1. राजस्थान राज्य मानवाधिकार आयोग की अवधारणा — राष्ट्रीय स्तर से शुरुआत
आज़ादी के बाद के दशकों में जब देश में हिरासती मौतों, पुलिस ज़्यादतियों और सामाजिक भेदभाव की घटनाएं बार-बार सुर्खियों में आने लगीं, तब एक ऐसे स्वतंत्र निकाय की ज़रूरत महसूस हुई जो सरकार से बाहर रहकर, फिर भी सरकारी तंत्र के भीतर घुसकर, नागरिकों के मौलिक अधिकारों की निगरानी कर सके। इसी सोच का नतीजा था मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993।
यह अधिनियम 28 सितंबर 1993 से लागू हुआ, और इसी के अंतर्गत 12 अक्टूबर 1993 को न्यायमूर्ति रंगनाथ मिश्र की अध्यक्षता में राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) का गठन हुआ। इसका प्रधान कार्यालय नई दिल्ली में है।
| तथ्य | विवरण |
|---|---|
| लागू अधिनियम | मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 |
| अधिनियम प्रभावी तिथि | 28 सितंबर 1993 |
| NHRC गठन तिथि | 12 अक्टूबर 1993 |
| प्रथम अध्यक्ष | न्यायमूर्ति रंगनाथ मिश्र |
| मुख्यालय | नई दिल्ली |
| वर्तमान अध्यक्ष (2026) | न्यायमूर्ति वी. रामासुब्रमण्यम (30 दिसंबर 2024 से) |
| अध्यक्ष योग्यता | भारत का सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीश (CJI) अथवा उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश |
| संरचना | 1 अध्यक्ष + 5 पूर्णकालिक सदस्य + 7 पदेन सदस्य |
💡 परीक्षा ट्रिक: “28-9 अधिनियम, 12-10 आयोग” — पहले क़ानून बना (28 सितंबर), फिर दो हफ्ते बाद आयोग खड़ा हुआ (12 अक्टूबर)। दोनों तारीखों को क्रम में याद रखें तो कभी भ्रम नहीं होगा।
इसी अधिनियम की एक बेहद महत्वपूर्ण किंतु अक्सर नज़रअंदाज़ की जाने वाली बात यह है कि इसने केवल एक राष्ट्रीय निकाय नहीं बनाया — इसने राज्यों को भी अपने-अपने स्तर पर समानांतर तंत्र खड़ा करने का अधिकार दिया। यहीं से राजस्थान जैसे राज्यों में राज्य मानवाधिकार आयोगों की नींव पड़ती है, जो इस लेख का मुख्य विषय है।
🔑 परीक्षा बिंदु: ‘मानवाधिकार’ शब्द इस अधिनियम की धारा 2(घ) में परिभाषित है। इसमें वे अधिकार शामिल हैं जो व्यक्ति के जीवन, स्वतंत्रता, समानता व गरिमा से जुड़े हैं और जिन्हें संविधान द्वारा गारंटी दी गई है या अंतरराष्ट्रीय प्रसंविदाओं में शामिल है और भारतीय न्यायालयों में प्रवर्तनीय है।
2. राजस्थान राज्य मानवाधिकार आयोग — स्थापना और वैधानिक आधार
राजस्थान में यह विचार क़ानून बनने के लगभग छह वर्ष बाद ज़मीन पर उतरा। राज्य सरकार ने 18 जनवरी 1999 को एक अधिसूचना जारी की, जिसके ज़रिए मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 की धारा 21(1) के प्रावधानों के अनुसार राजस्थान राज्य मानव अधिकार आयोग के गठन की औपचारिक घोषणा हुई।
