चौहान वंश की शाखाएं: रणथम्भौर, जालौर, नाडोल, सिरोही और हाड़ौती
1192 ई. में तराइन के द्वितीय युद्ध में पृथ्वीराज चौहान तृतीय की पराजय का मतलब चौहान वंश का अंत नहीं था। यही वह बिंदु है जहाँ अधिकतर विद्यार्थी भ्रमित हो जाते हैं — मानो एक युद्ध हारते ही पूरा वंश इतिहास के पन्नों से गायब हो गया। असल कहानी इससे बिल्कुल अलग है। अगले लगभग सौ वर्षों तक चौहानों की अलग-अलग शाखाएँ रणथम्भौर, जालौर, नाडोल, सिरोही और हाड़ौती में स्वतंत्र सत्ताओं के रूप में टिकी रहीं, और इनमें से कुछ शाखाएँ — जैसे बूँदी और कोटा — तो 1947 तक चलती रहीं। इस भाग में हम इन सभी शाखाओं को क्रमशः समझेंगे।
🏰 1. रणथम्भौर के चौहान — हम्मीरदेव और राजस्थान का प्रथम साका
तराइन की पराजय के बाद पृथ्वीराज तृतीय के पुत्र गोविंदराज ने कुछ समय बाद रणथम्भौर में चौहान वंश का स्वतंत्र शासन स्थापित किया। यह कोई शांत उत्तराधिकार नहीं था — उनके उत्तराधिकारी वल्हण को दिल्ली सुल्तान इल्तुतमिश ने पराजित कर दुर्ग पर अधिकार कर लिया था। इसी वंश के शासक वाग्भट्ट ने पुनः दुर्ग पर कब्जा कर चौहान शासन फिर से स्थापित किया।
रणथम्भौर के सबसे प्रतापी और अंतिम शासक हम्मीरदेव चौहान थे। उन्होंने दिग्विजय की नीति अपनाते हुए अपने राज्य का चारों दिशाओं में विस्तार किया। अपने जीवन में उन्होंने कुल सत्रह युद्ध लड़े, जिनमें से सोलह में उन्हें विजय मिली — यह आँकड़ा अकेला बताता है कि हम्मीरदेव कितने कुशल योद्धा थे।
टकराव की शुरुआत तब हुई जब हम्मीरदेव ने अलाउद्दीन खिलजी के विद्रोही सैनिक नेता मुहम्मदशाह को अपने यहाँ शरण दे दी। दिल्ली के सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी ने इसे अपनी सत्ता के लिए चुनौती माना और रणथम्भौर पर आक्रमण कर दिया। दीर्घ घेरे और अंतिम भीषण युद्ध के बाद 1301 ई. में हम्मीरदेव की पराजय हुई। उनकी पत्नी रंगदेवी ने दुर्ग की अन्य राजपूत स्त्रियों के साथ जल जौहर किया, और सभी राजपूत योद्धा युद्धभूमि में मारे गए। 11 जुलाई 1301 को दुर्ग पर अलाउद्दीन खिलजी का अधिकार हो गया।
🔑 परीक्षा बिंदु: इसी युद्ध को राजस्थान का पहला साका माना जाता है। इस अभियान में कवि अमीर खुसरो स्वयं अलाउद्दीन की सेना के साथ उपस्थित था, जिससे हमें समकालीन विवरण मिलता है।
हम्मीरदेव ने पंडित विश्वभट्ट (विश्वरूप) के नेतृत्व में ‘कोटी यजन यज्ञ’ भी करवाया था — यह दिखाता है कि सैन्य अभियानों के बीच भी धार्मिक-सांस्कृतिक गतिविधियाँ जारी रहीं। साहित्यिक दृष्टि से नयनचन्द्र सूरी ने अपने ग्रन्थ ‘हम्मीर महाकाव्य’ में हम्मीरदेव की दिग्विजयों का वर्णन किया है, जबकि चन्द्रशेखर ने अपने ग्रन्थ ‘हम्मीरहठ’ में एक दिलचस्प प्रसंग दर्ज किया है — मुहम्मदशाह और अलाउद्दीन खिलजी की मराठा रानी चिमना ने मिलकर सुल्तान की हत्या का षड्यंत्र रचा था, और जब यह षड्यंत्र विफल हुआ तो मुहम्मदशाह भागकर हम्मीरदेव की शरण में आ गया।
| बिंदु | विवरण |
|---|---|
| वंश संस्थापक (रणथम्भौर शाखा) | गोविंदराज (पृथ्वीराज तृतीय के पुत्र) |
