राजस्थान की नदियाँ (बंगाल की खाड़ी तंत्र की नदियाँ)

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राजस्थान की नदियाँ

राजस्थान का एक महत्वपूर्ण भूभाग मरुस्थलीय होने के कारण, यहाँ नदियों का विशेष महत्व है। विशेष रूप से, पश्चिमी क्षेत्र में सिंचाई के संसाधनों की कमी के परिणामस्वरूप, इन जलधाराओं की प्रासंगिकता और भी अधिक बढ़ जाती है।

जलग्रहण क्षेत्र (Catchment Area)

प्रत्येक नदी एक विशिष्ट भौगोलिक क्षेत्र से अपने जल का संचय करती है, जिसे ‘जलग्रहण क्षेत्र‘ की संज्ञा दी जाती है। किसी एक मुख्य नदी और उसकी सहायक नदियों द्वारा सिंचित सम्पूर्ण भू-भाग को ‘अपवाह द्रोणी‘ कहा जाता है। वह सीमा जो एक अपवाह द्रोणी को दूसरी से पृथक करती है, ‘जल विभाजक‘ अथवा ‘जल-संभर‘ कहलाती है। वृहद नदियों के जलग्रहण क्षेत्र को सामान्यतः नदी द्रोणी कहा जाता है, जबकि अपेक्षाकृत छोटी नदियों एवं नालों द्वारा अपवाहित क्षेत्र को ‘जल-संभर‘ के रूप में जाना जाता है। आकार की दृष्टि से, नदी द्रोणी का विस्तार अधिक होता है, जबकि जल-संभर का आकार छोटा होता है।

राजस्थान के अपवाह तंत्र का वर्गीकरण

अपवाह तंत्र का तात्पर्य नदियों एवं उनकी सहायक धाराओं के उस जाल से है जो मिलकर एक एकीकृत तंत्र या प्रारूप का निर्माण करती हैं। राजस्थान में, चम्बल ही एकमात्र नदी है जो वर्ष भर प्रवाहित होती है। राज्य के अपवाह तंत्र का निर्धारण मुख्य रूप से अरावली पर्वत श्रृंखलाएँ करती हैं। अरावली पर्वतमाला राजस्थान में एक मौलिक जल विभाजक के रूप में कार्य करती है, जो राज्य में बहने वाली नदियों को दो प्रमुख भागों में विभाजित करती है। इसके अतिरिक्त, राज्य में अंतःप्रवाही नदियों का भी अस्तित्व है। इसी प्राथमिक आधार पर, राजस्थान की नदियों को निम्नलिखित तीन मुख्य समूहों में वर्गीकृत किया जाता है:

(i) बंगाल की खाड़ी का अपवाह तंत्र, (ii) अरब सागर का अपवाह तंत्र, एवं (iii) आंतरिक अपवाह तंत्र।

राजस्थान की नदियाँ
राजस्थान की नदियाँ (बंगाल की खाड़ी तंत्र की नदियाँ)

(i) बंगाल की खाड़ी का अपवाह तंत्र

1. चम्बल नदी (चर्मण्वती, नित्यवाही, सदानीरा, कामधेनु)

राजस्थान की सर्वाधिक लम्बी नदियों में से एक, चम्बल नदी का उद्गम स्थल मध्य प्रदेश के महू जिले में स्थित जानापाव की पहाड़ियाँ हैं। यह नदी दक्षिण से उत्तर दिशा की ओर प्रवाहित होते हुए राजस्थान के चित्तौड़गढ़ जिले में चौरासीगढ़ नामक स्थान से प्रवेश करती है। इसके पश्चात यह कोटा एवं बूंदी जिलों से होकर बहती है तथा सवाई माधोपुर, करौली, और धौलपुर जिलों में राजस्थान एवं मध्य प्रदेश के मध्य एक प्राकृतिक सीमा का निर्माण करती है। अंततः, यह उत्तर प्रदेश के इटावा जिले में मुरादगंज नामक स्थान पर यमुना नदी में समाहित हो जाती है। इस नदी की कुल लम्बाई लगभग 966 किलोमीटर है, जिसमें से यह राजस्थान में 135 किलोमीटर की दूरी तय करती है। यह मध्य प्रदेश के साथ 250 किलोमीटर लम्बी एक महत्वपूर्ण अन्तर्राज्यीय सीमा भी बनाती है। यह भारत की एकमात्र प्रमुख नदी है जो दक्षिण से उत्तर दिशा की ओर बहती है। मध्य प्रदेश में यह नदी महू, मंदसौर, उज्जैन और रतलाम जिलों से होकर गुजरती है।

