की एक भी कील नहीं है।
  • आयाम: 100 फीट लंबा, 50 फीट चौड़ा, 52 फीट ऊंचा। 88 खंभों पर टिका है।
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11. अन्य प्रमुख सम्प्रदाय

राजाराम सम्प्रदाय

  • संस्थापक: संत राजाराम जी।
  • प्रधान पीठ: शिकारपुरा (लूणी, जोधपुर)।
  • योगदान: पटेल समाज में लोकप्रिय। इन्होंने भी विश्नोई समाज की तरह पर्यावरण संरक्षण और वन्य जीवों की रक्षा का संदेश दिया।

नवल सम्प्रदाय

  • संस्थापक: नवल दास जी।
  • जन्म: हसोलाव (नागौर)।
  • प्रधान पीठ: जोधपुर।
  • ग्रंथ: ‘नवलेश्वर अनुभव वाणी’।

अलखिया सम्प्रदाय

  • संस्थापक: स्वामी लालगिरी जी।
  • प्रधान पीठ: बीकानेर।
  • जन्म: सुलखिया (चूरू)।
  • ग्रंथ: ‘अलख स्तुति प्रकाश’।

निरंजनी सम्प्रदाय

  • संस्थापक: संत हरिदास जी।
  • मूल नाम: हरि सिंह सांखला (ये पहले डकैत थे, बाद में संत बने)।
  • उपनाम: ‘कलयुग का वाल्मीकि’
  • जन्म: कापड़ोद (डीडवाना-कुचामन जिला, पूर्व में नागौर)।
  • प्रधान पीठ: गाढ़ा (डीडवाना)।
  • शाखाएँ: 1. निहंग (विरक्त), 2. घरबारी (गृहस्थ)।

निष्कलंक सम्प्रदाय

  • संस्थापक: संत मावजी।
  • जन्म: साबला ग्राम (आसपुर, डूंगरपुर)।
  • अवतार: इन्हें भगवान विष्णु का ‘कल्कि अवतार’ माना जाता है।
  • ज्ञान प्राप्ति: बेणेश्वर धाम (डूंगरपुर)।
  • ग्रंथ: ‘चौपड़ा’ (यह वाद-विवाद शैली में लिखा गया है)। मावजी के चौपड़े केवल दीपावली के दिन बाहर निकाले जाते हैं।
  • भाषा: बागड़ी (भीली)।
  • धाम: बेणेश्वर धाम (सोम-माही-जाखम का संगम), जिसे ‘आदिवासियों का कुंभ’ कहा जाता है।

12. महिला संत एवं कवयित्रियाँ

मीरा बाई (Mira Bai)

  • उपनाम: राजस्थान की राधा।
  • जन्म: 1498 ई., कुड़की ग्राम (वर्तमान में ब्यावर जिला, पूर्व में पाली)।
  • पिता: रतन सिंह राठौड़ (बाजौली के जागीरदार)।
  • दादा: राव दूदा (मेड़ता के शासक)।
  • पति: भोजराज (मेवाड़ के महाराणा सांगा के ज्येष्ठ पुत्र)। विवाह के 7 वर्ष बाद पति का निधन हो गया।
  • भक्ति: दास्य और माधुर्य भाव (कृष्ण को पति मानकर)।
  • गुरु: संत रैदास (चमार जाति के संत)।
  • अंतिम समय: गुजरात के द्वारका स्थित रणछोड़ राय मंदिर में। किंवदंती है कि वे मूर्ति में समा गई थीं।
  • प्रमुख मंदिर:
    1. चारभुजा नाथ/मीरा मंदिर – मेड़ता सिटी (नागौर)।
    2. मीरा मंदिर – चित्तौड़गढ़ दुर्ग (इंडो-आर्य शैली)। इस मंदिर के सामने उनके गुरु रैदास की छतरी है।
    3. जगत शिरोमणि मंदिर (आमेर, जयपुर) – यहाँ वही कृष्ण मूर्ति है जिसकी मीरा बचपन में पूजा करती थीं।
  • साहित्य: ‘मीरा पदावलियाँ’, ‘रुक्मणी मंगल’, ‘सत्यभामा जी रो रूसणो’।
    • ‘नरसी जी रो मायरो’ (रचना: रत्ना खाती, निर्देशन: मीरा बाई)।

गवरी बाई (Gavri Bai)