शुरुआत में इस अधिसूचना में एक पूर्णकालिक अध्यक्ष एवं चार सदस्यों का प्रावधान रखा गया था। परंतु अधिसूचना जारी होना और आयोग का वास्तव में काम शुरू करना — ये दो अलग-अलग घटनाएं हैं। अध्यक्ष व सदस्यों की नियुक्ति की प्रक्रिया पूरी होने में समय लगा, और आयोग वास्तविक रूप से 23 मार्च 2000 से क्रियाशील हुआ।
⚠️ परीक्षा सावधानी: छात्र अक्सर “स्थापना वर्ष” और “क्रियाशील होने का वर्ष” दोनों को एक ही मान लेते हैं। ऐसा नहीं है — अधिसूचना 1999 में आई, आयोग 2000 में सक्रिय हुआ। यदि प्रश्न में “अधिसूचना कब जारी हुई” पूछा जाए तो उत्तर 18 जनवरी 1999 है; यदि “आयोग कब से कार्यरत हुआ” पूछा जाए तो उत्तर 23 मार्च 2000 है।
आयोग का मुख्य कार्यालय सचिवालय, जयपुर में स्थित है — राजधानी में होना स्वाभाविक भी है, क्योंकि आयोग को राज्य सरकार के तंत्र के साथ लगातार समन्वय बनाए रखना होता है, भले ही वह प्रशासनिक रूप से स्वायत्त हो।
एक दशक से अधिक समय बाद, मानव अधिकार संरक्षण (संशोधित) अधिनियम, 2006 ने आयोग की संरचना में बड़ा बदलाव किया — अध्यक्ष व चार सदस्यों की मूल व्यवस्था को घटाकर अध्यक्ष व दो सदस्यों तक सीमित कर दिया गया। यह बदलाव अगले भाग में विस्तार से समझते हैं।
मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 (धारा 21-1)
↓
राजस्थान सरकार की अधिसूचना (18 जनवरी 1999)
↓
अध्यक्ष व सदस्यों की नियुक्ति प्रक्रिया
↓
आयोग पूर्ण रूप से गठित व क्रियाशील (23 मार्च 2000)
↓
2006 संशोधन अधिनियम
→ संरचना: 1 अध्यक्ष + 4 सदस्य से घटकर 1 अध्यक्ष + 2 सदस्य3. आयोग का संगठन और सदस्यों की योग्यता
यहाँ ठीक वही जगह है जहाँ परीक्षार्थी सबसे ज़्यादा गलती करते हैं। सवाल आसान लगता है — “अध्यक्ष कौन बन सकता है?” — पर उत्तर की बारीकी छूट जाती है।
आयोग का अध्यक्ष केवल कोई भी सेवानिवृत्त न्यायाधीश नहीं बन सकता। नियमानुसार अध्यक्ष किसी उच्च न्यायालय का सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीश (Chief Justice) होना चाहिए — सामान्य न्यायाधीश नहीं। यह ठीक उसी तरह की सटीकता है जो राष्ट्रीय आयोग में CJI या उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश के लिए अपेक्षित होती है।
इसके अतिरिक्त आयोग में दो सदस्य होते हैं:
| सदस्य | योग्यता |
|---|---|
| अध्यक्ष | उच्च न्यायालय का सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीश |
| सदस्य 1 | उच्च न्यायालय का सेवानिवृत्त अथवा कार्यरत न्यायाधीश |
| सदस्य 2 | राज्य में जिला न्यायाधीश रहा व्यक्ति (न्यूनतम 7 वर्ष अनुभव), जिसे मानव अधिकारों से संबंधित मामलों का ज्ञान या व्यावहारिक अनुभव हो |
⚠️ परीक्षा सावधानी: “अध्यक्ष उच्च न्यायालय का कोई भी सेवानिवृत्त न्यायाधीश हो सकता है” — यह कथन ग़लत है। सही कथन है: अध्यक्ष उच्च न्यायालय का सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीश होना चाहिए। “कोई भी न्यायाधीश” वाली योग्यता तो दूसरे सदस्य के लिए है, अध्यक्ष के लिए नहीं।
राष्ट्रीय बनाम राज्य आयोग — योग्यता की तुलना
