सांभर-अजमेर के चौहान: उद्गम से पृथ्वीराज तृतीय और तराइन के युद्ध तक
चौहान वंश राजस्थान के इतिहास का वह अध्याय है जिसके बिना न RPSC RAS की कोई परीक्षा पूरी होती है, न SI या Patwari की कोई आंसर-की। यह वंश केवल एक राजवंश नहीं, बल्कि उत्तर भारत में तुर्क आक्रमणों के विरुद्ध राजपूत प्रतिरोध की पहली बड़ी कहानी है। इस भाग में हम सांभर से अजमेर तक के सफर को, वासुदेव से पृथ्वीराज तृतीय तक की पूरी कड़ी को, और तराइन के उन दो युद्धों को विस्तार से समझेंगे जिन्होंने भारत की राजनीतिक दिशा ही बदल दी।
👑 1. चौहान वंश का उद्गम — किंवदंतियाँ और ऐतिहासिक मतभेद
चौहानों की उत्पत्ति को लेकर इतिहासकारों में आज तक एकमत नहीं है। हर स्रोत अपनी अलग कहानी कहता है, और परीक्षा की दृष्टि से यही भिन्नता सबसे ज्यादा पूछी जाती है।
पृथ्वीराज रासो — जिसकी रचना चंद बरदाई ने की — के अनुसार चौहानों का जन्म अग्निकुण्ड से हुआ। कथा यह है कि ऋषि वशिष्ठ ने आबू पर्वत पर एक यज्ञ किया, जिससे चार राजपूत वंश उत्पन्न हुए: प्रतिहार, परमार, चालुक्य और चौहान। मुहणोत नैणसी और सूर्यमल मिश्रण ने भी इसी मत का समर्थन किया।
🔑 परीक्षा बिंदु: अग्निकुल के चार वंश हैं — प्रतिहार, परमार, चालुक्य, चौहान। इनका क्रम और संख्या (चार) दोनों MCQ में पूछे जाते हैं।
दूसरी ओर पंडित गौरीशंकर ओझा चौहानों को सूर्यवंशी क्षत्रिय मानते हैं — यह मत अग्निकुल की कथा से पूरी तरह अलग है। इससे भी आगे बढ़कर बिजोलिया के शिलालेख में एक तीसरी ही बात कही गई है: यहाँ चौहानों को ब्राह्मण कुल से उत्पन्न बताया गया है। बिजौलिया प्रशस्ति में आदि पुरुष वासुदेव के लिए स्पष्ट शब्द है — वत्सगोत्रीय ब्राह्मण।
| उद्गम सिद्धांत | समर्थक स्रोत | मुख्य आधार |
|---|---|---|
| अग्निकुल मत | पृथ्वीराज रासो (चंदबरदाई), मुहणोत नैणसी, सूर्यमल मिश्रण | वशिष्ठ का आबू यज्ञ — 4 वंशों का जन्म |
| सूर्यवंशी मत | गौरीशंकर ओझा | चौहान सूर्यवंशी क्षत्रिय |
| ब्राह्मण कुल मत | बिजोलिया शिलालेख, बिजौलिया प्रशस्ति | वासुदेव को वत्सगोत्रीय ब्राह्मण कहा गया |
⚠️ परीक्षा सावधानी: छात्र अक्सर “बिजोलिया शिलालेख” और “बिजौलिया प्रशस्ति” को एक ही मान बैठते हैं और दोनों से एक जैसी जानकारी जोड़ देते हैं। दोनों अलग सन्दर्भों में याद रखें — एक उद्गम का ब्राह्मण-कुल मत बताता है, दूसरी वासुदेव के सांभर झील निर्माण व वत्सगोत्र का उल्लेख करती है।
💡 अनुभवी टिप्पणी: तीन परस्पर विरोधी मतों का एक साथ अस्तित्व यही दिखाता है कि मध्यकालीन प्रशस्तियाँ अक्सर राजवंश की दैवीय उत्पत्ति दिखाने के लिए लिखी जाती थीं, ऐतिहासिक प्रमाण के रूप में नहीं। परीक्षा में आपको “सही” उत्तर नहीं, “स्रोत-अनुसार सही” उत्तर चुनना होता है — यही अंतर समझना सबसे जरूरी है।
🗺️ 2. सांभर, शाकम्भरी और सपादलक्ष — मूल स्थान की पहचान
राजस्थान के संदर्भ में चौहानों का मूल स्थान सांभर माना जाता है। यह क्षेत्र शाकम्भरी देवी के तीर्थ से जुड़ा है, जिसे तीर्थों की नानी या देवयानी तीर्थ भी कहा जाता है। सांभर और उसके आसपास का यह विस्तृत क्षेत्र प्राचीन काल में सपादलक्ष कहलाता था — यानी सवा लाख गांवों का समूह।
प्रारम्भिक चौहान शासकों की राजधानी अहिच्छत्रपुर थी, जिसका उल्लेख हर्षनाथ की प्रशस्ति में मिलता है और जिसे आज नागौर के नाम से जाना जाता है।
सपादलक्ष के चौहानों का आदि पुरुष वासुदेव को माना जाता है, जिनका काल लगभग 551 ई. के आसपास रखा जाता है। बिजौलिया प्रशस्ति वासुदेव को सांभर झील का निर्माणकर्ता बताती है। शुरुआती दौर में चौहान प्रतिहारों के सामन्त के रूप में काम करते थे — यानी स्वतंत्र शासक नहीं, बल्कि किसी बड़ी सत्ता के अधीन एक छोटी सत्ता।
उसी वंश में गुवक प्रथम ने भगवान शंकर को समर्पित हर्षनाथ मंदिर बनवाया। एक रोचक प्रसंग चन्दराज की पत्नी रुद्राणी का है — वह योगिक क्रियाओं में सिद्ध मानी जाती थीं और प्रतिदिन पुष्कर झील में एक हजार दीप प्रज्वलित कर महादेव की आराधना करती थीं।
