अध्याय XIV

CrPC Section 193 in Hindi: सेशन न्यायालयों द्वारा अपराधों का संज्ञान

New Law Update (2024)

धारा 216 भा.ना.सु.सं.

TRIAL COURT

सेशन न्यायालय

Punishment​

प्रक्रियात्मक – संज्ञान

Bailable?

Compoundable?

Bare Act Text

जब तक कि इस संहिता द्वारा या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि द्वारा अभिव्यक्त रूप से अन्यथा उपबंधित न हो, कोई सेशन न्यायालय किसी अपराध का संज्ञान प्रारंभिक अधिकारिता वाले न्यायालय के रूप में तब तक नहीं करेगा जब तक कि मामला इस संहिता के अधीन किसी मजिस्ट्रेट द्वारा उसे सुपुर्द नहीं कर दिया गया है।

Important Sub-Sections Explained

Landmark Judgements

किशन सिंह बनाम बिहार राज्य (1993):

उच्चतम न्यायालय ने प्राधिकारपूर्वक अभिनिर्धारित किया कि कोई सेशन न्यायालय किसी अपराध का प्रत्यक्ष संज्ञान प्रारंभिक अधिकारिता वाले न्यायालय के रूप में तब तक नहीं कर सकता जब तक कि मामला संहिता के अधीन किसी मजिस्ट्रेट द्वारा उसे सुपुर्द नहीं कर दिया गया हो। इस निर्णय ने सेशन न्यायालय की अधिकारिता के लिए सुपुर्दगी प्रक्रिया की अनिवार्य प्रकृति को सुदृढ़ किया।

संजय गांधी बनाम भारत संघ (1978):

इस ऐतिहासिक निर्णय ने सुपुर्दगी कार्यवाही के दायरे और उद्देश्य को स्पष्ट किया, इस बात पर जोर दिया कि वे एक लघु-विचारण नहीं हैं, बल्कि यह सुनिश्चित करने के लिए एक तंत्र हैं कि मामले को विचारण के लिए सेशन न्यायालय को भेजने के लिए पर्याप्त सामग्री है, जिससे धारा 193 के तहत संज्ञान लेने में सेशन न्यायालय को सक्षम बनाने में मजिस्ट्रेट की प्रारंभिक भूमिका को रेखांकित किया गया।

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