1. प्रस्तावना एवं भौगोलिक पृष्ठभूमि
राजस्थान, क्षेत्रफल की दृष्टि से भारत का सबसे बड़ा राज्य है, जिसका कुल क्षेत्रफल 3,42,239 वर्ग किलोमीटर है। यह भारत के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल का लगभग 10.41 प्रतिशत है। राज्य की अर्थव्यवस्था में कृषि एवं संबद्ध क्षेत्रों का योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि राज्य की अधिकांश जनसंख्या अपनी आजीविका के लिए कृषि और पशुपालन पर निर्भर है।
भौगोलिक विषमताओं के कारण राजस्थान में कृषि कार्य एक चुनौतीपूर्ण उपक्रम है। राज्य का लगभग 61.11 प्रतिशत भाग (नवीनतम आंकड़ों के अनुसार) पश्चिमी मरुस्थल (थार) के अंतर्गत आता है, जबकि लगभग 10 प्रतिशत क्षेत्र अरावली पर्वतीय श्रृंखला से आच्छादित है। इस कारण कृषि योग्य भूमि सीमित है और कृषि कार्य भौगोलिक परिस्थितियों द्वारा नियंत्रित होता है।
कृषि भूमि उपयोग के आंकड़े (नवीनतम आर्थिक समीक्षा के संदर्भ में)
- सकल फसली क्षेत्र: राज्य में शुद्ध बोया गया क्षेत्र और सकल बोया गया क्षेत्र मानसून की प्रबलता पर निर्भर करता है।
- सिंचाई की स्थिति: राज्य में शुद्ध सिंचित क्षेत्र लगभग 30-35 प्रतिशत के मध्य रहता है, जबकि शेष कृषि वर्षा पर आधारित है।
- मानसून पर निर्भरता: राज्य में वर्षा की अनिश्चितता, अनियमितता और असमान वितरण के कारण कृषि को ‘मानसून का जुआ’ (Gamble of Monsoon) कहा जाता है।
2. कृषि में नवाचार एवं कृषक सम्मान
कृषि क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान देने वाले प्रगतिशील किसानों को राष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित किया गया है, जो राज्य के लिए गौरव का विषय है:
- पद्म श्री सम्मान:
- श्री हुकुमचंद पाटीदार (मानपुरा, झालावाड़): इन्हें जैविक खेती (Organic Farming) के क्षेत्र में उनके उत्कृष्ट कार्यों और रासायनिक उर्वरकों के पूर्ण त्याग के लिए सम्मानित किया गया।
- श्री जगदीश प्रसाद पारीक (अजीतगढ़, सीकर): इन्होंने जैविक कृषि और उन्नत किस्मों (विशेषकर गोभी की 25 किलो तक की किस्म) के विकास में नवाचार के लिए ख्याति प्राप्त की।
- श्री सुंडाराम वर्मा (दांता, सीकर): इन्हें भी जल संरक्षण और कृषि वानिकी में उनके प्रयोगों (एक लीटर पानी तकनीक) के लिए पद्म श्री से नवाजा गया है।
3. फसल चक्र एवं ऋतुओं का वर्गीकरण
राजस्थान में कृषि फसलों को बुवाई और कटाई के समय के आधार पर मुख्य रूप से तीन श्रेणियों में वर्गीकृत किया गया है:
3.1 रबी की फसल (उनालु)
यह शीतकालीन फसल है। इसकी बुवाई मानसून की वापसी के बाद और शीत ऋतु के आगमन पर की जाती है।
- बुवाई का समय: अक्टूबर से नवंबर।
- कटाई का समय: मार्च से अप्रैल।
- स्थानीय नाम: इसे राजस्थानी भाषा में ‘उनालु’ कहा जाता है।
- प्रमुख फसलें: गेहूं, जौ, चना, सरसों, मसूर, मटर, अलसी, तारामीरा, सूरजमुखी, धनिया, जीरा, मेथी आदि।
3.2 खरीफ की फसल (स्यालु/सावणु)
यह वर्षाकालीन फसल है, जो पूर्णतः दक्षिण-पश्चिमी मानसून पर निर्भर करती है।
- बुवाई का समय: जून से जुलाई (मानसून के आगमन के साथ)।
- कटाई का समय: सितंबर से अक्टूबर।