| पुनर्स्थापक | वाग्भट्ट (इल्तुतमिश से दुर्ग पुनः जीता) |
| अंतिम/सर्वाधिक प्रतापी शासक | हम्मीरदेव चौहान |
| कुल युद्ध / विजय | 17 युद्ध, 16 में विजय |
| पतन | 1301 ई., अलाउद्दीन खिलजी द्वारा |
| पत्नी का जौहर | रंगदेवी |
| साहित्यिक स्रोत | हम्मीर महाकाव्य (नयनचन्द्र सूरी), हम्मीरहठ (चन्द्रशेखर) |
⚠️ परीक्षा सावधानी: रणथम्भौर के साके (1301) और चित्तौड़ के साकों को छात्र अक्सर मिला देते हैं। याद रखें — रणथम्भौर का साका सबसे पहला है, चित्तौड़ के दो साके (1303 और 1568) इसके बाद की घटनाएँ हैं।
💡 अनुभवी टिप्पणी: हम्मीरदेव की कथा केवल वीरता की नहीं, बल्कि शरणागत-धर्म की भी है — उन्होंने एक शरणागत को सुल्तान को सौंपने से इनकार किया, चाहे इसकी कीमत उनके पूरे राज्य के विनाश के रूप में चुकानी पड़ी। यह राजपूत आचार-संहिता का एक चरम उदाहरण है, जिसे परीक्षा के विश्लेषणात्मक प्रश्नों में अक्सर उद्धृत किया जाता है।
🏰 2. जालौर के चौहान — सोनगरा वंश और कान्हड़देव का बलिदान
जालौर दिल्ली से गुजरात और मालवा जाने के मार्ग पर स्थित था, इसलिए इसका सामरिक महत्व हमेशा बना रहा। जालौर का प्राचीन नाम जाबालीपुर या जालहुर था, और यहाँ के किले को सुवर्णगिरी कहा जाता है। प्रतिहार शासनकाल (8वीं से 11वीं सदी के प्रारम्भ तक) में यह एक समृद्ध नगर था — प्रतिहार नरेश नागभट्ट प्रथम ने तो जालौर को अपनी राजधानी ही बना लिया था, और सम्भवतः जालौर दुर्ग का निर्माण भी उन्होंने ही करवाया।
प्रतिहारों की शक्ति क्षीण होने के बाद इस प्रदेश पर परमारों का शासन स्थापित हुआ, लेकिन 13वीं सदी में नाडोल शाखा के कीर्तिपाल चौहान ने परमारों को पराजित कर यहाँ सोनगरा चौहान वंश की स्थापना की। सुण्डा पर्वत अभिलेख में उन्हें ‘राजेश्वर’ कहा गया है।
कीर्तिपाल के उत्तराधिकारी समरसिंह ने जालौर दुर्ग को और सुदृढ़ बनाया। वे एक कुशल कूटनीतिज्ञ भी थे — उन्होंने गुजरात के शक्तिशाली चालुक्य शासक भीमदेव द्वितीय के साथ अपनी पुत्री लीलादेवी का विवाह करवाकर उसे अपना मित्र व संबंधी बना लिया। समरसिंह के पुत्र उदयसिंह सोनगरा शासकों में सबसे शक्तिशाली थे — उन्होंने दिल्ली सुल्तान इल्तुतमिश के आक्रमण को असफल कर उसे वापस लौटने को मजबूर किया।
सन् 1305 में जालौर के शासक बने कान्हड़देव चौहान। अलाउद्दीन खिलजी ने जालौर पर अधिकार करने की योजना बनाई। जालौर के मार्ग में पहले सिवाना का दुर्ग पड़ता था, इसलिए 1308 ई. में अलाउद्दीन ने पहले सिवाना दुर्ग पर आक्रमण कर उसे जीत लिया, उसका नाम खैराबाद रख दिया और कमालुद्दीन गुर्ग को वहाँ का दुर्ग-रक्षक नियुक्त किया। इस युद्ध में वीर सातल और सोम वीरगति को प्राप्त हुए।
सन् 1311 ई. में अलाउद्दीन ने जालौर दुर्ग पर आक्रमण किया। कई दिनों के घेरे के बाद हुए अंतिम युद्ध में अलाउद्दीन की विजय हुई और सभी राजपूत शहीद हुए — वीर कान्हड़देव सोनगरा और उनके पुत्र वीरमदेव युद्ध करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। विजय के बाद अलाउद्दीन ने जालौर में एक मस्जिद का निर्माण करवाया। इस युद्ध की जानकारी पद्मनाभ के ग्रन्थ ‘कान्हड़दे प्रबन्ध’ तथा ‘वीरमदेव सोनगरा की वात’ में मिलती है।
