भारतीय संविधान की प्रमुख विशेषताएँ क्या हैं?(Characteristics of Indian Constitution)

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भारतीय संविधान की प्रमुख विशेषताएँ

भारतीय संविधान अपनी अद्वितीय संरचना और मूलभूत सिद्धांतों के कारण अन्य संविधानों से विशेष एवं अनुपम है। इसमें देश के ऐतिहासिक अनुभवों, स्वतंत्रता संग्राम के मूल्यों, और उन सभी महत्वपूर्ण तत्वों को सम्मिलित किया गया है, जो राष्ट्र की विविधता एवं अल्पसंख्यक हितों की सुरक्षा के लिए आवश्यक हैं। संविधान निर्माताओं ने विश्वभर के प्रमुख संविधानों का गहन अध्ययन किया और उनकी प्रासंगिक धाराओं को भारतीय परिप्रेक्ष्य में संशोधित कर संविधान में स्थान दिया। इस प्रकार, भारतीय संविधान को सर्वोत्तम संवैधानिक प्रावधानों का संयोजन कहा जा सकता है। इसकी प्रमुख विशेषताओं को निम्नलिखित बिंदुओं में समझा जा सकता है।

लिखित एवं व्यापक संविधान (Written and Most Comprehensive Constitution)

भारतीय संविधान लिखित एवं सुव्यवस्थित संविधान है। इसे संविधान सभा द्वारा निर्मित किया गया और एक निर्धारित तिथि को लागू किया गया। यह विश्व के सबसे विस्तृत संविधानों में से एक है। प्रारंभ में इसमें 395 अनुच्छेद, 22 भाग एवं 8 अनुसूचियाँ थीं, किंतु विभिन्न संशोधनों के कारण वर्तमान में यह 448 अनुच्छेद, 22 भाग एवं 12 अनुसूचियों तक विस्तारित हो चुका है। इसके वृहद स्वरूप के पीछे निम्नलिखित प्रमुख कारण हैं:

  • भारतीय संविधान निर्माताओं ने इसे अद्वितीय बनाने हेतु विभिन्न देशों के संविधानों का अध्ययन कर उनके प्रमुख प्रावधानों को सम्मिलित किया, जिससे इसका आकार विस्तृत हो गया।
  • अमेरिका जैसे संघीय देशों में दोहरे संविधान (केंद्र एवं राज्य के लिए पृथक संविधान) की व्यवस्था है, जबकि भारत में एकल संविधान है। इस कारण संघ एवं राज्य दोनों से संबंधित प्रावधानों को सम्मिलित किया गया, जिससे संविधान का आकार बड़ा हो गया।
  • भारत की सामाजिक एवं सांस्कृतिक विविधता को ध्यान में रखते हुए अन्य विशेष प्रावधानों को जोड़ा गया, जैसे अनुसूचित जनजातियों के लिए पाँचवीं और छठी अनुसूची
  • भारतीय संविधान में प्रशासनिक प्रावधानों का भी विस्तारपूर्वक उल्लेख किया गया है, जैसे नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक, वित्त आयोग, लोक सेवा आयोग आदि।
  • इसमें मौलिक अधिकारों एवं नीति निदेशक तत्त्वों का व्यापक रूप से समावेश किया गया है। 42वें संविधान संशोधन द्वारा मौलिक कर्तव्यों को भी जोड़ा गया, जिससे संविधान अधिक विस्तृत हुआ।
  • संविधान निर्माताओं ने राष्ट्रीय एकता और अखंडता सुनिश्चित करने हेतु आपातकालीन प्रावधानों को भी सम्मिलित किया।

संविधान की सर्वोच्चता (Supremacy of Constitution)

भारतीय संविधान की सर्वोच्चता उसकी मौलिक विशेषता है। यह संघ एवं राज्य सरकारों की शक्तियों का प्राथमिक स्रोत है। केंद्र और राज्य की विधायिका एवं कार्यपालिका को संविधान का पालन अनिवार्य रूप से करना पड़ता है। यदि विधायिका द्वारा कोई ऐसा कानून बनाया जाता है जो संविधान की मूल भावना के विरुद्ध हो, तो न्यायपालिका उसे असंवैधानिक घोषित कर सकती है

कठोरता व लचीलेपन का मिश्रण (Mixture of Rigidity and Flexibility)

संविधान में संशोधन प्रक्रिया की दृष्टि से संविधानों को दो भागों में विभाजित किया जाता है: लचीला संविधान और कठोर संविधान। एकात्मक शासन प्रणाली में लचीला संविधान होता है, जिसमें सरल प्रक्रिया द्वारा संशोधन किया जा सकता है, जबकि संघीय प्रणाली में संशोधन के लिए विशेष बहुमत आवश्यक होता है। भारतीय संविधान न तो पूर्णत: कठोर है, न ही पूर्णत: लचीला, बल्कि दोनों का संतुलित मिश्रण है। इसमें संशोधन के लिए तीन प्रक्रियाएँ निर्धारित की गई हैं:

  • संसद साधारण बहुमत द्वारा कुछ प्रावधानों में संशोधन कर सकती है, जैसे नए राज्यों का निर्माण, सीमाओं में परिवर्तन, नागरिकता संबंधी उपबंध
  • विशेष बहुमत द्वारा संसद मौलिक अधिकारों एवं नीति निर्देशक तत्त्वों में संशोधन कर सकती है।
  • कुछ महत्वपूर्ण प्रावधान, जैसे राष्ट्रपति का निर्वाचन, न्यायपालिका से संबंधित उपबंध, संशोधित करने के लिए राज्यों की आधिकारिक सहमति आवश्यक होती है।

इस प्रकार, भारतीय संविधान न तो ब्रिटेन की तरह पूर्णत: लचीला है और न ही अमेरिका की तरह पूर्णत: कठोर। यह कठोरता एवं लचीलेपन का संतुलित मिश्रण है, जिससे यह समयानुसार आवश्यक परिवर्तन करने में सक्षम बना रहता है।

संघीय संविधान किंतु एकात्मकता की प्रवृत्ति (Federal Constitution With Unitary Bias)

भारतीय संविधान का ढांचा संघीय है, जिसमें संघ के सभी प्रमुख लक्षणों को समाहित किया गया है, जैसे कि केंद्र एवं राज्यों के बीच शक्तियों का स्पष्ट विभाजन, लिखित संविधान, संविधान की सर्वोच्चता, तथा स्वतंत्र एवं सर्वोच्च न्यायपालिका। इसके साथ ही, इसमें कुछ एकात्मक तत्त्व भी सम्मिलित किए गए हैं, जैसे कि एकल नागरिकता, एकीकृत न्यायपालिका, राज्यपालों की नियुक्ति, और आपातकालीन प्रावधान। इन महत्त्वपूर्ण विशेषताओं के कारण भारतीय संविधान को एक अनुपम संविधान माना जाता है। इसी कारण आइवर जेनिंग्स ने इसे “मजबूत केंद्र वाला संघ” की संज्ञा दी है।


संसदीय प्रणाली (Parliamentary System)

  • भारत में संसदीय शासन प्रणाली को अंगीकार किया गया है। संविधान निर्माण के समय, संविधान निर्माताओं के समक्ष संसदीय एवं अध्यक्षीय प्रणाली के विकल्प उपलब्ध थे, किन्तु उन्होंने संसदीय प्रणाली को प्राथमिकता दी। इसका मुख्य कारण यह था कि भारत में 1919 के अधिनियम के अंतर्गत पहले से ही यह प्रणाली अस्तित्व में थी, और जनता को इसके संचालन का पर्याप्त अनुभव प्राप्त था। इसके अतिरिक्त, भारत जैसे बहुसांस्कृतिक राष्ट्र के लिए यह प्रणाली अधिक उपयुक्त मानी गई।
  • इस प्रणाली में संवैधानिक एवं वास्तविक प्रधान के बीच स्पष्ट भेद किया जाता है। भारत में राष्ट्रपति संवैधानिक प्रधान होता है, जबकि प्रधानमंत्री वास्तविक प्रधान के रूप में कार्य करता है। यहाँ राष्ट्रपति ब्रिटेन के राजा की भांति वंशानुगत आधार पर नहीं, बल्कि निर्वाचन प्रक्रिया द्वारा नियुक्त किया जाता है। इस प्रणाली में विधायिका एवं कार्यपालिका के मध्य समन्वय स्थापित रहता है। विधायिका के सदस्य ही कार्यपालिका के अंग होते हैं तथा कार्यपालिका विधायिका के प्रति उत्तरदायी होती है।
  • सामूहिक उत्तरदायित्व इस प्रणाली का एक अनिवार्य तत्त्व है, जिसके तहत किसी भी नीति या निर्णय के लिए कोई एकमात्र मंत्री नहीं, बल्कि पूरा मंत्रिमंडल उत्तरदायी होता है। इसी कारण, अविश्वास प्रस्ताव किसी एक मंत्री के विरुद्ध नहीं, बल्कि सम्पूर्ण मंत्रिमंडल के विरुद्ध लाया जाता है।