  • उपनाम: ‘बागड़ की मीरा’
  • क्षेत्र: डूंगरपुर-बांसवाड़ा।
  • मंदिर: डूंगरपुर महारावल शिवसिंह ने इनके लिए ‘बालमुकुंद मंदिर’ बनवाया।

राणाबाई

  • उपनाम: ‘राजस्थान की दूसरी मीरा’
  • स्थान: हरनावा (परबतसर, डीडवाना-कुचामन जिला)।
  • विशेष: यह एकमात्र महिला संत हैं जो कुंवारी सती हुई थीं।

13. अन्य महत्वपूर्ण लोक संत

संत धन्ना

  • जन्म: धुंवन गाँव (टोंक)।
  • जाति: जाट।
  • गुरु: रामानंद जी।
  • महत्व: राजस्थान में भक्ति आंदोलन का प्रारम्भ करने का श्रेय संत धन्ना और पीपा को जाता है। मान्यता है कि भगवान ने हठपूर्वक इनके हाथ से भोजन ग्रहण किया था।

संत पीपा

  • मूल नाम: प्रताप सिंह (गागरोन के शासक)।
  • जन्म: गागरोन दुर्ग (झालावाड़)।
  • पिता: कडावाराव खींची।
  • गुरु: रामानंद जी।
  • समाज: दर्जी समुदाय के आराध्य देव।
  • प्रमुख स्थल:
    1. छतरी: गागरोन दुर्ग (झालावाड़)।
    2. गुफा: टोडा (टोंक) – यहीं इन्हें ज्ञान प्राप्त हुआ।
    3. भव्य मंदिर: समदड़ी (वर्तमान बालोतरा जिला, पूर्व में बाड़मेर)।

संत रैदास (रविदास)

  • बनारस के निवासी और रामानंद जी के शिष्य।
  • जाति प्रथा और छुआछूत का विरोध किया।
  • चित्तौड़गढ़ दुर्ग में इनकी छतरी स्थित है (मीरा मंदिर के सामने)।

भक्त कवि दुर्लभ

  • उपनाम: ‘राजस्थान का नृसिंह’
  • कार्य क्षेत्र: बागड़ (डूंगरपुर-बांसवाड़ा)।
  • ये कृष्ण भक्ति धारा के संत थे।

संत खेताराम जी

  • कार्य: समाज सुधार और ब्रह्मा जी के मंदिर का निर्माण।
  • मंदिर: आसोतरा (वर्तमान बालोतरा जिला)। यह विश्व का दूसरा प्रमुख ब्रह्मा मंदिर है (पुष्कर के बाद) जहाँ विधिवत पूजा होती है और साथ में सावित्री जी की मूर्ति भी है।

सारांश

अध्ययन की सुगमता के लिए संतों को निम्न वर्गों में रखा जा सकता है:

  1. सगुण भक्ति धारा: (मूर्ति पूजा, अवतारवाद में विश्वास)
    • वैष्णव मत (रामानुज, वल्लभ, निम्बार्क, गौड़), मीरा दासी, गवरी बाई, भक्त कवि दुर्लभ।
  2. निर्गुण भक्ति धारा: (निराकार ईश्वर, मूर्ति पूजा का विरोध)
    • जसनाथी, दादू पंथ, विश्नोई, रामस्नेही, लालदासी, कबीरपंथी, निरंजनी, राजाराम, अलखिया।
  3. मिश्रित भक्ति (सगुण + निर्गुण):
    • चरणदासी सम्प्रदाय।
    • निष्कंलक सम्प्रदाय (संत मावजी)।
    • हरि सिंह सांखला (निरंजनी – प्रारंभिक जीवन में सगुण, बाद में निर्गुण)।
राजस्थान की कला और संस्कृति में कई प्रमुख संत और संप्रदाय शामिल हैं, जो भक्ति, सामाजिक समानता और आध्यात्मिक ज्ञान के संदेशों से समृद्ध हैं, जिनमें रामानंदी, वल्लभ, रामस्नेही, जसनाथी, विश्नोई, निम्बार्क, दादू पंथ, और लालदासी संप्रदाय प्रमुख हैं, जिन्होंने संत मीराबाई, संत धन्ना, संत पीपा, संत जाम्भोजी, संत जसनाथ, और संत दादू दयाल जैसे महान संतों के माध्यम से समाज को दिशा दी
राजस्थान की कला एवं संस्कृति: प्रमुख संत एवं सम्प्रदाय
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