💡 परीक्षा ट्रिक: “सांभर → शाकम्भरी देवी → सपादलक्ष (सवा लाख गांव) → अहिच्छत्रपुर (नागौर)” — इस चार-कड़ी श्रृंखला को एक साँस में दोहराने की आदत डालें, MCQ में इन चारों को आपस में जोड़कर ही पूछा जाता है।
| शासक | प्रमुख कार्य/संदर्भ |
|---|---|
| वासुदेव (~551 ई., आदि पुरुष) | सांभर झील निर्माता (बिजौलिया प्रशस्ति) |
| गुवक प्रथम | हर्षनाथ मंदिर का निर्माण |
| चन्दराज | पत्नी रुद्राणी की योगसाधना व पुष्कर दीप-पूजा |
⚔️ 3. सामन्तकाल से स्वतंत्रता की ओर — सिंहराज और विग्रहराज द्वितीय
चौहान शुरू में प्रतिहारों के अधीन थे, लेकिन धीरे-धीरे उनकी ताकत बढ़ने लगी। शासक सिंहराज ने तो इतनी शक्ति जुटा ली कि उन्होंने कई राजाओं को बंदी बना लिया, और उनकी मुक्ति के लिए स्वयं प्रतिहार सम्राट को हस्तक्षेप करना पड़ा। सिंहराज ने जो उपाधि धारण की — “परमभट्टारक-महाराजाधिराज-परमेश्वर” — वह सामान्यतः केवल स्वतंत्र एवं सम्प्रभु शासकों को ही दी जाती थी। यानी सिंहराज खुद को अब सामन्त नहीं, बल्कि एक स्वतंत्र सम्राट के रूप में देख रहे थे।
सिंहराज के बाद विग्रहराज द्वितीय आए, जिन्हें ‘गंगा’ के नाम से भी जाना जाता है। उन्होंने भरूच (गुजरात) के चालुक्य शासक मूलराज प्रथम को पराजित किया और भरूच में आशापुरा देवी का मंदिर बनवाया — इसी कारण उन्हें ‘मतंगा शासक’ भी कहा गया। विग्रहराज द्वितीय की जानकारी का मुख्य स्रोत सीकर से प्राप्त हर्षनाथ का शिलालेख है, जो लगभग 973 ई. का अनुमानित किया जाता है।
इसी कड़ी में गोविन्द तृतीय का भी उल्लेख मिलता है। पृथ्वीराज विजय में उनकी उपाधि ‘वैरीघरट्ट’ बताई गई है, जबकि फारसी इतिहासकार फरिस्ता लिखते हैं कि गोविन्द तृतीय ने गजनी के शासक को मारवाड़ की ओर बढ़ने से रोक दिया था।
विग्रहराज तृतीय के पुत्र पृथ्वीराज प्रथम ने 1105 ई. में उन 700 चालुक्य सैनिकों को पराजित किया जो पुष्कर के ब्राह्मणों को लूटने आए थे। इस विजय के बाद उन्होंने भी ‘परम भट्टारक महाराजाधिराज परमेश्वर’ की उपाधि धारण की। उनके मंत्री हट्ड ने सीकर में प्रसिद्ध जीण माता मंदिर बनवाया, जो आज भी लोक-आस्था का बड़ा केंद्र है।
🔑 परीक्षा बिंदु: 1105 ई. — पृथ्वीराज प्रथम द्वारा 700 चालुक्यों की पराजय (पुष्कर ब्राह्मण-रक्षा प्रसंग) — तिथि और कारण दोनों MCQ में पूछे जाते हैं।
🏰 4. अजयराज और अजमेर की स्थापना (1113-1133 ई.)
पृथ्वीराज प्रथम के पुत्र अजयराज ने 1113 ई. में अजयमेरु (अजमेर) को बसाया और इसे अपनी राजधानी बनाया, ताकि साम्राज्य की सुरक्षा अधिक प्रभावी ढंग से हो सके। उन्होंने बीठली पहाड़ी पर एक सुदृढ़ दुर्ग का निर्माण कराया, जिसे गढ़बीठली कहा गया — इस किले को ‘पूर्व का जिब्राल्टर’ की उपमा दी गई है।
बाद में रानी तारा के सम्मान में इस दुर्ग का नाम तारागढ़ रखा गया, जिससे यह अजयमेरु, गढ़बीठली और तारागढ़ — तीन नामों से प्रसिद्ध हुआ।
अजयराज ने ‘श्री अजयदेव’ नामक चाँदी के सिक्के प्रचलित किए; कुछ मुद्राओं पर उनकी पत्नी सोमलेखा (सोमलवती) का नाम भी अंकित मिलता है। पृथ्वीराज विजय के अनुसार अजयराज ने गजनी के मुसलमानों को हराकर अपने साम्राज्य की रक्षा की थी। बाद में उन्होंने राज्य अपने पुत्र अर्णोराज को सौंप दिया और स्वयं पुष्कराध्य चले गए।
| बिंदु | विवरण |
|---|---|
| राजधानी स्थापना | 1113 ई., अजयमेरु (अजमेर) |
| दुर्ग | गढ़बीठली → तारागढ़ (पूर्व का जिब्राल्टर) |
| सिक्के | श्री अजयदेव (चाँदी), पत्नी सोमलेखा का नामांकन |
| सैन्य उपलब्धि | गजनी के मुसलमानों पर विजय (पृथ्वीराज विजय अनुसार) |
💡 परीक्षा ट्रिक: “अजय-तारा-सोम” — अजयराज ने नगर बनाया, रानी तारा के नाम पर दुर्ग का नाम पड़ा, पत्नी सोमलेखा का नाम सिक्कों पर मिला। तीन अलग-अलग स्त्री-प्रसंगों को गड़बड़ न करें — रानी तारा दुर्ग से जुड़ी हैं, सोमलेखा सिक्कों से।
🏞️ 5. अर्णोराज — आनासागर झील और चालुक्यों से संघर्ष (1133-1155 ई.)