स्वतंत्र न्यायपालिका
(Independent Judiciary)

भारतीय संविधान में स्वतंत्र न्यायपालिका का प्रावधान किया गया है, जो कि संघीय शासन व्यवस्था का एक मौलिक तत्त्व है। न्यायपालिका की स्वतंत्रता का आशय यह है कि विधायिका एवं कार्यपालिका इसके कार्यों में हस्तक्षेप न करें, जिससे न्यायाधीश अपने निर्णय स्वतंत्र रूप से ले सकें। इसे सुनिश्चित करने हेतु निम्नलिखित प्रावधान किए गए हैं

  1. न्यायाधीशों का कार्यकाल निश्चित होता है। उन्हें सेवानिवृत्ति से पूर्व केवल महाभियोग प्रक्रिया या स्वेच्छा से त्यागपत्र देने पर ही हटाया जा सकता है।
  2. न्यायिक कार्यों की आलोचना प्रतिबंधित की गई है। संसद में किसी न्यायाधीश के आचरण पर केवल उसी स्थिति में चर्चा की जा सकती है, जब उसके हटाने का प्रस्ताव विचाराधीन हो।
  3. न्यायाधीशों के वेतन एवं भत्ते संविधान द्वारा सुनिश्चित किए गए हैं, तथा उनके कार्यकाल के दौरान इन वेतन-भत्तों में कमी नहीं की जा सकती। ये संचित निधि से प्रदान किए जाते हैं, जिससे इन पर विधायिका का नियंत्रण नहीं रहता
  4. न्यायपालिका को अपने कर्मचारियों की नियुक्ति एवं उनकी सेवा शर्तों के निर्धारण का भी अधिकार प्रदान किया गया है, जिससे बाहरी हस्तक्षेप को कम किया जा सके

संसदीय संप्रभुता एवं न्यायिक सर्वोच्चता में समन्वय (Coordination Between Parliamentary Sovereignty and Judicial Supremacy)

भारतीय संविधान में संसदीय प्रभुता तथा न्यायिक सर्वोच्चता के बीच संतुलन स्थापित किया गया है। ब्रिटिश संविधान में संसद की पूर्ण सर्वोच्चता होती है, अर्थात् उसके बनाए गए किसी भी कानून को चुनौती नहीं दी जा सकती। इसके विपरीत, अमेरिकी संविधान में न्यायिक सर्वोच्चता को अपनाया गया है, जहाँ सर्वोच्च न्यायालय को कांग्रेस द्वारा पारित कानूनों की समीक्षा करने का अधिकार प्राप्त है

भारतीय संविधान में इन दोनों प्रणालियों के संयोजन का प्रयास किया गया है—

  • संसद को विधि निर्माण एवं संविधान संशोधन करने का अधिकार प्राप्त है
  • साथ ही, न्यायपालिका को यह अधिकार दिया गया है कि यदि कोई कानून संविधान की मूल भावना के विरुद्ध हो, तो उसे अवैध घोषित किया जा सकता है

प्रभुत्वसंपन्न राज्य (Sovereign State)

संविधान की प्रस्तावना में भारत को सम्पूर्ण प्रभुत्वसंपन्न राष्ट्र के रूप में परिभाषित किया गया है, जिसका अर्थ है कि यह अपने आंतरिक एवं बाह्य मामलों में किसी भी प्रकार के निर्णय लेने के लिए पूर्णतः स्वतंत्र है। भारत के किसी भी आधिकारिक निर्णय में किसी विदेशी सत्ता का कोई हस्तक्षेप स्वीकार्य नहीं है, और उसे किसी भी अंतर्राष्ट्रीय संधि या समझौते को स्वीकार करने हेतु विवश नहीं किया जा सकता। कुछ समीक्षकों ने भारत की राष्ट्रमंडल सदस्यता को उसकी संप्रभुता के विरुद्ध बताया है। किंतु पं. नेहरू ने प्रारंभ से ही स्पष्ट किया कि यह पूर्णतः स्वैच्छिक समझौता है, जिसे आवश्यकतानुसार समाप्त भी किया जा सकता है। भारत ने राष्ट्रमंडल की सदस्यता एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में ग्रहण की, जो ब्रिटिश साम्राज्य को केवल प्रतीकात्मक महत्व प्रदान करता है।

समाजवादी राज्य (Socialist State)

भारतीय संविधान की प्रस्तावना में भारत को समाजवादी राज्य घोषित किया गया है। यह समाजवाद लोकतांत्रिक समाजवाद की अवधारणा पर आधारित है, जो संवैधानिक और लोकतांत्रिक साधनों के माध्यम से प्राप्त किया जाता है। इस समाजवाद का लक्ष्य शोषण के समस्त रूपों को समाप्त कर संसाधनों का न्यायसंगत वितरण और सामाजिक समानता स्थापित करना है। भारत में संपत्ति एवं संसाधनों के वितरण का उद्देश्य सामाजिक न्याय की प्राप्ति है, ताकि प्रत्येक नागरिक को समान अवसर मिल सके।

लोकतांत्रिक गणराज्य (Democratic Republic)

  • संविधान की उद्देशिका में भारत को एक लोकतांत्रिक गणराज्य घोषित किया गया है। लोकतंत्र में सर्वोच्च सत्ता जनता में निहित होती है, और नागरिक निर्वाचन प्रक्रिया के माध्यम से एक निर्धारित अवधि के लिए अपने शासन प्रतिनिधियों का चयन करते हैं।
  • साथ ही, संविधान में गणराज्य शब्द का प्रयोग यह इंगित करता है कि भारत में राष्ट्र प्रमुख का चयन निर्वाचन द्वारा होगा, न कि वंशानुगत आधार पर, जैसा कि ब्रिटेन में देखा जाता है। यहाँ सभी नागरिक समान अधिकारों से युक्त होते हैं, और कोई भी व्यक्ति सार्वजनिक पदों के लिए योग्य उम्मीदवार हो सकता है, चाहे उसका सामाजिक या पारिवारिक पृष्ठभूमि कुछ भी हो।

पंथनिरपेक्ष राज्य (Secular State)

42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 के अंतर्गत संविधान की प्रस्तावना में पंथनिरपेक्षता शब्द जोड़ा गया। यद्यपि संविधान में इस शब्द को स्पष्ट रूप से परिभाषित नहीं किया गया है, फिर भी इसके विभिन्न अनुच्छेदों के माध्यम से इसके स्वरूप को समझा जा सकता है। भारतीय पंथनिरपेक्षता का आशय केवल धर्म से तटस्थता नहीं, बल्कि सर्वधर्म समभाव से है।

  • इसका तात्पर्य यह है कि राज्य का कोई आधिकारिक धर्म नहीं होगा, और वह किसी भी नागरिक के साथ धार्मिक आधार पर कोई भेदभाव नहीं करेगा
  • भारत में सभी धर्मों को समान महत्व प्रदान किया जाता है, और राज्य प्रत्येक नागरिक को अपने धार्मिक विश्वासों को स्वतंत्र रूप से अपनाने एवं अभ्यास करने का अधिकार देता है।
  • संविधान के अनुच्छेद 15 और 16 किसी भी व्यक्ति के साथ धार्मिक आधार पर भेदभाव को निषिद्ध करते हैं, जबकि अनुच्छेद 25-28 नागरिकों को धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार प्रदान करते हैं।
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एकल नागरिकता (Single Citizenship)