चम्बल राजस्थान की एकमात्र नदी है जो अन्तर्राज्यीय सीमा का निर्माण करती है। राजस्थान और मध्य प्रदेश के मध्य इस नदी पर चम्बल घाटी परियोजना स्थापित की गई है, जिसके अंतर्गत चार प्रमुख बाँध निर्मित किए गए हैं। इनमें से तीन बाँध राजस्थान में स्थित हैं, जबकि एक मध्य प्रदेश में है। राजस्थान में स्थित तीन बाँध राणा प्रताप सागर बाँध, जवाहर सागर बाँध और कोटा बैराज हैं। मध्य प्रदेश में स्थित बाँध का नाम गांधी सागर बाँध है।

चित्तौड़गढ़ के रावतभाटा में प्रवेश करने के उपरांत, चम्बल नदी पर राणा प्रताप सागर बाँध का निर्माण किया गया है। इसके आगे कोटा जिले में, इस पर जवाहर सागर बाँध और कोटा बैराज सिंचाई बाँध बनाए गए हैं।

चम्बल नदी पर बने बाँधों का दक्षिण से उत्तर की ओर क्रम इस प्रकार है – गांधी सागर बाँध, राणा प्रताप सागर बाँध, जवाहर सागर बाँध और कोटा बैराज। चम्बल पर स्थित चार बाँधों में से तीन पर जलविद्युत उत्पादन संयंत्र स्थापित हैं, जबकि कोटा बैराज का उपयोग मुख्य रूप से सिंचाई के लिए होता है। चम्बल नदी पर निर्मित सबसे बड़ा बाँध गांधी सागर बाँध है, जो राजस्थान में स्थित न होकर मध्य प्रदेश के मंदसौर जिले में अवस्थित है। वहीं, चम्बल पर स्थित राजस्थान का सबसे बड़ा बाँध राणा प्रताप सागर बाँध है, जो चित्तौड़गढ़ जिले के रावतभाटा में है। गांधी सागर बाँध की ऊँचाई 62.17 मीटर (204.0 फीट) है और इसकी भंडारण क्षमता 7.322 अरब घन मीटर है। इस बाँध की आधारशिला 7 मार्च 1954 को पंडित जवाहरलाल नेहरू द्वारा रखी गई थी, और इसका निर्माण कार्य 1960 में पूर्ण हुआ। इस बाँध में कुल 19 गेट हैं। इसके निर्माणकर्ता प्रमुख ठेकेदार द्वारका दास अग्रवाल थे, जिन्होंने इसे एशिया के सबसे किफायती बाँधों में से एक बनाया। बाँध के निचले भाग में एक 115-मेगावाट का पनबिजली स्टेशन है, जिसमें 23-23 मेगावाट की पाँच इकाइयाँ कार्यरत हैं।

चित्तौड़गढ़ में भैंसरोड़गढ़ के समीप जब बामनी नदी चम्बल में मिलती है, तो वहाँ चूलिया जलप्रपात का निर्माण होता है, जो 18 मीटर की ऊँचाई के साथ राजस्थान का सबसे ऊँचा जलप्रपात है। कोटा जिले के नौनेरा गाँव के पास काली सिंध नदी चम्बल में विलीन हो जाती है। सवाई माधोपुर के पालिया गाँव में पार्वती नदी इसमें मिलती है। सवाई माधोपुर में ही बनास एवं सीप नदियाँ चम्बल में मिलकर एक महत्वपूर्ण त्रिवेणी संगम का निर्माण करती हैं।

