राजस्थान की लोक देवियां

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राजस्थान की मरुधरा न केवल शूरवीरों और त्याग की भूमि है, बल्कि यह शक्ति उपासना का भी एक प्रमुख केंद्र रही है। राजस्थानी संस्कृति में ‘लोक देवियों’ का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। यहाँ ‘कुलदेवी’ (जिस वंश में जन्म लिया हो उसकी देवी) और ‘आराध्य देवी’ (जिसकी पूजा इष्ट के रूप में की जाती है) की परंपरा सदियों से चली आ रही है। समाज का प्रत्येक वर्ग, चाहे वह राजवंश हो या सामान्य जन, अपनी-अपनी कुलदेवियों के प्रति अगाध श्रद्धा रखता है। प्रस्तुत लेख में राजस्थान की प्रमुख लोक देवियों का विस्तृत, अकादमिक और अद्यतन विवरण प्रस्तुत किया गया है।

1. करणी माता (Karni Mata) – बीकानेर

करणी माता बीकानेर के पास देशनोक में स्थित एक प्रसिद्ध देवी हैं, जिन्हें चूहों वाली माता के रूप में जाना जाता है, जहां हजारों चूहे मंदिर परिसर में स्वतंत्र रूप से घूमते हैं और भक्तों द्वारा चूहों का झूठा प्रसाद खाया जाता है, जिससे यह मंदिर उत्तर भारत के सबसे अनोखे और महत्वपूर्ण तीर्थस्थलों में से एक बन गया है, खासकर बीकानेर और जोधपुर के शाही परिवारों के लिए यह देवी संरक्षक मानी जाती हैं।

स्थान एवं परिचय: करणी माता का विश्व प्रसिद्ध मंदिर बीकानेर से लगभग 30 किलोमीटर दूर ‘देशनोक’ नामक स्थान पर स्थित है। इन्हें ‘चूहों वाली देवी’ (The Rat Temple) के नाम से भी जाना जाता है। ऐतिहासिक मान्यताओं के अनुसार, करणी माता का जन्म सुताप गांव (जोधपुर) में हुआ था और वे चारण जाति की थीं। वे बीकानेर के राठौड़ राजवंश की कुलदेवी हैं।

ऐतिहासिक महत्व: करणी माता का जीवन काल चमत्कारों से भरा माना जाता है। कहा जाता है कि मेहरानगढ़ दुर्ग (जोधपुर) और बीकानेर के किले की नींव करणी माता के आशीर्वाद से ही रखी गई थी। बीकानेर राज्य के संस्थापन में इनका प्रत्यक्ष आध्यात्मिक सहयोग माना जाता है।

स्थापत्य कला एवं मंदिर निर्माण:

  • प्रारंभिक निर्माण: मंदिर का मूल स्वरूप राव बीका और बाद में कर्ण सिंह द्वारा निर्मित करवाया गया था।
  • आधुनिक स्वरूप: वर्तमान भव्य मंदिर का निर्माण 20वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में बीकानेर के महाराजा गंगा सिंह जी द्वारा करवाया गया। मंदिर के मुख्य द्वार पर संगमरमर की नक्काशी और चांदी के दरवाजे अत्यंत आकर्षक हैं।
  • चांदी के किवाड़: मंदिर के विशाल चांदी के किवाड़ अलवर के महाराजा बख्तावर सिंह द्वारा भेंट किए गए थे।

काबा (सफेद चूहे) का रहस्य: इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यहाँ विचरण करने वाले हजारों चूहे हैं, जिन्हें स्थानीय भाषा में ‘काबा’ कहा जाता है। मान्यता है कि ये चूहे चारण समाज के पूर्वज हैं। हजारों काले चूहों के बीच एक या दो ‘सफेद काबा’ के दर्शन होना अत्यंत शुभ और सौभाग्य का प्रतीक माना जाता है।

मेला एवं अनुष्ठान: यहाँ वर्ष में दो बार नवरात्रि (चैत्र और आश्विन) के दौरान विशाल मेला भरता है, जिसमें देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु आते हैं। पुजारी चारण समाज के लोग होते हैं।

