1. मेवाड़ — परिचय एवं भौगोलिक पहचान
मेवाड़ राजस्थान के इतिहास में सर्वाधिक गौरवशाली, संघर्षशील और स्वाभिमानी क्षेत्र के रूप में प्रतिष्ठित है। वर्तमान उदयपुर, राजसमंद, चित्तौड़गढ़ एवं प्रतापगढ़ सहित उनके निकटवर्ती भूभाग को संयुक्त रूप से ‘मेवाड़’ के नाम से जाना जाता है।
मेवाड़ के प्राचीन नाम — परीक्षा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण
| प्राचीन नाम | विशेष विवरण |
|---|---|
| शिवि | सबसे प्राचीन नाम — शिवि जनपद (महाभारत काल) |
| प्राग्वाट | प्राचीन साहित्यिक ग्रंथों में उल्लिखित |
| मेद्पाट | मेर/मेद् जनजाति के आधिपत्य के कारण |
| मेवाड़ | मेद्पाट का अपभ्रंश → वर्तमान प्रचलित नाम |
💡 परीक्षा ट्रिक: मेवाड़ के 3 प्राचीन नाम — “शि-प्रा-मेद” = शिवि + प्राग्वाट + मेद्पाट। यह ट्रिक अक्सर 1 MCQ बचाती है!
मेद्पाट नाम की उत्पत्ति: यह माना जाता है कि इस प्रदेश पर प्रारंभ में मेर अथवा मेद् नामक जनजाति का आधिपत्य था। इसी जनजाति के नाम पर यह क्षेत्र मेद्पाट कहलाया, और कालांतर में इसका अपभ्रंश ‘मेवाड़’ हो गया।
ऐतिहासिक स्रोत: रावल समरसिंह के शासनकाल की चित्तौड़ प्रशस्ति से गुहिल वंश की विभिन्न शाखाओं के विषय में महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त होती है।
🔍 2. गुहिलों की उत्पत्ति — इतिहासकारों के विभिन्न मत
गुहिल वंश की उत्पत्ति को लेकर इतिहासकारों में पर्याप्त मतभेद हैं। इस विषय पर विभिन्न विद्वानों के मत निम्नलिखित हैं:
इतिहासकारों के मतों की तुलनात्मक सारणी
| इतिहासकार/स्रोत | मत (गुहिलों की उत्पत्ति) | आधार |
|---|---|---|
| अबुल फजल (मुगलकालीन) | ईरान के बादशाह नौशेरवां आदिल के वंशज | फारसी तवारीखें |
| डी. आर. भण्डारकर | ब्राह्मण वंश | पुरालेखीय/Epigraphical साक्ष्य |
| डॉ. गोपीनाथ शर्मा | ब्राह्मण वंश | भण्डारकर के मत का समर्थन |
| मुहणोत नैणसी | मूलतः ब्राह्मण, बाद में क्षत्रिय | लेखन में दोहरा मत |
| डॉ. गौरीशंकर ओझा | विशुद्ध सूर्यवंशी क्षत्रिय | विस्तृत शोध |
| कर्नल जेम्स टॉड | विदेशी मूल (वल्लभी की घटना) | जैन ग्रंथ + फारसी तवारीख |
💡 परीक्षा बिंदु: RAS परीक्षाओं में “गुहिलों को सूर्यवंशी क्षत्रिय किसने माना?” पूछा जाता है — उत्तर: डॉ. गौरीशंकर हीराचंद ओझा।
📖 कर्नल टॉड का वल्लभी सिद्धांत
कर्नल जेम्स टॉड ने जैन ग्रंथों के आधार पर गुहिल वंश की उत्पत्ति के संबंध में एक विस्तृत विवरण प्रस्तुत किया:
- 524 ई. में गुजरात स्थित वल्लभी पर विदेशी आक्रांताओं ने आक्रमण किया।
- उस समय वल्लभी के शासक शिलादित्य की गर्भवती रानी पुष्पावती सिरोही में अम्बा भवानी की तीर्थयात्रा पर थीं।