सहायक नदियाँ: इसकी प्रमुख सहायक नदियों में कालीसिंध, आहू, पार्वती, परवन, बनास, अलनिया, बामणी, कुराल, मेज, सीप, कुनु और छोटी कालीसिंध शामिल हैं। चम्बल की सबसे बड़ी सहायक नदी बनास है।

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राजस्थान के त्रिवेणी संगम

त्रिवेणी संगम स्थलनदियाँजिलाविशेष
साबंला (बेणेश्वर)सोम-माही-जाखमडूंगरपुरराजस्थान का कुंभ/आदिवासियों का महाकुंभ
मांडलगढ़ (बींगोद)बनास-बेड़च-मेनालभीलवाड़ामहत्वपूर्ण त्रिवेणी तीर्थ
मानपुर (रामेश्वर घाट)चम्बल-बनास-सीपसवाई माधोपुरवर्षों से अखण्ड संकीर्तन/श्रीजी मंदिर
राजमहलबनास-खारी-डोईटोंक 

डांग क्षेत्र

चम्बल नदी के प्रवाह क्षेत्र में स्थित गहरे खड्डों से युक्त भूमि, जहाँ वनों और वृक्षों की सघनता है, डांग क्षेत्र कहलाती है। लगभग 30-35 वर्ष पूर्व यह क्षेत्र दस्युओं की शरणस्थली के रूप में कुख्यात था, जिस कारण इसे ‘दस्यु प्रभावित क्षेत्र’ भी कहा जाता है।

तथ्य

राजस्थान में सर्वाधिक सतही जल की उपलब्धता चम्बल नदी में है, जिसके पश्चात क्रमशः बनास, माही और लूनी नदियों का स्थान आता है।

चम्बल नदी कोटा और सवाई माधोपुर जिलों के साथ-साथ कोटा और बूंदी जिलों की भी सीमा का निर्धारण करती है।

अपनी गहरी घाटी में तीव्र प्रवाह के कारण चम्बल नदी को ‘वाटर सफारी’ के लिए भी जाना जाता है।

राज्य में सर्वाधिक अवनालिका अपरदन इसी नदी द्वारा होता है, जो एक गंभीर पर्यावरणीय चिंता का विषय है।

चम्बल नदी बूँदी जिले में केशोरायपाटन के निकट अपने सर्वाधिक गहरे स्वरूप में है।

यह राजस्थान की एकमात्र नदी है जिसे यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची के लिए नामित किया गया है।

चम्बल नदी राजस्थान में सर्वाधिक कंदराओं (गुफाओं) का निर्माण करने वाली नदी है।

चम्बल की सहायक नदी कुनु के नाम पर एक राष्ट्रीय उद्यान, कूनो राष्ट्रीय उद्यान, का नामकरण किया गया है, जो मध्य प्रदेश के श्योपुर जिले में स्थित है।

चम्बल नदी में ‘गांगेय सूस’ नामक स्तनपायी जीव पाया जाता है, जो इसके पारिस्थितिक महत्व को रेखांकित करता है।

चम्बल नदी के तट पर मुख्य रूप से कोटा में स्थित गरडिया महादेव का मंदिर और धौलपुर में स्थित अचलेश्वर महादेव मंदिर प्रमुख धार्मिक स्थल हैं।

भारत सरकार ने राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य को एक इको-सेंसिटिव ज़ोन के रूप में अधिसूचित किया है। इस अभयारण्य में गंगा डॉल्फ़िन और गंभीर रूप से लुप्तप्राय घड़ियाल पाए जाते हैं। इको-सेंसिटिव ज़ोन घोषित होने के कारण यहाँ रिसॉर्ट्स, होटल या अन्य आवासीय और औद्योगिक गतिविधियों के निर्माण पर कठोर प्रतिबंध लागू होते हैं। यह अभयारण्य प्राकृतिक रूप से घड़ियालों का सबसे बड़ा आवास स्थल है, जहाँ विश्व की लगभग 75% घड़ियाल आबादी निवास करती है।