| बिंदु | राष्ट्रीय आयोग (NHRC) | राज्य आयोग (RSHRC) |
|---|---|---|
| अध्यक्ष की योग्यता | भारत का सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीश (CJI) या उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश | उच्च न्यायालय का सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीश |
| कुल पूर्णकालिक सदस्य | अध्यक्ष सहित 6 (5 सदस्य + अध्यक्ष) | अध्यक्ष सहित 3 (2 सदस्य + अध्यक्ष) |
| पदेन सदस्य | 7 | कोई नहीं |
💡 अनुभवी टिप्पणी: ध्यान दीजिए, राज्य आयोग की संरचना जानबूझकर छोटी रखी गई है — क्योंकि इसका कार्यक्षेत्र भी सीमित है (केवल राज्य व समवर्ती सूची तक)। यह डिज़ाइन का तर्क समझ लेंगे तो आगे की पूरी संरचना अपने-आप याद हो जाएगी, रटने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी।
4. नियुक्ति प्रक्रिया — कौन नियुक्त करता है, कौन शपथ दिलाता है
नियुक्ति की प्रक्रिया में तीन अलग-अलग व्यक्ति/संस्थाएं तीन अलग-अलग भूमिका निभाती हैं, और यही बात परीक्षा में सबसे ज़्यादा उलझन पैदा करती है।
औपचारिक रूप से नियुक्ति राज्यपाल करते हैं। परंतु राज्यपाल यह नियुक्ति अपनी मर्ज़ी से नहीं करते — वे एक 6 सदस्यीय समिति की सिफारिश पर करते हैं। चूंकि राजस्थान में विधान परिषद (Legislative Council) नहीं है, इसलिए व्यवहार में यह समिति केवल 4 सदस्यों की रह जाती है।
| क्रम | समिति सदस्य | भूमिका |
|---|---|---|
| 1 | मुख्यमंत्री | समिति के पदेन अध्यक्ष |
| 2 | गृह मंत्री (राज्य मंत्रिमंडल सदस्य) | सदस्य |
| 3 | विधानसभा अध्यक्ष | सदस्य |
| 4 | विधानसभा में विपक्ष का नेता | सदस्य |
| राजस्थान में लागू नहीं | ||
| राजस्थान में लागू नहीं |
नियुक्ति के बाद अध्यक्ष व सदस्यों को शपथ दिलाने का काम राज्यपाल नहीं, बल्कि उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश करता है। यह छोटी-सी बारीकी 2016 की Senior Teacher Grade-II परीक्षा में सीधे पूछी जा चुकी है, इसलिए इसे हल्के में मत लीजिए।
राज्यपाल (नियुक्ति-कर्ता, समिति की सिफारिश पर)
↓
6 सदस्यीय समिति (राजस्थान में व्यवहारतः 4 सदस्य)
→ मुख्यमंत्री (अध्यक्ष)
→ गृह मंत्री
→ विधानसभा अध्यक्ष
→ नेता प्रतिपक्ष
↓
शपथ — उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश दिलवाता है🔑 परीक्षा बिंदु: नियुक्ति समिति का पदेन अध्यक्ष मुख्यमंत्री होता है, गृह मंत्री नहीं। 2016 की परीक्षा में यही प्रश्न इसी रूप में पूछा गया था, और कई अभ्यर्थियों ने ग़लती से गृह मंत्री को उत्तर मान लिया था।
5. पदच्युति — अध्यक्ष व सदस्यों को हटाने की प्रक्रिया
यहाँ एक दिलचस्प विरोधाभास है, जो दरअसल आयोग की स्वायत्तता की रीढ़ है — नियुक्ति राज्यपाल करते हैं, पर हटाने का अधिकार केवल राष्ट्रपति के पास है। राज्य सरकार चाहे कितनी भी नाराज़ क्यों न हो, वह अकेले किसी अध्यक्ष या सदस्य को पद से नहीं हटा सकती।