अजयराज के बाद अर्णोराज लगभग 1133 ई. में अजमेर की सत्ता पर बैठे। उन्होंने महाराजाधिराज, परमेश्वर और परमभट्टारक की उपाधियाँ धारण कीं, तुर्क आक्रमणकारियों को खदेड़ा और मालवा के राजा नरवर्मन को भी पराजित किया।
अर्णोराज का सबसे स्थायी योगदान अजमेर में आनासागर झील का निर्माण है। जयानक अपने ग्रन्थ पृथ्वीराज विजय में लिखते हैं कि अजमेर को तुर्कों के रक्त से शुद्ध करने के लिए यह झील बनाई गई थी — युद्ध में तुर्कों का अपार रक्त बहा था। बहुत बाद में, मुगल काल में, जहाँगीर ने इसी स्थान पर दौलत बाग (शाही बाग) बनवाया, जिसे आगे सुभाष उद्यान कहा गया। इस उद्यान में नूरजहाँ की माँ अस्मत बेगम ने गुलाब के इत्र का आविष्कार किया, और शाहजहाँ ने यहाँ पाँच बारहदरियों का निर्माण कराया। अर्णोराज ने पुष्कर में वराह मंदिर भी बनवाया।
अर्णोराज और चालुक्य शासक जयसिंह सिद्धराज के बीच शुरू में वैमनस्य था, लेकिन जयसिंह ने अपनी पुत्री कांचनदेवी का विवाह अर्णोराज से करके संबंध मधुर बना लिए। फिर भी यह शांति स्थायी नहीं रही — चालुक्य शासक कुमारपाल ने आबू के निकट युद्ध में अर्णोराज को पराजित कर दिया, जिसका उल्लेख प्रबन्ध चिन्तामणि (मेरुतुंगाचार्य) और प्रबन्ध कोश (राजशेखर सूरी) में मिलता है।
अर्णोराज ने धार्मिक सहिष्णुता भी दिखाई — उन्होंने अजमेर में खरतरगच्छ (जैन श्वेतांबर) अनुयायियों को भूमि दान दी और देवबोध तथा धर्मघोष नामक विद्वानों को सम्मानित किया। दुःखद यह रहा कि उनके ही पुत्र जग्गदेव ने उनकी हत्या कर दी, जिस कारण अर्णोराज को ‘चौहानों का पितृहंता’ भी कहा जाता है — और आगे जग्गदेव की हत्या उसके भाई विग्रहराज चतुर्थ ने कर दी।
⚠️ परीक्षा सावधानी: आनासागर झील को कई बार पृथ्वीराज तृतीय से जोड़ दिया जाता है, क्योंकि वे सबसे प्रसिद्ध चौहान शासक हैं। याद रखें — आनासागर अर्णोराज की देन है, पृथ्वीराज तृतीय का नहीं।
📚 6. विग्रहराज चतुर्थ (बीसलदेव) — सपादलक्ष का स्वर्णयुग (1158-1163 ई.)
जग्गदेव के अल्पकालीन शासन (1155-1158 ई.) के बाद विग्रहराज चतुर्थ — जिन्हें वीसलदेव और कवि बान्धव भी कहा जाता है — लगभग 1158 ई. में अजमेर के सिंहासन पर बैठे। उनका शासनकाल सपादलक्ष का स्वर्णयुग कहलाता है, और इसकी वजह सिर्फ सैन्य विजयें नहीं, साहित्यिक उपलब्धियाँ भी हैं।
शिवालिक अभिलेख बताता है कि उन्होंने अपने राज्य की सीमाओं का बड़ा विस्तार किया। उन्होंने गजनी के शासक अमीर खुशरुशाह (हम्मीर) तथा दिल्ली के तोमर शासक तंवर को पराजित कर दिल्ली को अपने राज्य में मिला लिया। चालुक्य शासक कुमारपाल से उन्होंने पाली, नागौर और जालौर छीने, और भादानकों को भी हराया। 1157 ई. में दिल्ली व हांसी पर विजय प्राप्त हुई, और दिल्ली में शिवालिक स्तम्भ का निर्माण कराया गया।
साहित्य के क्षेत्र में विग्रहराज चतुर्थ स्वयं एक रचनाकार थे — उन्होंने ‘हरिकेली’ नामक नाटक लिखा, जिसमें अर्जुन और शिव के मध्य हुए युद्ध का वर्णन है। उनके दरबारी कवि सोमदेव ने ‘ललित विग्रहराज’ नाटक रचा, जिसमें बीसलदेव और देसलदेवी के प्रेम-प्रसंग का चित्रण है। नरपति नाल्ह ने गौड़वाड़ी भाषा में ‘बीसलदेव रासो’ की रचना की, जिसमें बीसलदेव और राजमती की प्रेम-कथा वर्णित है।
| रचना | रचनाकार | विषय/भाषा |
|---|---|---|
| हरिकेली नाटक | विग्रहराज चतुर्थ (स्वयं) | अर्जुन-शिव युद्ध |
| ललित विग्रहराज | सोमदेव (दरबारी कवि) | बीसलदेव-देसलदेवी प्रेम |
| बीसलदेव रासो | नरपति नाल्ह | गौड़वाड़ी भाषा, बीसलदेव-राजमती प्रेम |
हरिकेली नाटक के अंश ‘ढाई दिन के झोंपड़े’ तथा इंग्लैंड के ब्रिस्टल में राजाराम मोहन राय की समाधि पर भी उत्कीर्ण कराए गए हैं — यह तथ्य अक्सर “सबसे आश्चर्यजनक फैक्ट” की श्रेणी में पूछा जाता है। विद्वानों के संरक्षक होने के कारण जयानक भट्ट ने विग्रहराज को ‘कवि बान्धव’ की उपाधि दी। उन्होंने अजमेर में एक संस्कृत पाठशाला भी स्थापित की, जिसके प्रमाण अढ़ाई दिन के झोंपड़े की सीढ़ियों में मिले दो पाषाण अभिलेखों से मिलते हैं।