2. जीण माता (Jeen Mata) – सीकर

स्थान एवं भौगोलिक स्थिति: जीण माता का प्राचीन मंदिर अरावली पर्वतमाला की घाटियों में, ‘रेवासा’ ग्राम के पास ‘कोछोर’ (गोरियां) पहाड़ियों के तल में स्थित है। यह स्थान सीकर जिले में आता है।

वंश एवं कुलदेवी: जीण माता को अजमेर और सांभर के चौहान वंश की कुलदेवी माना जाता है। इसके अतिरिक्त, मीणा जनजाति के लोग भी इनकी आराध्य देवी के रूप में पूजा करते हैं।

ऐतिहासिक कथा (जीण-हर्ष): जीण और उनके भाई हर्ष की कथा भाई-बहन के प्रेम और त्याग का प्रतीक है। किंवदंतियों के अनुसार, भाभी के ताने से दुखी होकर जीण तपस्या करने के लिए काजल शिखर पर आ गई थीं। भाई हर्ष उन्हें मनाने आया, लेकिन असफल होने पर वह भी वहीं भेरूजी के रूप में स्थापित हो गया। पास ही हर्ष पर्वत पर हर्षनाथ भैरव का मंदिर भी स्थित है।

मुगल आक्रमण और चमत्कार: इतिहासकारों के अनुसार, मुगल बादशाह औरंगजेब ने इस मंदिर को तोड़ने का प्रयास किया था। जनश्रुतियों के अनुसार, उस समय मधुमक्खियों (भंवरों) के एक झुंड ने मुगल सेना पर आक्रमण कर दिया था, जिससे सेना को भागना पड़ा। इसके पश्चात औरंगजेब ने यहाँ अखण्ड ज्योति के लिए तेल भिजवाने की परंपरा शुरू की।

विशेष रस्में एवं साहित्य:

निर्माता: मंदिर का निर्माण मोहिल के राजा हट्टड़ द्वारा 1064 ई. के आसपास माना जाता है (शिलालेखों के आधार पर)।

ढाई प्याला शराब: प्राचीन काल में यहाँ ढाई प्याला शराब चढ़ाने की रस्म थी, जिसे अब प्रतीकात्मक रूप दिया गया है।

चिरजा (लोकगीत): राजस्थानी लोक साहित्य में जीण माता का गीत (चिरजा) सबसे लंबा लोकगीत माना जाता है, जिसे कनफटे जोगी केसरिया कपड़े पहनकर डमरू और सारंगी के साथ गाते हैं।

जीण माता सीकर जिले में स्थित एक प्रसिद्ध लोकदेवी हैं, जिनका मंदिर रेवासा गाँव के पास अरावली की पहाड़ियों में है और यह शक्तिपीठ के रूप में विख्यात है, जहाँ नवरात्रि में बड़ा मेला लगता है और इन्हें कई समुदायों की कुलदेवी माना जाता है

3. कैला देवी (Kaila Devi) – करौली

कैला देवी (Kaila Devi) - करौली

स्थान एवं परिवेश: कैला देवी का भव्य मंदिर करौली जिले में त्रिकूट पर्वत की घाटी में, कालीसिल नदी के किनारे स्थित है। यह स्थान सघन वन क्षेत्र (कैला देवी अभयारण्य) के मध्य है।

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पौराणिक संदर्भ: कैला देवी को भगवान श्रीकृष्ण की बहन ‘योगमाया’ का अवतार माना जाता है, जो कंस के हाथों से छूटकर आकाश में विलीन हो गई थीं। वे करौली के यदुवंशी (जादौन/यादव) राजवंश की कुलदेवी हैं।

लक्खी मेला: यहाँ चैत्र शुक्ल अष्टमी को विशाल मेला भरता है, जिसे ‘लक्खी मेला’ कहा जाता है क्योंकि इसमें लाखों की संख्या में श्रद्धालु भाग लेते हैं।