भारतीय संविधान में एकल नागरिकता की अवधारणा को स्वीकार किया गया है। अमेरिका की तरह यहाँ संघीय एवं प्रांतीय स्तर पर अलग-अलग नागरिकता की व्यवस्था नहीं है। प्रत्येक भारतीय नागरिक को एक समान राष्ट्रीय पहचान प्राप्त होती है।

  • राष्ट्रीय एकता और अखंडता को सुदृढ़ बनाए रखने के लिए एकल नागरिकता को अधिक उपयुक्त एवं प्रभावी माना गया है।
  • इस व्यवस्था के कारण हर भारतीय नागरिक को यह अधिकार प्राप्त है कि वह देश के किसी भी भाग में निवास कर सके, रोजगार प्राप्त कर सके, तथा स्वतंत्र रूप से आवागमन कर सके

मौलिक अधिकार (Fundamental Rights)

भारत में राष्ट्रीय आंदोलन के दौरान मौलिक अधिकारों की मांग की जाती रही थी। स्वतंत्रता प्राप्ति के पश्चात भारतीय संविधान में इन अधिकारों को सम्मिलित करके इस अपेक्षा को पूर्ण किया गया। इसके तहत, भारतीय नागरिकों को कुछ ऐसे अपरिहार्य अधिकार प्रदान किए गए हैं, जिन्हें राज्य द्वारा भी निरस्त नहीं किया जा सकता। इन अधिकारों को न्यायिक संरक्षण भी प्राप्त है। भारतीय संविधान में भाग-3 के तहत अनुच्छेद 12 से 35 तक इन अधिकारों को संकलित किया गया है। वर्तमान में कुल छह मौलिक अधिकार निम्नलिखित हैं:

  • समानता का अधिकार (अनुच्छेद 14-18)
  • संवैधानिक उपचारों का अधिकार (अनुच्छेद 32)
  • संस्कृति एवं शिक्षा संबंधी अधिकार (अनुच्छेद 29-30)
  • धर्म की स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 25-28)
  • स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद 19-22)
  • शोषण के विरुद्ध अधिकार (अनुच्छेद 23-24)

राज्य की नीति के निदेशक तत्त्व (Directive Principles of State Policy)

राज्य की नीति के निदेशक तत्त्व, नागरिकों के प्रति राज्य के सकारात्मक उत्तरदायित्व को इंगित करते हैं। यद्यपि ये न्यायालय द्वारा प्रवर्तनीय नहीं हैं, फिर भी ये शासन प्रशासन के लिए मार्गदर्शक सिद्धांत के रूप में कार्य करते हैं। संविधान संशोधन के माध्यम से इनका क्रियान्वयन संभव हुआ है, जैसे कि 73वें संविधान संशोधन के तहत ग्राम पंचायत व्यवस्था को संविधान में स्थान दिया गया।


कल्याणकारी राज्य की स्थापना (Establishment of Welfare State)

  • भारतीय संविधान में ऐसे अनेक उपबंध निहित हैं, जो राज्य के कल्याणकारी स्वरूप को स्पष्ट करते हैं। संविधान की प्रस्तावना में समाजवाद, सामाजिक एवं आर्थिक न्याय, तथा समानता जैसे शब्दों का समावेश, राज्य के जनकल्याणकारी स्वरूप को रेखांकित करता है।
  • राज्य की नीति के निदेशक तत्त्वों के विभिन्न प्रावधान, सामाजिक एवं आर्थिक लोकतंत्र की स्थापना के साथ-साथ कल्याणकारी राज्य की अवधारणा को भी स्पष्ट करते हैं। सरकारों से अपेक्षा की जाती है कि वे नीतियों एवं कार्यक्रमों का निर्धारण करते समय इन निर्देशक तत्त्वों को प्राथमिकता देंगे।
  • भारतीय संविधान की उपर्युक्त विशेषताएँ इसे अद्वितीय बनाती हैं। इन्हीं गुणों के कारण, भारत ने अनेक चुनौतियों का सामना करते हुए भी विकास के पथ पर निरंतर प्रगति की है। जहां द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद निर्मित कई संविधान समाप्त हो गए, वहीं भारतीय संविधान अपनी सुदृढ़ता और लचीलेपन के कारण न केवल स्थायित्व बनाए रखने में सक्षम रहा, बल्कि अन्य राष्ट्रों के लिए प्रेरणा स्रोत भी बना है।

आपातकालीन उपबंध (Emergency Provisions)

भारतीय संविधान में गंभीर परिस्थितियों से निपटने हेतु आपातकालीन उपबंधों की व्यवस्था की गई है, जिसे राष्ट्रपति द्वारा लागू किया जाता है। उल्लेखनीय है कि इन प्रावधानों को संविधान में सम्मिलित करने का मुख्य उद्देश्य देश की एकता, अखंडता, संप्रभुता, संवैधानिक व्यवस्था एवं लोकतांत्रिक ढांचे की सुरक्षा सुनिश्चित करना है। भारतीय संविधान में तीन प्रकार के आपातकालीन परिस्थितियों के लिए उपबंध किए गए हैं:

  • राष्ट्रीय आपातकाल – यदि युद्ध, बाह्य आक्रमण या सशस्त्र विद्रोह के कारण राष्ट्र में गंभीर संकट उत्पन्न हो जाए।
  • राज्य आपातकाल – जब किसी राज्य में संवैधानिक तंत्र पूरी तरह से विफल हो जाए या वह केंद्र सरकार के निर्देशों का अनुपालन करने में असमर्थ हो।
  • वित्तीय आपातकाल – यदि भारत की वित्तीय स्थिरता को गहरी चुनौती का सामना करना पड़े या देश आर्थिक संकट में आ जाए।

त्रिस्तरीय शासन प्रणाली (Three-Tier Government)

भारतीय संविधान में प्रारंभ में अन्य संघीय संविधानों की भांति द्विस्तरीय शासन प्रणाली (केंद्र और राज्य) की व्यवस्था थी। किंतु 1992 में 73वें एवं 74वें संविधान संशोधनों के माध्यम से त्रिस्तरीय शासन प्रणाली (केंद्र, राज्य एवं स्थानीय स्तर) का प्रावधान किया गया, जो वैश्विक स्तर पर अद्वितीय उदाहरण है।

ध्यान देने योग्य है कि 73वें संविधान संशोधन के तहत संविधान के एक नए भाग (भाग-9) तथा 11वीं अनुसूची को जोड़ा गया, जिसके माध्यम से पंचायतों को संवैधानिक मान्यता प्रदान की गई। इसी प्रकार, 74वें संविधान संशोधन, 1992 के द्वारा एक नया भाग (भाग-9क) एवं 12वीं अनुसूची जोड़कर नगरपालिकाओं (शहरी स्थानीय शासन इकाइयों) को संवैधानिक दर्जा प्रदान किया गया।


सहकारी समितियाँ (Co-operative Societies)

भारतीय संविधान में 97वें संशोधन अधिनियम, 2011 के अंतर्गत सहकारी समितियों को संवैधानिक दर्जा एवं संरक्षण प्रदान किया गया। इस संदर्भ में निम्नलिखित महत्वपूर्ण परिवर्तन किए गए:

  • सहकारी समितियों के गठन के अधिकार को मौलिक अधिकार का दर्जा प्रदान किया गया।
  • राज्य की नीति के निदेशक सिद्धांतों में संशोधन कर सहकारी समितियों को प्रोत्साहन देने के लिए एक नया प्रावधान जोड़ा गया।
  • संविधान में “सहकारी समितियाँ” शीर्षक से एक नया भाग (भाग-IX ख) सम्मिलित किया गया।

संविधान के स्रोत (Sources of Constitution)

भारतीय संविधान के निर्माणकर्ताओं का उद्देश्य एक अद्वितीय संविधान का निर्माण करना था। इसके लिए यह अत्यावश्यक था कि वे न केवल भारत की प्राचीन विरासत बल्कि वैश्विक स्तर पर अपनाए गए मुख्य संविधानों का भी गहन अध्ययन करें। इसी संदर्भ में, भारतीय संविधान निर्माताओं ने 60 से अधिक संविधानों का विश्लेषण किया और उनके महत्वपूर्ण प्रावधानों को भारतीय आवश्यकताओं के अनुरूप संविधान में सम्मिलित किया। संविधान सभा के सदस्यों के इस महत्वपूर्ण प्रयास की आलोचना करते हुए कुछ लोगों ने इसे ‘उधार का थैला’ करार दिया और इसे अनुकरणवादी मानसिकता से प्रेरित बताया। किन्तु, यह तर्क उचित नहीं माना जा सकता।