- स्थानीय नाम: इसे ‘स्यालु’ या ‘सावणु’ कहा जाता है।
- प्रमुख फसलें: बाजरा, ग्वार, ज्वार, मक्का, मूंगफली, कपास, गन्ना, सोयाबीन, चावल, तिल, मूंग, मोठ, उड़द, अरहर।
3.3 जायद की फसल
यह रबी और खरीफ के मध्य की अल्पकालिक ग्रीष्मकालीन फसल है।
- बुवाई का समय: मार्च-अप्रैल।
- कटाई का समय: जून-जुलाई।
- प्रमुख फसलें: खरबूजा, तरबूज, ककड़ी, खीरा और विभिन्न प्रकार की हरी सब्जियां एवं चारा फसलें (रिंजका, बरसीम)।
4. फसलों का प्रारूप एवं वर्गीकरण
राजस्थान में फसलों को उनके उपयोग और आर्थिक महत्व के आधार पर दो मुख्य भागों में विभाजित किया जा सकता है:
- खाद्यान्न फसलें (Food Grains): इनका उपयोग मुख्य रूप से भोजन के लिए किया जाता है। राज्य के कुल बोये गए क्षेत्र का लगभग 57 से 60 प्रतिशत भाग खाद्यान्न फसलों के अंतर्गत आता है।
- उदाहरण: गेहूं, जौ, ज्वार, मक्का, बाजरा, चावल और दालें।
- व्यापारिक/नकदी फसलें (Cash/Commercial Crops): इनका उत्पादन मुख्य रूप से बाजार में बिक्री और लाभार्जन के उद्देश्य से किया जाता है। यह क्षेत्र लगभग 40 से 43 प्रतिशत है।
- उदाहरण: गन्ना, कपास, तंबाकू, तिलहन (सरसों, राई, मूंगफली, सोयाबीन), मसाले।
विशेष विश्लेषणात्मक बिंदु:
- राज्य में कृषि जोत का औसत आकार 2.73 हेक्टेयर (कृषि गणना 2015-16 के अनुसार, हालांकि आपके डेटा में 3.96 उल्लिखित है जो पुराने आंकड़ों पर आधारित हो सकता है, लेकिन वर्तमान प्रवृत्ति घटते हुए जोत आकार की है)।
- कुल कृषि क्षेत्र का लगभग दो-तिहाई भाग (65%) खरीफ के मौसम में बोया जाता है क्योंकि बारानी (वर्षा आधारित) खेती अधिक होती है।
5. प्रमुख खाद्यान्न फसलों का विस्तृत अध्ययन
5.1 गेहूं (Wheat) – Triticum aestivum
- महत्व: गेहूं राजस्थान में सर्वाधिक उत्पादित होने वाली और सर्वाधिक उपभोग की जाने वाली रबी की खाद्यान्न फसल है।
- उत्पादन स्थिति: भारत में उत्तर प्रदेश और पंजाब के बाद राजस्थान प्रमुख गेहूं उत्पादक राज्य है।
- प्रमुख क्षेत्र: राजस्थान का पूर्वी और उत्तरी भाग गेहूं उत्पादन में अग्रणी है।
- श्रीगंगानगर: इसे ‘राज्य का अन्न भंडार’ (Granary of Rajasthan) और ‘कमाऊ पूत’ कहा जाता है। नहरी सिंचाई की उपलब्धता के कारण यहाँ सर्वाधिक उत्पादन होता है।
- हनुमानगढ़, अलवर, भरतपुर: अन्य प्रमुख उत्पादक जिले।
- उन्नत किस्में: सोना-कल्याण, सोनेरा, शरबती, कोहिनूर, मैक्सिकन, राज-3077, राज-3765, लाल बहादुर।
5.2 जौ (Barley) – Hordeum vulgare
- उत्पादन: जौ उत्पादन में उत्तर प्रदेश के पश्चात राजस्थान का देश में दूसरा स्थान है।
- प्रमुख क्षेत्र: जयपुर, श्रीगंगानगर, सीकर और अलवर। जयपुर जिला उत्पादन में प्रथम स्थान रखता है।
- उपयोग: इसका उपयोग खाद्यान्न के साथ-साथ बियर (Beer) निर्माण और माल्ट (Malt) उद्योग में प्रमुखता से होता है।
- किस्में: ज्योति, राजकिरण, आर.एस.-6, आर.डी.-2035।
5.3 ज्वार (Sorghum) – ‘गरीब की रोटी’
- महत्व: यह एक मोटा अनाज है जिसे ‘सोरगम’ भी कहा जाता है।
- रैंकिंग: देश में महाराष्ट्र सर्वाधिक उत्पादक है, जबकि राजस्थान का स्थान चौथा है।