सांस्कृतिक विशेषता (लांगुरिया): इस मेले का मुख्य आकर्षण ‘लांगुरिया गीत’ और नृत्य है। लांगुरिया गीतों के माध्यम से भक्त देवी और उनके भक्त लांगुरिया (हनुमान जी का प्रतीक) के बीच के संवाद को प्रस्तुत करते हैं। मंदिर के सामने हनुमान जी का मंदिर है, जिन्हें यहाँ लांगुरिया कहा जाता है।

4. शीतला माता (Sheetla Mata) – जयपुर

स्थान (चाकसू): शीतला माता का मुख्य मंदिर जयपुर जिले के चाकसू कस्बे में शील की डूंगरी पर स्थित है।

उपनाम एवं स्वरूप:

  • चेचक की देवी: इन्हें चेचक (Smallpox) निवारक देवी माना जाता है।
  • बच्चों की संरक्षिका: इन्हें ‘सेढल माता’ और ‘बच्चों की पालनहार’ भी कहा जाता है।
  • खण्डित प्रतिमा: यह एकमात्र ऐसी देवी हैं जिनकी पूजा ‘खण्डित मूर्ति’ (Broken Idol) के रूप में की जाती है।

ऐतिहासिक संदर्भ: इस मंदिर का निर्माण जयपुर के महाराजा माधोसिंह द्वितीय द्वारा करवाया गया था। मान्यता है कि देवी की मूर्ति जोधपुर से विजय के प्रतीक के रूप में लाई गई थी (कुछ स्रोतों के अनुसार मानसिंह प्रथम द्वारा लाई गई, लेकिन मंदिर निर्माण माधोसिंह से जुड़ा है)।

बास्योड़ा (Basoda) परंपरा: शीतला माता को बासी भोजन (ठंडा खाना) का भोग लगाया जाता है, जिसे ‘बास्योड़ा’ कहते हैं। चैत्र कृष्ण अष्टमी (शीतला अष्टमी) के दिन घरों में चूल्हा नहीं जलता और एक दिन पूर्व बना भोजन ही ग्रहण किया जाता है। इसका वैज्ञानिक कारण ऋतु परिवर्तन के समय पाचन तंत्र को आराम देना और स्वच्छता रखना है।

वाहन एवं प्रतीक: इनका वाहन ‘गधा’ है और पुजारी पारम्परिक रूप से ‘कुम्हार’ (प्रजापत) समाज के लोग होते हैं। इसी दिन मारवाड़ क्षेत्र में राव सातल की याद में ‘घुड़ला पर्व’ भी मनाया जाता है।

5. शाकम्भरी माता (Shakambhari Mata) – नवीन जिला ‘नीम का थाना’

शाकम्भरी माता आदिशक्ति जगदम्बा का सौम्य अवतार हैं, जिन्हें पोषण और जीवनदायिनी देवी के रूप में पूजा जाता है, जिन्होंने पृथ्वी को अकाल से बचाने के लिए अपने शरीर से शाक (सब्जियां) उत्पन्न किए थे; उनके मुख्य शक्तिपीठ उत्तर प्रदेश के सहारनपुर और राजस्थान के सांभर में हैं, और वे शताक्षी के नाम से भी जानी जाती हैं।

स्थान एवं अपडेट: पूर्व में झुंझुनू जिले में स्थित उदयपुरवाटी अब नवीन जिला पुनर्गठन के बाद ‘नीम का थाना’ जिले का भाग है। शाकम्भरी माता का मुख्य मंदिर सकराय (उदयपुरवाटी) में स्थित है। इनका एक अन्य प्राचीन मंदिर सांभर (जयपुर) में भी है।

उपनाम एवं कथा:

कुलदेवी: ये खण्डेलवाल वैश्य समाज की कुलदेवी हैं। इसके साथ ही सांभर के चौहानों की भी कुलदेवी मानी जाती हैं।

शाक-सब्जियों की देवी: अकाल के समय लोगों को भूख से बचाने के लिए देवी ने शाक-सब्जियां और कंद-मूल उत्पन्न किए थे, जिस कारण इनका नाम ‘शाकम्भरी’ पड़ा।