पूर्वी राजस्थान नहर परियोजना (ERCP): यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण और महत्वाकांक्षी परियोजना है, जिसे 2025 तक प्राथमिकता के साथ आगे बढ़ाया जा रहा है। इस परियोजना का मुख्य उद्देश्य मानसून ऋतु में चम्बल और उसकी सहायक नदियों जैसे कूनू, पार्वती और कालीसिंध के अतिरिक्त जल को राजस्थान के 13 जल-संकटग्रस्त जिलों में स्थानांतरित करना है। 2024 में राजस्थान और मध्यप्रदेश सरकारों के बीच पार्वती- कालीसिंध-चम्बल (PKC) लिंक परियोजना को ERCP के साथ एकीकृत करने के लिए एक ऐतिहासिक समझौता हस्ताक्षरित किया गया है, जो इस परियोजना के कार्यान्वयन को और अधिक गति देगा।

काली सिंध

यह नदी मध्य प्रदेश के देवास जिले के बांगली गाँव से निकलती है। देवास, शाजापुर और राजगढ़ जिलों से प्रवाहित होने के पश्चात यह झालावाड़ के रायपुर में राजस्थान में प्रवेश करती है। झालावाड़ और कोटा में बहने के बाद, यह कोटा के नौनेरा नामक स्थान पर चम्बल में मिल जाती है। आहू, परवन, निवाज, उजाड़ और चौली इसकी प्रमुख सहायक नदियाँ हैं। इस नदी पर कोटा में हरिशचन्द्र बाँध का निर्माण किया गया है।

आहू

इस नदी का उद्गम मध्य प्रदेश के मेंहदी गाँव से होता है। यह झालावाड़ के नन्दपुर में राजस्थान में प्रवेश करती है और झालावाड़ व कोटा की सीमा पर बहते हुए झालावाड़ के गागरोन नामक स्थान पर काली सिंध में विलीन हो जाती है।

तथ्य

झालावाड़ के गागरोन में कालीसिंध और आहू नदियों का संगम होता है। इसी अद्वितीय संगम पर प्रसिद्ध गागरोन का जल दुर्ग स्थित है, जो एक प्रमुख ऐतिहासिक धरोहर है।

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पीपलाज

पीपलाज नदी का उद्गम झालावाड़ की पंचपहाड़ तहसील की पहाड़ियों से होता है और यह झालावाड़ जिले में ही बाईं ओर से आहू नदी में मिल जाती है।

पार्वती

यह नदी मध्य प्रदेश के सिहोर क्षेत्र से निकलती है और बारां के करियाहट में राजस्थान में प्रवेश करती है। बारां और कोटा में बहने के बाद, यह सवाई माधोपुर और कोटा की सीमा पर स्थित पालिया गाँव के निकट चम्बल में समाहित हो जाती है। अंधेरी, रेतीली, अहेली, ल्हासी, बैथली, बिलास और कूल इसकी मुख्य सहायक नदियाँ हैं।

तथ्य

रामगढ़ की गोलाकार पहाड़ियाँ, जो बारां में स्थित हैं, पार्वती और उसकी सहायक नदी के मध्य अवस्थित हैं।

पार्वती परियोजना धौलपुर जिले में स्थित एक महत्वपूर्ण सिंचाई परियोजना है।

परवन

यह अजनार और घोड़ा पछाड़ नामक दो धाराओं के संयुक्त रूप से बनती है। इसका उद्गम मध्य प्रदेश के विंध्याचल से होता है। यह झालावाड़ के मनोहर थाना में राजस्थान में प्रवेश करती है और झालावाड़ व बारां में बहने के बाद, बारां के पलायता गाँव के निकट काली सिंध में मिल जाती है। निमाज (नेवज), छापी, कालीखाड़ (घोड़ापछाड़) और धार इसकी प्रमुख सहायक नदियाँ हैं।

मनोहर थाना का किला परवन और उसकी सहायक नदी कालीखाड़ के संगम पर स्थित है। शेरगढ़ वन्यजीव अभयारण्य परवन नदी के बाएँ किनारे पर बारां जिले में स्थित है। इसी अभयारण्य के पास परवन नदी के बाएँ किनारे पर शेरगढ़ का किला (कोषवर्धन किला) भी स्थित है।