- प्रमुख क्षेत्र: मध्य राजस्थान। अजमेर जिला ज्वार उत्पादन में ऐतिहासिक रूप से प्रथम रहा है, हालांकि पाली और भीलवाड़ा में भी इसका अच्छा उत्पादन होता है।
- अनुसंधान: ज्वार अनुसंधान केंद्र वल्लभनगर (उदयपुर) में स्थापित है।
- किस्में: पी.वी.-96, सी.एस.एच.-1।
5.4 मक्का (Maize)
- महत्व: यह दक्षिणी राजस्थान (मेवाड़ क्षेत्र) का प्रमुख खाद्यान्न है और आदिवासियों का मुख्य भोजन है।
- रैंकिंग: देश में कर्नाटक और मध्य प्रदेश प्रमुख उत्पादक हैं। राजस्थान का स्थान 8वां-10वां रहता है।
- प्रमुख क्षेत्र: चित्तौड़गढ़, भीलवाड़ा, उदयपुर, बांसवाड़ा, और राजसमंद। चित्तौड़गढ़ उत्पादन में अग्रणी है।
- वैज्ञानिक विकास: कृषि अनुसंधान केंद्र, बांसवाड़ा द्वारा मक्का की दो विशिष्ट किस्में विकसित की गई हैं:
- माही कंचन
- माही धवल
- अन्य किस्में: डब्ल्यू-126, सविता।
5.5 चावल (Rice)
- परिस्थिति: चावल एक उष्णकटिबंधीय फसल है जिसके लिए अधिक तापमान और अत्यधिक पानी (200 सेमी वार्षिक वर्षा) की आवश्यकता होती है। चूँकि राजस्थान एक शुष्क राज्य है, अतः यहाँ चावल का उत्पादन सीमित (कुल खाद्यान्न का 1% से भी कम) है।
- प्रमुख क्षेत्र:
- हनुमानगढ़: घग्घर नदी के प्रवाह क्षेत्र (नाली बेल्ट) में। यहाँ ‘गरडा बासमती’ चावल पैदा होता है।
- बांसवाड़ा: यहाँ माही बजाज सागर बांध के कैचमेंट क्षेत्र में खेती होती है।
- अनुसंधान: कृषि अनुसंधान केंद्र बांसवाड़ा द्वारा ‘माही सुगंधा’ किस्म विकसित की गई है।
- तकनीक: पानी की कमी के कारण यहाँ ‘जापानी पद्धति’ का प्रयोग भी किया जाता है।
5.6 चना (Gram)
- प्रकृति: यह रबी की प्रमुख दलहन फसल है। इसे शुष्क खेती के अंतर्गत उगाया जा सकता है।
- रैंकिंग: मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र के साथ राजस्थान शीर्ष उत्पादक राज्यों में शामिल है।
- प्रमुख क्षेत्र: चूरू, बीकानेर, हनुमानगढ़ और जैसलमेर। चूरू और बीकानेर चने के उत्पादन में अग्रणी हैं।
- मिश्रित खेती: जब गेहूं और जौ के साथ चने को मिलाकर बोया जाता है, तो इस मिश्रण को ‘गोचनी’ या ‘बेझड़’ कहा जाता है।
5.7 दलहन (Pulses)
- महत्व: राजस्थान देश में दलहन उत्पादन में एक प्रमुख राज्य है। दालें प्रोटीन का मुख्य स्रोत हैं और मृदा स्वास्थ्य के लिए अनिवार्य हैं।
- मोठ: राजस्थान का पश्चिमी भाग (मरुस्थल) मोठ उत्पादन में देश में एकाधिकार रखता है। बीकानेर और नागौर इसके प्रमुख उत्पादक हैं।
- वैज्ञानिक महत्व: दलहनी फसलों की जड़ों में ‘राइजोबियम’ (Rhizobium) नामक बैक्टीरिया पाया जाता है, जो वायुमंडलीय नाइट्रोजन को नाइट्रेट में परिवर्तित करके भूमि की उर्वरा शक्ति बढ़ाता है।
- अन्य दालें: मूंग (जालौर, नागौर), उड़द (बूंदी, टोंक), अरहर/तुअर (बांसवाड़ा)।
5.8 बाजरा (Pearl Millet)
- राजस्थान का गौरव: बाजरा उत्पादन और क्षेत्रफल दोनों ही दृष्टि से राजस्थान का देश में प्रथम स्थान है। देश का लगभग 40% से अधिक बाजरा राजस्थान में होता है।
- जलवायु: यह शुष्क और अर्द्ध-शुष्क जलवायु का पौधा है, जिसे कम पानी और उच्च तापमान की आवश्यकता होती है।