6. शीला देवी (Shila Devi) – आमेर (जयपुर)

स्थान: इनका मंदिर जयपुर के आमेर दुर्ग (Amber Fort) के जलेब चौक में स्थित है।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: आमेर के राजा मानसिंह प्रथम 1604 ई. में बंगाल विजय अभियान के दौरान वहां के शासक केदार (जेस्सोर) को हराकर यह अष्टभुजी काले पत्थर की मूर्ति लाए थे और आमेर में स्थापित करवाई।

पूजा पद्धति: इन्हें ‘अन्नपूर्णा देवी’ के रूप में पूजा जाता है। पहले यहाँ नरबलि की प्रथा थी, जिसे बाद में छाग बली (बकरे की बलि) में बदला गया और वर्तमान में यह बलि प्रथा पूर्णतः निषिद्ध है। भक्तों की इच्छा के अनुसार यहाँ ‘शराब’ और ‘जल’ दोनों का चरणामृत दिया जाता है।

7. राणी सती (Rani Sati) – झुंझुनू

परिचय एवं इतिहास: राणी सती का विशाल संगमरमर का मंदिर झुंझुनू शहर में स्थित है। लोकभाषा में इन्हें ‘दादी जी’ कहा जाता है। इनका वास्तविक नाम ‘नारायणी बाई’ था और इनके पति का नाम ‘तनधन दास’ था, जो हिसार के नवाब के सैनिकों से लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए थे। यह अग्रवाल समाज की कुलदेवी मानी जाती हैं।

सामाजिक सुधार एवं कानून: भाद्रपद अमावस्या को यहाँ विशाल मेला लगता था। परन्तु, 1987 में देवराला (सीकर) सती काण्ड के बाद, राजस्थान सरकार ने ‘सती निवारण अधिनियम-1987’ लागू किया। इसके तहत सती प्रथा का महिमामंडन प्रतिबंधित कर दिया गया। वर्तमान में यह मंदिर एक शक्तिपीठ के रूप में पूजनीय है, न कि सती प्रथा के समर्थन केंद्र के रूप में।

8. नारायणी माता (Narayani Mata) – अलवर/कोटपूतली-बहरोड़ सीमा

स्थान: इनका मंदिर सरिस्का अभयारण्य के पास, ‘बरवा डूंगरी’, राजगढ़ तहसील (अलवर) में स्थित है।

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विवाद एवं आस्था: नारायणी माता नाई (सैन) समाज की कुलदेवी हैं, लेकिन इनकी पूजा का अधिकार और चढ़ावे को लेकर मीणा समाज के साथ विवाद भी रहा है। मीणा समाज के लोग इन्हें अपनी आराध्य देवी मानते हैं और पुजारी भी मीणा जाति के होते हैं। किंवदंती के अनुसार, मीणा युवकों ने ही नारायणी माता और उनके पति की रक्षा की थी।

9. आई माता (Aai Mata) – जोधपुर (बिलाड़ा)

स्थान: इनका भव्य मंदिर बिलाड़ा (जोधपुर ग्रामीण) में स्थित है।

सामाजिक सन्देश: आई माता मालवा से मारवाड़ आई थीं और वे रामदेवजी की शिष्या थीं। उन्होंने ‘डोरा पंथ’ (आई पंथ) चलाया और छुआछूत मिटाने तथा हिंदू-मुस्लिम एकता पर बल दिया।

  • सिरवी समाज: ये सिरवी जाति के क्षत्रियों की कुलदेवी हैं।
  • बढेर/दरगाह: इनके मंदिरों को ‘बढेर’ या ‘दरगाह’ कहा जाता है और मुख्य स्थान को ‘थान’ कहते हैं।
  • चमत्कार: मान्यता है कि इनकी अखण्ड ज्योति (दीपक) से कालिख (काजल) के स्थान पर ‘केसर’ टपकती है, जो आँखों के रोगों के लिए लाभकारी मानी जाती है। यहाँ गुर्जर जाति का प्रवेश निषेध माना जाता है।