| शासक | प्रमुख कार्य |
|---|---|
| कीर्तिपाल चौहान | सोनगरा वंश की स्थापना, परमारों को पराजित किया, ‘राजेश्वर’ उपाधि |
| समरसिंह | दुर्ग सुदृढ़ीकरण, पुत्री लीलादेवी का विवाह भीमदेव द्वितीय से |
| उदयसिंह | इल्तुतमिश के आक्रमण को असफल किया |
| कान्हड़देव चौहान | 1305 ई. में सत्तारूढ़, 1311 ई. में अलाउद्दीन के विरुद्ध वीरगति |
💡 परीक्षा ट्रिक: जालौर पतन का क्रम — पहले “सिवाना” (1308, रास्ते का दुर्ग) फिर “जालौर” (1311, मुख्य दुर्ग)। याद रखें: “सिवाना पहले गिरा, जालौर बाद में” — यही क्रम MCQ में सबसे ज्यादा पूछा जाता है।
⚠️ परीक्षा सावधानी: रणथम्भौर (1301) और जालौर (1311) दोनों ही अलाउद्दीन खिलजी से जुड़े पतन हैं, परन्तु दोनों की तिथियाँ और शासक अलग-अलग हैं। हम्मीरदेव-रणथम्भौर-1301 और कान्हड़देव-जालौर-1311 — इन्हें कभी आपस में न बदलें।
🏯 3. नाडोल के चौहान — सबसे प्राचीन शाखा
चौहानों की इस शाखा के संस्थापक शाकम्भरी नरेश वाक्पति के पुत्र लक्ष्मण चौहान थे, जिन्होंने लगभग 960 ई. में चावड़ा राजपूतों के आधिपत्य से स्वयं को स्वतंत्र कर चौहान वंश का शासन स्थापित किया। शाकम्भरी के मूल चौहान राज्य के बाद यह पहला अलग चौहान राज्य था — इसी कारण इसे चौहानों की सबसे प्राचीन शाखा कहा जाता है।
नाडोल शाखा के कीर्तिपाल चौहान ने 1177 ई. के लगभग मेवाड़ शासक सामन्तसिंह को पराजित कर मेवाड़ को भी अपने अधीन कर लिया था — यह दर्शाता है कि नाडोल के चौहान केवल स्थानीय सत्ता नहीं, बल्कि एक समय क्षेत्रीय शक्ति केंद्र भी थे। 1205 ई. के लगभग नाडोल के चौहान जालौर की सोनगरा चौहान शाखा में विलीन हो गए, और इस तरह एक स्वतंत्र राजनीतिक इकाई के रूप में नाडोल का अस्तित्व समाप्त हो गया।
🔑 परीक्षा बिंदु: नाडोल शाखा संस्थापक — लक्ष्मण चौहान (~960 ई.); नाडोल का जालौर में विलय — ~1205 ई. इन दो तिथियों को आगे-पीछे न करें।
🛕 4. सिरोही के चौहान — देवड़ा शाखा और दत्ताणी का युद्ध
सिरोही में चौहानों की देवड़ा शाखा का शासन था, जिसकी स्थापना लगभग 1311 ई. में लुम्बा ने की थी। इनकी प्रारम्भिक राजधानी चन्द्रावती थी। बार-बार होने वाले मुस्लिम आक्रमणों के कारण इस वंश के सहासमल ने 1425 ई. में सिरोही नगर की स्थापना कर इसे अपनी नई राजधानी बनाया। इसी काल में महाराणा कुंभा ने सिरोही को मेवाड़ के अधीन कर लिया था।
सिरोही के इतिहास की सबसे चर्चित घटना है दत्ताणी का युद्ध (1583 ई.)। इसमें सिरोही महाराव सुरताण ने अकबर की भेजी शाही सेना को पराजित किया। अकबर ने इस अभियान में मेवाड़ के जगमाल (महाराणा प्रताप के भाई) और मारवाड़-बीकानेर के रायसिंह को भेजा था — यानी सिरोही की एक छोटी सेना ने मुगल समर्थित बड़ी सेना को परास्त कर दिया, जिसमें स्वयं राजपूत सरदार मुगल पक्ष से लड़ रहे थे।