हटाने के दो रास्ते हैं:
पहला रास्ता — सिद्ध कदाचार या असमर्थता के आधार पर: यदि अध्यक्ष या सदस्य पर सिद्ध कदाचार (proved misbehaviour) या असमर्थता (incapacity) का आरोप हो, तो मामला राष्ट्रपति द्वारा जांच हेतु उच्चतम न्यायालय को भेजा जाता है। उच्चतम न्यायालय जांच के बाद रिपोर्ट राष्ट्रपति को भेजता है, और दुर्व्यवहार या असमर्थता सिद्ध होने पर ही राष्ट्रपति हटा सकते हैं। यह प्रक्रिया लंबी और सुरक्षा-कवच जैसी है।
दूसरा रास्ता — बिना उच्चतम न्यायालय की जांच के सीधे हटाना: कुछ विशेष परिस्थितियों में राष्ट्रपति सीधे अपने आदेश से हटा सकते हैं:
| क्रम | आधार |
|---|---|
| 1 | यदि वह दिवालिया (insolvent) घोषित हो गया हो |
| 2 | यदि कार्यकाल के दौरान कोई अन्य लाभ का सरकारी पद धारण किया हो |
| 3 | यदि दिमागी या शारीरिक रूप से दायित्व निर्वहन के अयोग्य हो गया हो |
| 4 | यदि सक्षम न्यायालय द्वारा मानसिक रूप से अस्वस्थ घोषित किया गया हो |
| 5 | यदि किसी अपराध में दोषी सिद्ध होकर कारावास की सज़ा पाई हो |
⚠️ परीक्षा सावधानी: एक आम भ्रम यह है कि “राज्यपाल नियुक्त करते हैं तो राज्यपाल ही हटा भी सकते हैं” — यह पूरी तरह ग़लत है। नियुक्ति और पदच्युति, दोनों अलग-अलग प्राधिकारियों के हाथ में हैं। यही असल में आयोग की स्वायत्तता की गारंटी है, क्योंकि राज्य सरकार अपनी मर्ज़ी से किसी असुविधाजनक अध्यक्ष को नहीं हटा सकती।
6. कार्यकाल संबंधी प्रावधान
अध्यक्ष व सदस्य 3 वर्ष के कार्यकाल अथवा 70 वर्ष की आयु, जो भी पहले पूरी हो, तक पद पर बने रह सकते हैं। ध्यान रहे — 2019 से पहले यह कार्यकाल 5 वर्ष का हुआ करता था; मानव अधिकार संरक्षण (संशोधन) अधिनियम, 2019 ने इसे घटाकर 3 वर्ष कर दिया। यह बदलाव NHRC और सभी राज्य आयोगों — दोनों पर समान रूप से लागू होता है।
दो बातें विशेष रूप से याद रखने योग्य हैं:
- यदि 70 वर्ष की आयु पूर्ण नहीं हुई हो, तो व्यक्ति को इस आयु-सीमा तक पुनर्नियुक्त किया जा सकता है।
- कार्यकाल पूर्ण होने के बाद संबंधित व्यक्ति राज्य या केंद्र सरकार के अधीन कोई अन्य पद ग्रहण नहीं कर सकता — यह प्रावधान इसलिए रखा गया है ताकि अध्यक्ष अपने कार्यकाल के दौरान भविष्य के किसी सरकारी पद की उम्मीद में सरकार के पक्ष में झुकाव न रखे।
💡 परीक्षा ट्रिक: “3-70 फॉर्मूला” याद रखें — 3 वर्ष या 70 वर्ष, जो पहले आए। और अगर प्रश्न में “2019 से पहले” जैसा कोई संदर्भ मिले, तो समझ जाइए जवाब 5 वर्ष होगा, 3 नहीं।
7. आयोग के कार्य (Functions)
आयोग के कार्यों को याद रखने का सबसे अच्छा तरीका है उन्हें तीन समूहों में बांटना — जांच संबंधी, समीक्षा-सिफारिश संबंधी, और जागरूकता संबंधी।
जांच व हस्तक्षेप संबंधी कार्य:
- मानव अधिकार उल्लंघन की स्वयं-प्रेरणा (suo motu) से अथवा किसी पीड़ित के आवेदन पर जांच करना — विशेष रूप से तब जब कोई लोक सेवक शिकायत की अवहेलना कर रहा हो