10. आवड़ माता / स्वांगिया माता (Aavad Mata) – जैसलमेर

परिचय: आवड़ माता को ‘तेमड़ेराय’ भी कहा जाता है। ये जैसलमेर के भाटी राजवंश की कुलदेवी हैं। इनका मंदिर ‘भू-गांव’ (जैसलमेर) में है।

प्रतीक: ‘स्वांगिया’ माता भी इन्ही का स्वरूप है। ‘स्वांग’ का अर्थ होता है ‘भाला’। देवी के हाथ में मुड़ा हुआ भाला होने के कारण इन्हें स्वांगिया माता कहा जाता है। इनका प्रतीक चिन्ह ‘सुगन चिड़ी’ (शगुन चिड़िया) है।

चमत्कार: इन्हें हिंगलाज माता का अवतार माना जाता है। एक दंतकथा के अनुसार, हकरा नदी (सरस्वती) के प्रकोप से लोगों को बचाने के लिए माता ने नदी का सारा पानी एक घूंट में पी लिया था। इनका मंदिर गजरूप सागर झील के किनारे भी स्थित है।

11. आशापुरा माता (Ashapura Mata) – जालौर/पाली

स्थान: इनके प्रमुख मंदिर नाडौल (पाली), मोदरा (जालौर) और पोकरण (जैसलमेर) में हैं।

महत्व: आशापुरा माता जालौर के सोनगरा चौहानों (कान्हड़देव प्रबंध में उल्लेखित) की कुलदेवी हैं। ‘आशा’ पूर्ण करने वाली देवी होने के कारण इनका नाम आशापुरा पड़ा।

  • महोदरी माता: मोदरा (जालौर) स्थित मंदिर में, जिसका उदर (पेट) बड़ा है, उन्हें ‘महोदरी माता’ के नाम से जाना जाता है।
  • बिस्सा समाज: पोकरण की आशापुरा माता ‘बिस्सा’ ब्राह्मण समाज की कुलदेवी हैं।

12. सच्चिया माता (Sachiya Mata) – ओसियां (जोधपुर ग्रामीण)

स्थान: इनका प्रसिद्ध मंदिर ओसियां (जोधपुर ग्रामीण जिला) में स्थित है। ओसियां को ‘राजस्थान का भुवनेश्वर’ भी कहा जाता है।

स्थापत्य: यह मंदिर महामारू (गुर्जर-प्रतिहार) शैली में निर्मित है। इसका निर्माण परमार राजकुमार उपलदेव द्वारा करवाया गया था, हालांकि इसका संरक्षण प्रतिहार शासकों द्वारा किया गया।

महत्व: सच्चिया माता ओसवाल (जैन और हिंदू दोनों) समाज की कुलदेवी हैं। यह सांप्रदायिक सद्भाव का प्रतीक है जहाँ हिंदू और जैन दोनों पूजा करते हैं।

13. तनोटिया माता (Tanot Mata) – जैसलमेर

स्थान: भारत-पाकिस्तान सीमा के पास तनोट गांव, जैसलमेर। इसकी स्थापना भाटी शासक तनुराव ने की थी।

उपनाम:

  • थार की वैष्णो देवी: (नोट: राजस्थान की वैष्णो देवी ‘अर्बुदा माता’ को कहा जाता है, लेकिन थार क्षेत्र में तनोट माता प्रसिद्ध हैं)।
  • रुमाल वाली देवी: भक्त यहाँ मन्नत के रुमाल बांधते हैं।
  • सैनिकों की देवी: इस मंदिर की पूजा और व्यवस्था सीमा सुरक्षा बल (BSF) के जवान करते हैं।

1965 का युद्ध चमत्कार: 1965 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान, पाकिस्तानी सेना ने इस मंदिर पर लगभग 3000 बम गिराए, लेकिन देवी के चमत्कार से मंदिर को कोई खरोंच नहीं आई और कई बम फटे ही नहीं। वे जीवित बम आज भी मंदिर संग्रहालय में रखे हैं।

14. ब्रह्माणी माता (Brahmani Mata) – सोरसन (बारां)