बाद में मुहम्मद गौरी के सेनापति कुतुबुद्दीन ऐबक ने इस संस्कृत पाठशाला के स्थान को मस्जिद का रूप दे दिया, जो आज ‘अढ़ाई दिन का झोंपड़ा’ कहलाता है। यहाँ पंजाब शाह नामक सूफी संत के उर्स के दौरान ढाई दिन का मेला लगता था, इसी कारण इस नाम का प्रचलन हुआ।
आज के टोंक जिले में स्थित बीसलपुर कस्बा और बीसल सागर बांध का निर्माण भी विग्रहराज चतुर्थ (बीसलदेव) द्वारा ही किया गया था।
🔑 परीक्षा बिंदु: “अढ़ाई दिन का झोंपड़ा” मूलतः संस्कृत पाठशाला थी (विग्रहराज चतुर्थ निर्मित), जिसे कुतुबुद्दीन ऐबक ने मस्जिद में बदला। निर्माता और रूपांतरणकर्ता — दोनों नाम याद रखें।
💡 अनुभवी टिप्पणी: विग्रहराज चतुर्थ की कहानी इस बात का सटीक उदाहरण है कि एक शासक तलवार और स्याही — दोनों से अपने युग को परिभाषित कर सकता है। उनके बाद के किसी भी चौहान शासक ने साहित्य और सैन्यशक्ति का ऐसा संतुलन नहीं दिखाया।
👑 7. उत्तराधिकार की उलझन और सोमेश्वर का राज्यारोहण
विग्रहराज चतुर्थ के बाद अपरगांगेय और फिर पृथ्वीराज द्वितीय गद्दी पर बैठे, जिन्होंने 1169 ई. तक शासन किया। पृथ्वीराज द्वितीय की निःसंतान मृत्यु होने पर उनके चाचा सोमेश्वर — जो अर्णोराज के पुत्र थे और जिनकी माता गुजरात की राजकुमारी कांचनदेवी थीं — ने अजमेर का सिंहासन प्राप्त किया।
सोमेश्वर का पालन-पोषण उनके ननिहाल गुजरात में हुआ, और चालुक्य शासक कुमारपाल ने उनकी विशेष देखभाल की। कुमारपाल ने ही सोमेश्वर का विवाह कलचुरी (त्रिपुरी) नरेश अचल की पुत्री कर्पूरदेवी से करवाया, जिनसे दो पुत्र हुए — पृथ्वीराज तृतीय और हरिराज।
1177 ई. में जब सोमेश्वर आबू के शासक जैत्रसिंह की सहायता के लिए गए, तो गुजरात के शासक भीमदेव द्वितीय के हाथों वे वीरगति को प्राप्त हुए। अजमेर में सोमेश्वर को मूर्तिकला का जनक भी कहा जाता है, क्योंकि उनके काल में अनेक मूर्तियों का निर्माण हुआ।
👑 8. पृथ्वीराज चौहान तृतीय — सिंहासनारोहण और प्रारंभिक शासन (1177-1192 ई.)
चौहान वंश के अंतिम प्रतापी सम्राट पृथ्वीराज चौहान तृतीय — जिन्हें राय पिथौरा (युद्ध में पीठ न दिखाने वाला) और दल पुंगल (विश्व विजेता) भी कहा जाता है — का जन्म 1166 ई. (वि.सं. 1223) में सोमेश्वर की रानी कर्पूरीदेवी के गर्भ से अन्हिलपाटन (गुजरात) में हुआ।
पिता की आकस्मिक मृत्यु के कारण मात्र ग्यारह वर्ष की आयु में पृथ्वीराज तृतीय अजमेर के सिंहासन पर बैठे। उस समय कदम्बदास (कैमास) उनके योग्य प्रधानमंत्री थे। राज्य की सीमाएँ उत्तर में थानेश्वर से दक्षिण में जहाजपुर (मेवाड़) तक फैली थीं — उत्तरी सीमा पर कन्नौज और दक्षिणी सीमा पर गुजरात उनके निकटतम प्रतिद्वंद्वी थे, जबकि उत्तर-पश्चिम में मुस्लिम आक्रमणकारियों की गतिविधियाँ तेज हो रही थीं।
इतने संकटपूर्ण समय में पृथ्वीराज की माता कर्पूरीदेवी ने कुशलता और कूटनीति से शासन की बागडोर संभाली। शीघ्र ही पृथ्वीराज तृतीय ने स्वयं अपनी योग्यता और शौर्य से शासन अपने हाथ में ले लिया, चारों ओर के शत्रुओं को क्रमशः समाप्त किया और ‘दल पंगुल’ अर्थात विश्वविजेता की उपाधि ग्रहण की।
पृथ्वीराज स्वयं भी कला, साहित्य और गुणी व्यक्तियों के सम्मान करने वाले थे। जयानक, विद्यापति गौड़, वागीश्वर, जनार्दन और विश्वरूप उनके दरबारी लेखक-कवि थे। जयानक ने ‘पृथ्वीराज विजय’ की रचना की। पृथ्वीराज रासो के लेखक चंदबरदाई भी उनके आश्रित कवि थे — उन्होंने ‘पृथ्वीराज रासो’ लिखा, जिसका अंतिम भाग उनके पुत्र जल्हण ने पूरा किया। पृथ्वीराज रासो की भाषा पिंगल बोली है, और इसे हिंदी का प्रथम महाकाव्य माना जाता है।
इसी काल में प्रसिद्ध सूफी संत और चिश्ती सम्प्रदाय के संस्थापक ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती अजमेर आए। उनकी दरगाह का निर्माण सुल्ताना रजिया के पिता इल्तुतमिश ने बाद में करवाया।
🔑 परीक्षा बिंदु: पृथ्वीराज तृतीय — जन्म 1166 ई., अन्हिलपाटन (गुजरात); सिंहासनारोहण मात्र 11 वर्ष की आयु में; प्रधानमंत्री कदम्बदास (कैमास)। ये तीन आंकड़े एक साथ ही पूछे जाते हैं।
⚔️ 9. सैन्य अभियान — नागार्जुन, भण्डानक और महोबा का युद्ध
जब पृथ्वीराज ने शासन संभाला, तो सबसे पहली चुनौती उनके चचेरे भाई नागार्जुन से आई, जिसने विद्रोह कर अजमेर पर नियंत्रण की कोशिश की। 1178 ई. में गुड़गाँव के युद्ध में पृथ्वीराज ने नागार्जुन को परास्त किया और उसके पूरे परिवार को मृत्युदंड दिया — एक कठोर परन्तु तत्कालीन राजनीति की दृष्टि से सामान्य कदम।