वास्तव में, संविधान निर्माताओं ने विभिन्न संविधानों से आवश्यक प्रावधानों को ग्रहण करने से पूर्व व्यापक चिंतन, संशोधन एवं विमर्श किया ताकि वे भारतीय परिस्थितियों के अनुकूल बनाए जा सकें। उन्होंने किसी भी संविधान का यथावत अनुकरण नहीं किया, बल्कि उन्हें भारत के सामाजिक, राजनीतिक एवं सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य के अनुकूल ढाला। संविधान सभा में इस आलोचना का उत्तर देते हुए डॉ. भीमराव अंबेडकर ने यह स्पष्ट किया कि संविधान निर्माण की प्रक्रिया एक क्रमिक एवं तार्किक विकास का परिणाम होती है। उन्होंने कहा कि चूँकि विभिन्न देशों ने अपने संविधानों का सुधार एवं पुनर्गठन करते हुए उन्हें परिष्कृत किया है, अतः कुछ सामान्य सिद्धांतों की पुनरावृत्ति अपरिहार्य है। अतः भारतीय संविधान पर अन्य संविधानों के अनुकरण का जो आरोप लगाया गया, वह केवल अपर्याप्त अध्ययन का परिणाम था।

भारतीय संविधान के स्रोतों को दो मुख्य वर्गों में विभाजित किया जा सकता है – आंतरिक स्रोत एवं बाह्य स्रोतआंतरिक स्रोतों में मुख्य रूप से भारत शासन अधिनियम, 1935 को सम्मिलित किया जाता है, जिसने भारतीय संविधान के अधिकांश प्रावधानों को प्रभावित किया। इसका मुख्य कारण यह था कि इस अधिनियम के अंतर्गत भारत में शासन संचालन का पर्याप्त अनुभव प्राप्त हो चुका था। दूसरी ओर, बाह्य स्रोतों में ब्रिटेन, अमेरिका, आयरलैंड सहित अन्य देशों से लिए गए संवैधानिक प्रावधान सम्मिलित हैं। इन स्रोतों का विस्तार निम्नलिखित रूप में किया जा सकता है –

भारतीय संविधान के प्रमुख स्रोतों की तालिका

देश/स्रोतभारतीय संविधान में अपनाए गए प्रावधान
भारत शासन अधिनियम (1935)संघीय शासन प्रणाली, शक्तियों का वितरण (तीन सूचियाँ), राज्यपाल का पद, न्यायिक संरचना, लोक सेवा आयोग, आपातकालीन प्रावधान
ब्रिटेन का संविधानसंसदीय शासन प्रणाली, मंत्रिमंडल प्रणाली, द्विसदनीय विधायिका, एकल नागरिकता, विधायी प्रक्रिया, संसदीय विशेषाधिकार, संवैधानिक परमाधिकार रिट, विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया
संयुक्त राज्य अमेरिका का संविधानमौलिक अधिकार, उपराष्ट्रपति का पद, न्यायपालिका की स्वतंत्रता, न्यायिक पुनरावलोकन, राष्ट्रपति के विरुद्ध महाभियोग प्रक्रिया, उच्चतम न्यायालय एवं उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को पदच्युत करने की प्रक्रिया
आयरलैंड का संविधानराज्य की नीति के निदेशक सिद्धांत, राष्ट्रपति के निर्वाचन की पद्धति, राज्यसभा के लिए नामांकन प्रक्रिया
कनाडा का संविधानसशक्त केंद्र के साथ संघीय व्यवस्था, अवशिष्ट शक्तियाँ केंद्र के पास रहना, राज्यपालों की नियुक्ति केंद्र द्वारा, उच्चतम न्यायालय का परामर्शी न्यायनिर्णय अधिकार
ऑस्ट्रेलिया का संविधानसमवर्ती सूची, संसद के दोनों सदनों की संयुक्त बैठक, व्यापार, वाणिज्य और समागम की स्वतंत्रता
जर्मनी का वाइमर संविधानआपातकाल की स्थिति में मौलिक अधिकारों का स्थगन
सोवियत संघ (पूर्व) का संविधाननागरिकों के मौलिक कर्तव्य, प्रस्तावना में सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक न्याय का समावेश
दक्षिण अफ्रीका का संविधानसंविधान संशोधन प्रक्रिया, राज्यसभा के सदस्यों का निर्वाचन
फ्रांस का संविधानगणतंत्रात्मक शासन प्रणाली, स्वतंत्रता, समानता एवं बंधुता का आदर्श

भारतीय संविधान: परिसंघात्मक, संघात्मक या एकात्मक?

संविधान का वर्गीकरण: केंद्र एवं राज्यों के आधार पर

संविधान को तीन प्रमुख श्रेणियों में विभाजित किया गया है: परिसंघात्मक (Confederal), संघात्मक (Federal), और एकात्मक (Unitary)

1. परिसंघात्मक व्यवस्था

इस प्रणाली में केंद्र का स्वतंत्र अस्तित्व नहीं होता है। यह एक ऐसी संरचना होती है जिसमें स्वतंत्र राज्य कुछ महत्त्वपूर्ण विषयों, जैसे कि विदेश नीति, संचार, बाह्य सुरक्षा आदि के प्रशासन हेतु आपसी समझौते के आधार पर एक संयुक्त शासन तंत्र की स्थापना करते हैं। इस व्यवस्था में प्रत्येक राज्य को यह स्वतंत्रता प्राप्त होती है कि वह अपनी इच्छानुसार इस परिसंघ से अलग हो सकता है। उदाहरणस्वरूप, संयुक्त राज्य अमेरिका का प्रारंभिक गठन इसी प्रणाली के अंतर्गत हुआ था। हालांकि, वर्तमान समय में अमेरिका में सर्वोच्च न्यायालय के कुछ महत्त्वपूर्ण निर्णयों के आधार पर राज्यों को परिसंघ से अलग होने के अधिकार को समाप्त कर दिया गया है।

2. संघात्मक व्यवस्था

संघात्मक शासन प्रणाली भी परिसंघीय संरचना की भांति विभिन्न राज्यों के आपसी समझौते का परिणाम होती है, किंतु इस प्रणाली में राज्यों को अलग होने का अधिकार नहीं प्राप्त होता है। वर्तमान समय में इसके उत्कृष्ट उदाहरण संयुक्त राज्य अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया तथा कनाडा हैं।

नोट: “संघ” शब्द लैटिन भाषा के ‘Foedus’ से लिया गया है, जिसका अर्थ ‘संधि’ या ‘समझौता’ होता है।

3. एकात्मक शासन प्रणाली

यह व्यवस्था प्रायः छोटे देशों में पाई जाती है, जहां सम्पूर्ण शासन प्रणाली केंद्र के अधीन होती है। इस प्रणाली में केंद्र की प्रधान भूमिका होती है, जबकि प्रांतों की भूमिका गौण होती है। इसमें राज्यों को सीमित अधिकार प्रदान किए जाते हैं, और वे मुख्यतः केंद्र द्वारा निर्धारित दायित्वों का ही निर्वहन करते हैं। केंद्र के पास यह अधिकार भी होता है कि वह राज्यों की सीमाओं, नाम एवं अधिकारों में परिवर्तन कर सके या उन्हें पूर्णतः समाप्त कर सके। इस प्रणाली का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण ब्रिटेन है।

भारतीय संविधान का स्वरूप

इन संवैधानिक प्रारूपों के अध्ययन के पश्चात यह स्पष्ट होता है कि भारतीय संविधान परिसंघात्मक नहीं है, क्योंकि यह किसी भी प्रकार के आपसी समझौते का परिणाम नहीं है, न ही इसमें राज्यों को संघ से अलग होने की स्वतंत्रता प्राप्त है

भारतीय संविधान के स्वरूप को लेकर विवाद इस पर केंद्रित रहा है कि यह एकात्मक है या संघात्मक। इस विषय पर के. सी. व्हीयर, के. संथानम एवं आइवर जेनिंग्स जैसे विद्वानों में मतभेद रहा है। भारतीय संविधान की व्याख्या करते हुए प्रारूप समिति के अध्यक्ष डॉ. भीमराव अंबेडकर ने कहा था कि भारतीय संविधान में कुछ प्रावधान केंद्र को विशेष शक्तियां प्रदान करते हैं, जिससे राज्यों की स्वतंत्रता सीमित हो जाती है, परंतु संवैधानिक स्वरूप में यह संघात्मक ही है