- प्रमुख क्षेत्र: पश्चिमी राजस्थान। अलवर, जयपुर, बाड़मेर, और जोधपुर प्रमुख उत्पादक जिले हैं। नवीनतम आंकड़ों में अलवर और जयपुर उत्पादन में शीर्ष पर रहते हैं, जबकि क्षेत्रफल बाड़मेर में सर्वाधिक है।
- अनुसंधान: बाजरा अनुसंधान केंद्र बाड़मेर में स्थित है (और अखिल भारतीय समन्वित बाजरा अनुसंधान परियोजना का केंद्र मंडोर, जोधपुर में है)।
- किस्में: राज-171, आर.एच.बी.-30, डब्लू.सी.सी.-75।
6. नकदी एवं व्यापारिक फसलें
6.1 गन्ना (Sugarcane)
- उद्गम: भारतीय मूल (Indian Origin) का पौधा।
- उत्पादन: भारत विश्व में गन्ने का प्रमुख उत्पादक है। भारत में उत्तर प्रदेश (चीनी का कटोरा) प्रथम स्थान पर है। राजस्थान में इसका उत्पादन नगण्य (0.5% से कम) है क्योंकि यह अत्यधिक जल मांग वाली फसल है।
- प्रमुख क्षेत्र: श्रीगंगानगर, हनुमानगढ़ (घग्घर बेसिन), बूंदी और चित्तौड़गढ़।
- चीनी मिलें (Sugar Mills):
- द मेवाड़ शुगर मिल्स (भोपालसागर, चित्तौड़गढ़): 1932 में स्थापित राज्य की प्रथम (निजी क्षेत्र) मिल। वर्तमान में बंद।
- राजस्थान स्टेट गंगानगर शुगर मिल्स (श्रीगंगानगर): 1937 में स्थापित, 1956 में सार्वजनिक क्षेत्र में आई। यहाँ गन्ने के साथ-साथ चुकंदर (Sugar beet) से भी चीनी बनाने का प्रयोग हुआ। यहाँ शराब (Royal Heritage Liqueur) भी बनाई जाती है।
- केशोरायपाटन सहकारी शुगर मिल्स (बूंदी): 1965 में सहकारी क्षेत्र में स्थापित। वर्तमान में बंद।
6.2 कपास (Cotton) – ‘सफेद सोना’ (White Gold)
- इतिहास: सिंधु घाटी सभ्यता से ही भारत में कपास की खेती के प्रमाण मिलते हैं।
- किस्में:
- देशी कपास: उदयपुर, चित्तौड़गढ़, झालावाड़।
- अमेरिकन कपास: श्रीगंगानगर, हनुमानगढ़, बांसवाड़ा। (लंबे रेशे वाली)।
- मालवी कपास: कोटा, झालावाड़ (हाड़ौती क्षेत्र)।
- उत्पादन: हनुमानगढ़ और श्रीगंगानगर जिले कपास उत्पादन में अग्रणी हैं।
- शब्दावली: स्थानीय भाषा में कपास को ‘बणिया’ कहा जाता है। कपास के बीजों को ‘बिनौला’ कहते हैं, जिससे तेल और खली प्राप्त होती है। कपास की एक गांठ (Bale) का मानक वजन 170 किलोग्राम होता है।
6.3 तंबाकू (Tobacco)
- इतिहास: यह भारतीय मूल का पौधा नहीं है। इसे 1508 ई. में पुर्तगाली भारत लाए थे। मुगल बादशाह जहाँगीर के काल में इसकी खेती शुरू हुई और बाद में प्रतिबंध भी लगाया गया।
- किस्में:
- निकोटियाना टेबेकम: राजस्थान में सर्वाधिक यही उगाई जाती है।
- निकोटियाना रस्टिका: हुक्का तंबाकू।
- क्षेत्र: अलवर, जालौर और झुंझुनू। अलवर जिला तंबाकू उत्पादन में प्रमुख है।
6.4 तिलहन (Oilseeds)
राजस्थान तिलहन उत्पादन में देश के अग्रणी राज्यों में से एक है। तिलहन विकास कार्यक्रम (1984-85) ने इसके उत्पादन को बढ़ावा दिया।
- सरसों एवं राई (Mustard & Rapeseed):
- रैंकिंग: सरसों उत्पादन में राजस्थान का देश में प्रथम स्थान है (देश के कुल उत्पादन का लगभग 40-45%)। इसलिए राजस्थान को ‘सरसों प्रदेश’ भी कहा जाता है।
- प्रमुख क्षेत्र: अलवर, भरतपुर, श्रीगंगानगर, टोंक। भरतपुर संभाग सरसों का हब है।
- अनुसंधान: राष्ट्रीय सरसों अनुसंधान निदेशालय (DRMR), सेवर (भरतपुर) में स्थित है (स्थापना: 20 अक्टूबर 1993)।