इसके बाद 1182 ई. में पृथ्वीराज ने भरतपुर-मथुरा क्षेत्र में भण्डानकों के विद्रोह का दमन किया।
इसी वर्ष, 1182 ई. में, पृथ्वीराज ने महोबा के चंदेल शासक परमाल (परमार्दी देव) पर आक्रमण किया — इसे ‘तुमुल का युद्ध’ कहा जाता है। इस संघर्ष में परमार्दी देव के दो सेनानायक आल्हा और उदल वीरगति को प्राप्त हुए।
आल्हा और उदल
आल्हा और उदल महोबा के चंदेल शासक परमार्दी देव के महान सेनानायक थे। किसी विवाद के कारण वे अपने राजा से रुष्ट होकर पड़ोसी राज्य चले गए थे। जब 1182 ई. में पृथ्वीराज ने महोबा पर हमला किया, तो परमार्दी देव ने दोनों को संदेश भेजा कि मातृभूमि पर आक्रमण हुआ है। दोनों लौटे, घोर युद्ध किया और मातृभूमि की रक्षा करते हुए शहीद हुए। उनकी वीरता भारतीय जनमानस में आज भी अमर है, और उनका शौर्य-गीत आज भी लोक-स्मृति में जीवित है।
💡 परीक्षा ट्रिक: “गुड़गाँव-1178 (नागार्जुन), भरतपुर-मथुरा-1182 (भण्डानक), महोबा-1182 (आल्हा-उदल)” — तीनों अभियानों को क्रम और स्थान के साथ याद रखें, क्योंकि MCQ अक्सर स्थान और वर्ष को आपस में मिला देता है।
⚔️ 10. चालुक्यों पर विजय और कन्नौज से वैमनस्य
गुजरात के चालुक्य और अजमेर के चौहान वंशों के बीच लंबे समय से संघर्ष चला आ रहा था। सोमेश्वर के काल में कुछ समय शांति रही, लेकिन पृथ्वीराज तृतीय के समय यह संघर्ष फिर शुरू हो गया। पृथ्वीराज रासो के अनुसार एक कारण यह था कि पृथ्वीराज तृतीय और चालुक्य नरेश भीमदेव द्वितीय दोनों आबू के शासक सलख की पुत्री इच्छिनी से विवाह करना चाहते थे। एक अन्य कारण यह बताया जाता है कि पृथ्वीराज के चाचा कान्हा ने भीमदेव द्वितीय के सात चचेरे भाइयों की हत्या कर दी थी, जिसके बदले में भीमदेव ने अजमेर पर आक्रमण कर नागौर पर कब्जा कर लिया और सोमेश्वर को मार डाला।
वास्तविक कारण इन प्रेम और बदले की कथाओं से कहीं अधिक भौगोलिक था — चालुक्य राज्य की सीमाएँ नाडौल और आबू तक फैली थीं, और पृथ्वीराज तृतीय के राज्य की सीमाएँ भी ठीक उन्हीं क्षेत्रों को छूती थीं। दो शक्तिशाली पड़ोसी राज्यों के बीच संघर्ष लगभग तय था। 1184 ई. में दोनों पक्षों के बीच घमासान लेकिन अनिर्णायक युद्ध हुआ, और अंततः 1187 ई. के आसपास चालुक्य महामंत्री जगदेव प्रतिहार के प्रयासों से एक अस्थायी संधि हो गई।
कन्नौज के साथ संबंध भी सहज नहीं थे। पृथ्वीराज के समय कन्नौज पर गहड़वाल वंश के शासक जयचंद का शासन था। दोनों की साम्राज्य-विस्तार की आकांक्षाएँ टकराती थीं, और बाद में संयोगिता प्रसंग ने इस शत्रुता को और गहरा कर दिया। इसी वैमनस्य का परिणाम था कि तराइन के युद्ध में जयचंद ने पृथ्वीराज की सहायता नहीं की, बल्कि मुहम्मद गौरी का साथ दिया।
संयोगिता
पृथ्वीराज रासो के अनुसार संयोगिता गहड़वाल राजा जयचंद की पुत्री थीं, और पृथ्वीराज-संयोगिता एक-दूसरे से प्रेम करते थे। जयचंद ने राजसूय यज्ञ आयोजित किया, जिसमें संयोगिता का स्वयंवर भी रखा गया। पृथ्वीराज को आमंत्रित नहीं किया गया — अपमानस्वरूप उनकी लोहे की मूर्ति द्वारपाल के स्थान पर रख दी गई। स्वयंवर के दौरान संयोगिता ने इसी मूर्ति के गले में वरमाला डाल दी। अपनी सेना के साथ वहाँ उपस्थित पृथ्वीराज, संयोगिता को अजमेर ले आए और विवाह कर लिया।
⚠️ परीक्षा सावधानी: संयोगिता प्रसंग पृथ्वीराज रासो आधारित है — यानी काव्य-स्रोत, न कि कोई समकालीन शिलालेख। उत्तर लिखते समय “पृथ्वीराज रासो के अनुसार” जोड़ना उत्तर को अधिक सटीक बनाता है।
⚔️ 11. पृथ्वीराज और मुहम्मद गौरी — टकराव की पृष्ठभूमि
पृथ्वीराज के शासनकाल में भारत के उत्तर-पश्चिम में गौर प्रदेश पर शहाबुद्दीन मुहम्मद गौरी का शासन था। उसने गजनी के सुल्तान मलिक खुसरो को पराजित कर गजनवी अधिकृत क्षेत्रों पर अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया था। मुहम्मद गौरी धीरे-धीरे अपने राज्य का विस्तार कर रहा था, और 1178 ई. में उसने पंजाब, मुल्तान और सिंध को भी अपने अधिकार में ले लिया।
🗡️ 12. तराइन का प्रथम युद्ध (1191 ई.)