कुनु नदी

कुनु नदी का उद्गम मध्य प्रदेश के गुना से होता है और यह बारां जिले के मुसेरी गाँव (शाहबाद) में प्रवेश करती है। बारां जिले से यह पुनः मध्य प्रदेश में प्रवाहित होकर करौली की सीमा पर चम्बल में मिल जाती है। कराई और रेम्पी इसकी सहायक नदियाँ हैं।

चाकण नदी

चाकण नदी का निर्माण बूँदी जिले के कई छोटे-छोटे नदी-नालों के मिलने से होता है, जो अंततः सवाई माधोपुर के करणपुरा गाँव में चम्बल नदी में विलीन हो जाती है।

मेज

मेज नदी का उद्गम भीलवाड़ा के मांडलगढ़ से होता है और यह बूँदी जिले में प्रवाहित होकर लाखेरी (बूँदी) के निकट चम्बल नदी में मिलती है। बाजन, कुराल और मांगली मेज नदी की प्रमुख सहायक नदियाँ हैं। घोड़ा पछाड़ नदी मांगली की सहायक नदी है। यह उल्लेखनीय है कि भीमलत जलप्रपात बूँदी जिले में मांगली नदी पर स्थित है। कुराल नदी बूँदी जिले में बहती है।

बनास नदी (वन की आशा, वर्णाशा, वशिष्ठि)

पूर्णतः राजस्थान के भीतर प्रवाह की दृष्टि से सबसे लम्बी नदी, बनास का उद्गम राजसमंद में कुम्भलगढ़ के निकट खमनोर की पहाड़ियों से होता है। यह राजसमंद से चित्तौड़गढ़, भीलवाड़ा, शाहपुरा, केकड़ी, और टोंक जिलों से होकर बहती हुई अंत में सवाई माधोपुर जिले में रामेश्वरम् नामक स्थान पर चम्बल नदी में समाहित हो जाती है। इस नदी की कुल लम्बाई लगभग 480 किलोमीटर है, जो पूर्ण रूप से राजस्थान की सीमाओं के भीतर है। इस प्रकार, बनास पूर्णतः राजस्थान में बहने वाली सबसे लंबी नदी है।

इस नदी पर दो मुख्य बाँध बनाए गए हैं:

(अ) बीसलपुर बाँध (टोंक)

(ब) ईसरदा बाँध (सवाई माधोपुर)

बीसलपुर बाँध से जयपुर जिले को पेयजल की आपूर्ति की जाती है, जो एक अत्यंत महत्वपूर्ण व्यवस्था है।

बीगोंद (भीलवाड़ा) – भीलवाड़ा जिले के बीगोंद नामक स्थान पर बनास नदी में बेड़च और मेनाल नदियाँ आकर मिलती हैं। केवल बेड़च और मेनाल ही बनास में दाईं ओर से मिलने वाली प्रमुख नदियाँ हैं।

सहायक नदियाँ: इसकी प्रमुख सहायक नदियों में बेड़च, गम्भीरी, कोठारी, मेनाल, खारी, डाई, माशी, मान्सी, बांडी, सोहादरा (सोडरा), मोरेल, ढूँढ, ढील और कालीसिल शामिल हैं।

बनास नदी का जलग्रहण क्षेत्र राजस्थान में सर्वाधिक (46,570 वर्ग किलोमीटर) है, जिसके बाद क्रमशः लूनी (34,250 वर्ग किलोमीटर), चम्बल (29,110 वर्ग किलोमीटर), और माही (16,030 वर्ग किलोमीटर) नदियों का स्थान आता है।

बेड़च नदी (आयड़)

इस नदी का उद्गम राजस्थान के उदयपुर जिले में गोगुंदा की पहाड़ियों से होता है। प्रारम्भ में इसे आयड़ नदी के नाम से जाना जाता है, किन्तु उदयसागर झील से निकलने के पश्चात यह नदी बेड़च कहलाती है। इसकी कुल लम्बाई लगभग 190 किलोमीटर है। यह नदी उदयपुर और चित्तौड़गढ़ जिलों से होकर बहती हुई अंत में भीलवाड़ा जिले के बिगोंद नामक स्थान पर बनास नदी में मिल जाती है। चित्तौड़गढ़ जिले में गम्भीरी नदी इसमें मिलती है।