- मूंगफली (Groundnut):
- स्थिति: इसे ‘गरीब का बादाम’ कहा जाता है। खरीफ की प्रमुख फसल।
- प्रमुख क्षेत्र: बीकानेर, जयपुर, जोधपुर।
- विशेष तथ्य: बीकानेर का लूणकरणसर क्षेत्र उच्च गुणवत्ता वाली मूंगफली उत्पादन के कारण ‘राजस्थान का राजकोट’ कहलाता है (गुजरात का राजकोट मूंगफली के लिए प्रसिद्ध है)।
- सोयाबीन:
- क्षेत्र: हाड़ौती क्षेत्र (कोटा, बारां, झालावाड़)। झालावाड़ और बारां अग्रणी हैं।
- विशेषता: इसे ‘चमत्कारिक फसल’ कहा जाता है क्योंकि इसमें सर्वाधिक प्रोटीन (40-42%) होता है। मध्य प्रदेश के बाद राजस्थान प्रमुख उत्पादक है।
- होहोबा/जोजोबा (Jojoba):
- परिचय: यह एक मरुस्थलीय पौधा है जिसे ‘पीला सोना’ (Yellow Gold) कहा जाता है। इसका मूल स्थान एरिजोना (USA) का मरुस्थल है। इसे इजराइल के सहयोग से भारत लाया गया।
- उपयोग: इसके बीज से निकलने वाला तेल उच्च ताप सहने में सक्षम है, जिसका उपयोग हवाई जहाजों और भारी मशीनरी में लुब्रिकेंट (स्नेहक) के रूप में, तथा सौंदर्य प्रसाधनों में होता है।
- फार्म: राजस्थान में इसके तीन प्रमुख फार्म स्थापित हैं:
- ढंड (जयपुर)
- फतेहपुर (सीकर)
- बीकानेर (निजी क्षेत्र)।
7. कृषि संस्थान एवं अनुसंधान केंद्र
CAZRI (काजरी) – जोधपुर
- पूरा नाम: केंद्रीय शुष्क क्षेत्र अनुसंधान संस्थान (Central Arid Zone Research Institute).
- स्थापना: 1959 में (ऑस्ट्रेलिया और यूनेस्को के सहयोग से)।
- उद्देश्य: मरुस्थल के प्रसार को रोकना, शुष्क खेती की तकनीक विकसित करना, और मरुस्थलीय वनस्पति का संरक्षण।
- उप-केंद्र: बीकानेर, जैसलमेर, पाली, भुज (गुजरात), और लेह-लद्दाख।
AFRI (आफरी) – जोधपुर
- पूरा नाम: शुष्क वन अनुसंधान संस्थान (Arid Forest Research Institute).
- स्थापना: 1985-1988 के मध्य। यह वानिकी अनुसंधान पर केंद्रित है।
अन्य महत्वपूर्ण केंद्र
- केंद्रीय कृषि अनुसंधान संस्थान (RARI): दुर्गापुरा (जयपुर)।
- केंद्रीय शुष्क बागवानी संस्थान (CIAH): बीकानेर।
- राष्ट्रीय बीजीय मसाला अनुसंधान केंद्र (NRCSS): तबीजी, अजमेर।
- खजूर एवं बेर अनुसंधान केंद्र: बीकानेर।
8. कृषि एवं संबद्ध क्षेत्रों की क्रांतियां (Revolutions)
कृषि उत्पादन में गुणात्मक और मात्रात्मक वृद्धि के लिए विभिन्न क्रांतियां चलाई गईं:
| क्र.सं. | क्रांति का नाम | संबंधित क्षेत्र | जनक/विशेष विवरण |
|---|---|---|---|
| 1. | हरित क्रांति (Green Revolution) | खाद्यान्न उत्पादन (विशेषकर गेहूं) | विश्व: नॉर्मन बोरलॉग, भारत: एम.एस. स्वामीनाथन (1966-67) |
| 2. | श्वेत क्रांति (White Revolution) | दुग्ध उत्पादन | डॉ. वर्गीज कुरियन (ऑपरेशन फ्लड, 1970) |
| 3. | पीली क्रांति | तिलहन (विशेषतः सरसों) | |
| 4. | नीली क्रांति | मत्स्य पालन | |
| 5. | गुलाबी क्रांति | झींगा मछली/प्याज उत्पादन | |
| 6. | काली/कृष्ण क्रांति | पेट्रोलियम/वैकल्पिक ऊर्जा | एथेनॉल, बायोडीजल |
| 7. | लाल क्रांति | टमाटर/मांस उत्पादन | |
| 8. | सुनहरी (Golden) क्रांति | बागवानी/फल उत्पादन | |
| 9. | रजत (Silver) क्रांति | अंडा/मुर्गी पालन | |