विशिष्टता: यह विश्व का संभवतः एकमात्र ऐसा मंदिर है जहाँ देवी के मुख की नहीं, बल्कि ‘पीठ’ (Back) की पूजा और श्रृंगार किया जाता है।

स्थान: सोरसन, बारां जिले में। यहाँ माघ शुक्ल सप्तमी को गधों का मेला भी लगता है। मंदिर एक गुफा में स्थित है और दुर्ग के परकोटे से घिरा है।

15. अन्य प्रमुख लोक देवियां (विस्तृत सूची)

राजस्थान के अंचल में अन्य कई देवियां पूजनीय हैं, जिनका विवरण निम्न प्रकार है:

  1. सुंधा माता (जालौर): जसवंतपुरा की पहाड़ियों में स्थित। यहाँ केवल देवी के ‘सिर’ की पूजा होती है। यह अघटेश्वरी देवी कहलाती हैं। राजस्थान का प्रथम रोप-वे (Ropeway) 2006 में यहीं शुरू किया गया था। यहाँ भालू अभयारण्य भी है।
  2. त्रिपुरा सुंदरी / तुरताई माता (बांसवाड़ा): तलवाड़ा कस्बे के पास स्थित। यह पांचाल (लोहार) समाज की कुलदेवी हैं। यह एक प्राचीन शक्तिपीठ है और अठारह भुजाओं वाली महिषासुर मर्दिनी की मूर्ति है। राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे की यह आराध्य देवी मानी जाती हैं।
  3. नागणेची माता (जोधपुर/बाड़मेर): राठौड़ राजवंश की कुलदेवी। मूल मंदिर नगाणा गांव (वर्तमान बालोतरा जिला) में है। राव दुहड़ इनकी लकड़ी की मूर्ति कर्नाटक से लाए थे। इनके 18 भुजाएं होती हैं और नीम का वृक्ष पवित्र माना जाता है।
  4. बाण माता (उदयपुर): मेवाड़ के सिसोदिया (गुहिल) राजवंश की कुलदेवी। इनका मुख्य मंदिर चित्तौड़गढ़ दुर्ग और उदयपुर में है।
  5. शीतला माता (कागा, जोधपुर): एक शीतला माता चाकसू में हैं, जबकि जोधपुर के कागा बाग में भी शीतला माता का प्रसिद्ध मंदिर है।
  6. जमुवाय माता (जयपुर): आमेर के कछवाहा राजवंश की कुलदेवी। इनका मंदिर जमवारामगढ़ में है। रामगढ़ का नाम इन्हीं के नाम पर पड़ा।
  7. दधिमति माता (नागौर): गोठ-मांगलोद (नागौर) में स्थित। यह दाधीच ब्राह्मणों की कुलदेवी हैं। यहाँ का मंदिर प्रतिहार कालीन स्थापत्य कला का बेजोड़ नमूना है।
  8. अर्बुदा देवी / अधर देवी (माउंट आबू): सिरोही जिले में स्थित। इन्हें ‘राजस्थान की वैष्णो देवी’ कहा जाता है। यह मंदिर एक गुफा में है जहाँ माता का अधर (होठ) गिरा था।
  9. भवाल माता (नागौर): मेड़ता के पास भवाल गांव में। यहाँ भी देवी को ढाई प्याला शराब चढ़ाने की परंपरा रही है।
  10. राणी भटियाणी (जसोल): वर्तमान में बालोतरा जिले के जसौल में स्थित। इनका नाम स्वरूप कंवर था। ढोली (गायक) जाति के लोग इनका विशेष गुणगान करते हैं।
  11. हर्षत माता (आभानेरी, दौसा): प्रसिद्ध चाँद बावड़ी के पास स्थित। यह मंदिर मूलतः भगवान विष्णु को समर्पित था जिसे बाद में देवी रूप में पूजा जाने लगा। यह महामारू शैली का उत्कृष्ट उदाहरण है।
  12. विरात्रा माता (बाड़मेर/बालोतरा): चौहटन के पास। यह भोपों की कुलदेवी मानी जाती हैं। यहाँ साल में तीन बार मेला भरता है।
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संक्षिप्त सूची (स्थान आधारित)