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संघात्मक शासन प्रणाली के प्रकार

आधार (Base)परिसंघ (Confederation)संघ (Federation)संघ (Union)
केंद्र की स्थितिसीमित शक्तिसंतुलित शक्तिनिर्णायक या मजबूत शक्ति
राज्यों की स्थितिनिर्णायक शक्तिसंतुलित शक्तिसीमित शक्ति
संविधान संशोधन शक्तिराज्यों के पासकेंद्र एवं राज्यों में वितरितकेंद्र के पास
अवशिष्ट शक्तियांराज्यों के पासकेंद्र एवं राज्यों में वितरितकेंद्र के पास
उदाहरणऑस्ट्रेलियासंयुक्त राज्य अमेरिकाभारत – कनाडा

संघात्मक संविधान के लक्षण (Features of Federal Constitution)

संघात्मक संविधान की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं—

1. कठोर संविधान (Rigid Constitution)

संघात्मक शासन प्रणाली में संविधान संशोधन की प्रक्रिया अत्यंत जटिल होती है। इस कठिन प्रक्रिया के कारण संविधान में सरलता से संशोधन संभव नहीं होता, जिससे राज्यों के अधिकारों एवं शक्तियों में अनावश्यक हस्तक्षेप की संभावना समाप्त हो जाती है। संघात्मक व्यवस्था की इस जटिलता का अनुमान इस तथ्य से लगाया जा सकता है कि संयुक्त राज्य अमेरिका के संविधान में अब तक केवल 26 संशोधन ही किए जा सके हैं

2. लिखित संविधान (Written Constitution)

संघात्मक प्रणाली में संविधान प्रायः लिखित होता है। इसमें केंद्र एवं राज्यों के मध्य शक्तियों का स्पष्ट विभाजन किया जाता है, जिससे किसी भी प्रकार की अव्यवस्था उत्पन्न न हो

3. संविधान की सर्वोच्चता (Supremacy of the Constitution)

संघात्मक शासन प्रणाली में संविधान सर्वोच्च होता हैकेंद्र एवं राज्य सरकारों की सभी शक्तियाँ संविधान से ही प्राप्त होती हैं तथा उनके बीच उत्पन्न किसी भी विवाद का समाधान संविधान के अनुसार ही किया जाता है। इस कारण से संविधान की सर्वोच्चता अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है।

4. शक्तियों का विभाजन (Division of Powers)

संघात्मक शासन प्रणाली में केंद्र एवं राज्यों के मध्य शक्तियों का स्पष्ट बँटवारा किया जाता है। इसी शक्तियों के विभाजन के आधार पर संघात्मक संविधान का निर्माण किया जाता है।

5. स्वतंत्र न्यायपालिका (Independent Judiciary)

संघात्मक प्रणाली में स्वतंत्र न्यायपालिका की उपस्थिति आवश्यक होती है। यह केंद्र एवं राज्यों के मध्य उत्पन्न होने वाले विवादों का निष्पक्ष समाधान प्रदान करती है। न्यायपालिका की स्वतंत्रता एवं निष्पक्षता संघात्मक शासन प्रणाली के सफल संचालन के लिए आवश्यक होती है

भारतीय संविधान की संघात्मक विशेषताएँ(Federal Characteristics of Indian Constitution)

भारतीय संविधान में संघीय शासन व्यवस्था के प्रमुख तत्त्व निम्नलिखित रूप में परिलक्षित होते हैं—

1. दोहरी शासन प्रणाली (Dual Governance System)

भारतीय संविधान में दोहरी शासन प्रणाली को अंगीकार किया गया है, जिसमें केन्द्र एवं राज्यों के लिए पृथक सरकारों की व्यवस्था की गई है। यह संघीय ढाँचे का एक मूलभूत सिद्धांत है, जिसके अंतर्गत राष्ट्रीय एवं प्रांतीय स्तरों पर प्रशासनिक स्वायत्तता सुनिश्चित की जाती है

2. लिखित संविधान (Written Constitution)

भारतीय संविधान एक संहिताबद्ध दस्तावेज है, जो केंद्र तथा राज्य सरकारों की शक्तियों का मूल आधार प्रदान करता है। इसकी लिखित प्रकृति सुनिश्चित करती है कि किसी भी प्रकार की प्रशासनिक अराजकता उत्पन्न न हो तथा संवैधानिक प्रावधानों का पालन स्पष्ट रूप से किया जाए

3. संविधान की कठोरता (Rigidity of the Constitution)

भारतीय संविधान में संघीय ढांचे से संबंधित संशोधनों के लिए एक कठोर प्रक्रिया अपनाई गई है। इस प्रक्रिया के अंतर्गत, संसद के दोनों सदनों में विशेष बहुमत से पारित किए जाने के अतिरिक्त, राज्यों के विधान मंडलों द्वारा साधारण बहुमत से अनुमोदन आवश्यक होता है

4. स्वतंत्र एवं निष्पक्ष न्यायपालिका (Independent and Impartial Judiciary)

भारतीय संविधान में न्यायपालिका को स्वतंत्र एवं निष्पक्ष बनाए रखने की व्यवस्था की गई है। सर्वोच्च न्यायालय को संविधान की व्याख्या करने तथा केंद्र और राज्यों के बीच उत्पन्न संवैधानिक विवादों का निपटारा करने का सर्वोच्च अधिकार प्राप्त है। इसके अतिरिक्त, न्यायपालिका को संघ एवं राज्यों के मध्य तथा राज्यों के आपसी विवादों के समाधान हेतु मौलिक क्षेत्राधिकार प्रदान किया गया है

भारतीय संविधान में संघीय शासन व्यवस्था की सभी आवश्यक विशेषताएँ मौजूद हैं, किंतु कुछ विद्वानों ने इसे पूर्णतः संघात्मक मानने से इंकार किया हैके.सी. व्हीयर का मत है कि भारतीय संविधान अर्ध-संघीय प्रकृति का है, जबकि आइवर जेनिंग्स ने इसे एक सुदृढ़ केंद्र वाला संघ कहा है

भारतीय संविधान में संघवाद (Federalism in Indian Constitution)

भारत अपने सामाजिक, सांस्कृतिक एवं भौगोलिक विविधता के कारण एक अत्यंत जटिल प्रशासनिक संरचना वाला देश है। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान ही इस बात पर सहमति बन गई थी कि विविधतापूर्ण एवं विशाल भारत में सत्ता का विकेंद्रीकरण आवश्यक होगा। इस प्रकार की शासन व्यवस्था से भिन्न-भिन्न क्षेत्रों, भाषाओं एवं संस्कृतियों के लोगों को प्रशासन में भागीदारी एवं स्वशासन का अवसर मिलता है

संविधान निर्माताओं ने भारत की विविधता को दृष्टिगत रखते हुए संघीय शासन प्रणाली को स्वीकार किया। भारतीय संविधान में अंगीकृत **संघीय ढांचे का सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांत यह है कि केंद्र और राज्यों के बीच संबंध सहयोगपूर्ण होंगे, जिससे विविधता का सम्मान करने के साथ-साथ राष्ट्रीय एकता को भी सुदृढ़ किया जा सके

  • भारतीय संविधान के अनुच्छेद 1 में भारत को “राज्यों का संघ” (Union of States) कहा गया है। इसमें “संघ” के स्थान पर “यूनियन” शब्द का प्रयोग किया गया है, जो यह इंगित करता है कि राज्यों को संविधान द्वारा सृजित किया गया है, न कि वे स्वतंत्र सत्ता के रूप में अस्तित्व में थे
  • भारतीय संघीय प्रणाली का ढांचा व्यवहारिक दृष्टि से संघात्मक रखा गया है, किंतु इसका मॉडल कनाडा के संघीय ढांचे पर आधारित है। कनाडा की संघीय प्रणाली में एक शक्तिशाली केंद्र सरकार की व्यवस्था की गई है, जो अमेरिकी संघीय मॉडल से भिन्न है।
  • भारतीय शासन प्रणाली के स्वरूप को लेकर विभिन्न विद्वानों के मतभेद मौजूद हैं। कुछ विद्वानों का मत है कि भारत की शासन व्यवस्था संघात्मक नहीं, बल्कि एकात्मक विशेषताओं से युक्त है। तथापि, यह स्पष्ट है कि भारतीय शासन प्रणाली में संघीय एवं एकात्मक दोनों तत्त्वों का समावेश किया गया है, जो इसे एक विशिष्ट प्रशासनिक ढांचा प्रदान करता है