- रानी पुष्पावती इस विनाश से बच निकलीं और एक गुफा में उन्होंने एक बालक को जन्म दिया।
- गुफा में जन्म होने के कारण वह बालक:
- गोह, गुहिल अथवा गुहदर कहलाया।
- इसी गुहिल ने मेवाड़ में गुहिल राजवंश की मौलिक नींव रखी।
⚠️ परीक्षा सावधानी: यह टॉड का मत है और इसे ऐतिहासिक रूप से काल्पनिक भी माना जाता है। परीक्षा में “टॉड के अनुसार” पूछा जाए तो यही उत्तर देना है।
👑 3. गुहिल वंश के संस्थापक
| भूमिका | व्यक्ति | विवरण |
|---|---|---|
| वंश के मूल संस्थापक | गुहिल | गुफा में जन्मे — वंश का नाम इन्हीं पर |
| साम्राज्य के वास्तविक संस्थापक | बप्पा रावल (कालभोज) | 728-753 ई. |
💡 परीक्षा ट्रिक: “गुहिल = वंश का नाम; बप्पा रावल = साम्राज्य का संस्थापक” — दोनों में अंतर याद रखें।
⚔️ 4. बप्पा रावल (728–753 ई.) — मेवाड़ साम्राज्य के वास्तविक संस्थापक
बप्पा रावल मेवाड़ के इतिहास का वह सूर्य हैं जिनकी चमक सदियों बाद भी फीकी नहीं पड़ी। उनका असली नाम, उनकी उपाधियाँ, उनके विजय अभियान और उनके धार्मिक योगदान — सभी परीक्षा की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
📋 बप्पा रावल — मूल परिचय
| विवरण | तथ्य |
|---|---|
| वास्तविक/मूल नाम | कालभोज |
| उपाधि | बप्पा रावल (हारीत ऋषि द्वारा प्रदत्त) |
| शासनकाल | 728–753 ई. |
| वंश | गुहिल (Guhil) |
| गुरु | हारीत ऋषि |
| सम्प्रदाय | पाशुपत सम्प्रदाय |
| आराध्य देव | एकलिंगजी |
| प्रारम्भिक राजधानी | नागदा |
| महत्वपूर्ण विजय | मौर्य शासक मान मोरी को पराजित किया (734 ई.) |
🏆 बप्पा रावल की विजय एवं उपलब्धियाँ
(i) मौर्य शासक मान मोरी को पराजित करना (734 ई.)
- बप्पा रावल ने 734 ई. में तत्कालीन मौर्य शासक मान मोरी को पराजित कर चित्तौड़ पर अपनी सत्ता स्थापित की।
- कविराजा श्यामलदास ने अपने ग्रंथ ‘वीर विनोद’ में भी बप्पा द्वारा मौर्यों से चित्तौड़ दुर्ग छीनने का समय 734 ई. ही बताया है।
(ii) धारण की गई उपाधियाँ
चित्तौड़ पर अधिकार के पश्चात बप्पा ने तीन महत्वपूर्ण उपाधियाँ धारण कीं:
| उपाधि | महत्व |
|---|---|
| हिन्दू सूर्य | हिन्दू धर्म के रक्षक के रूप में |
| राजगुरु | धार्मिक और राजनीतिक सर्वोच्चता |
| चक्कवै (चक्रवर्ती) | सम्राट की उपाधि |
🪙 बप्पा रावल के सिक्के — महत्वपूर्ण परीक्षा बिंदु
बप्पा के शासनकाल के तांबे एवं स्वर्ण सिक्के प्राप्त हुए हैं:
| विवरण | तथ्य |
|---|---|
| स्वर्ण सिक्के का वजन | 119 ग्रेन |
| सिक्कों पर अंकित चिह्न | कामधेनु, शिवलिंग, बछड़ा, नन्दी, दण्डवत पुरुष, त्रिशूल, चमर |