1823 ई. में यहाँ के शासक शिवसिंह ने ईस्ट इंडिया कम्पनी से संधि कर राज्य की सुरक्षा का जिम्मा उसे सौंप दिया। स्वतंत्रता के बाद सिरोही राज्य जनवरी 1950 में राजस्थान में मिला दिया गया।
⚠️ परीक्षा सावधानी: दत्ताणी युद्ध (1583) में जगमाल और रायसिंह “अकबर की ओर से” लड़े थे, “सिरोही की ओर से” नहीं — यह दिशा अक्सर उलट कर पूछी जाती है।
⚔️ 5. हाड़ौती के चौहान — बूँदी की स्थापना
हाड़ौती क्षेत्र के अंतर्गत वर्तमान बूँदी, कोटा, झालावाड़ और बारां आते हैं। महाभारत काल से ही इस क्षेत्र में मत्स्य (मीणा) जाति का निवास रहा है, और मध्यकाल में यहाँ मीणा जाति का ही शासन स्थापित था। प्रारम्भ में यह सम्पूर्ण क्षेत्र केवल बूँदी के नाम से जाना जाता था।
1241 ई. में हाड़ा चौहान देवा ने — जो नाडोल के चौहानों के वंशज थे — मीणा शासक जैता को पराजित कर इस क्षेत्र में चौहान वंश का शासन स्थापित किया। बूँदी का नाम यहाँ के शासक बूँदा मीणा के नाम पर पड़ा।
आगे चलकर मेवाड़ नरेश क्षेत्रसिंह ने आक्रमण कर बूँदी को अपने अधीन कर लिया, और तब से बूँदी का शासन मेवाड़ के अधीन चलता रहा। 1569 ई. में यहाँ के शासक सुरजन सिंह ने अकबर से संधि कर मुगल अधीनता स्वीकार कर ली — इसी के साथ बूँदी मेवाड़ की अधीनता से मुक्त हो गया।
1631 ई. में मुगल बादशाह शाहजहाँ ने कोटा को बूँदी से स्वतंत्र कर दिया (इसकी पूरी कहानी अगले भाग में)। मुगल बादशाह फर्रुखशियर के समय बूँदी नरेश बुद्धसिंह जयपुर नरेश जयसिंह के विरुद्ध अभियान पर नहीं गए, जिसके दण्डस्वरूप बूँदी राज्य का नाम बदलकर फर्रुखाबाद कर उसे कोटा नरेश को दे दिया गया, परन्तु कुछ समय बाद बुद्धसिंह को बूँदी का राज्य पुनः वापस मिल गया। इसके बाद बूँदी के उत्तराधिकार को लेकर बार-बार युद्ध होते रहे, जिनमें मराठे, जयपुर नरेश सवाई जयसिंह और कोटा की दखलंदाजी रही।
राजस्थान में मराठों का सर्वप्रथम प्रवेश बूँदी में ही हुआ — 1734 ई. में बुद्धसिंह की कछवाही रानी आनन्द (अमर) कुँवरी ने अपने पुत्र उम्मेदसिंह के पक्ष में मराठा सरदार होल्कर और राणोजी को आमंत्रित किया था।
1818 ई. में बूँदी के शासक विष्णुसिंह ने मराठों से सुरक्षा हेतु ईस्ट इंडिया कम्पनी से संधि कर ली, जिसके बाद बूँदी की सुरक्षा का भार अंग्रेजी सेना पर आ गया। देश की स्वाधीनता के बाद बूँदी का राजस्थान संघ में विलय हो गया।
💡 परीक्षा ट्रिक: “देवा-1241-जैता” — देवा हाड़ा ने 1241 ई. में मीणा शासक जैता को हराकर बूँदी में चौहान शासन शुरू किया, और नगर का नाम मीणा शासक बूँदा के नाम पर ही पड़ा — विजेता और जिसके नाम पर शहर बना, ये दो अलग व्यक्ति हैं, मिलाएं नहीं।
🏯 6. कोटा के चौहान — बूँदी से पृथक रियासत
कोटा प्रारम्भ में बूँदी रियासत का ही एक भाग था, और यहाँ भी हाड़ा चौहानों का शासन था। यह क्षेत्र पहले कोटिया भील के नियंत्रण में था, जिसे बूँदी के संस्थापक देवा के पौत्र जैत्रसिंह ने मार कर अपने अधिकार में किया — कोटिया भील के नाम पर ही इस क्षेत्र का नाम कोटा पड़ा।