भारतीय संविधान की संघीय विशेषताएँ

द्वि-स्तरीय शासन प्रणाली

भारतीय संविधान ने दो-स्तरीय प्रशासनिक संरचना को अपनाया है, जिसमें राष्ट्रीय स्तर पर केंद्र सरकार और प्रांतीय स्तर पर राज्य सरकारों की स्थापना की गई है। केंद्र सरकार को वैश्विक महत्व के विषय, जैसे विदेश नीति, रक्षा, मुद्रा एवं संचार से संबंधित अधिकार सौंपे गए हैं, जबकि राज्यों को क्षेत्रीय और स्थानीय आवश्यकताओं से जुड़े विषय, जैसे स्वास्थ्य, नगर प्रशासन एवं कृषि, के संचालन की जिम्मेदारी दी गई है।

लिखित संविधान

भारतीय संविधान एक संहिताबद्ध विधायी दस्तावेज है, जो व्यापक रूप से संरचित है। वर्तमान में इसमें 465 अनुच्छेद (प्रारंभिक रूप से 395), 25 भाग (मूलतः 22) तथा 12 अनुसूचियां (शुरुआती रूप में 8) सम्मिलित हैं। संविधान के अंतर्गत केन्द्र एवं राज्यों के मध्य शक्तियों का स्पष्ट विभाजन किया गया है, तथा इसे सर्वोच्च विधायी आधार माना गया है।

शक्तियों का विभाजन

संविधान में राज्य एवं केंद्र सरकारों के दायित्वों को स्पष्ट रूप से विभाजित किया गया है। सातवीं अनुसूची के तहत तीन सूची प्रणाली को अपनाया गया है:

  • केंद्र सूची – इसमें 90 विषय (पूर्व में 97) सम्मिलित हैं।
  • राज्य सूची – इसमें 59 विषय (मूलतः 66) शामिल किए गए हैं।
  • समवर्ती सूची – इसमें 52 विषय (पूर्व में 47) रखे गए हैं।

समवर्ती सूची में राज्य एवं केंद्र सरकार दोनों को विधि निर्माण का अधिकार प्राप्त है, किंतु यदि किसी विषय पर टकराव उत्पन्न होता है, तो केंद्र सरकार द्वारा निर्मित विधि को सर्वोपरि माना जाएगा

स्वतंत्र न्यायपालिका

संविधान ने संघीय ढांचे को संतुलित बनाए रखने तथा संविधान की सर्वोच्चता सुनिश्चित करने हेतु एक स्वतंत्र न्यायपालिका की स्थापना का प्रावधान किया है। केंद्र एवं राज्यों के बीच संवैधानिक विवादों के निपटान के लिए सर्वोच्च न्यायालय को विशेष अधिकार प्रदान किए गए हैं

द्विसदनीय विधायिका

भारतीय विधायिका को द्विसदनीय संरचना प्रदान की गई है, जिसमें लोकसभा (निम्न सदन) एवं राज्यसभा (उच्च सदन) शामिल हैं।

  • राज्यसभा – यह राज्यों के हितों का प्रतिनिधित्व करने वाली संस्था है।
  • लोकसभा – यह भारतीय नागरिकों के प्रत्यक्ष प्रतिनिधित्व का माध्यम है।
    राज्यसभा संघीय ढांचे के अंतर्गत राज्यों के अधिकारों एवं हितों की रक्षा करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है

कठोर संविधान

भारतीय संविधान की संशोधन प्रक्रिया कठोर एवं जटिल है, विशेष रूप से संघीय संरचना से संबंधित प्रावधानों में संशोधन के लिए व्यापक बहुमत आवश्यक होता है। इसमें संसद के दोनों सदनों में विशेष बहुमत से पारित विधेयक के अतिरिक्त, कुल राज्यों में से आधे राज्यों की सहमति आवश्यक होती है। यह प्रावधान संघीय प्रणाली की स्थिरता एवं अखंडता सुनिश्चित करता है


भारतीय संविधान की एकात्मक विशेषताएँ

संविधान में संघीय तत्वों के साथ-साथ एकात्मक तत्त्वों को भी समान रूप से सम्मिलित किया गया है, जिससे यह सुनिश्चित किया जा सके कि केंद्र सरकार आवश्यकतानुसार राष्ट्रीय एकता एवं अखंडता बनाए रखने में सक्षम हो

एकात्मक विशेषताएँ

  • एकल नागरिकता – भारतीय नागरिकों के लिए एकल राष्ट्रीयता की अवधारणा लागू की गई है, जिससे राष्ट्रीय एकता को प्रोत्साहन मिलता है।
  • राज्यसभा में असमान प्रतिनिधित्व – राज्यों को समान प्रतिनिधित्व प्रदान करने के बजाय, जनसंख्या के आधार पर प्रतिनिधित्व दिया गया है, जिससे केंद्र की सुदृढ़ता बनी रहती है
  • इकहरी न्यायपालिकासंपूर्ण देश में एक ही न्यायिक प्रणाली लागू की गई है, जो केंद्र के अधिकार क्षेत्र में आती है।
  • एकल संविधान – भारत में संपूर्ण देश के लिए एकल संविधान लागू है, जबकि अन्य संघीय देशों में राज्यों के पास अपना पृथक संविधान होता है।
  • राज्यपाल की नियुक्तिराज्यों के प्रमुख (राज्यपाल) की नियुक्ति केंद्र सरकार द्वारा की जाती है, जिससे राज्यों पर केंद्र का प्रभाव सुनिश्चित होता है।
  • शक्तियों का विभाजन केंद्र के पक्ष में – केंद्र सरकार को अधिक व्यापक एवं निर्णायक शक्तियाँ प्रदान की गई हैं, जिससे संघीय ढांचे के भीतर केंद्रीय नियंत्रण बना रहता है
  • राज्य सूची के विषयों पर संसद की विधायी शक्ति – संसद को यह अधिकार प्राप्त है कि विशेष परिस्थितियों में राज्य सूची के विषयों पर भी विधि निर्मित कर सके

एकल नागरिकता

भारत ने एकल नागरिकता की प्रणाली को अपनाया है, जबकि संघात्मक शासन व्यवस्था में प्रायः द्वैध नागरिकता का प्रावधान होता है, जिसके अंतर्गत नागरिकों को संघ तथा राज्य स्तर पर पृथक नागरिकता प्रदान की जाती है। भारत में राज्यों के लिए कोई पृथक नागरिकता नहीं है। प्रत्येक नागरिक को यह अधिकार प्राप्त है कि वह देश के किसी भी भाग में निवास कर सकता है और वहाँ स्वतंत्र रूप से बस सकता है।

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एकीकृत न्यायपालिका

भारत में एकीकृत न्याय प्रणाली लागू की गई है, जहाँ संघीय शासन प्रणाली वाले अन्य देशों की तरह संघीय एवं राज्य स्तरीय पृथक न्यायालयों की कोई व्यवस्था नहीं है। संघीय न्यायालय संघ से जुड़े मामलों की सुनवाई करता है, जबकि राज्य न्यायालय राज्य-स्तरीय विषयों को संभालते हैं। अन्य संघीय व्यवस्थाओं में राज्यों के लिए पृथक सर्वोच्च न्यायालय होते हैं, जिनके निर्णयों को किसी अन्य न्यायालय में चुनौती नहीं दी जा सकती। परंतु भारत में उच्चतम न्यायालय अपील का सर्वोच्च प्राधिकरण है और यह राज्य सूची से संबंधित मामलों पर भी निर्णय देने का अधिकार रखता है।