| सिक्कों से प्रमाण | बप्पा के शैव मतानुयायी होने का प्रमाण |
🛕 बप्पा रावल और एकलिंगजी — धार्मिक योगदान
यह विषय परीक्षाओं में बार-बार पूछा जाता है:
- बप्पा रावल पाशुपत सम्प्रदाय के अनुयायी थे (हारीत ऋषि उनके गुरु थे)।
- उन्होंने पाशुपत सम्प्रदाय के प्रमुख देवता एकलिंगजी को अपना आराध्य देव स्वीकार किया।
- कैलाशपुरी (उदयपुर) में एकलिंगजी के भव्य मंदिर का निर्माण करवाया।
- बप्पा ने एकलिंगजी को मेवाड़ का वास्तविक शासक घोषित किया।
- स्वयं को एकलिंगजी का दीवान (प्रधानमंत्री) माना।
- तब से आज तक मेवाड़ के महाराणा स्वयं को एकलिंगजी का दीवान ही मानते हैं।
🔑 परीक्षा बिंदु: “मेवाड़ का वास्तविक शासक किसे माना जाता है?” — उत्तर: एकलिंगजी (बप्पा रावल की स्थापना से)।
📍 बप्पा रावल — अन्य महत्वपूर्ण तथ्य
| तथ्य | विवरण |
|---|---|
| देहावसान स्थान | नागदा |
| समाधि स्थल | एकलिंगजी (कैलाशपुरी) से 1 मील की दूरी पर |
| रावलपिंडी का नाम | माना जाता है कि बप्पा के सैन्य ठिकानों के कारण पाकिस्तान के शहर रावलपिंडी का नाम पड़ा |
| इतिहासकार सी.वी. वैद्य की तुलना | चार्ल्स मार्टेल से (मुस्लिम सेनाओं को पराजित करने वाले फ्रांसीसी सेनापति) |
❓ ‘बप्पा रावल’ — नाम या उपाधि? विवाद
यह एक महत्वपूर्ण विवाद है जो परीक्षाओं में पूछा जाता है:
| विचारक/स्रोत | मत |
|---|---|
| डॉ. रामप्रसाद | ‘बप्पा रावल’ किसी व्यक्ति का नाम न होकर एक उपाधि था |
| श्यामलदास (‘वीर विनोद’) | बप्पा एक उपाधि है |
| नैणसी और टॉड | बप्पा रावल का मूल नाम कालभोज था; हारीत ऋषि ने ‘बप्पा रावल’ की उपाधि दी |
| रणकपुर प्रशस्ति | बप्पा रावल और कालभोज दो अलग-अलग व्यक्ति बताए गए हैं |
💡 परीक्षा ट्रिक: “नाम = कालभोज; उपाधि = बप्पा रावल” — यही सर्वाधिक प्रचलित और स्वीकृत मत है।
🏛️ 5. बप्पा के उत्तराधिकारी — अल्लट तक
बप्पा के तात्कालिक उत्तराधिकारियों के बारे में प्रामाणिक सूचनाएं सीमित हैं। किंतु अल्लट (जिन्हें ‘आलु-रावल’ भी कहा जाता है) के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी उपलब्ध है।
अल्लट के बारे में प्रमुख तथ्य
| विवरण | तथ्य |
|---|---|
| विवाह | हूण राजकुमारी हरियादेवी से (राजनीतिक गठबंधन) |
| दूसरी राजधानी | आहड़ (इससे पूर्व नागदा राजधानी थी) |
| आहड़ का महत्व | उस समय आहड़ एक समृद्ध नगर और बड़ा व्यापारिक केंद्र था |
| नौकरशाही | माना जाता है कि अल्लट ने मेवाड़ में सर्वप्रथम नौकरशाही का गठन किया |
| मंदिर निर्माण | आहड़ में वराह मंदिर का निर्माण |
💡 परीक्षा बिंदु: “आहड़ को मेवाड़ की दूसरी राजधानी किसने बनाया?” — अल्लट।