लगभग 4000 वर्ष पूर्व, उदयपुर जिले में इसी नदी के तट पर ऐतिहासिक आहड़ सभ्यता का विकास हुआ था।

गंभीरी

इसका उद्गम मध्य प्रदेश की जावरा पहाड़ियों (रतलाम) से होता है। यह चित्तौड़गढ़ के निम्बाहेड़ा में राजस्थान में प्रवेश करती है और चित्तौड़गढ़ दुर्ग के पास बेड़च नदी में मिल जाती है।

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कोठारी

यह नदी राजसमंद में दिवेर से निकलती है। राजसमंद और भीलवाड़ा में बहने के बाद यह भीलवाड़ा के नन्दराय में बनास में मिल जाती है। भीलवाड़ा के मांडलगढ़ कस्बे में इस पर प्रसिद्ध मेजा बाँध बना हुआ है।

खारी

इसका उद्गम राजसमंद के बिजराल गाँव से होता है। यह राजसमंद, भीलवाड़ा, शाहपुरा, केकड़ी और टोंक जिलों में बहती हुई टोंक के देवली में बनास में मिल जाती है। शाहपुरा में इसमें मानसी नदी आकर मिलती है। भीलवाड़ा का आसिंद कस्बा इसी नदी के किनारे स्थित है।
नोट: बनास की सहायक नदी खारी का उद्गम राजसमंद जिले के देवगढ़ के निकट बिजराल की पहाड़ियों से होता है। इसके अतिरिक्त, एक अन्य खारी नदी लूनी की सहायक है जो सिरोही से निकलती है, तथा एक तीसरी खारी नदी डीडवाना-कुचामन से निकलकर सांभर झील में गिरती है।

मान्सी

मान्सी नदी भीलवाड़ा जिले के करेरा गाँव के पास से निकलकर केकड़ी और शाहपुरा जिलों की सीमा पर खारी नदी में मिल जाती है।

डाई

डाई नदी का उद्गम अजमेर जिले की नसीराबाद तहसील की अरावली पहाड़ियों से होता है और यह अजमेर, केकड़ी तथा टोंक जिलों में बहकर बिसलपुर के निकट बनास में मिल जाती है।

माशी

बनास की सहायक, माशी नदी, अजमेर के किशनगढ़ की पहाड़ियों से निकलकर अजमेर-दूदू से बहती हुई टोंक के गलोद गाँव में बनास नदी में मिलती है। जयपुर ग्रामीण की समोद पहाड़ियों से निकलने वाली बांडी नदी टोंक में माशी नदी में मिलती है। सोडरा (सोहादरा) नदी भी माशी की सहायक है। बीसलपुर बाँध के बाद बनास नदी में सबसे पहले माशी नदी टोंक में मिलती है, जिसके बाद ढील और मोरेल नदियाँ सवाई माधोपुर में मिलती हैं।

ढील

ढील (धील) नदी टोंक के बावली गाँव से निकलकर सवाई माधोपुर जिले में बनास में मिल जाती है। इसकी सहायक नदी गुडिया है।

मोरेल

इसका उद्गम जयपुर ग्रामीण के चैनपुरा (बस्सी) गाँव से होता है। यह जयपुर ग्रामीण, दौसा, गंगापुर सिटी और सवाई माधोपुर में बहती हुई सवाई माधोपुर के हाड़ौती गाँव के निकट बनास में मिल जाती है। सवाई माधोपुर के पिलूखेड़ा गाँव में इस पर महत्वपूर्ण मोरेल बाँध बना है।

कालीसिल

कालीसिल, मोरेल की एक सहायक नदी है, जो करौली से निकलकर सवाई माधोपुर में मोरेल नदी में मिलती है। प्रसिद्ध कैला देवी का मंदिर इसी कालीसिल नदी के किनारे स्थित है।

यह ध्यान रखना आवश्यक है कि कालीसिल मोरेल की सहायक है, जबकि कालीसिंध चम्बल की सहायक नदी है।

चंद्रभागा

चंद्रभागा नदी का उद्गम राजसमंद के आमेट से होता है और यह भीलवाड़ा में बनास नदी से मिल जाती है।