| 10. | भूरी (Grey) क्रांति | खाद्य प्रसंस्करण (Food Processing) | |
| 11. | बादामी क्रांति | मसाला उत्पादन | |
| 12. | गोल क्रांति | आलू उत्पादन | |
| 13. | इन्द्रधनुष क्रांति | सभी क्रांतियों का समन्वित विकास | कृषि नीति 2000 |
9. मसाला एवं फल उत्पादन (Horticulture)
मसाला उत्पादन
भारत को ‘मसालों का घर’ कहा जाता है। बीजीय मसालों (Seed Spices) के उत्पादन में राजस्थान का देश में प्रथम स्थान है।
- धनिया: बारां, झालावाड़, कोटा।
- जीरा: जोधपुर, बाड़मेर, जालौर। (जीरा मंडी: मेड़ता सिटी)।
- सौंफ: सिरोही, जोधपुर, टोंक।
- मैथी: बीकानेर, नागौर। (पान मैथी/कस्तूरी मैथी के लिए नागौर का ताऊसर प्रसिद्ध है)।
- मिर्च: सवाई माधोपुर, टोंक, जोधपुर (मथानिया की लाल मिर्च प्रसिद्ध है)।
- लहसुन: बारां, कोटा (हाड़ौती क्षेत्र)।
- ईसबगोल (घोड़ाजीरा): बाड़मेर, जालौर। (औषधीय महत्व)।
मसाला पार्क (Spice Parks):
- रामपुरा भाटियान (मथानिया), जोधपुर।
- रामगंज मंडी, कोटा।
फल उत्पादन
राजस्थान में फलों का उत्पादन भी बढ़ रहा है।
- किन्नू/माल्टा: श्रीगंगानगर (फलों की टोकरी)।
- संतरा: झालावाड़ (इसे ‘राजस्थान का नागपुर’ कहा जाता है)।
- अमरूद: सवाई माधोपुर (बर्फीला और ताइवान अमरूद)।
- सीताफल: राजसमंद, चित्तौड़गढ़, उदयपुर।
- अनार: बाड़मेर, जालौर (सिंदूरी अनार)।
- खजूर: बीकानेर, जैसलमेर।
उत्कृष्टता केंद्र (Centers of Excellence) – इंडो-इजराइल प्रोजेक्ट
राजस्थान सरकार ने विभिन्न फसलों की गुणवत्ता बढ़ाने के लिए उत्कृष्टता केंद्र स्थापित किए हैं:
- खजूर: सगरा भोजका, जैसलमेर।
- अनार: डिंडोल, बस्सी (जयपुर)।
- सब्जी: बूंदी।
- नींबू वर्गीय फल (Citrus): नांता, कोटा।
- अमरूद: देवड़ावास, टोंक।
- आम: खेमरी, धौलपुर।
- संतरा: झालावाड़।
- फूल: सवाई माधोपुर।
- औषधीय पौधे: मावली, उदयपुर।
10. कृषि के प्रकार एवं पद्धतियां
- शुष्क कृषि (Dry Farming): 50 सेमी से कम वर्षा वाले क्षेत्रों (पश्चिमी राजस्थान) में, जहाँ सिंचाई का अभाव हो। इसमें नमी संरक्षण तकनीक अपनाई जाती है।
- तकनीक: फव्वारा (Sprinkler) और बूंद-बूंद (Drip) सिंचाई (इजराइल की तकनीक)।
- सिंचित कृषि (Irrigated Farming): जहाँ नहरों या कुओं से पानी उपलब्ध हो।
- मिश्रित कृषि (Mixed Farming): जब फसल उत्पादन के साथ-साथ पशुपालन (डेयरी) भी किया जाता है। यह राजस्थान की कृषि की मुख्य विशेषता है।
- मिश्रित खेती (Mixed Cropping): एक ही खेत में एक साथ दो या अधिक फसलें उगाना (जैसे चना + सरसों)।
- स्थानांतरित/वालरा कृषि (Shifting Cultivation): आदिवासियों द्वारा वनों को जलाकर की जाने वाली खेती।
- दजिया: मैदानी भागों में की जाने वाली।
- चिमाता: पहाड़ी ढलानों पर की जाने वाली।
- नोट: यह पर्यावरण के लिए हानिकारक है और इसे हतोत्साहित किया जा रहा है।
- संविदा खेती (Contract Farming): राज्य में 11 जून 2004 से इसकी अनुमति दी गई।
11. राजस्थान के कृषि-जलवायु क्षेत्र (Agro-Climatic Zones)
कृषि वैज्ञानिक वर्गीकरण के आधार पर राजस्थान को 10 कृषि-जलवायु खंडों में विभाजित किया गया है। यह वर्गीकरण फसल नियोजन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