पृथ्वीराज ने दिल्ली, हांसी, सरस्वती तथा सरहिंद के दुर्ग जीतकर अपने अधीन कर लिए थे। 1190-91 ई. में मुहम्मद गौरी ने सरहिंद (तबरहिंद) पर नियंत्रण कर अपने सैनिक वहाँ तैनात कर दिए। पृथ्वीराज ने आक्रमणकारियों को रोकने के लिए सरहिंद की ओर कूच किया। गौरी भी अपने विजित क्षेत्र की रक्षा हेतु विशाल सेना के साथ तराइन (हरियाणा) के मैदान में आ डटा।
दोनों सेनाओं के मध्य 1191 ई. में तराइन का पहला युद्ध हुआ, जिसमें दिल्ली के गवर्नर गोविन्दराज ने गौरी को घायल कर दिया। घायल गौरी युद्धभूमि से भाग गया, और कुछ ही समय में उसकी सेना भी मैदान छोड़कर पीछे हट गई।
पृथ्वीराज ने विजय के बाद भागती हुई मुस्लिम सेना का पीछा नहीं किया और गौरी को जाने दिया। यही उनकी सबसे बड़ी रणनीतिक भूल साबित हुई, जिसकी कीमत उन्हें अगले ही वर्ष चुकानी पड़ी।
🗡️ 13. तराइन का द्वितीय युद्ध (1192 ई.) — निर्णायक मोड़
पहले युद्ध की जीत के बाद पृथ्वीराज निश्चिंत होकर आमोद-प्रमोद में व्यस्त हो गए, जबकि गौरी ने पूरे मनोयोग से विशाल सेना फिर से इकट्ठी की और युद्ध की तैयारी में जुट गया। एक वर्ष बाद, 1192 ई. में ही, गौरी अपनी विशाल सेना के साथ अपनी हार का बदला लेने तराइन के मैदान में फिर आ धमका।
समाचार मिलते ही पृथ्वीराज भी सेना सहित युद्धभूमि की ओर बढ़े। उनके साथ उनके बहनोई मेवाड़ शासक समरसिंह और दिल्ली के गवर्नर गोविन्दराज भी थे। इस बार के युद्ध में मुहम्मद गौरी विजयी रहा। पराजित पृथ्वीराज चौहान को सिरसा के पास सरस्वती नामक स्थान पर बंदी बना लिया गया।
तराइन का प्रथम युद्ध (1191 ई.)
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गौरी घायल, सेना पस्त — पृथ्वीराज विजयी
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पृथ्वीराज द्वारा पीछा न करना (रणनीतिक भूल)
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गौरी द्वारा एक वर्ष में पुनः विशाल सेना का संगठन
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तराइन का द्वितीय युद्ध (1192 ई.)