- न्यायालय में लंबित किसी मानव अधिकार संबंधी मामले में हस्तक्षेप करना
- जेलों में जाकर वहां की स्थिति का अध्ययन करना और सुधार हेतु सिफारिशें करना
समीक्षा व सिफारिश संबंधी कार्य: 4. मानव अधिकारों की रक्षा हेतु बने संवैधानिक व विधिक प्रावधानों की समीक्षा तथा प्रभावी क्रियान्वयन हेतु सुझाव देना 5. आतंकवाद सहित उन सभी कारणों की समीक्षा करना जिनसे मानव अधिकारों का हनन होता है, और बचाव के उपाय सुझाना 6. मानवाधिकार संबंधी अंतरराष्ट्रीय संधियों व दस्तावेज़ों का अध्ययन कर उन्हें प्रभावी ढंग से लागू करने की सिफारिश करना
अनुसंधान व जागरूकता संबंधी कार्य: 7. मानव अधिकारों के क्षेत्र में शोध को बढ़ावा देना 8. जनता में मानवाधिकारों की जानकारी और उपलब्ध सुरक्षा-उपायों के प्रति जागरूकता फैलाना 9. मानवाधिकार क्षेत्र में कार्यरत गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) के प्रयासों की सराहना करना 10. मानवाधिकारों के प्रचार-प्रसार हेतु आवश्यक अन्य कार्य करना
🔑 परीक्षा बिंदु: ध्यान दें कि आयोग “जांच” कर सकता है, “दंड” नहीं दे सकता — कार्यों की सूची में हर जगह क्रियाएं हैं जैसे जांच करना, सिफारिश करना, समीक्षा करना, जागरूक करना — लेकिन कहीं भी “दंड देना” या “मुआवज़ा देना” नहीं है। यह अंतर अगले भाग (शक्तियां) में और स्पष्ट होगा।
8. आयोग की शक्तियाँ एवं सीमाएं
आयोग को कुछ ऐसी शक्तियां प्राप्त हैं जो आमतौर पर एक सिविल न्यायालय के पास होती हैं:
| शक्ति | विवरण |
|---|---|
| समन जारी करना | गवाहों व पक्षकारों को उपस्थित होने हेतु बुलाना |
| शपथ-पत्र पर साक्ष्य लेना | हलफ़नामे के आधार पर लिखित गवाही स्वीकार करना |
| गवाही रिकॉर्ड करना | साक्ष्य को औपचारिक रूप से दर्ज करना |
| जेल निरीक्षण | देश की किसी भी जेल का निरीक्षण करने का अधिकार |
इन शक्तियों के कारण ही आयोग का चरित्र न्यायिक प्रकृति का माना जाता है। लेकिन यहीं सबसे बड़ा भ्रम पैदा होता है — छात्र अक्सर सोच लेते हैं कि “न्यायिक शक्तियां हैं तो आयोग दंड भी दे सकता होगा।” वास्तविकता इसके उलट है।
⚠️ परीक्षा सावधानी: आयोग न तो मानवाधिकार उल्लंघन के दोषी को दंड दे सकता है, न ही पीड़ित को कोई आर्थिक सहायता या मुआवज़ा सीधे प्रदान कर सकता है। इसका काम जांच करना और सिफारिश करना है — सिफारिश को लागू करना या न करना संबंधित सरकार/प्राधिकरण पर निर्भर करता है।
दो और सीमाएं गांठ बांध लीजिए:
- आयोग केवल उन्हीं मामलों की जांच कर सकता है जिन्हें घटित हुए एक वर्ष से कम समय हुआ हो। इससे पुरानी घटनाओं पर आयोग को कोई अधिकार-क्षेत्र प्राप्त नहीं है।
- सचिव का पद राज्य सरकार के सचिव-स्तर से नीचे नहीं होता, और जांच एजेंसी का नेतृत्व महानिरीक्षक (Inspector General) स्तर से नीचे का पुलिस अधिकारी नहीं कर सकता — यह प्रावधान आयोग की प्रशासनिक हैसियत को ऊंचा रखने के लिए है।