| क्र. | जलवायु क्षेत्र | कोड | सम्मिलित जिले | मुख्य फसलें |
|---|---|---|---|---|
| 1. | शुष्क पश्चिमी मैदानी क्षेत्र | I-A | बाड़मेर, जोधपुर (ग्रामीण/फलोदी) | बाजरा, मोठ, तिल |
| 2. | सिंचित उत्तर-पश्चिमी मैदान | I-B | श्रीगंगानगर, हनुमानगढ़ | कपास, गेहूं, सरसों, किन्नू |
| 3. | अति शुष्क आंशिक सिंचित क्षेत्र | I-C | बीकानेर, जैसलमेर, चूरू | बाजरा, ग्वार, मूंगफली |
| 4. | अंतःस्थलीय जलोत्सरण क्षेत्र | II-A | नागौर, सीकर, झुन्झुनू (शेखावाटी) | बाजरा, दलहन, ग्वार |
| 5. | लूनी नदी का अंतर्वर्ती मैदान | II-B | पाली, जालौर, सिरोही, सांचौर | जीरा, इसबगोल, अरंडी |
| 6. | अर्द्ध-शुष्क पूर्वी मैदान | III-A | जयपुर, अजमेर, दौसा, टोंक | जौ, सरसों, मटर |
| 7. | बाढ़ संभाव्य पूर्वी मैदान | III-B | अलवर, भरतपुर, धौलपुर, करौली, सवाईमाधोपुर | सरसों, गेहूं, बाजरा |
| 8. | अर्द्ध-आर्द्र दक्षिणी मैदान | IV-A | भीलवाड़ा, राजसमंद, चित्तौड़गढ़ | मक्का, कपास, दलहन |
| 9. | आर्द्र दक्षिणी मैदान | IV-B | बांसवाड़ा, डूंगरपुर, प्रतापगढ़ | मक्का, चावल, तुअर |
| 10. | आर्द्र दक्षिणी-पूर्वी मैदान | V | कोटा, बूंदी, बारां, झालावाड़ | सोयाबीन, धनिया, संतरा |
महत्वपूर्ण तथ्य:
- क्षेत्रफल में सबसे बड़ा खंड: I-C (अति शुष्क आंशिक सिंचित क्षेत्र)।
- क्षेत्रफल में सबसे छोटा खंड: IV-B (आर्द्र दक्षिणी मैदान)।
- सर्वाधिक खाद्यान्न उत्पादन: I-B और III-B में।
12. प्रमुख सरकारी योजनाएं एवं नीतियां
कृषि के सर्वांगीण विकास हेतु केंद्र और राज्य सरकार द्वारा संचालित प्रमुख योजनाएं:
12.1 मुख्यमंत्री बीज स्वावलंबन योजना (Mukhya Mantri Beej Swavlamban Yojana)
- शुभारम्भ: 2017 (कोटा, भीलवाड़ा, उदयपुर से पायलट प्रोजेक्ट)।
- विस्तार: 2018-19 से राज्य के सभी 10 कृषि जलवायु खंडों में लागू।
- उद्देश्य: किसानों को अपने ही खेत पर उन्नत किस्म के बीज तैयार करने हेतु प्रशिक्षित करना और आत्मनिर्भर बनाना। प्रमुख फसलों (गेहूं, जौ, चना, सोयाबीन आदि) की 10 वर्ष से कम पुरानी किस्मों का संवर्धन।
12.2 कृषि शिक्षा में प्रोत्साहन राशि
कृषि को एक व्यवसाय और शोध का विषय बनाने हेतु छात्राओं को प्रोत्साहित करना:
- उच्च माध्यमिक (11वीं-12वीं कृषि): ₹15,000 प्रतिवर्ष।
- स्नातक/बी.एस.सी. (कृषि): ₹25,000 प्रतिवर्ष।
- स्नातकोत्तर (M.Sc) एवं पी.एच.डी.: ₹40,000 प्रतिवर्ष (अधिकतम 3 वर्ष)।
12.3 राजस्थान कृषि प्रसंस्करण, कृषि व्यवसाय एवं कृषि निर्यात प्रोत्साहन नीति-2019
- लॉन्च: 17 दिसंबर 2019।
- उद्देश्य: किसानों की आय बढ़ाना, आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत करना और निर्यात को बढ़ावा देना।
- प्रावधान: एग्रो-प्रोसेसिंग यूनिट लगाने पर कृषकों को पूंजीगत अनुदान (Capital Subsidy) का प्रावधान।
12.4 प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना (PMFBY)
- प्रारंभ: खरीफ 2016 से।
- प्रीमियम दरें:
- खरीफ फसल: 2%
- रबी फसल: 1.5%
- व्यापारिक/बागवानी फसल: 5%