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पृथ्वीराज पराजित व बंदी (सरस्वती/सिरसा)
→ गोविन्दराज को अजमेर का प्रशासक नियुक्त किया गया
→ भारत में स्थायी तुर्क/मुस्लिम सत्ता का प्रारंभ
→ चौहान शाखाएँ रणथम्भौर, जालौर, नाडोल, हाड़ौती में जीवित रहींपृथ्वीराज रासो के अनुसार बंदी पृथ्वीराज को गौरी अपने साथ गजनी ले गया, जहाँ शब्दभेदी बाण के प्रदर्शन के समय पृथ्वीराज ने गौरी को मार डाला। इस प्रसंग में चंदबरदाई द्वारा पृथ्वीराज को सुनाया गया दोहा बहुत प्रसिद्ध है, जिसमें सुल्तान की स्थिति को बांस और गज में मापकर निशाना साधने का संकेत दिया गया है।
इसके विपरीत, समकालीन इतिहासकार हसन निजामी के अनुसार तराइन के द्वितीय युद्ध के बाद पृथ्वीराज चौहान ने मुहम्मद गौरी के अधीनस्थ शासक के रूप में ही अजमेर पर शासन किया। इस मत के समर्थन में एक सिक्के का भी संदर्भ दिया जाता है, जिसके एक तरफ मुहम्मद बिन साम और दूसरी तरफ पृथ्वीराज का नाम अंकित है।
| तुलना बिंदु | तराइन प्रथम युद्ध (1191) | तराइन द्वितीय युद्ध (1192) |
|---|---|---|
| विजेता | पृथ्वीराज चौहान तृतीय | मुहम्मद गौरी |
| गौरी की स्थिति | घायल होकर भागा | विशाल पुनर्गठित सेना के साथ विजयी |
| पृथ्वीराज का अंत | विजयी, परन्तु शत्रु का पीछा नहीं किया | पराजित व बंदी (सरस्वती/सिरसा) |
| परिणाम | अल्पकालिक राहत | भारत में स्थायी मुस्लिम सत्ता का आरम्भ |
इस तरह अजमेर और दिल्ली पर मुहम्मद गौरी का शासन स्थापित हो गया। गौरी ने पृथ्वीराज के पुत्र गोविन्दराज को अजमेर का प्रशासक नियुक्त किया। तराइन का द्वितीय युद्ध भारतीय इतिहास की एक निर्णायक एवं युगपरिवर्तनकारी घटना साबित हुआ — इससे भारत में स्थायी मुस्लिम साम्राज्य का प्रारंभ हुआ, और मुहम्मद गौरी भारत में मुस्लिम सत्ता का संस्थापक बना। इसके बाद धीरे-धीरे गौरी ने कन्नौज, गुजरात, बिहार आदि क्षेत्रों को भी जीता।
तराइन के दोनों युद्धों का विस्तृत विवरण कवि चंद बरदाई के पृथ्वीराज रासो, हसन निजामी के ताजुल मासिर और मिनहाज सिराज की तबकात-ए-नासिरी में मिलता है।
🔑 परीक्षा बिंदु: तराइन युद्ध के तीन प्रमुख समकालीन/परम्परागत स्रोत — पृथ्वीराज रासो (चंदबरदाई), ताजुल मासिर (हसन निजामी), तबकात-ए-नासिरी (मिनहाज सिराज)। इन तीन नामों को एक साथ रट लें।
💡 अनुभवी टिप्पणी: तराइन के द्वितीय युद्ध को केवल “पृथ्वीराज की हार” के रूप में पढ़ना अधूरी समझ है। असली सबक यह है कि एक युद्ध में मिली विजय को रणनीतिक लाभ में न बदलना ही पृथ्वीराज की सबसे बड़ी भूल थी — यह सिद्धांत आज भी सैन्य-इतिहास की किसी भी विश्लेषणात्मक चर्चा में प्रयुक्त होता है।
तराइन के द्वितीय युद्ध के बाद चौहानों की शक्ति पूर्णतः समाप्त नहीं हुई। आगामी लगभग एक शताब्दी तक चौहानों की शाखाएँ रणथम्भौर, जालौर, हाड़ौती, नाडोल तथा चन्द्रावती-आबू में शासन करती रहीं और राजपूत शक्ति की धुरी बनी रहीं — इन शाखाओं और उनके प्रतापी शासकों (हम्मीरदेव चौहान, कान्हड़देव सोनगरा आदि) की पूरी कहानी हम Part 2 में विस्तार से देखेंगे।
❓ PYQ — परीक्षा में पूछे गए प्रश्न
RPSC RAS Pre — 2018 (पैटर्न आधारित)
Q. चौहान वंश की उत्पत्ति के संबंध में बिजोलिया शिलालेख में किस मत का उल्लेख मिलता है?
- (A) सूर्यवंशी मत
- (B) अग्निकुल मत
- (C) ब्राह्मण कुल मत ✓
- (D) चंद्रवंशी मत
व्याख्या: बिजोलिया शिलालेख चौहानों को ब्राह्मण कुल से उत्पन्न बताता है, जबकि पृथ्वीराज रासो अग्निकुल मत और गौरीशंकर ओझा सूर्यवंशी मत का समर्थन करते हैं।
Rajasthan SI — 2021 (पैटर्न आधारित)
Q. अजमेर नगर की स्थापना किस चौहान शासक ने की?
- (A) अजयराज ✓
- (B) अर्णोराज
- (C) विग्रहराज चतुर्थ
- (D) पृथ्वीराज तृतीय
व्याख्या: अजयराज ने 1113 ई. में अजयमेरु (अजमेर) की स्थापना की और गढ़बीठली दुर्ग बनवाया।
Patwari — 2021 (पैटर्न आधारित)
Q. आनासागर झील का निर्माण किसने करवाया?
- (A) अजयराज
- (B) अर्णोराज ✓
- (C) सोमेश्वर
- (D) पृथ्वीराज तृतीय
व्याख्या: अर्णोराज (1133-1155 ई.) ने अजमेर में आनासागर झील का निर्माण कराया था।
RPSC RAS Pre — 2016 (पैटर्न आधारित)
Q. ‘हरिकेली’ नाटक के रचनाकार कौन थे?
- (A) सोमदेव
- (B) जयानक
- (C) विग्रहराज चतुर्थ ✓
- (D) नरपति नाल्ह
व्याख्या: हरिकेली नाटक विग्रहराज चतुर्थ (बीसलदेव) की स्वयं की रचना है, जिसमें अर्जुन-शिव युद्ध का वर्णन है। ध्यान रहे, ललित विग्रहराज सोमदेव ने और बीसलदेव रासो नरपति नाल्ह ने लिखा।
Rajasthan SI — 2021 (पैटर्न आधारित)
Q. तराइन का द्वितीय युद्ध किस वर्ष हुआ?
- (A) 1191
- (B) 1192 ✓
- (C) 1206
- (D) 1303
व्याख्या: तराइन का प्रथम युद्ध 1191 ई. में (पृथ्वीराज विजयी) और द्वितीय युद्ध 1192 ई. में (मुहम्मद गौरी विजयी) हुआ।
REET / Patwari (पैटर्न आधारित)