1631 ई. में शाहजहाँ ने बूँदी नरेश राव रतनसिंह के पुत्र माधोसिंह को कोटा का पृथक राज्य देकर उसे बूँदी से स्वतंत्र कर दिया। तभी से कोटा एक स्वतंत्र रियासत के रूप में अस्तित्व में आया।
कोटा के बाद के शासकों की कहानी बारी-बारी से देखें तो कई दिलचस्प मोड़ मिलते हैं:
| शासक (काल) | प्रमुख कार्य/घटना |
|---|---|
| मुकुन्द सिंह हाड़ा (1648-1658 ई.) | अबली मीणी महल का निर्माण (दर्रा अभ्यारण्य में, इसे ‘हाड़ौती का ताजमहल’ कहा जाता है); 1658 में धरमत के युद्ध में औरंगजेब के विरुद्ध शाही सेना की ओर से लड़ते हुए वीरगति |
| किशोर सिंह | कोटा के किशोर सागर तालाब का निर्माण |
| रामसिंह प्रथम (1696-1707 ई.) | औरंगजेब के पुत्रों के उत्तराधिकार युद्ध में आजम का साथ दिया, जाजऊ के युद्ध में लड़ते हुए मारे गए |
| भीम सिंह प्रथम (1707-1720 ई.) | वल्लभ सम्प्रदाय अनुयायी; बहादुरशाह प्रथम ने ‘महाराव’ की उपाधि दी; खींची शासकों से गागरोन छीना; फर्रुखसियर के कहने पर बूँदी पर आक्रमण कर बुद्धसिंह को हराया व बूँदी का नाम फर्रुखाबाद रखा; बाद में राज-पाट त्यागकर भक्ति-मार्ग अपनाया, स्वयं का नाम ‘कृष्णदास’ और कोटा का नाम ‘नन्दगाँव’ रखा; बारां में सांवरिया जी के मंदिर का निर्माण करवाया |
| दुर्जनशाल हाड़ा | इनके समय कोटा रियासत में सर्वप्रथम मराठों का प्रवेश हुआ |
| शत्रुशाल | इनके फौजदार झाला जालिमसिंह ने 1761 ई. में भटवाड़ा के युद्ध में जयपुर नरेश माधोसिंह की सेना को पराजित किया |
भीम सिंह प्रथम को कोटा रियासत का सबसे प्रभावशाली शासक माना जाता है, और उनके जीवन का धार्मिक मोड़ इस बात का उदाहरण है कि मध्यकालीन राजपूत शासकों के लिए सत्ता और भक्ति के बीच चयन कोई असामान्य बात नहीं थी।
भटवाड़ा की विजय के बाद कोटा के प्रशासन में झाला जालिमसिंह का प्रभाव लगातार बढ़ता गया, और अंततः वे ही कोटा राज्य के वास्तविक प्रशासक बन गए — महाराव नाम के लिए शासक रहे, पर सत्ता दीवान के हाथ में आ गई।
उम्मेदसिंह के समय 1817 ई. में अंग्रेजों से पूरक संधि हुई, जिसकी शर्तें ध्यान से समझनी चाहिए:
पूरक संधि (1817) की शर्तें:
→ उम्मेदसिंह व उनके वंशज कोटा के राजा (महाराव) बने रहेंगे
→ झाला जालिमसिंह व उनके वंशज कोटा के दीवान बने रहेंगे
→ कोटा की सभी वास्तविक शक्तियाँ दीवान (झाला परिवार) के पास रहेंगीकिशोर सिंह के समय 1821 ई. में मांगरोल का युद्ध हुआ, जिसमें झाला जालिमसिंह ने मांगरोल नगर में स्वयं राजा किशोर सिंह से मुकाबला किया — इस आंतरिक संघर्ष में महाराव की हार और जालिमसिंह की जीत हुई। इस युद्ध में जेम्स टॉड ने जालिमसिंह झाला का साथ दिया था।
झाला जालिमसिंह (1769-1823 ई.) को कोटा राज्य का ‘वीर दुर्गादास राठौड़’ कहा जाता है — दोनों ही अपने स्वामी राज्य को संकट में बचाने वाले प्रशासक रहे। मराठों, अंग्रेजों और पिंडारियों से अच्छे संबंध होने के कारण कोटा इन तीनों खतरों से अपेक्षाकृत सुरक्षित रहा। दिसम्बर 1817 ई. में जालिमसिंह झाला ने कोटा की ओर से ईस्ट इंडिया कम्पनी से संधि कर ली।