💡 अनुभवी टिप्पणी: यही सीमाएं हैं जिनके कारण आलोचक आयोग को अक्सर “दांतहीन बाघ” (toothless tiger) कहते हैं — यह एक निगरानी-कुत्ता (watchdog) ज़रूर है, पर इसके पास काटने के दांत नहीं हैं, केवल भौंकने यानी सिफारिश करने की ताक़त है। फिर भी, एक संवैधानिक तंत्र में सार्वजनिक सिफारिश का अपना नैतिक व राजनीतिक वज़न होता है, जिसे पूरी तरह नज़रअंदाज़ करना किसी भी सरकार के लिए आसान नहीं होता।
9. राष्ट्रीय बनाम राज्य मानवाधिकार आयोग — पूर्ण तुलनात्मक तालिका
अब तक हमने दोनों आयोगों की तुलना टुकड़ों में देखी। परीक्षा में अक्सर एक ही प्रश्न में यह पूरी तुलना पूछी जाती है, इसलिए इसे एक जगह समेट लेते हैं।
| बिंदु | राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) | राजस्थान राज्य मानवाधिकार आयोग (RSHRC) |
|---|---|---|
| स्थापना अधिनियम | मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 | वही अधिनियम, धारा 21(1) |
| गठन तिथि | 12 अक्टूबर 1993 | अधिसूचना: 18 जनवरी 1999; क्रियाशील: 23 मार्च 2000 |
| मुख्यालय | नई दिल्ली | सचिवालय, जयपुर |
| अध्यक्ष योग्यता | सेवानिवृत्त CJI या उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश | उच्च न्यायालय का सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीश |
| संरचना (2006 के बाद) | 1 अध्यक्ष + 5 सदस्य + 7 पदेन सदस्य | 1 अध्यक्ष + 2 सदस्य |
| नियुक्ति-कर्ता | राष्ट्रपति (उच्चस्तरीय समिति की सिफारिश पर) | राज्यपाल (मुख्यमंत्री-नीत समिति की सिफारिश पर) |
| हटाने का अधिकार | राष्ट्रपति | राष्ट्रपति (राज्यपाल नहीं) |
| कार्यकाल | 3 वर्ष या 70 वर्ष (जो पहले हो) | 3 वर्ष या 70 वर्ष (जो पहले हो) |
| अधिकार-क्षेत्र | पूरे देश में, व्यापक दायरा | केवल राज्य सूची व समवर्ती सूची के विषय |
| वर्तमान अध्यक्ष (2026) | न्यायमूर्ति वी. रामासुब्रमण्यम | न्यायमूर्ति गंगा राम मूलचंदानी |
🔑 परीक्षा बिंदु: यह तालिका “Match the Column” प्रकार के प्रश्नों के लिए विशेष रूप से उपयोगी है — RPSC अक्सर NHRC और SHRC के प्रावधानों को आपस में मिलाकर भ्रामक विकल्प (जैसे “NHRC में भी अध्यक्ष व 2 सदस्य होते हैं”) बना देता है, जो ग़लत होता है।
10. महत्वपूर्ण व्यक्तित्व — आयोग के अध्यक्षगण
आयोग की प्रथम अध्यक्ष न्यायमूर्ति कांता भटनागर थीं — एक ऐसा नाम जो राजस्थान की न्यायिक परंपरा में दोहरे कारणों से विशेष स्थान रखता है। वे मद्रास उच्च न्यायालय की प्रथम महिला मुख्य न्यायाधीश रह चुकी थीं, और इस तरह राजस्थान मानवाधिकार आयोग की प्रथम अध्यक्ष होने के साथ-साथ वे इस आयोग की भी पहली महिला अध्यक्ष थीं — यह इत्तेफ़ाक नहीं, एक ही व्यक्ति से जुड़ा दोहरा तथ्य है, इसलिए भ्रमित न हों।