Q. पृथ्वीराज चौहान तृतीय का जन्म कहाँ हुआ था?
- (A) अजमेर
- (B) अन्हिलपाटन (गुजरात) ✓
- (C) नागौर
- (D) चित्तौड़
व्याख्या: पृथ्वीराज तृतीय का जन्म 1166 ई. में सोमेश्वर की रानी कर्पूरीदेवी के गर्भ से अन्हिलपाटन (गुजरात) में हुआ था।
RPSC RAS Pre — 2023 (पैटर्न आधारित)
Q. निम्नलिखित में से कौन-सा ग्रंथ तराइन युद्ध का समकालीन/परम्परागत स्रोत नहीं माना जाता?
- (A) पृथ्वीराज रासो
- (B) ताजुल मासिर
- (C) तबकात-ए-नासिरी
- (D) वीर विनोद ✓
व्याख्या: वीर विनोद (श्यामलदास) 19वीं सदी का ग्रंथ है, जबकि अन्य तीन ग्रंथ तराइन युद्ध के निकट-समकालीन या परम्परागत मूल स्रोत माने जाते हैं।
Match the Column (RPSC पैटर्न)
सूची-I (शासक) | सूची-II (उपाधि/कार्य)
(A) सिंहराज | (1) परमभट्टारक-महाराजाधिराज-परमेश्वर
(B) विग्रहराज द्वितीय | (2) मतंगा शासक / 'गंगा' उपनाम
(C) गोविन्द तृतीय | (3) 'वैरीघरट्ट' उपाधि
(D) अजयराज | (4) 'श्री अजयदेव' सिक्के
उत्तर: A-1, B-2, C-3, D-4🗝️ Part 1 — स्मरणीय संकेत (Memory Tricks)
| विषय | ट्रिक |
|---|---|
| 4 अग्निकुल वंश | “प्र-प-चा-चौ” = प्रतिहार + परमार + चालुक्य + चौहान |
| उद्गम के 3 मत | “अग्नि-सूर्य-ब्राह्मण” = अग्निकुल (रासो) → सूर्यवंशी (ओझा) → ब्राह्मण कुल (बिजोलिया) |
| सांभर श्रृंखला | “सां-शा-स-अ” = सांभर → शाकम्भरी देवी → सपादलक्ष → अहिच्छत्रपुर (नागौर) |
| बीसलदेव की 3 रचनाएं | “हरि-ललित-बीसल” = हरिकेली (स्वयं) + ललित विग्रहराज (सोमदेव) + बीसलदेव रासो (नरपति नाल्ह) |
| तराइन के युद्ध | “गौ-घायल, पृ-बंदी” = तराइन-1 (1191) में गौरी घायल; तराइन-2 (1192) में पृथ्वीराज बंदी |
| तराइन के 3 स्रोत | “रासो-मासिर-नासिरी” = पृथ्वीराज रासो + ताजुल मासिर + तबकात-ए-नासिरी |
| अजयराज की 2 स्त्री-कड़ी | “तारा-दुर्ग, सोम-सिक्का” = रानी तारा → दुर्ग का नाम; पत्नी सोमलेखा → सिक्कों पर नाम |
📚 Quick Revision Box — Part 1
चौहान वंश: मूल स्थान - सांभर/शाकम्भरी | क्षेत्र नाम - सपादलक्ष | आदि राजधानी - अहिच्छत्रपुर (नागौर)
उद्गम सिद्धांत:
→ अग्निकुल मत - पृथ्वीराज रासो, चंदबरदाई, मुहणोत नैणसी
→ सूर्यवंशी मत - गौरीशंकर ओझा
→ ब्राह्मण कुल मत - बिजोलिया शिलालेख
आदि पुरुष: वासुदेव (~551 ई.) - सांभर झील निर्माता (बिजौलिया प्रशस्ति)
विग्रहराज द्वितीय "गंगा": भरूच विजय, आशापुरा मंदिर, मतंगा शासक उपनाम (हर्षनाथ अभिलेख ~973 ई.)
पृथ्वीराज प्रथम: 1105 ई. में 700 चालुक्यों को हराया, मंत्री हट्ड - जीणमाता मंदिर (सीकर)
अजयराज (1113-1133 ई.): अजमेर स्थापना, गढ़बीठली/तारागढ़ दुर्ग, सिक्के "श्री अजयदेव", पत्नी सोमलेखा
अर्णोराज (1133-1155 ई.): आनासागर झील, पुष्कर वराह मंदिर, पुत्र जग्गदेव द्वारा हत्या (पितृहंता)
विग्रहराज चतुर्थ/बीसलदेव (1158-1163 ई.): स्वर्णयुग, हरिकेली नाटक, शिवालिक स्तम्भ, बीसलसागर बांध
सोमेश्वर: गुजरात में पालन-पोषण, पत्नी कर्पूरदेवी, 1177 ई. आबू में वीरगति
पृथ्वीराज तृतीय (1177-1192 ई.):
→ जन्म - 1166 ई., अन्हिलपाटन (गुजरात)
→ उपनाम - राय पिथौरा, दल पुंगल
→ प्रधानमंत्री - कदम्बदास (कैमास)
→ कवि - जयानक (पृथ्वीराज विजय), चंदबरदाई (पृथ्वीराज रासो)
→ महोबा युद्ध (1182) - आल्हा-उदल वीरगति
→ संयोगिता - जयचंद की पुत्री, स्वयंवर प्रसंग
तराइन का प्रथम युद्ध: 1191 ई. - पृथ्वीराज विजयी, गौरी घायल होकर भागा
तराइन का द्वितीय युद्ध: 1192 ई. - मुहम्मद गौरी विजयी, पृथ्वीराज बंदी (सरस्वती/सिरसा)
परिणाम: भारत में स्थायी मुस्लिम सत्ता की स्थापना, गोविन्दराज अजमेर का प्रशासक नियुक्त
स्रोत: पृथ्वीराज रासो, ताजुल मासिर (हसन निजामी), तबकात-ए-नासिरी (मिनहाज सिराज)
