रामसिंह के समय 1838 ई. में जालिमसिंह झाला के पौत्र महारावल झाला मदनसिंह — जो कोटा के दीवान-फौजदार थे — को कोटा से अलग कर ‘झालावाड़’ का स्वतंत्र राज्य दे दिया गया। यह राजस्थान में अंग्रेजों द्वारा बनाई गई आखिरी रियासत थी।
1947 में देश के स्वतंत्र होने के बाद मार्च 1948 में कोटा का राजस्थान संघ में विलय हो गया, और कोटा महाराव भीमसिंह इसके राजप्रमुख बने।
🔑 परीक्षा बिंदु: कोटा का दीवान-शासन मॉडल याद रखें — “राजा महाराव, सत्ता दीवान के पास” — 1817 की पूरक संधि में यह स्पष्ट रूप से लिखा गया।
💡 अनुभवी टिप्पणी: भीमसिंह प्रथम की कहानी — सत्ता से भक्ति की ओर मोड़ — और झाला जालिमसिंह की कहानी — दीवान से वास्तविक शासक बनने की ओर — एक ही रियासत के भीतर सत्ता के दो बिलकुल विपरीत प्रवाह दिखाती हैं। परीक्षा में अक्सर “कोटा में वास्तविक सत्ता किसके हाथ में थी” जैसे विश्लेषणात्मक प्रश्न इसी विरोधाभास पर आधारित होते हैं।
🏛️ 7. झालावाड़ — हाड़ौती में चौहान शाखा या अपवाद?
झाला जालिमसिंह के पौत्र मदनसिंह झाला ने 1837 ई. में कोटा से अलग होकर झालावाड़ रियासत की स्थापना की, और 1838 ई. में अंग्रेजों ने इसे मान्यता दे दी। झालावाड़ राजस्थान की सबसे नई रियासत थी, और इसकी राजधानी झालरापाटन (चन्द्रभागा नदी के किनारे) बनाई गई। झालरापाटन को ‘घण्टियों का शहर’ कहा जाता है। यहाँ का शीतलेश्वर महादेव मंदिर राजस्थान में सबसे प्राचीन दिनांकित (689 ई.) मंदिर माना जाता है।
बाद में राजेन्द्र सिंह ने झालावाड़ में काष्ठ प्रासाद (लकड़ी से निर्मित भवन) का निर्माण करवाया और समाज सुधार के कई कार्य किए — उन्होंने झालावाड़ के मंदिर सभी जातियों के लिए खुलवा दिए, जो उस काल के लिए एक उल्लेखनीय सामाजिक कदम था।
⚠️ परीक्षा सावधानी: यह बिंदु बार-बार गलत पूछा और गलत उत्तर दिया जाता है — झालावाड़ का शासक वंश झाला है, चौहान नहीं। झाला परिवार मूलतः कोटा के हाड़ा चौहान शासकों के फौजदार और दीवान थे, जिन्होंने धीरे-धीरे वास्तविक सत्ता हासिल कर ली और अंत में स्वतंत्र शासक बन गए। भौगोलिक रूप से झालावाड़ हाड़ौती क्षेत्र का हिस्सा है, इसलिए इसका उल्लेख चौहान-वंश की कहानी के साथ होता है, पर वंशानुक्रम की दृष्टि से इसे चौहान शाखा कहना तथ्यात्मक रूप से गलत होगा।
❓ PYQ — परीक्षा में पूछे गए प्रश्न
RPSC RAS Pre — 2018 (पैटर्न आधारित)
Q. राजस्थान के प्रथम साके के रूप में किस घटना को जाना जाता है?
- (A) चित्तौड़ का प्रथम साका (1303)
- (B) रणथम्भौर का पतन (1301) ✓
- (C) चित्तौड़ का द्वितीय साका (1568)
- (D) जालौर का पतन (1311)
व्याख्या: हम्मीरदेव चौहान की पराजय और रानी रंगदेवी के जौहर के साथ रणथम्भौर का पतन (1301 ई.) राजस्थान का प्रथम साका माना जाता है।
Rajasthan SI — 2021 (पैटर्न आधारित)
Q. जालौर के सोनगरा चौहान वंश की स्थापना किसने की?
- (A) समरसिंह
- (B) कीर्तिपाल चौहान ✓
- (C) उदयसिंह
- (D) कान्हड़देव
व्याख्या: नाडोल शाखा के कीर्तिपाल चौहान ने परमारों को पराजित कर जालौर में सोनगरा चौहान वंश की स्थापना की।
Patwari — 2022 (पैटर्न आधारित)