एकल संविधान

भारत में संघीय शासन प्रणाली होने के बावजूद द्वैध संविधान की व्यवस्था नहीं है। यहाँ एकल संविधान प्रभावी है, जो केंद्र एवं राज्यों दोनों की शक्तियों का मूल स्रोत है। राज्यों के लिए कोई पृथक संविधान नहीं है तथा उन्हें संविधान में संशोधन करने का अधिकार भी प्राप्त नहीं है, जिससे राष्ट्रीय एकता सुनिश्चित होती है।

शक्तियों का विभाजन केंद्र के पक्ष में

भारतीय संविधान में शक्तियों का विभाजन ऐसा प्रतीत होता है कि यह केंद्र सरकार के पक्ष में अधिक झुका हुआ है। संघ सूची में विषयों की संख्या सर्वाधिक है, जबकि समवर्ती सूची में भी राज्यों की तुलना में केंद्र को प्राथमिकता प्रदान की गई है। इसके अतिरिक्त, कुछ मामलों में केंद्र को अधिकार-प्राप्ति की भी विशेष सुविधा दी गई है।

राज्य सूची के विषयों पर संसद की विधायी शक्ति

भारतीय संविधान में राज्य सूची से संबंधित विषयों पर भी संसद को विधायी अधिकार प्रदान किया गया है। यदि राज्यसभा में उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के दो-तिहाई बहुमत से किसी विषय को राष्ट्रीय महत्व का घोषित कर दिया जाए, तो संसद को उस विषय पर विधि निर्माण का अधिकार प्राप्त हो जाता है।

राज्यपाल की नियुक्ति

संवैधानिक व्यवस्था के अंतर्गत राज्यों में राज्यपाल की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है। राज्यपाल का कार्यकाल राष्ट्रपति के अनुग्रह पर निर्भर करता है। वस्तुतः, राज्यपाल केंद्र सरकार के प्रतिनिधि के रूप में कार्य करता है और केंद्र सरकार राज्यपाल के माध्यम से राज्यों पर नियंत्रण स्थापित करती है।

राज्यसभा में असमान प्रतिनिधित्व

भारत में राज्यसभा के अंतर्गत राज्यों को समान प्रतिनिधित्व प्रदान नहीं किया गया है। राज्यों को मिलने वाले सीटों के आवंटन में व्यापक असमानता देखी जाती है। उदाहरणस्वरूप, उत्तर प्रदेश को राज्यसभा में 33 स्थान आवंटित किए गए हैं, जबकि मणिपुर, नागालैंड और त्रिपुरा जैसे राज्यों को मात्र एक सीट प्रदान की गई है। इसके विपरीत, संघीय व्यवस्था वाले देशों में राज्यों को उच्च सदन में समान प्रतिनिधित्व प्राप्त होता है। उदाहरण के रूप में, अमेरिका की सीनेट में प्रत्येक राज्य को दो सीटों का समान आवंटन दिया जाता है

आपातकालीन उपबंध (Emergency Provisions)

अनुच्छेद 352 के अंतर्गत जब राष्ट्र में आपातकाल लागू किया जाता है, तो संघीय कार्यपालिका की शक्ति राज्यों की कार्यपालिका शक्तियों पर प्रभाव डालती है, जिससे केंद्र सरकार को राज्यों को निर्देश जारी करने का अधिकार प्राप्त हो जाता है। इस अवधि के दौरान केंद्र सरकार को राज्य सूची के अंतर्गत कानून बनाने की शक्ति मिल जाती है। इसके अतिरिक्त, केंद्र सरकार राज्यों को प्रदान की जाने वाली वित्तीय सहायता में संशोधन या निलंबन कर सकती है। इस प्रकार, आपातकाल की स्थिति में भारतीय संविधान का ढांचा एकात्मक स्वरूप ग्रहण कर लेता है।

अनुच्छेद 356 के अंतर्गत राष्ट्रपति शासन की घोषणा होने पर भी संविधान का स्वरूप एकात्मक हो जाता है। इस शासन प्रणाली के तहत राज्य विधानमंडल की शक्तियाँ संसद द्वारा निष्पादित की जाती हैं, जिससे राज्य विधानसभा को निलंबित या विघटित किया जा सकता है। इस अवधि में राज्य का प्रशासन राष्ट्रपति के निर्देशानुसार राज्यपाल द्वारा संचालित किया जाता है। ये सभी प्रावधान भारतीय संविधान की एकात्मक प्रकृति को दर्शाते हैं।


नए राज्यों का निर्माण एवं राज्य सीमाओं में परिवर्तन

संघीय संरचना में सामान्यतः राज्यों को यह अधिकार प्राप्त होता है कि वे अपने भौगोलिक अस्तित्व को बनाए रख सकें, तथा संघ के पास उनके क्षेत्र में परिवर्तन करने की कोई शक्ति नहीं होती। किंतु भारतीय संविधान के अनुच्छेद 3 के तहत संसद को यह अधिकार प्राप्त है कि वह विधि के माध्यम से किसी राज्य के क्षेत्र की वृद्धि, संकुचन, सीमाओं में परिवर्तन, नाम में संशोधन अथवा नए राज्य की स्थापना कर सके। यही कारण है कि भारतीय राज्यों का अस्तित्व पूर्णतः केंद्र पर निर्भर है।

इस शक्ति का प्रयोग करते हुए हाल ही में केंद्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर राज्य से लद्दाख को पृथक कर, दो केंद्र शासित प्रदेशों का गठन किया। यह घटनाक्रम भारतीय संविधान के केंद्रीयकरण की प्रवृत्ति को दर्शाता है।


राज्यों की आर्थिक स्थिति केंद्र की तुलना में कमजोर

संघीय ढांचे में वित्तीय संसाधनों का वितरण इस प्रकार किया जाता है कि राज्य अपनी आर्थिक आवश्यकताओं के लिए केंद्र पर निर्भर न रहें। किंतु भारत में यह सिद्धांत व्यावहारिक रूप से प्रभावी नहीं है

हालांकि राज्यों के पास स्वतंत्र संसाधन उपलब्ध हैं, किंतु वे अपनी आर्थिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए केंद्र पर निर्भर रहते हैं। भारत में संघ सरकार वित्तीय रूप से अधिक सशक्त है, जबकि राज्य सरकारें अनुदानों के लिए केंद्र पर आश्रित हैं।

वित्त आयोग, जिसका कार्य राज्यों को वित्तीय अनुदानों की अनुशंसा करना है, उसकी नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है और इसमें केंद्र सरकार के प्रतिनिधियों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। परिणामस्वरूप, राज्यों के वित्तीय अधिकार सीमित हो जाते हैं, जिससे उनकी आर्थिक स्वतंत्रता प्रभावित होती है


लोक सेवाओं का अस्पष्ट विभाजन

संघीय व्यवस्थाओं में सामान्यतः राज्य और केंद्र की प्रशासनिक सेवाओं का स्पष्ट पृथक्करण किया जाता है। संघ के अधिकारी संघीय दायित्वों का निर्वहन करते हैं, जबकि राज्य अधिकारी राज्य-स्तरीय प्रशासन को संभालते हैं।

भारत में, इन दोनों सेवाओं के अतिरिक्त, अखिल भारतीय सेवाओं (All India Services) की भी व्यवस्था लागू है। अखिल भारतीय सेवा के अधिकारियों को विभिन्न राज्यों में सेवा देनी होती है तथा केंद्र सरकार आवश्यकतानुसार उन्हें प्रतिनियुक्ति पर बुला सकती है। यह प्रावधान भारतीय संविधान के एकात्मक स्वरूप को सुदृढ़ करता है।


संघवाद की प्रकृति और वैश्विक परिप्रेक्ष्य

किसी देश में संघवाद की संरचना वहां की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि एवं सामाजिक आवश्यकताओं पर निर्भर करती है। संघीय प्रणाली का एक निश्चित ढांचा सभी राष्ट्रों में एक समान नहीं होता

वर्तमान में, अमेरिका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में केंद्रीकरण की प्रवृत्ति बढ़ी है। इससे संघीय शक्तियाँ अधिक मजबूत हुई हैं, जबकि राज्यों के अधिकारों में प्रतिबंध लगा है

भारतीय संविधान निर्माताओं ने ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य, स्वतंत्रता संग्राम के उद्देश्यों और तात्कालिक समस्याओं को ध्यान में रखते हुए संविधान का निर्माण किया। वे देश की सुरक्षा, प्रांतीय असंतोष, कश्मीर विवाद और शरणार्थी समस्या जैसी चुनौतियों से भली-भांति परिचित थे।