- नवीनतम प्रावधान: यह योजना अब स्वैच्छिक कर दी गई है। इसमें असिंचित और सिंचित क्षेत्रों के लिए प्रीमियम अनुदान का भार केंद्र और राज्य सरकार द्वारा वहन किया जाता है।
12.5 राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन (NFSM)
- प्रारंभ: 2007-08 (रबी सीजन से)।
- उद्देश्य: गेहूं और दलहन का उत्पादन बढ़ाना।
- वित्त पोषण: केंद्र: 60%, राज्य: 40%।
- घटक: इसमें अब न्यूट्रिसीरियल (मोटा अनाज/मिलेट्स) मिशन भी शामिल है (2018-19 से), जो श्री अन्न (Millets) के उत्पादन को प्रोत्साहित करता है।
12.6 राष्ट्रीय कृषि विस्तार एवं तकनीकी मिशन (NMAET)
कृषि ज्ञान और तकनीक को प्रयोगशाला से खेत तक (Lab to Land) पहुँचाने हेतु। इसके 4 उप-मिशन हैं:
- कृषि विस्तार पर उप-मिशन (SMAE)।
- बीज एवं रोपण सामग्री (SMSP)।
- कृषि यंत्रीकरण (SMAM)।
- पौध संरक्षण एवं संगरोध।
12.7 राजस्थान फसल सुरक्षा मिशन (तारबंदी योजना)
- उद्देश्य: नीलगाय और आवारा पशुओं से फसलों को होने वाले नुकसान को रोकना।
- अनुदान:
- लघु/सीमांत कृषक: लागत का 60% या ₹48,000 (जो भी कम हो)।
- अन्य कृषक: 50% या ₹40,000।
- सामुदायिक (समूह में): 70% तक अनुदान।
- शर्त: न्यूनतम 1.5 हेक्टेयर भूमि होना आवश्यक (समूह के लिए 5 हेक्टेयर)।
12.8 प्रधान मंत्री कृषि सिंचाई योजना (PMKSY)
- नारा: “हर खेत को पानी” और “Per Drop More Crop” (प्रति बूंद अधिक फसल)।
- सूक्ष्म सिंचाई (Micro Irrigation): ड्रिप और स्प्रिंकलर सिस्टम पर भारी अनुदान दिया जाता है।
12.9 परम्परागत कृषि विकास योजना (PKVY)
जैविक खेती (Organic Farming) को बढ़ावा देने के लिए क्लस्टर आधारित दृष्टिकोण। इसमें “पार्टिसिपेटरी गारंटी सिस्टम” (PGS) के तहत प्रमाणीकरण किया जाता है।
13. राजस्थान की प्रमुख मंडियां (विशिष्ट उत्पाद केंद्र)
राजस्थान में विशिष्ट फसलों के विपणन के लिए विशेष मंडियां स्थापित की गई हैं:
- जीरा मंडी: मेड़ता सिटी (नागौर), जोधपुर।
- संतरा मंडी: भवानीमंडी (झालावाड़)।
- किन्नू/माल्टा: श्रीगंगानगर।
- प्याज मंडी: अलवर।
- अमरूद मंडी: सवाई माधोपुर।
- ईसबगोल मंडी: भीनमाल (जालौर)।
- मूंगफली मंडी: बीकानेर।
- धनिया मंडी: रामगंजमंडी (कोटा)।
- फूल मंडी: मुहाना (जयपुर) और पुष्कर (अजमेर)।
- मेंहदी मंडी: सोजत (पाली) – सोजत की मेंहदी को GI टैग प्राप्त है।
- लहसुन मंडी: छिपाबड़ौद (बारां)।
- अश्वगंधा मंडी: झालरापाटन (झालावाड़)।
- टिंडा मंडी: शाहपुरा (जयपुर)।
- टमाटर मंडी: बस्सी (जयपुर)।
- मिर्च मंडी: टोंक।
- सोनामुखी मंडी: सोजत (पाली)।
- आंवला मंडी: चौमूं (जयपुर)।
14. निष्कर्ष
राजस्थान की कृषि व्यवस्था, प्राकृतिक चुनौतियों के बावजूद, विविधतापूर्ण और प्रगतिशील है। बाजरा, सरसों, ग्वार और बीजीय मसालों में राज्य का राष्ट्रीय स्तर पर एकाधिकार या प्रमुख स्थान है। राज्य सरकार की नीतियां, जैसे ‘कृषि प्रसंस्करण नीति’ और ‘ड्रिप सिंचाई का प्रोत्साहन’, कृषि को निर्वाह खेती से निकालकर व्यावसायिक खेती की ओर ले जा रही हैं। भविष्य में जल संरक्षण तकनीकों और जैविक खेती के व्यापक अंगीकरण से राजस्थान की कृषि अर्थव्यवस्था और अधिक सुदृढ़ होगी।