Q. कान्हड़देव सोनगरा और उनके पुत्र वीरमदेव की वीरगति किस वर्ष हुई?
- (A) 1301
- (B) 1308
- (C) 1311 ✓
- (D) 1318
व्याख्या: 1311 ई. में अलाउद्दीन खिलजी ने जालौर पर अधिकार किया, जिस युद्ध में कान्हड़देव और वीरमदेव वीरगति को प्राप्त हुए।
RPSC RAS Pre — 2016 (पैटर्न आधारित)
Q. चौहानों की सबसे प्राचीन शाखा कौन-सी मानी जाती है?
- (A) रणथम्भौर के चौहान
- (B) जालौर के सोनगरा चौहान
- (C) नाडोल के चौहान ✓
- (D) सिरोही के देवड़ा चौहान
व्याख्या: नाडोल शाखा की स्थापना लक्ष्मण चौहान ने लगभग 960 ई. में की थी, जो शाकम्भरी के मूल चौहान राज्य के बाद चौहानों का पहला अलग राज्य था।
Rajasthan SI — 2023 (पैटर्न आधारित)
Q. दत्ताणी का युद्ध (1583 ई.) किसके मध्य लड़ा गया?
- (A) सिरोही महाराव सुरताण और अकबर की सेना ✓
- (B) मेवाड़ और गुजरात के चालुक्य
- (C) कोटा और जयपुर
- (D) बूँदी और मेवाड़
व्याख्या: दत्ताणी के युद्ध में सिरोही महाराव सुरताण ने अकबर की भेजी सेना को पराजित किया, जिसमें मेवाड़ के जगमाल और बीकानेर के रायसिंह अकबर की ओर से लड़े थे।
Patwari / REET (पैटर्न आधारित)
Q. बूँदी का नाम किसके नाम पर पड़ा?
- (A) देवा हाड़ा
- (B) बूँदा मीणा ✓
- (C) जैता मीणा
- (D) क्षेत्रसिंह
व्याख्या: 1241 ई. में देवा हाड़ा ने मीणा शासक जैता को हराकर बूँदी में चौहान शासन स्थापित किया, परन्तु नगर का नाम स्थानीय शासक बूँदा मीणा के नाम पर पड़ा।
RPSC RAS Pre — 2019 (पैटर्न आधारित)
Q. कोटा को बूँदी से पृथक कर स्वतंत्र राज्य कब बनाया गया?
- (A) 1569 ई.
- (B) 1631 ई. ✓
- (C) 1707 ई.
- (D) 1817 ई.
व्याख्या: 1631 ई. में मुगल बादशाह शाहजहाँ ने बूँदी नरेश के पुत्र माधोसिंह को कोटा का पृथक राज्य देकर उसे स्वतंत्र किया।
RPSC RAS Mains पैटर्न (विश्लेषणात्मक)
Q. कोटा रियासत में झाला जालिमसिंह की भूमिका का मूल्यांकन करें।
संकेत बिंदु: भटवाड़ा का युद्ध (1761) → फौजदार से दीवान → 1817 की पूरक संधि (राजा महाराव, सत्ता दीवान के पास) → मराठा-अंग्रेज-पिंडारी संबंध → ‘कोटा का दुर्गादास राठौड़’ उपनाम → झालावाड़ रियासत की नींव (पौत्र मदनसिंह के माध्यम से)।
Match the Column (RPSC पैटर्न)
सूची-I (रियासत) | सूची-II (पृथक्करण वर्ष/घटना)
(A) कोटा | (1) 1631 ई. - बूँदी से पृथक
(B) झालावाड़ | (2) 1837-38 ई. - कोटा से पृथक
(C) सिरोही | (3) 1311 ई. - सोनगरा चौहान का पतन (जालौर तुलना हेतु)
(D) रणथम्भौर | (4) 1301 ई. - प्रथम साका
उत्तर: A-1, B-2, D-4 (जालौर अलग रियासत के रूप में C से न जोड़ें — सिरोही का संबंध दत्ताणी युद्ध 1583 से है, यही इस प्रश्न की मुख्य परीक्षा-चुनौती है)⚠️ परीक्षा सावधानी: Match the Column प्रश्नों में रियासतों के पृथक्करण और पतन की घटनाओं को मिलाना सबसे सामान्य गलती है। हमेशा पहले यह तय करें कि प्रश्न “पतन” (जैसे रणथम्भौर 1301, जालौर 1311) के बारे में है या “पृथक्करण/स्थापना” (जैसे कोटा 1631, झालावाड़ 1837-38) के बारे में।