🌿 6. गुहिल वंश की दो प्रमुख शाखाएं — अत्यंत महत्वपूर्ण
यह विषय परीक्षाओं में सर्वाधिक पूछा जाने वाला है। गुहिल वंश में विक्रमसिंह के पुत्र रणसिंह (कर्णसिंह) के दो पुत्र हुए, जिनसे दो अलग-अलग शाखाओं का उद्भव हुआ:
रणसिंह (कर्णसिंह)├── क्षेमसिंह ──────→ रावल शाखा (मुख्य शाखा)│ (चित्तौड़ पर शासन → 1303 में समाप्त)│└── राहप ───────────→ राणा शाखा / सिसोदिया वंश (सीसोदा ग्राम से — राजधानी)
रावल शाखा बनाम राणा/सिसोदिया शाखा
| विवरण | रावल शाखा | राणा/सिसोदिया शाखा |
|---|---|---|
| संस्थापक | क्षेमसिंह | राहप (सीसोदा ग्राम) |
| शासन केंद्र | चित्तौड़ (मुख्य सत्ता) | सीसोदा ग्राम (जागीर) |
| अंत/परिवर्तन | 1303 में अलाउद्दीन की विजय से समाप्त | 1303 के बाद मेवाड़ के शासक बने |
| उपाधि | रावल | महाराणा/राणा |
| वंश नाम | गुहिल | सिसोदिया |
🔑 परीक्षा ट्रिक: “रावल = क्षेमसिंह की संतान; राणा = राहप की संतान” — यह एक sentence याद कर लें।
क्षेमसिंह के पुत्र और मेवाड़ का विवाद
क्षेमसिंह के दो पुत्र थे:
- सामंतसिंह — इनसे कीतू चौहान (कीर्तिपाल) ने मेवाड़ का राज्य छीन लिया।
- कुमारसिंह — इन्होंने कालांतर में कीर्तिपाल से मेवाड़ पुनः प्राप्त किया।
👑 7. जैत्रसिंह (1213–1253 ई.) — ‘मध्यकालीन मेवाड़ का स्वर्णकाल’
कुमारसिंह के वंशज जैत्रसिंह गुहिल वंश के सबसे प्रतापी शासकों में से एक थे।
जैत्रसिंह की उपलब्धियाँ
(i) सोनगरा चौहान उदयसिंह पर विजय
- जैत्रसिंह ने पूर्वजों के अपमान का प्रतिशोध लेने के लिए सोनगरा चौहान उदयसिंह पर आक्रमण किया।
- पराजय निश्चित देखकर उदयसिंह ने अपनी पुत्री रूपादेवी (चचिकदेवी) का विवाह जैत्रसिंह के पुत्र तेजसिंह से कर संधि की।
(ii) इल्तुतमिश को परास्त करना — सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि
| विवरण | तथ्य |
|---|---|
| आक्रमणकारी | दिल्ली सुल्तान इल्तुतमिश |
| आक्रमण का लक्ष्य | नागदा |
| संभावित तिथि | 1222–1229 ई. के मध्य |
| परिणाम | जैत्रसिंह ने इल्तुतमिश को सफलतापूर्वक परास्त कर दिया |
| पुष्टि | आबू व चीरवा शिलालेखों से; जयसिंह सूरि रचित ‘हम्मीर मद मर्दन’ |
| दुष्परिणाम | युद्ध के कारण नागदा को भारी क्षति → राजधानी चित्तौड़ स्थानांतरित |
| कर्नल टॉड का मत | 1231 ई. में नागौर के निकट इल्तुतमिश की सेना को परास्त किया |
🔑 परीक्षा बिंदु: जैत्रसिंह ने राजधानी नागदा से चित्तौड़ क्यों स्थानांतरित की? — क्योंकि इल्तुतमिश से युद्ध में नागदा को भारी क्षति पहुँची।
(iii) नासिरुद्दीन महमूद का आक्रमण (1248 ई.)