संविधान निर्माताओं ने राष्ट्रीय एकता एवं अखंडता को सर्वोच्च प्राथमिकता दी और इसी कारण उन्होंने एक सशक्त केंद्र-युक्त संघीय ढांचे को अपनाया। शक्तियों का विभाजन भी केंद्र के पक्ष में झुका हुआ प्रतीत होता है, क्योंकि तत्कालीन और भविष्य की संभावित चुनौतियों के समाधान के लिए शक्तिशाली केंद्र आवश्यक था

भारतीय संविधान की आलोचना (Criticism of Indian Constitution)

कुछ संविधानविदों ने भारतीय संविधान के संविधान सभा द्वारा निर्मित और अंगीकृत होने की प्रक्रिया को लेकर आलोचना की है, जिसे निम्नलिखित रूप में प्रस्तुत किया गया है:

भारतीय संविधान को उधार का संकलन कहा जाना (Indian Constitution as a Borrowed Compilation)

कुछ संविधान विश्लेषकों का मत है कि भारतीय संविधान में कुछ भी नवीन अथवा मौलिक नहीं है, जिससे इसे पूरी तरह भारत का संविधान कहा जा सके। इसके बजाय, इसे ‘उधार का संविधान’, ‘उधारी की एक बोरी’, ‘हॉच-पॉच संविधान’, ‘उधार का थैला’ अथवा विभिन्न संविधानों के तत्वों का ‘पैबंद’ कहा गया है।

भारतीय संविधान का विस्तृत विश्लेषण करने पर यह आलोचना पक्षपातपूर्ण और अतार्किक प्रतीत होती है। भारतीय संविधान निर्माताओं ने विश्व के कई संविधानों का गहन अध्ययन कर उनके सकारात्मक तत्वों को चुना, जो भारतीय समाज की परिस्थितियों के अनुकूल थे और उन्हें भारतीय संविधान में समाहित किया।

इस संदर्भ में डॉ. भीमराव अंबेडकर ने संविधान सभा में कहा था—

“कोई पूछ सकता है कि वर्तमान समय में बनाए जा रहे संविधान में कुछ नया हो सकता है? विश्व का पहला लिखित संविधान बने हुए 100 वर्षों से अधिक समय हो चुका है और इसके आधार पर अनेक देशों ने अपने संविधान को लिखित और संक्षिप्त रूप में तैयार किया है। यह भी पहले से निर्धारित है कि किसी संविधान का विषय क्षेत्र क्या होना चाहिए। इसी प्रकार, संविधान के मूलभूत सिद्धांतों की जानकारी और स्वीकृति अब पूरे विश्व में सर्वमान्य हो चुकी है। इन तथ्यों को ध्यान में रखते हुए, यह स्वाभाविक है कि विभिन्न संविधानों के मुख्य प्रावधानों में समानता पाई जाए। हालांकि, एक नई विशेषता यह हो सकती है कि, एक ऐसे संविधान में, जिसका निर्माण काफी विलंब से हो रहा हो, त्रुटियों की संभावना कम से कम हो। यदि कोई कमियां हों भी, तो उन्हें सुधारने और देश की आवश्यकताओं के अनुरूप इसे ढालने की सुविधा संविधान में मौजूद रहे। यह आरोप कि भारतीय संविधान अन्य देशों के संविधानों की हूबहू नकल मात्र है, मेरा मानना है कि यह अपर्याप्त अध्ययन पर आधारित एक भ्रामक धारणा है।”

वकीलों का स्वर्ग (Paradise of Lawyers)

कुछ संविधान विशेषज्ञों का मत है कि भारतीय संविधान अत्यधिक विधिकतापूर्ण और अत्यंत जटिल है। इसमें प्रयुक्त कानूनी शब्दावली और तकनीकी मुहावरे इसे एक गूढ़ दस्तावेज़ बना देते हैं। इसी कारण आइवर जेनिंग्स ने इसे ‘वकीलों का स्वर्ग’ कहा है।

इस संदर्भ में संविधान सभा के सदस्य एच. के. माहेश्वरी ने भी यह विचार व्यक्त किया कि ऐसा प्रारूप जनता को अधिक विधिक विवादों में उलझने के लिए प्रेरित करेगा और लोग न्यायालयों की ओर अधिक प्रवृत्त होंगे। इससे समाज में ईमानदारी का स्तर घटेगा तथा लोग सत्य और अहिंसा के मार्ग से दूर हट सकते हैं। यदि मैं यह कह सकूँ तो यह प्रारूप वास्तव में ‘वकीलों का स्वर्ग’ ही है, क्योंकि यह विवादों के लिए व्यापक अवसर प्रस्तुत करता है और हमारे कुशल तथा मेधावी अधिवक्ताओं के लिए पर्याप्त कार्य उपलब्ध कराता है।

इसी प्रकार संविधान सभा के सदस्य पी. आर. देशमुख ने यह अभिव्यक्त किया कि मैं यह कहना चाहूँगा कि डॉ. बी. आर. अम्बेडकर द्वारा सदन के समक्ष प्रस्तुत संवैधानिक अनुच्छेदों का प्रारूप अत्यधिक विस्तृत एवं जटिल प्रतीत होता है, मानो यह किसी विशालकाय विधिक ग्रंथ की भाँति हो। किसी भी संवैधानिक दस्तावेज में इतना अत्यधिक विस्तार एवं शब्दाडम्बर नहीं होना चाहिए। संभवतः उनके लिए ऐसे दस्तावेज़ को संक्षिप्त एवं स्पष्ट रूप में तैयार करना एक चुनौतीपूर्ण कार्य रहा होगा। मेरा मानना है कि जो सजीव, सक्रिय एवं प्रगतिशील संविधान होना चाहिए, वह मात्र एक विधिक ग्रंथ नहीं बल्कि सामाजिक-राजनीतिक दिशा-निर्देश के रूप में होना चाहिए था। किंतु दुर्भाग्यवश ऐसा नहीं हो सका, और हम अनावश्यक रूप से शब्दों के भार से ग्रसित हो गए हैं, जिन्हें सरलता से संक्षिप्त किया जा सकता था।


भारत सरकार अधिनियम, 1935 की नकल (Copy of Government of India, 1935)

कुछ संवैधानिक विश्लेषकों का यह मत है कि भारतीय संविधान निर्माताओं ने भारत सरकार अधिनियम, 1935 के प्रावधानों को अत्यधिक मात्रा में अपनाया है। इससे संविधान 1935 के अधिनियम का संशोधित स्वरूप मात्र प्रतीत होता है। एन. श्रीनिवासन का कथन है कि “भारतीय संविधान भाषा एवं विषय-वस्तु दोनों ही दृष्टिकोण से 1935 के अधिनियम की अनुकृति है।” इसी प्रकार आइवर जेनिंग्स ने भी कहा कि भारतीय संविधान, भारत सरकार अधिनियम, 1935 से प्रत्यक्ष रूप से व्युत्पन्न है और इसके अधिकतर प्रावधानों को सीधे समाहित कर लिया गया है। संविधान सभा के सदस्य पी. आर. देशमुख ने भी इसे स्पष्ट करते हुए कहा कि “संविधान मूलतः भारत सरकार अधिनियम, 1935 ही है, जिसमें मात्र वयस्क मताधिकार जोड़ा गया है।”

इन आलोचनाओं के प्रत्युत्तर में संविधान सभा में डॉ. अम्बेडकर ने कहा कि ,

यदि प्रारूप संविधान में भारत सरकार अधिनियम, 1935 के अधिकांश प्रावधानों को सम्मिलित किया गया है, तो इसमें कोई क्षमायोग्य दोष नहीं है। किसी भी विधिक प्रणाली में अवश्यकतानुसार उधार लेना अनुचित नहीं माना जाता, और यह साहित्यिक अनुकरण नहीं बल्कि तर्कसंगत ग्रहण है। कोई भी संवैधानिक सिद्धांत किसी एक विचारधारा का एकाधिकार नहीं होता। मुझे केवल इस तथ्य का अफसोस है कि 1935 अधिनियम से लिए गए अधिकांश प्रावधान प्रशासनिक तंत्र के विवरणों तक सीमित रह गए।

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