ढुंण्ढ/डुंण्ड

यह नदी जयपुर ग्रामीण के अजरोल/अचरोल से निकलती है। जयपुर और दौसा में बहने के बाद यह दौसा के लालसोट में मोरेल में मिल जाती है। इसी नदी के कारण जयपुर के आस-पास का क्षेत्र ‘ढुंढाड़’ कहलाता है।

बाणगंगा नदी

एक प्रचलित मान्यता के अनुसार, अर्जुन ने एक बाण से इसकी धारा को प्रकट किया था, जिस कारण इसे ‘अर्जुन की गंगा’ भी कहा जाता है। लगभग 380 किलोमीटर लम्बी इस नदी का उद्गम कोटपूतली-बहरोड़ जिले में बैराठ की पहाड़ियों से होता है। यह जयपुर ग्रामीण, दौसा, और भरतपुर में बहने के पश्चात उत्तर प्रदेश में आगरा के समीप फतेहाबाद नामक स्थान पर यमुना नदी में विलीन हो जाती है। हालांकि, हाल के दशकों में जल प्रवाह की कमी के कारण यह अक्सर अपने गंतव्य तक नहीं पहुँच पाती, जिस कारण कुछ विशेषज्ञ इसे ‘रुण्डित’ नदी मानकर आंतरिक अपवाह तंत्र में भी वर्गीकृत करते हैं।

इसकी मुख्य सहायक नदियों में गुमटी नाला और सूरी नदी हैं, जो इसके दाहिने किनारे पर मिलती हैं, तथा सांवन और पलासन नदियाँ इसके बाएँ किनारे पर मिलती हैं।
उपनाम: इसे खण्डित, रूण्डित व ताला नदी भी कहते हैं। इसी नदी के तट पर ऐतिहासिक बैराठ सभ्यता का विकास हुआ, जहाँ मौर्य युग के महत्वपूर्ण अवशेष प्राप्त हुए हैं।

गंभीर नदी

उंटगन नदी (गंभीर नदी) का उद्गम करौली जिले के महू के लांगरा गाँव की पहाड़ियों से होता है। यह भरतपुर जिले में बहती हुई उत्तर प्रदेश व राजस्थान की सीमा के साथ-साथ प्रवाहित होकर फतेहाबाद (उत्तर प्रदेश) जिले के रिहोली गाँव के पास यमुना नदी में मिल जाती है।

अरवारी नदी

अरवारी नदी का उद्गम अलवर जिले की सरिस्का पहाड़ियों में स्थित थानागाजी के पास सकरा बाँध से होता है। यह नदी लगभग मृत हो चुकी थी, परन्तु ‘तरुण भारत संघ’ और ‘जल पुरुष’ श्री राजेंद्र सिंह के अभूतपूर्व सामुदायिक प्रयासों से इसे पुनर्जीवित किया गया, जो जल संरक्षण का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। इसकी दो धाराएँ अजबगढ़-प्रतापगढ़ के पास पलसाना के पहाड़ नामक स्थान पर मिलकर अरवरी नदी के रूप में प्रवाहित होती हैं। यह आगे जाकर उंटगन (गंभीर) नदी में मिलती है।

नदियों के किनारे/संगम पर बने दुर्ग

दुर्ग का नामनदियों का संगम/किनाराजिला
गागरोन का किलाआहू व कालीसिंध नदी के संगम परझालावाड़
भैंसरोड़ दुर्गचम्बल व बामनी नदियों के संगम परचित्तौड़गढ़
शेरगढ़ (कोशवर्द्धन) दुर्गपरवन नदी के किनारेबारां
चित्तौड़गढ़ दुर्गगंभीरी और बेड़च नदियों के संगम के निकटचित्तौड़गढ़
मनोहर थाना दुर्गपरवन और कालीखाड़ नदियों के संगम परझालावाड़
गढ़ पैलेस, कोटा (कोटा दुर्ग)चम्बल नदी के किनारेकोटा

अस्वीकरण: यह सामग्री 2025 तक उपलब्ध नवीनतम जानकारी के अनुसार अद्यतन की गई है।

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