- दिल्ली के सुल्तान नासिरुद्दीन महमूद ने लगभग 1248 ई. में मेवाड़ पर आक्रमण किया।
- फरिश्ता के अनुसार, इस आक्रमण का कारण था — सुल्तान का भाई जलालुद्दीन चित्तौड़ के आसपास के क्षेत्रों में छिप गया था।
- नासिरुद्दीन उसे पकड़ने में असफल रहा और दिल्ली लौट गया।
📣 जैत्रसिंह पर इतिहासकारों के उद्गार
| इतिहासकार | उद्गार/मत |
|---|---|
| डॉ. गौरीशंकर हीराचंद ओझा | “दिल्ली के गुलाम वंश के सुल्तानों के समय में मेवाड़ के राजाओं में सबसे प्रतापी और बलवान राजा जैत्रसिंह ही हुआ, जिसकी वीरता की प्रशंसा उसके विपक्षियों ने भी की है।” |
| डॉ. दशरथ शर्मा | जैत्रसिंह के शासनकाल को ‘मध्यकालीन मेवाड़ का स्वर्णकाल’ और ‘मेवाड़ की नवशक्ति का संचारक’ कहा |
💡 परीक्षा ट्रिक: “जैत्रसिंह = मेवाड़ का स्वर्णकाल” — दशरथ शर्मा का यह उद्धरण अक्सर Match-the-Column में आता है।
जैत्रसिंह — संक्षिप्त तथ्य सारणी
| विवरण | तथ्य |
|---|---|
| शासनकाल | 1213–1253 ई. |
| राजवंश | गुहिल (कुमारसिंह के वंशज) |
| प्रमुख शत्रु | इल्तुतमिश + नासिरुद्दीन महमूद |
| राजधानी परिवर्तन | नागदा → चित्तौड़ |
| ऐतिहासिक स्थान | डॉ. दशरथ शर्मा के अनुसार — मेवाड़ का स्वर्णकाल |
| उत्तराधिकारी | पुत्र तेजसिंह |
📝 Part 1 — विगत वर्षों के प्रश्न (PYQs)
Q1. मेवाड़ का प्राचीन नाम क्या था, जो वहाँ की प्रमुख जनजाति के नाम पर पड़ा?
- (A) शिवि (B) प्राग्वाट (C) मेद्पाट ✓ (D) मेद्भूमि
व्याख्या: मेर/मेद् जनजाति के आधिपत्य के कारण यह क्षेत्र मेद्पाट कहलाया।
Q2. बप्पा रावल का वास्तविक/मूल नाम क्या था?
- (A) गुहिल (B) कालभोज ✓ (C) बप्पा (D) नागादित्य
व्याख्या: नैणसी और टॉड दोनों के अनुसार बप्पा रावल का मूल नाम कालभोज था।
Q3. बप्पा रावल ने किस मौर्य शासक को पराजित कर चित्तौड़ पर अधिकार किया?
- (A) चन्द्रमोरी (B) शिलादित्य (C) मान मोरी ✓ (D) भीमसिंह
Q4. एकलिंगजी मंदिर का निर्माण किसने करवाया?
- (A) जैत्रसिंह (B) बप्पा रावल ✓ (C) राणा कुंभा (D) समरसिंह
Q5. बप्पा रावल के स्वर्ण सिक्के का वजन कितना था?
- (A) 100 ग्रेन (B) 110 ग्रेन (C) 119 ग्रेन ✓ (D) 125 ग्रेन
Q6. गुहिल वंश की राणा शाखा (सिसोदिया) की स्थापना किसने की?
- (A) क्षेमसिंह (B) राहप ✓ (C) रणसिंह (D) सामंतसिंह
व्याख्या: राहप ने सीसोदा ग्राम की स्थापना कर राणा शाखा की नींव डाली।
Q7. आहड़ को मेवाड़ की दूसरी राजधानी किसने बनाया?