समय के साथ यह पद कई और विशिष्ट न्यायविदों के पास रहा — जिनमें नागेन्द्र कुमार जैन (2005-2010, जो मद्रास व कर्नाटक उच्च न्यायालय के भी मुख्य न्यायाधीश रह चुके थे) और प्रकाश चंद्र टाटिया (2015-2019, जो झारखंड उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश तथा सशस्त्र सेना अधिकरण के अध्यक्ष भी रह चुके थे) उल्लेखनीय हैं।
वर्तमान में (2026 तक) आयोग के अध्यक्ष न्यायमूर्ति गंगा राम मूलचंदानी हैं, जिन्होंने 25 अक्टूबर 2023 को पदभार संभाला। यह तथ्य केवल किताबी नहीं है — RAS Pre परीक्षा (1 अक्टूबर 2023) में एक कथन-आधारित प्रश्न में सीधे इसी नाम की पुष्टि करने को कहा गया था, जिससे स्पष्ट होता है कि RPSC “वर्तमान अध्यक्ष कौन है” जैसे तथ्यों को कितनी गंभीरता से करंट अफेयर्स के रूप में परखता है।
💡 अनुभवी टिप्पणी: एक अभ्यर्थी के तौर पर सबसे बड़ी ग़लती यह होती है कि लोग “प्रथम अध्यक्ष” को तो अच्छे से रट लेते हैं, पर “वर्तमान अध्यक्ष” अपडेट करना भूल जाते हैं — जबकि यही वह तथ्य है जो परीक्षा की तारीख के जितना करीब होता है, उतना ही ज़्यादा पूछे जाने की संभावना रखता है। हर अपडेट से पहले आधिकारिक वेबसाइट ज़रूर देख लें।
❓ PYQ — परीक्षा में पूछे गए प्रश्न
RPSC RAS Pre — 1 अक्टूबर 2023
Q. राजस्थान राज्य मानव अधिकार आयोग के संबंध में निम्नांकित कथनों पर विचार कीजिए: (i) मानव अधिकार संरक्षण (संशोधन) अधिनियम, 2006 के प्रावधानानुसार आयोग के एक अध्यक्ष एवं चार सदस्य हैं। (ii) वर्तमान में गंगाराम मूलचंदानी इसके अध्यक्ष हैं।
- (A) न तो (i) न ही (ii) सही है
- (B) (i) व (ii) दोनों सही हैं
- (C) केवल (ii) सही है ✓
- (D) केवल (i) सही है
व्याख्या: कथन (i) ग़लत है — 2006 संशोधन के बाद संरचना 1 अध्यक्ष + 2 सदस्य है, 4 सदस्य नहीं (वह तो 2006 से पहले की मूल व्यवस्था थी)। कथन (ii) सही है — गंगाराम मूलचंदानी वास्तव में आयोग के अध्यक्ष हैं। इसलिए उत्तर (C) है।
RPSC 2nd Grade Teacher (IT Paper) — 22 दिसंबर 2022
Q. राजस्थान राज्य मानवाधिकार आयोग का संघटन है —
- (A) एक अध्यक्ष एवं 6 सदस्य
- (B) एक अध्यक्ष एवं 3 सदस्य
- (C) एक अध्यक्ष एवं 4 सदस्य
- (D) एक अध्यक्ष एवं 2 सदस्य ✓
व्याख्या: प्रारंभ में आयोग में एक पूर्णकालिक अध्यक्ष व चार सदस्य रखे गए थे। मानव अधिकार संरक्षण (संशोधित) अधिनियम, 2006 के अनुसार अब राज्य मानवाधिकार आयोग में एक अध्यक्ष व दो सदस्यों का प्रावधान है।
RPSC Senior Teacher Grade-II Comp. Exam — 2016
Q. राजस्थान मानवाधिकार आयोग के अध्यक्ष एवं सदस्यों की नियुक्ति राज्यपाल एक समिति की अनुशंसा पर करते हैं, जिसका अध्यक्ष होता है —
- (A) प्रभारी मंत्री, गृह विभाग
- (B) विधानसभा अध्यक्ष
- (C) मुख्यमंत्री ✓
- (D) विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष
व्याख्या: नियुक्ति-समिति की अध्यक्षता मुख्यमंत्री करते हैं; गृह मंत्री, विधानसभा अध्यक्ष व नेता प्रतिपक्ष इसके सदस्य होते हैं, अध्यक्ष नहीं।