  • छींक माता: जयपुर (गोपालजी का रास्ता)। माघ सुदी सप्तमी को पूजा होती है।
  • छींछ माता: बांसवाड़ा। यहाँ ब्रह्मा जी का भी मंदिर है।
  • हिचकी माता: सरवाड़ (अजमेर)। मान्यता है कि हिचकी रोग से पीड़ित व्यक्ति यहाँ ठीक होते हैं।
  • अम्बिका माता: जगत (उदयपुर)। इसे ‘मेवाड़ का खजुराहो’ कहा जाता है क्योंकि यहाँ की मूर्तियाँ खजुराहो शैली की हैं।
  • क्षेमकारी (खीमज) माता: भीनमाल (जालौर)। सोलंकी शासकों की कुलदेवी।
  • सुभद्रा माता: भाद्राजूण (जालौर)।
  • खूबड़ माता: सिवाणा (बालोतरा)।
  • बड़ली माता: आकोला (चित्तौड़गढ़)। बेड़च नदी के किनारे। यहाँ से गुजरने पर बच्चों की बीमारियां ठीक होने की मान्यता है।
  • जोगणिया माता: भीलवाड़ा (बेंगू)। यहाँ पहले कैदियों की हथकड़ियां टूट जाती थीं, ऐसी मान्यता है।
  • लटियाल भवानी: फलौदी (जोधपुर)। कल्ला (खेजड़ला) ब्राह्मणों की कुलदेवी। इनके मंदिर के पास खेजड़ी के वृक्ष बहुतायत में हैं, अतः ‘खेजड़बेरी राय’ भी कहलाती हैं।
  • जिलाड़ी माता: बहरोड़ (नवीन जिला कोटपूतली-बहरोड़)। इन्होंने जबरन धर्म परिवर्तन के खिलाफ कार्य किया था।
  • चौथ माता: चौथ का बरवाड़ा (सवाई माधोपुर)। कंजर समाज की आराध्य देवी। यहाँ ‘संकट चौथ’ का प्रसिद्ध मेला लगता है।
  • मनसा देवी: चूरू।
  • आवरी माता: निकुम्भ (चित्तौड़गढ़)। यहाँ लकवाग्रस्त (Paralysis) रोगियों का इलाज दैवीय चमत्कार से होने की मान्यता है।
  • भदाणा माता: कोटा। यहाँ मूठ (जादू-टोना) से पीड़ित व्यक्ति का इलाज होता है।
  • भंवर माता: छोटी सादड़ी (प्रतापगढ़)।
  • सीता माता: बड़ी सादड़ी (चित्तौड़गढ़)। यहाँ सीता माता अभयारण्य भी है (उड़न गिलहरी के लिए प्रसिद्ध)।
  • कुशाल माता: बदनोर (ब्यावर जिला)। निर्माण महाराणा कुंभा ने मालवा विजय के उपलक्ष्य में करवाया था।
  • सुगाली माता: आउवा (पाली)। 1857 की क्रांति की देवी। इनके 10 सिर और 54 हाथ माने जाते हैं। यह चम्पावतों की कुलदेवी थीं। वर्तमान में इनकी मूर्ति बांगड़ संग्रहालय (पाली) में रखी गई है।

निष्कर्ष

राजस्थान की ये लोक देवियां केवल धार्मिक आस्था का केंद्र नहीं हैं, बल्कि ये सामाजिक समरसता, इतिहास, स्थापत्य कला और नारी शक्ति का जीवंत उदाहरण हैं। जहाँ करणी माता और जीण माता ऐतिहासिक राजवंशों की संरक्षिका रहीं, वहीं आई माता और शीतला माता ने सामाजिक सुधार और स्वास्थ्य चेतना का संदेश दिया। नवीन जिला निर्माण के बाद इनकी भौगोलिक स्थिति में प्रशासनिक परिवर्तन आए हैं, किन्तु जनमानस में इनकी आस्था का स्थान आज भी अटल है।

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