- (A) बप्पा रावल (B) जैत्रसिंह (C) अल्लट ✓ (D) क्षेमसिंह
Q8. जैत्रसिंह के शासनकाल को ‘मध्यकालीन मेवाड़ का स्वर्णकाल’ किसने कहा?
- (A) डॉ. ओझा (B) कर्नल टॉड (C) डॉ. दशरथ शर्मा ✓ (D) डॉ. भण्डारकर
Q9. बप्पा रावल किस सम्प्रदाय के अनुयायी थे?
- (A) वैष्णव (B) जैन (C) पाशुपत ✓ (D) शाक्त
Q10. नागदा से चित्तौड़ राजधानी परिवर्तन का मुख्य कारण क्या था?
- (A) बाढ़ (B) भूकम्प (C) इल्तुतमिश के आक्रमण से नागदा को क्षति ✓ (D) आर्थिक कारण
Q11. किस इतिहासकार ने बप्पा रावल की तुलना ‘चार्ल्स मार्टेल’ से की?
- (A) डॉ. ओझा (B) टॉड (C) सी. वी. वैद्य ✓ (D) दशरथ शर्मा
Q12. निम्न में से कौन-सा कथन सही नहीं है?
- (A) बप्पा रावल का मूल नाम कालभोज था ✓ सही
- (B) अल्लट ने हूण राजकुमारी से विवाह किया ✓ सही
- (C) जैत्रसिंह ने राजधानी चित्तौड़ से नागदा स्थानांतरित की ✗ गलत (उत्तर C)
- (D) एकलिंगजी को मेवाड़ का वास्तविक शासक माना जाता है ✓ सही
व्याख्या: राजधानी नागदा से चित्तौड़ स्थानांतरित की — न कि चित्तौड़ से नागदा।
🗝️ स्मरणीय संकेत (Memory Tricks)
| विषय | ट्रिक |
|---|---|
| मेवाड़ के 3 प्राचीन नाम | “शि-प्रा-मेद” = शिवि + प्राग्वाट + मेद्पाट |
| बप्पा रावल की 3 उपाधियाँ | “हिरा-चक्क” = हिन्दू सूर्य + राजगुरु + चक्कवै |
| बप्पा का मूल नाम | “कालभोज = बप्पा” (कालभोज ने भोज [राज्य] काला/हासिल किया) |
| रावल/राणा शाखा | “क्षेमसिंह = रावल; राहप = राणा” (राहप ने राणा बनाया) |
| जैत्रसिंह = स्वर्णकाल | “जैत = दशरथ का स्वर्ण” (दशरथ शर्मा ने स्वर्णकाल कहा) |
| इल्तुतमिश → नागदा | “इल्तु आया, नागदा गया, चित्तौड़ आया” |
📚 Quick Revision Box
मेवाड़ के प्राचीन नाम : शिवि, प्राग्वाट, मेद्पाट
गुहिल वंश संस्थापक : गुहिल (वंश) | बप्पा रावल (साम्राज्य)
बप्पा रावल (असली नाम कालभोज)
→ शासनकाल: 728-753 ई.
→ मौर्य मान मोरी को पराजित: 734 ई.
→ उपाधि: हिन्दू सूर्य, राजगुरु, चक्कवै
→ एकलिंगजी मंदिर: कैलाशपुरी (उदयपुर)
→ समाधि: नागदा (एकलिंगजी से 1 मील)
→ सिक्के: 119 ग्रेन स्वर्ण
अल्लट → आहड़ राजधानी | हूण राजकुमारी | वराह मंदिर
दो शाखाएं: क्षेमसिंह (रावल) | राहप (राणा/सिसोदिया)
जैत्रसिंह (1213-1253): इल्तुतमिश परास्त | स्वर्णकाल (दशरथ शर्मा)
→ राजधानी नागदा → चित्तौड़
