🗝️ Part 2 — स्मरणीय संकेत (Memory Tricks)
| विषय | ट्रिक |
|---|---|
| रणथम्भौर का प्रथम साका | “रण-1301-रंग” = रणथम्भौर + वर्ष 1301 + रानी रंगदेवी का जौहर |
| जालौर पतन का क्रम | “सिवाना पहले (1308), जालौर बाद में (1311)” |
| नाडोल शाखा | “लक्ष्मण-960-स्वतंत्र” = लक्ष्मण चौहान, ~960 ई., चावड़ों से स्वतंत्र |
| सिरोही-दत्ताणी | “सुरताण जीता, जगमाल-रायसिंह अकबर की ओर से हारे” |
| बूँदी संस्थापक vs नामकरण | “देवा ने जीता, बूँदा के नाम पर शहर बना” — विजेता और नामकर्ता अलग व्यक्ति |
| कोटा पृथक्करण | “1631-शाहजहाँ-माधोसिंह” |
| कोटा का वास्तविक शासक | “राजा महाराव, सत्ता दीवान (झाला जालिमसिंह) के पास” — 1817 पूरक संधि |
| झालावाड़ अपवाद | “झालावाड़ = झाला वंश, चौहान नहीं” — पर भौगोलिक रूप से हाड़ौती में |
📚 Quick Revision Box — Part 2
चौहान वंश की शाखाएं (1192 के बाद, लगभग 1 शताब्दी तक सक्रिय):
रणथम्भौर:
→ संस्थापक - गोविंदराज (पृथ्वीराज III पुत्र)
→ अंतिम शासक - हम्मीरदेव (17 युद्ध, 16 विजय)
→ पतन - 1301 ई., अलाउद्दीन खिलजी, पत्नी रंगदेवी जौहर
→ यह राजस्थान का प्रथम साका माना जाता है
→ स्रोत - हम्मीर महाकाव्य (नयनचन्द्र सूरी), हम्मीरहठ (चन्द्रशेखर)
जालौर (सोनगरा चौहान):
→ संस्थापक - कीर्तिपाल चौहान (नाडोल शाखा से, 13वीं सदी)
→ प्रमुख शासक - समरसिंह, उदयसिंह
→ पतन - 1311 ई., कान्हड़देव व वीरमदेव वीरगति (पहले सिवाना 1308 गिरा)
→ स्रोत - कान्हड़दे प्रबन्ध (पद्मनाभ), वीरमदेव सोनगरा की वात
नाडोल: संस्थापक लक्ष्मण चौहान (~960 ई.) | सबसे प्राचीन शाखा | 1205 ई. जालौर में विलय
सिरोही (देवड़ा शाखा):
→ संस्थापक - लुम्बा (~1311 ई.), राजधानी चन्द्रावती
→ सिरोही नगर स्थापना - सहासमल (1425 ई.)
→ दत्ताणी का युद्ध (1583) - महाराव सुरताण ने अकबर की सेना हराई
→ 1950 ई. राजस्थान में विलय
हाड़ौती:
→ बूँदी - देवा हाड़ा ने 1241 ई. में मीणा शासक जैता को हराया; नाम बूँदा मीणा से
→ सुरजन सिंह - 1569 ई. अकबर संधि (मेवाड़ से मुक्त)
→ कोटा - 1631 ई. शाहजहाँ ने माधोसिंह को बूँदी से अलग किया
→ भीम सिंह प्रथम (1707-1720) - कोटा का सबसे प्रभावशाली शासक
→ झाला जालिमसिंह (1769-1823) - 'कोटा का दुर्गादास राठौड़', वास्तविक सत्ता दीवान के पास
→ झालावाड़ - मदनसिंह झाला, 1837-38 ई. कोटा से पृथक (झाला वंश, चौहान नहीं)
→ शीतलेश्वर महादेव मंदिर (झालरापाटन) - 689 ई., राजस्थान का सबसे प्राचीन दिनांकित मंदिर
समग्र परिणाम: चौहान शक्ति 1192 में समाप्त नहीं हुई, बल्कि शाखाओं में बदल गई — रणथम्भौर व जालौर 14वीं सदी में अलाउद्दीन खिलजी के सामने गिरे, जबकि बूँदी व कोटा (हाड़ा चौहान) 1947 तक चलते रहे।
