Q. राज्य मानवाधिकार आयोग के प्रथम अध्यक्ष कौन थे?
- (A) जस्टिस प्रेमचन्द जैन
- (B) जस्टिस एन. के. जैन
- (C) जस्टिस एस. सगीर अहमद
- (D) जस्टिस कांता भटनागर ✓
व्याख्या: न्यायमूर्ति कांता भटनागर राजस्थान राज्य मानवाधिकार आयोग की प्रथम अध्यक्ष थीं। यही प्रश्न “आयोग की प्रथम महिला अध्यक्ष कौन थीं” के रूप में भी पूछा जा चुका है — उत्तर वही रहता है, क्योंकि यह एक ही व्यक्ति से जुड़ा दोहरा तथ्य है।
सूची-I (व्यक्ति) | सूची-II (पद)
(A) कांता भटनागर | (1) NHRC के प्रथम अध्यक्ष
(B) रंगनाथ मिश्र | (2) RSHRC के प्रथम अध्यक्ष
(C) गंगा राम मूलचंदानी | (3) NHRC के वर्तमान अध्यक्ष
(D) वी. रामासुब्रमण्यम | (4) RSHRC के वर्तमान अध्यक्ष
उत्तर: A-2, B-1, C-4, D-3स्मरणीय संकेत (Memory Tricks)
| विषय | ट्रिक |
|---|---|
| संरचना (2006 बाद) | “1+2 फॉर्मूला” = 1 अध्यक्ष + 2 सदस्य |
| अध्यक्ष योग्यता | “राज्य में CJ, राष्ट्र में CJI” = राज्य आयोग अध्यक्ष के लिए हाईकोर्ट का मुख्य न्यायाधीश (CJ); NHRC अध्यक्ष के लिए भारत का मुख्य न्यायाधीश (CJI) या SC जज |
| तीन अलग शक्तियां | “नियुक्ति राज्यपाल, शपथ CJ हाईकोर्ट, हटाना राष्ट्रपति” — तीनों काम तीन अलग लोगों के पास |
| समिति सदस्य | “मु-गृ-वि-वि” = मुख्यमंत्री (अध्यक्ष) + गृहमंत्री + विधानसभा अध्यक्ष + विपक्ष नेता |
| कार्यकाल | “3-70 फॉर्मूला” = 3 वर्ष या 70 वर्ष, जो पहले हो (2019 से; पहले था 5 वर्ष) |
| दोनों तारीखें | “18-1 घोषणा, 23-3 आगाज़” = 18 जनवरी 1999 को अधिसूचना, 23 मार्च 2000 से क्रियाशील |
| सबसे बड़ी सीमा | “जांच हां, दंड नहीं” = आयोग जांच व सिफारिश कर सकता है, दंड या मुआवज़ा नहीं दे सकता |
Quick Revision Box
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC):
→ अधिनियम: मानव अधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 (लागू: 28 सितंबर 1993)
→ गठन: 12 अक्टूबर 1993
→ प्रथम अध्यक्ष: रंगनाथ मिश्र
→ मुख्यालय: नई दिल्ली
→ वर्तमान अध्यक्ष (2026): वी. रामासुब्रमण्यम (30 दिसंबर 2024 से)
→ संरचना: 1 अध्यक्ष + 5 सदस्य + 7 पदेन सदस्य
→ अध्यक्ष योग्यता: सेवानिवृत्त CJI / SC न्यायाधीश
→ नियुक्ति: राष्ट्रपति
राजस्थान राज्य मानवाधिकार आयोग (RSHRC):
→ वैधानिक आधार: धारा 21(1), अधिनियम 1993
→ अधिसूचना: 18 जनवरी 1999
→ क्रियाशील: 23 मार्च 2000
→ मुख्यालय: सचिवालय, जयपुर
→ संरचना (2006 बाद): 1 अध्यक्ष + 2 सदस्य (पहले 1+4 था)
→ अध्यक्ष योग्यता: उच्च न्यायालय का सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीश
→ प्रथम अध्यक्ष: कांता भटनागर (प्रथम महिला अध्यक्ष भी)
→ वर्तमान अध्यक्ष (2026): गंगा राम मूलचंदानी (25 अक्टूबर 2023 से)
नियुक्ति व हटाना:
→ नियुक्ति-कर्ता: राज्यपाल
→ सिफारिश-समिति अध्यक्ष: मुख्यमंत्री
→ समिति सदस्य: CM + गृहमंत्री + विधानसभा अध्यक्ष + नेता प्रतिपक्ष (राजस्थान में 4)
→ शपथ दिलाने वाला: उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधीश
→ हटाने वाला: केवल राष्ट्रपति (राज्यपाल नहीं)
→ कार्यकाल: 3 वर्ष या 70 वर्ष, जो पहले हो (2019 से पहले: 5 वर्ष)
अधिकार-क्षेत्र व शक्तियां:
→ जांच का दायरा: केवल राज्य सूची + समवर्ती सूची
→ समय-सीमा: घटना के 1 वर्ष के भीतर ही जांच संभव
→ शक्तियां: समन, शपथ-पत्र साक्ष्य, गवाही रिकॉर्ड, जेल निरीक्षण
→ सबसे बड़ी सीमा: दंड नहीं दे सकता, मुआवज़ा नहीं दे सकता — केवल सिफारिश
→ धारा 2(घ): 'मानवाधिकार' शब्द की परिभाषा
→ धारा 33: वित्तीय स्वायत्तता









